रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
समीक्षा भाग ३
रीतिबद्धमार्गी शाखा की निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती है—
१. शृंगारिकता
२. आलंकारिकता
३. भक्ति और नीति
४ काव्यरूप
५. ब्रजभाषा की प्रधानता
६. जीवन-दर्शन का अभाव
१. शृंगारिता—रीतिकाल मे शृंगार-वर्णन की प्रधानता रही है । इसी
प्राधान्य के कारण कतिपय विद्वान् इस काल को ‘शृंगार काल’ कहना उप-
युक्त समझते है । शृंगार-रस का जितना सूक्ष्म विवेचन इस काल मे हुआ है,
उतना किसी काल मे नही हुआ । इस प्रवृत्ति का मुख्य कारण तत्कालीन राज-
नीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ है । कवियो का ध्येय अपने आश्रयदाता
का मनोरजन करना होता था और मनोरजन के लिए शृंगार के अलावा और
क्या विषय उपयुक्त हो सकता है । भक्तिकाल मे माधुर्य भक्ति का जो अबाध
स्रोत बहा और उसमे जिस शृंगार को अलौकिक रूप दिया गया, वही रीति-
काल मे आकर लौकिक और मांसल बन गया । प्रथम दर्शन से लेकर सुरतांत
तक के चित्रों का इस काल के कवियो ने बडे मनोयोग से चित्रण किया । इसी
कारण इनकी दृष्टि मे प्रेम और नारी का स्वस्थ स्वरूप न आ सका । डॉ०
भागीरथ मिश्र के शब्दो मे—
‘शृंगारिकता के प्रति उनका (रीतिकालीन कवियो का) दृष्टिकोण मुख्यतः
भोगपरक था, इसीलिए प्रेम के उच्चतर सोपानो की ओर वे न जा सके । प्रेम
की अनन्यता, एकनिष्ठता, त्याग, तपश्चर्या आदि उदात्त पक्ष भी उनकी दृष्टि
मे बहुत कम आए है । उनका विलासोन्मुख जीवन और दर्शन सामान्यतः प्रेम
या शृंगार के बाह्य पक्ष शारीरिक आकर्षण तक ही सीमित रहकर रूप को
मादक बनाने वाले उपकरण ही जुटाता रहा । यह प्रवृत्ति नायिका-भेद, नख-
शिख वर्णन, ऋतु-वर्णन, अलंकार निरूपण सभी जगह देखी जा सकती है ।’
२. आलंकारिकता—रीतिकालीन कवियो के काव्य के दो प्रमुख उद्देश्य
थे—मनोरंजन और पांडित्य-प्रदर्शन । आलंकारिकता का प्राधान्य इन दोनो ही
कारणो से रीतिकालीन काव्य मे समाविष्ट हुआ ।, यह सच है कि काव्य मे
४ रसखान-ग्रन्थावली
अलंकारों को उसकी शोभा के आधार पर धर्म माना गया है और यदि उनका
समुचित प्रयोग किया जाए तो काव्य प्रभाव एवं भावप्रेषणीयता में बहुत सीमा
तक सहायक सिद्ध होते हैं। किन्तु रीतिकालीन कवियों ने अलंकारों का प्रयोग
प्राय चमत्कार-प्रदर्शन के लिए ही किया, इसलिए इस काल में श्लेष और
यमक जैसे श्रमसाध्य अलंकारों का बोलबाला रहा। उन कवियों ने चमत्कार
के प्रति अपना इतना गहन प्रलोभन दिखाया है कि यदि रस और चमत्कार में
से उन्हें एक को ग्रहण करने का अवसर आया है तो उन्होंने चमत्कार को ही
ग्रहण किया है।
३. भक्ति और नीति - जो भक्ति भक्तिकाल में कवियों का साध्य थी,
वही इस काल में आकर साधन बन गई। इन्होंने राधा और कृष्ण को लौकिक
धरातल पर ला खड़ा किया और तब ये साधारण नायिका और नायक बनकर
रह गए। भक्ति के प्रति इस काल के कवियों का कोई रुझान नहीं था और न
ये ऐसे वातावरण में ही थे जो भक्ति के अनुकूल पड़ता है। फलतः राधा और
कृष्ण के माध्यम से इन्होंने शृंगारिकता की ही अभिव्यक्ति की है। डॉ० नगेन्द्र
के शब्दों में -
'यह भक्ति भी उनकी शृंगारिकता का अंग थी। जीवन की अतिशय
रसिकता से जब ये लोग घबड़ा उठते होंगे तो राधा-कृष्ण का यही अनुराग
उनके धर्मभीरु मन को आश्वासन देता होगा। इस प्रकार रीतिकालीन भक्ति
एक ओर सामाजिक कवच और दूसरी ओर मानसिक शरणभूमि के रूप में
इनकी रक्षा करती थी। तभी तो ये किसी तरह उनका अंचल पकड़े हुए थे।
रीतिकाल का कोई भी कवि भक्तिभावना से हीन नहीं है-- हो भी नहीं सकता
था, क्योंकि भक्ति उसके लिए एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता थी। भौतिक
रस की उपासना करते हुए उसके विलास-जर्जर मन में इतना नैतिक बल नहीं
था कि भक्तिरस में अनास्था प्रकट करने का उसका सैद्धांतिक निषेध करते।
इसलिए रीतिकाल के सामाजिक जीवन और काव्य में भक्ति का आभास अनि-
वार्यत वर्तमान है और नायक-नायिका के लिए बार-बार हरि और राधिका
शब्दों का प्रयोग किया गया है।'
जहाँ तक नीति का सम्बन्ध है, इस विषय में इन लोगों ने जो कुछ लिखा
है, वह यथार्थ और व्यावहारिक है। वस्तुतः इनका वातावरण भक्ति की
समीक्षा भाग ५
अपेक्षा नीति के अधिक निकट था।
४. काव्यरूप—इस काल का वातावरण मुक्तकों के ही अधिक अनुरूप था,
क्योंकि मनोरंजन इस काल के काव्य का मुख्य प्रयोजन था। ऐसे वातावरण में
किसी प्रबंधकाव्य की आशा करना अनुचित ही है। काव्य का मूल्यांकन उसके
चमत्कार में निहित था। अतः कवि मुक्तक पदों में ही अपनी कवि-प्रतिभा और
पाण्डित्य प्रदर्शन कर सकते थे। प्रबंध और मुक्तक के स्वरूप को स्पष्ट करते
हुए आचार्य शुक्ल मुक्तक के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्देश करते हुए
लिखते हैं —
'मुक्तक में प्रबंध के समान रस की धारा नहीं रहती जिसमें कथा-प्रसंग
की परिस्थिति में अपने आपको भूला हुआ पाठक मग्न हो जाता है और हृदय
में एक स्थायी प्रभाव ग्रहण करता है। इसमें रस के ऐसे छींटे पड़ते हैं जिनमें
हृदय-कलिका थोड़ी देर के लिए खिल उठती है। यदि प्रबंधकाव्य वनस्थली
है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है। इसीसे वह सभा-समाजों के लिए
अधिक उपयुक्त होता है। उसमें उत्तरोत्तर अनेक दृश्यों द्वारा संघटित पूर्ण
जीवन या उसके किसी एक पूर्ण अंग का प्रदर्शन नहीं होता, कोई एक रमणीय
खंडदृश्य इस प्रकार सामने ला दिया जाता है कि पाठक या श्रोता कुछ क्षणों
के लिए मन्त्र-मुग्ध-सा हो जाता है। इसके लिए कवि को मनोरम वस्तुओं या
व्यापारों का एक छोटा-सा स्तवक कल्पित करके उन्हें अत्यन्त संक्षिप्त और
सशक्त भाषा में प्रदर्शित करना पड़ता है।'
कहने की आवश्यकता नहीं कि शुक्ल जी का यह विवेचन रीतिकालीन
काव्यरूप पर भी उतना ही फिट बैठता है जितना स्वतंत्र रूप से।
रीतिकाल में कुछ प्रबंधकाव्य भी लिखे गये हैं, पर मुक्तक काव्यों की
तुलना में उनकी संख्या नगण्य ही है।
५. ब्रजभाषा की प्रधानता—इस काल में ब्रजभाषा के प्रयोग को ही
कवियों ने अधिक महत्त्व दिया और समूचे रीति-कालीन काव्य में इसी भाषा
का बोलबाला रहा। इस प्रयोगाधिक्य से ब्रजभाषा को भी नई शक्ति, नई
सजीवता एवं नई प्राणवत्ता मिली।
६. जीवन-दर्शन का अभाव—रीतिकालीन कवियों के समक्ष यथार्थ
जीवन का कोई महत्त्व नहीं था और न जीवन की सम्पूर्णता ही उन्हें वांछित
६ रसखान-ग्रन्थावली
थी । वे तो जीवन के केवल उसी भाग को ग्रहण करते थे जिसमें कल्पनाओ की
उड़ाने और वासना की थिरकनें थी, युवावस्था से युक्त जीवन ही रीतिकालीन
कवियो का प्रतिपाद्य था । प्रो० भगीरथ मिश्र के शब्दो मे—
'ऐसे लगता है कि रीति कविता के रचियता यौवन और वसन्त के कवि है ।
जीवन का फूलता हुआ सुघर रूप ही उन्हें प्रिय है । पतझड, सघर्ष और विनाश
सम्भवत स्वतः जीवन मे इतने घोर रूप मे विद्यमान था कि कवि काव्य मे
भी उसको उतारकर नैराश्य और निवृत्ति की भावना को जगाना नही चाहता
है । वह तो फूलते-फलते जीवन का भ्रमर है । उसने जीवन का एक ही स्वरूप
लिया, एक ही पक्ष लिया, यह इस धारा के कवि की संकीर्णता है, दुर्बलता
है, और एकागिता है, परन्तु जिस पक्ष को उसने लिया है उसके चित्रण
मे उसने कोई कसर उठा नही रखी । उसके समस्त वैभव और विलास के
चित्रण मे उसने कलम तोड़ दी है ।'
यही कारण है कि रीतिकालीन कवि के पास न तो कोई स्वस्थ जीवन है
और न कोई जीवन-दर्शन है ।
रीतिकाल की दूसरी काव्यधारा रीतिमुक्त कवियो की है । घनानंद,
आलम, बोधा, रसखान आदि इस धारा के प्रमुख कवि है । ये कवि न तो किसी
परम्परा से सबद्ध है और न किसी काव्यशास्त्रीय नियमन से । ये भावावेश के
कवि है। इनके मन मे जो भी भाव स्फुरित होता है, उसे ये अत्यन्त सबल
एव प्रभावोत्पादक अभिव्यंजना के माध्यम से प्रकट करते है । इनके अपने
सिद्धात, अपनी रीति और अपनी अभिव्यंजना शैली है । इनको तो वही
व्यक्ति समझ सकता है जो ब्रजभाषा का अधिकारी विद्वान् होने के साथ-साथ
महास्नेही हो । रसखान का सम्बन्ध इसी धारा से है, अतः इस धारा का परि-
चय प्राप्त करना आवश्यक है ।
भक्ति के युग के पवित्र ब्रह्मद्रव की धारा को पार कर जब हिन्दी के
कवियो ने तनिक सामने की ओर अपनी दृष्टि दौड़ाई तो हरे-हरे लता-कुंजो,
कदम्ब के घने वृक्षों तथा हरियाली से भरे फूलों वाली निर्मल जल की धारा ने
उनके मन को अपनी ओर आकर्षित कर लिया, फिर क्या था, वही उनका
मन "श्याम ह्वै समान्यो, यमुना यमुन जल तरंग मे" कवियो के लिए
कविता का एक नया सुन्दर मार्ग मिल गया । यहाँ कविता की शैली में एक
समीक्षा भाग ७
नूतन परम्परा का आविष्कार हुआ । आगे चलकर इस नवीन परम्परा को
रीतिकाल के नाम से अभिहित किया गया ।
हिन्दी-साहित्य का यह रीतिकाल सभी दृष्टियो से ऊँचा और आदर्श माना
जाता है । इस युग मे कविता करने की एक ऐसी प्रणाली बन गई, जिसका
अवलम्ब सभी परवर्ती कवियो ने लिया । सच पूछा जाए तो भाषा, शैली और
विषय तीनो दृष्टियो से यह काल एक ऐसा राजमार्ग बना, जिस पर चलकर
तत्कालीन कवियो को कविता करने मे विशेष सुविधाएँ मिली । इस युग मे
कविता-पद्धति के हम दो विभिन्न रूप देखते हैं ।
एक रीतियुक्त और दूसरा रीतिमुक्त । रीतियुक्त कवियो ने काव्य के
लक्षण-ग्रन्थो के आधार पर कविताएँ लिखी पर रीतिमुक्त कवियो ने स्व-
तन्त्र रूप से अपनी रचनाएँ उपस्थित की । इन कवियो मे से प्रमुख कवि
घनानन्द थे । सच पूछा जाए तो इन कवियो की स्थिति रीतिकाल मे उसी
प्रकार की थी जिस प्रकार कमल की स्थिति जल मे होती है । सूक्ष्म रूप से
इनके काव्य का अध्ययन करने से इस बात की प्रामाणिकता स्पष्ट हो जाती
है ।
रीतिकालीन कविता का राजमार्ग आद्योपान्त शृंगार रस से अभिसिंचित
है, इसमे संभवत तो किसीको भी सन्देह नही, पर रीतिमुक्त कवियो ने इस
पथ पर जहाँ तक सचरण किया भक्ति के, अगर, धूप, चन्दन से उसे पवित्र
कर दिया । इनकी कविता केवल शृंगार की वशी-ध्वनि ही नही, अपितु
भक्ति की खञ्जडी भी मुखरित सुनाई पडती है । इन्होने शृंगार के साथ
भक्ति का मिश्रण करके बिहारी के 'श्याम हरित द्युति होय' से कुछ कम
कमाल नही किया । दो शब्दो मे यदि हम रीतिमुक्त कवियो को रीति पर-
म्परावादी कवियो मे भक्त कवि मान ले तो अधिक युक्तिसंगत होगा । इस
परम्परा के अन्तर्गत घनानन्द, बोधा, आलम, निवाज, ठाकुर आदि प्रमुख हैं ।
इस धारा के कवियो के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ या सामान्य प्रवृत्तियाँ
निम्नलिखित हैं:—
१. काव्य-रचना का प्रेरणा स्रोत निजी जीवन :—यद्यपि इन
कवियों मे से कुछ का संबंध विभिन्न राजाओं के दरबार से भी रहा ।
किन्तु फिर भी इन्होंने केवल अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के
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लिए काव्य-रचना नही की । इनकी काव्य-रचना का प्रेरणा स्रोत इनका
वैयक्तिक जीवन ही था । इन्होने अपने जीवन मे प्रेम और विरह की ऐसी
अनुभूतियाँ प्राप्त की जिन्होने इनको काव्य-रचना के लिए विवश कर दिया ।
यह कविता नही लिखते थे, अपितु कविता स्वत ही इनकी अनुभूतियो से प्रेरित
होकर उच्छ्वसित हो जाती थी । घनानन्द ने लिखा है—
“लोग है लागि कवित्त बनावत,
मोहि तो मेरे कवित्त बनावत ।”
इसी प्रकार इस धारा से अन्य कवियो ने भी प्रयत्नपूर्वक कविता नही
लिखी, अपितु उसमे उनकी भावनाओ के सहज स्वाभाविक उद्गार हैं । इनके
बहुत से समकालीन कवि रीति के लक्षणो को ध्यान मे रखकर कविता करते
थे, जो इन्हे पसन्द न थी ।
ठाकुर ने ऐसे कवियो की आलोचना करते हुए लिखा है—
“सीखि लीनो मीन मृग खंजन, कमल नयन,
सीखि लीनो जस और प्रताप को कहानो है ।”
इससे स्पष्ट है कि इस धारा के कवियो ने कविता के वास्तविक महत्व को
समझा था । यही कारण है कि इनकी कविता मे बाह्य शरीर के चित्रण के
स्थान पर हृदय की सच्ची पुकार मिलती है ।
२ स्वच्छन्द प्रेमः—जो प्रेम समाज की मर्यादाओ के प्रतिकूल हो, उसे
स्वच्छन्द प्रेम का नाम दिया जाता है । हिन्दी के इन कवियो का प्रेम भी
स्वच्छन्द प्रेम की कोटि मे आता है । इन कवियो ने जाति, समाज और धर्म
की अनुयायिनी ली । घनानन्द की सुजान, बोधा की सुभान, आलम की शेख,
आदि नायिकाएँ जाति की मुसलमान थी । ऐसी स्थिति मे इन कवियो को प्रेम
के क्षेत्र मे विविध कठिनाइयो का सामना करना पडा । मित्रो का उपहास,
समाज की निन्दा और आश्रयदाताओ के विरोध का उन्हे सामना करना पडा ।
उन्हे जीवन मे अनेक कष्ट सहने पडे, किन्तु फिर भी वे अपने प्रेम-मार्ग से
पीछे नही हटे । उनके प्रेम मे सच्चाई और एकोन्मुखता के दर्शन होते है । बोधा
के शब्दो मे वे अपनी प्रेयसी के लिए संसार के वैभव को ठुकराने के लिए सहर्ष
प्रस्तुत है—
“एक सुभान के आनन पे, कुरबान जहाँ लगि रूप जहाँ को ।
जानि मिले तो जहान मिले, नहि जान मिले तो जहान कहाँ को ॥”
समीक्षा भाग ६
प्रेम की इसी अनन्यता के कारण इनके शृंगार वर्णन मे स्वच्छता, पवित्रता
और गभीरता मिलती है जिसका रीतिबद्ध कवियो मे अभाव मिलता है।
३. सौन्दर्य का सूक्ष्म रूप मे चित्रण जहाँ रीतिबद्ध कवियो ने अपने
काव्य मे नारी के स्थूल अंगो की नाप-जोख की है वहाँ इन्होने अपनी प्रेयसियो
के सौन्दर्य का वर्णन अत्यंत सूक्ष्म रूप मे किया है। वह उनके नख-शिख का
वर्णन न करके उसके स्थान पर सौन्दर्य की अनुभूतिपूर्ण झलक प्रस्तुत करते हैं।
घनानन्द के अनुसार—
"अंग अंग तरंग उठे द्युति की
परि है मनु रूप अवै घर च्वै।"
अर्थात् नायिका के प्रत्येक अंग से सौन्दर्य की लहरे उठ रही हैं। अभी इसका
रूप धरती पर चू पड़ेगा। इसी भाँति वे स्थूल विशेषताओ के स्थान पर सूक्ष्म
सौन्दर्य का चित्रण करते है। नायिका के होठो की लाली की अपेक्षा इन्हे उसकी
मुस्कराहट अधिक आकर्षित करती है। देखिए—
"छवि को सदन, गोरो वदन रुचिर भाल,
रस निचुरत मृदु मीठी मुसक्यानि मे।"
उसकी मीठी मुस्कराहट मे रस टपक रहा है। यह वाक्य हमे छायावादी
सौन्दर्य पद्धति का स्मरण कराता है। यहाँ 'मीठी' का प्रयोग विशेषण विपर्यय
के रूप मे हुआ है जो कि छायावाद की विशेषता मानी जाती है। इसी प्रकार
अन्य कवियो ने भी सौन्दर्य का अंकन सूक्ष्म रूप मे ही किया है।
४. शृंगार के संयोग और वियोग पक्ष का चित्रण— स्वच्छन्द
धारा के कवियो को विरह और मिलन दोनो मे प्रेमियो के हृदय के अन्त.स्थो
को उद्घाटित करने की ही लगी रहती है। वैसे तो इन्होने शृंगार के दोनो
स्थलो का चित्रण किया है, परन्तु इनकी मनोवृत्ति वियोग-पक्ष मे अधिक
रमी है। प्रेम को ये लोग आन्तरिक और गोपनीय वस्तु मानते हैं। रीति
मार्गीय कवियो की प्रेम-वक्रता के विरुद्ध ये लोग तो यह मानते है—
"अति सूधो सनेह को मारग है,
जहाँ नेक सयानप बाँध नही।"
परन्तु सयोग मे बाहरी जगत की प्रधानता होती है और उस समय कवि
की अन्तर-वृत्ति भी बहिर्मुखी होती है। ऐसी स्थिति मे प्रेम की सघनता व तर-
१०
रसखान-ग्रन्थावली
लता अभिव्यक्त नही हो पाती । वियोग पक्ष मे कवि की दृष्टि अन्तर्मुखी होती
है । वह प्रेमानुभूति को स्वय प्रेमी बनकर प्रकट करता है । अतः उसकी विरह-
उक्तियाँ हृदय के अन्तस्तल से सच्ची प्रकार से प्रकट होती है । वह प्रेम की
अतुल गहराइयो तक बैठने को आतुर रहता है । वियोग की अमिट प्यास हृदय
को सदा द्रवित रखती है । विरह मे अनुभूति का स्वरूप अधिक तीव्र होता है ।
अतः उनकी विरह विषयक धारणा अधिक विलक्षण है । वस्तुत इनकी प्रेम
तृपा सदा बढती ही रहती है । इनमे विरह का मार्मिक चित्रण है और निजी
प्रेम की पीर का प्रदर्शन सच्चे रूप मे मिलता है ।
आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने इन कवियो को सूफियो से प्रभावित
माना है । उनका यह विश्वास है कि इनके काव्यो मे वर्णित प्रेम-पीर फारसी
काव्य-धारा का प्रभाव है जो कि सूफियो के माध्यम से आया है । उनके ही
शब्दो मे "इन स्वच्छन्द कवियो ने फारसी काव्यगत वेदना की निवृत्ति के
साथ इस प्रेम-पीर का स्वागत किया । इनकी रचना मे वियोग के आधिक्य
का कारण यही है । लौकिक पक्ष मे इनका विरह निवेदन फारसी काव्य की
वेदना की विवृत्ति से प्रभावित है और अलौकिक पक्ष मे सूफियो की प्रेम-पीर
से ।" रीतिमुक्त कवियो ने विरह का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन नही किया है ।
वह नायिका को रीतिबद्ध कवियो की तरह इतनी जलती हुई नही दिखाता
कि "उस पर गुलाब जल की शीशी औंधा दी जाए तो वह भाप बनकर उड़
जाएगी ।" परन्तु रीतिमुक्त कवि इन सब अन्तर्दशाओ का चित्रण आंतरिक
शैली से करता है ।
इन्होने कृष्ण के सगुण सलौने रूप को अपने काव्य का विषय बनाया है,
अत इन्होने कृष्ण और राधा के सयोग पक्ष के प्रेम की भी बडी मनोहारी
और मार्मिक झाँकियाँ प्रस्तुत की है । इनका प्रेम वासना-पकिल न होकर स्वच्छ
चमत्कार प्रदर्शन है । सक्षेप मे कहा जा सकता है कि इनका प्रेम वहिर्मुखी न
होकर अन्तर्मुखी अधिक है । उसमे हृदय की मार्मिक सूक्ष्म अनुभूतियो और
सौन्दर्य की महीन से महीन बारीकियाँ है । वस्तुतः ये प्रेम हृदय और सौन्दर्य के
सच्चे पारखी है ।
५ भक्ति का स्वरूप - इन कवियो ने राधा और कृष्ण की लीलाओ
का उन्मुक्त गान किया है, किन्तु इतने भर से इन्हे कृष्णभक्त कवि सूरदास
समीक्षा भाग ११
आदि की कोटि में नही रखा जा सकता। क्योकि लगभग सभी रीतिकालीन
कवियो का यह कथन है—
आगे के सुकवि रीझि है तो कविताई,
न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है।'
इनको शुद्ध रूप से भक्त कवि नही कहा जा सकता क्योकि इनका प्रमुख
उद्देश्य शृंगार-वर्णन था। इसीलिए इन्होने भगवद् भक्ति की ओर से अश्लील
एवं असंस्कृत चित्र प्रस्तुत किए। आचार्य विश्वनाथप्रसाद के अनुसार पहले
इनकी रुचि रीतिबद्ध रचना की ओर दिखाई देती है। दूसरे रूप मे इन्होने
स्वच्छन्द रूप से प्रेम के पवित्र क्षेत्र में पदार्पण किया। तीसरे मे इनकी रचनाएँ
भक्तिपरक हो गईं।"
आगे वह लिखते हैं कि यदि भक्त कहे बिना सतोष न मिले तो इन्हे उन्मु-
क्त भक्त कवि मान लिया जा सकता है। इनका भक्त कवियो से पार्थक्य इनकी
स्वच्छन्द प्रकृति द्वारा ही हो जाता है। दूसरा इन्होने भक्त कवियो द्वारा त्याज्य
विषयों को "प्रिय की वास्तविक कठोरता" आदि का वर्णन विस्तार से किया
है। इनकी भक्ति मे साम्प्रदायिकता एव संकीर्णता की भावना नही है। उन्होने
अनेक देवी-देवताओ के प्रति उदार आस्था प्रदर्शित की है। रसखान और घना-
नंद को ही इस भक्त कोटि मे रखा जा सकता है।
६. प्रकृति चित्रण—प्रायः सभी कवियो ने हिन्दी-साहित्य के प्रथम तीन
कालो मे प्रकृति-चित्रण को उपेक्षित रखा है। परन्तु रीतिकाल मे दृष्टि
शृंगारपरक होने के कारण शृंगारिक चित्रण मे अधिक रमी इसलिए
उनकी दृष्टि भी इसके वर्णन से दूर हट गई। रीतिकाल मे प्रकृति का चित्रण
उद्दीपन रूप मे हुआ है। सेनापति की रचना मे प्रकृति कही-कही उद्दीपन के
वधन से मुक्त अवश्य मिल जाती है। विरह वारीश मे बोधा मे प्रकृति वर्णन
कुछ तो गास्त्र वद्ध और कुछ स्वच्छन्द वृतिबद्ध रखा है।
७. लोक-जीवन का ग्रहण — स्वच्छन्दमार्गी कवियों ने लोक-जीवन के
मगल मोद पक्ष को भी लिया है। प्रसिद्ध पर्व त्यौहारो पर रीतिमुक्त शैली में
उत्तम रचनाएँ की है। अखतीज, हरियाली तीज, झूला, वट पूजन आदि अनेक
त्यौहार ठाकुर के काव्य मे वर्णित हुए है।
८. काव्य पद्धतिः—स्वच्छन्द कवियों ने रीति का निर्वाह आरम्भ में स्वीकृत
१२ रसखान-ग्रन्थावली
करके बाद मे त्याग दिया । रीतियुक्त, रीतिबद्ध सभी कवियो मे नेत्र व्यापार
सम्बन्धी सभी उक्तियाँ समान रूप से पाई जाती हैं। राजाश्रित कवि ने तो उर्दू
या फारसी के काव्यरचना के रकीबो और माशूको की जोड-तोड मे खण्डिता
को पेश किया । यहाँ पर ये कुछ रीतिबद्ध कवियो के समीप आ जाते हैं।
स्वच्छन्द कवियो ने खंडिता नायिका के द्योतक चिन्हो के ब्योरे प्रस्तुत न करके
उसके हृदय को दिखलाने का प्रयत्न किया । सुरतात या विपरीत रति के कुत्सित
चित्र प्रायः इन कवियो मे नही मिलते हैं। जो मिलते हैं वह भी उस समय के
जब इन कवियो ने इस मैदान प्रवेश किया था । बोधा मे कही-कही बाजारू ढग
अवश्य मिलता है ।
६. मुक्तक शैली :- वैसे तो समूचे रीतिकाल मे मुक्तक शैली की ही
प्रधानता पाई जाती है । परन्तु फिर भी कभी-कभी फुटकल रूप मे प्रबन्ध
काव्यो की रचना होती रही । आलम ने "माधवानल' 'कामकदला' 'सुदामा
चरित्र' और श्याम स्नेही, बोधा ने 'विरह वारीश' नामक प्रबन्ध काव्य प्रस्तुत
किए ।
१०. छन्दालंकार :- इस धारा मे अधिकांशतः कवित्त, सवैया और
दोहा जैसे छन्दो का प्रयोग किया गया । यद्यपि बीच-बीच मे छप्पय, व रवै
हरिपद आदि छन्दो का प्रयोग किया गया है किन्तु सभी रीति-कवियो की
वृत्ति अधिकतर दोहा-सवैया और कवित्त मे रमी है। रीतिमुक्त धारा के
कवियो ने अलकारो का प्रयोग अपने प्रकृत रूप मे किया है। इनके यहाँ अल-
कार साधन रूप मे आए हैं न कि साध्य के रूप मे ।
११ भाषा :- भाषा का परिमार्जन और व्यवस्थापन भी इन स्वच्छन्द
कवियो के द्वारा ही हुआ है। क्योकि रीतिबद्ध कवियो के पास इतना अवकाश
होते हुए भी उन्होने भाषा को व्यवस्थित करने का प्रयास नही किया । मति-
राम और पद्माकर को छोडकर दूसरे कवियो मे भाषा की सफाई के दर्शन
नही होते । भूषण और देव आदि ने स्वेच्छा से शब्दो को तोडा-मरोडा है।
इनकी भाषा मे प्रादेशिकता की पुट भी बनी रही । परन्तु रीतिमुक्त कवियो
मे न तो भाषा के अंग भंग की प्रवृत्ति और न ही प्रादेशिकता का ही पुट है।
रसखान और घनानन्द ने तो ब्रज भाषा का ऐसा प्रयोग किया है जिसमे ब्रज भाषा
समीक्षा भाग १३
का साहित्यिक परिनिष्ठित रूप स्वीकृत और मुहावरो का भो सुन्दर प्रयोग
हुआ है।
अन्त मे हम कह सकते है कि इनकी कविता सच्ची अनुभूति से पूर्ण है ।
भावपक्ष और कलापक्ष दोनो की दृष्टि से इनका काव्य प्रौढ़ है । यदि हम इस
काव्यधारा के सर्वश्रेष्ठ कवि घनानन्द को हिन्दी श्रृंगारी कवियो में सर्वश्रेष्ठ
मानें तो अनुचित नही होगा ।
: २ :
रसखान का जीवन-वृत्त
रीतीकालीन स्वच्छन्द काव्यधारा के विशिष्ट कवि रसखान का न तो जीवन-
वृत्त ही निर्विवाद है और न इनकी रचनाएँ । इनके जीवन-वृत्त को जानने की
जो सामग्री उपलब्ध है, उसे दो भागो मे विभाजित किया जा सकता है—अन्तः
साक्ष्य और बाह्य साक्ष्य । अन्त.साक्ष्य मे वे तथ्य होते है जो सम्बद्ध कवि की
रचना अथवा रचनाओ मे मिलते है । बाह्य साक्ष्य मे अन्य विद्वानो द्वारा अन्वे-
षित तथ्यो का विवेचन होता है । इन्ही दो आधारो पर हम यहाँ पर रसखान
का जीवन-वृत्त प्रस्तुत कर रहे है ।
अन्तःसाक्ष्य—जहाँ तक अंत साक्ष्य का सम्बन्ध है, अन्य भक्त-कवियो
की भाँति रसखान भी अपने विषय मे प्रायः मौन रहे, चाहे शालीनतावश अथवा
राजनीतिक कारणो से । प्रेम-वाटिका मे अपने विषय मे इन्होने निम्नलिखित
केवल चार दोहे लिखे है —
१. देखि गदर हित-साहिबी, दिल्ली नगर मसान ।
छिनहिं बादसा-बस की, ठसक छोरि रसखान ॥
२ प्रेम-निकेतन श्रीबनहिं, आइ गोवर्धन-धाम ।
लह्यौ सरन चित माहिंकै, जुगल-सरूप ललाम ॥
३. तोरि मानिनी ते हियो, फोरि मोहिनी मान ।
प्रेमदेव की छविहि लखि, भए मियाँ रसखान ॥
४. बिधु सागर रस इन्दु सुभ, बरस सरस रसखान ।
प्रेमवाटिका रचि रुचिर, चिर हिम हरषि वखान ॥
इन दोहो से यह ज्ञात होता है कि जब दिल्ली में शासन-लिप्सा के कारण
गदर हुआ और दिल्ली नगर श्मशान की भाँति कुरूप एवं भयानक हो गया तो
रसखान शाही वंश का तुरंत गर्व छोड़कर, तथा अपनी मानिनी प्रिया मान
की चिन्ता न करते हुए ब्रज मे आए, जहाँ इन्होने संवत् १६७१ मे प्रेमवाटिका
की रचना की ।
समीक्षा भाग १५
यह कथन समस्या का सरल समाधान नही, वरन् समस्या को और उलझा
देने वाला है । इस कथन से उपस्थित समस्याये ये हैं—
१. रसखान का अभिप्राय किस गदर से है ? यह गदर कब हुआ ?
२. रसखान ब्रज मे कब आये ?
३. रसखान की प्रेयसी कौन थी जिसे ये ठुकराकर ब्रज आये ?
४. 'प्रेमवाटिका' की रचना करते समय रसखान की आयु क्या थी ?
हिन्दी-विद्वान् उपर्युक्त प्रथम दो प्रश्नो को तो प्रायः उपेक्षित कर गए हैं ।
'प्रेमवाटिका' के रचना-काल को सर्वाधिक महत्त्व देकर इसके आधार पर रस-
खान के जो विभिन्न काल निर्णीत किए गए है, वे इस प्रकार है—
१ 'शिवसिंह-सरोज' के लेखक शिवसिंह ने इनका जन्म संवत् १६३०
माना है ।
२. 'शिवसिंह-सरोज' के मत को आधार मानकर ही बाबू राधाकृष्णदास
ने 'सूरसागर' की भूमिका मे रसखान का जन्म संवत् १६३१ स्वीकार
किया है ।
३ पं० किशोरीलाल गोस्वामी ने स्व-सम्पादित 'प्रेमवाटिका' के द्वितीय
संस्करण मे रसखान का समय सोलहवी शताब्दी निश्चित किया है ।
४. 'रसखान और घनानंद' नामक कृति के सम्पादक बाबू अमीरसिंह ने
पं० किशोरीलाल गोस्वामी के मत को ही मान्यता प्रदान की है ।
५. मिश्रबन्धुओं ने 'मिश्रबन्धु-विनोद' में रसखान का जन्म संवत् १६१५
में और देहावसान संवत् १६८५ मे माना है ।
६ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने रसखान के केवल कविता काल का उल्लेख
किया है जो संवत् १६४० के उपरांत है ।
७. डॉ० रामकुमार वर्मा ने संवत् १६७१ को ही रसखान का कविता-
काल माना है ।
ये मत मुख्यतः 'प्रेमवाटिका' के रचना काल पर ही आधृत हैं ।
कुछ विद्वानो ने 'दिल्ली के गदर' के आधार पर रसखान के समय का
निर्णय करने के प्रयास किये हैं । श्री अमृतलाल शील ने दिल्ली की इस दुर्घ-
टना को नादिरशाह के भीषण आक्रमण से जोड़कर रसखान का समय
गोस्वामी विट्ठलनाथ से १५० वर्ष पश्चात् माना है । पर शील जी अपने मत
१६ रसखान-ग्रन्थावली
की स्थापना करते समय ये भूल गये है कि गोस्वामी विट्ठलनाथ रसखान के
दीक्षा-गुरु थे । हिन्दी के कुछ अन्य विद्वानो की भांति आचार्य चन्द्रवली पाडेय
ने भी जहाँगीर (सलीम) के पुत्र खुसरू (जन्म संवत् १६४२, मरणकाल
संवत् १६७६) द्वारा राज्य हड़पने की संवत् १६६२-६३ वाली विफल घटना
को रसखान द्वारा उल्लिखित "दिल्ली का गदर' स्वीकार किया है । कुछ अन्य
विद्वानो ने अकबर की काबुल-विजय को ही दिल्ली का गदर मान लिया है ।
डॉ० भवानीशंकर याज्ञिक ने इन सभी मान्यताओ को अमान्य ठहराते हुए उस
विषय पर विस्तार से, इतिहास के परिवेश मे, विचार किया है । ये इस
घटना को अकबरकालीन मानते हैं—
'ठीक इसी समय सं० १६४२ (२३ जनवरी, १५५६ ई०) मे अपने पुस्त-
कालय की सीढ़ी से गिर पड़ने से हुमायूँ की अचानक मृत्यु हो गई और अक-
बर संवत् १६१२ (१४ फरवरी, १५५६ ई०) को गद्दी पर बैठा । उसने
पठानो को खदेड-खदेड़ कर अशक्त कर दिया । और थोडे समय मे सबका
दमन कर सूरवंश का नाम मिटा दिया । सिकन्दरशाह सूर अकबर से प्राणो की
भिक्षा पाकर शेष जीवन बंगाल मे व्यतीत करने लगा और तीन वर्ष बाद मर
गया । महमूदशाह आदिल को, जो चुनारगढ मे था, महमूदखाँ के पुत्र
खिजिरखाँ ने अपने पिता के वध का बदला लेने के लिए बिहार मे सूरजगढ मे
परास्त कर स० १६१७ मे मरवा डाला । इब्राहीमखाँ जो सभल भाग गया था,
हेमु से वार-वार पराजित होकर बुन्देलखंड और फिर उडीसा भाग गया और
कुछ वर्षों बाद मारा गया । हुमायूँ की मृत्यु का समाचार मिलते ही हेमू
मुग़ल-सेना से लडने गया और सितम्बर १५५६ ई० मे दिल्ली पर अधिकार
कर लिया, किन्तु ५ नवम्बर, सन् १५५६ ई० को युद्ध मे तीर की चोट से
ऊँचा होने पर वन्दी हुआ और बैरमखाँ द्वारा मारा गया ।
उपरोक्त इतिहास-प्रसिद्ध गृहकलह को ही रसखान ने गदर का नाम दिया
है । इसी गृहकलह ने दिल्ली को श्मशानवत् कर दिया था । यह राज्यलिप्सा-
जन्य परस्पर का कलह रसखान के निकट सम्बन्धियो के बीच ही हुआ था ।
वे स्वयं बादशाह-वंश के पठान थे और सम्बन्धियो मे मारकाट मची देखकर
व्याकुल हो गये थे । संवत् १६०२ मे इस कलह का वीजारोपण सलीमगाह
द्वारा बड़े भाई का राज्य हड़पने के कारण हुआ और संवत् १६११-१२ मे
१. सुजान रसखान: कृष्ण रूप-माधुरी व मुरली सवैया
समीक्षा भाग १७
भयंकर रूप से फैल गया, जिसकी लपेट में सूरवंश के पठानों का सर्वनाश हो
गया था । इस लगातार दो वर्षों के युद्ध के कारण दिल्ली नगर श्मशानवत् हो
गया था । कहने का तात्पर्य यह है कि रसखान ने संवत् १६१२ की घटना से
त्रस्त होकर अपने प्राण रक्षणार्थ या संसार से एकदम विरक्त होकर दिल्ली
छोड़ ब्रजवास किया । इस तथ्य में सन्देह का कोई कारण नहीं है ।'
इस आधार पर कहा जा सकता है कि रसखान का जन्म संवत् १५६०
ई० के आसपास हुआ होगा, क्योकि दिल्ली छोड़ते समय इनकी अवस्था बीस-
बाईस वर्ष की होगी ।
रसखान ब्रज में कब आये ? यहां पर यह प्रश्न भी विचारणीय है । डॉ०
याज्ञिक के अनुसार वे संवत् १६१२ मे दिल्ली छोड़कर तुरत ब्रज में आ गये थे,
परन्तु तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह मत शुद्ध प्रतीत
नहीं होता । 'मूल गुसाईं चरित' के अनुसार रसखान ने संवत् १६३४ से
१६३७ तक अर्थात् तीन वर्ष तक यमुना तट पर राम-कथा का श्रवण किया ।
इसका अभिप्राय यह है कि इस समय तक इनमें कृष्णभक्ति का प्रभाव प्रस्फु-
टित नहीं हुआ था । रसखान के दीक्षा-गुरु श्री विट्ठलनाथ जी का गोलोकवास-
काल संवत् १६४२ है । इसका अर्थ यह हुआ कि संवत् १६३७ से १६४२ के
अन्तराल मे ही रसखान कृष्णभक्ति में दीक्षित हुए और तभी ये ब्रज में जाकर
बसे ।
जिस मानवती के मान की उपेक्षा करके रसखान ब्रज मे आकर बसे, यह
मानिनी कौन है ? इस प्रश्न के उत्तर मे रसखान से सम्बद्ध सभी साधन मौन
हैं । कुछ विद्वानों का अनुमान है कि यह मानवती रसखान की कोई
प्रेमिका होगी । केवल अनुमान का आधार लेकर इस विषय मे इससे अधिक
कुछ नही कहा जा सकता ।
रसखान का जन्म-समय निर्धारित कर लेने के उपरांत अब यह कहना
कठिन नहीं कि जब इन्होंने 'प्रेमवाटिका' की रचना की, तब इनकी आयु ८१
वर्ष की थी, अर्थात् ये काफी लम्बी आयु तक जीवित रहे । अतः अनेक
विद्वानों की यह मान्यता भी असंगत प्रतीत नहीं होती कि ये लगभग ८५ वर्ष
तक जीवित रहे । इस आधार पर इनका देहावसान संवत् १६७५ के लगभग
माना जा सकता है ।
१८ रसखान-ग्रन्थावली
बाह्य साक्ष्य
रसखान से सम्बंधित बाह्य साक्ष्य के आधार पर तीन कृतियां विशेष रूप
से उल्लेख्य हैं—दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, मूल गुसाईं चरित और
भक्तमाल ।
१. दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता—इस कृति मे वैष्णव-सम्प्रदाय के
२५२ प्रमुख कवियो का परिचय है । यद्यपि यह परिचय पूर्ण तथा इतिहास-
सगत नही है, फिर भी उसे एकदम निराधार अथवा काल्पनिक नही कहा जा
सकता । इसमे ऐसे अनेक तथ्य मिलते हैं जिससे सम्वद्ध कवि के विषय मे बहुत-
कुछ ज्ञातव्य बातो का बोध हो जाता है। इस कृति की २१८ वी वार्ता रस-
खान से सम्बंधित है, जो इस प्रकार है--
'अब श्री गुसाई जी के सेवक रसखान पठान दिल्ली मे रहते तिनकी
वार्ता । सो दिल्ली मे एक साहूकार रहतो हतो । सो वा साहूकार को बेटा
बहुत सुन्दर हतो । वा छोरा सो रसखान को मन बहुत लग गयो । वाही के
पाछे फिर्यो करै और वाको झूँठो खाय और आठ पहर वाही की नौकरी
करै । पगार कछू लैवे नही, दिन रात वाही मे आसक्त रहै । दूसरे बडी जात
के रसखान की निन्दा बहुत-बहुत करते हते । पर रसखान काहू की सुनते
नही हते और आठ पहर वा साहूकार के बेटा मे चित्त लग्यो रहतो । एक
दिना चार वैस्नव मिलकै भगवत-वार्ता करते हते । करते-करते ऐसी बात
निकसी जो प्रभु मे ऐसो चित्त लगावनो जैसो रसखान को चित्त साहूकार के
बेटा मे लग्यौ है । इतने मे रसखान वा रस्ता निकस्ये, बिनने यह बात सुनी ।
तब रसखान ने कही जो तुम मेरी कहा बात करो हौ । तब वैस्नव ने जो बात
हती सो कही । तब रसखान बोले, प्रभु को सरूप दीखै तो चित्त लगाइये ।
तब वा वैस्नव न श्रीनाथ जी को चित्र दिखायो । सो देखत ही रसखान ने वो
चित्र ले लियो, और मन मे ऐसो संकल्प कर्यो जो ऐसो सरूप देखनो जब
अन्न खाना और उहाँ सूँ घोडा पै बैठकै एक रात मे वृन्दावन आयो और
सबरे दिन सब मदिरन मे भेष बदल कै फिर्यो और सब मदिरन मे दरसन
किये पर वैसे दरसन नही भये । तब गुपालपुर मे गयो और भेस बदलकै श्री-
नाथ जी के दरसन करने कूँ गयो । तब सिंघमौरिया ने भगवदिच्छा सूँ वाके
चिन्ह बड़ी जातवारे के पहिचाने । तब वाकू धक्का मार निकास दियो,
समीक्षा भाग १६
भीतर पैठन न दियो। सो जइके गोविंदकुंड पर रह्यो। तीन दिन ताईं पर्यो
रह्यो। खायवे पीवे की कछू अपेक्षा राखी नाही। तब श्रीनाथ जी ने जानी
यह जीव दैवी है और शुद्ध है, और सात्विक है और मेरो भक्त है, या कूँ
दरसन देऊँ तो ठीक है। तब श्रीनाथ जी ने दरसन दिए। तब वो उठिकै श्री-
नाथ जी कूँ पकरिवे दौर्यो। सो श्रीनाथ जी भाज गये। फेर श्रीनाथ जी ने
गुसाईं जी सूं कही, ये जीव दैवी है और म्लेच्छ योनि कूँ पायो है, जासूँ
याके ऊपर कृपा करो, या कूँ सरन लेग्रो। जहाँ ताईं तुम्हारो सम्बंध जीव कूँ
नाही हावै तहाँ ताईं मै जीव कूँ स्पर्श नाही करत हूँ और वाके हाथ को
खाऊँ नाही, जासूँ अब याको अंगीकार करो। तब श्री गुसाईं जी श्रीनाथ
जी के वचन सुनिकै गोविंद कुंड पै पधारे और वाकूँ नाम सुनायो और
साक्षात् श्रीनाथ जी के दरसन श्री गुसाईं जी के सरुप मे वाकूँ भए। तब श्री
गुसाई जी विनकूँ संग लै पधारे और उत्थापन के दरसन कराए। महाप्रसाद
लिवायो। तब रसखान जी श्रीनाथ जी के सरुप मे आसक्त भए। तब रसखान
ने अनेक कीर्तन और कविता और दोहा बहुत प्रकार के बनाये। जैसे-जैसे
लीला के दरसन विनकूँ भए, वैसे ही बरनन किये। सो वे रसखान श्री गुसाईं
जी के ऐसे कृपापात्र हते जिनकूँ चित्र के दरसन करत मात्र ही संसार सूँ चित्त
खिंच के श्रीनाथ जी मे लग्यौ। इनके भाग्य की कहा बडाई करनी। वार्ता
सम्पूर्ण।'
२. मूल गुसाईं चरित — इस कृति के लेखक बाबा वेणीमाधवदास है।
इसमे बताया गया है कि जब 'रामचरितमानस' की रचना पूर्ण हो गई तो
सबमे पहले उसे मिथिला के रूपारण्य स्वामी ने अयोध्या मे सुना। तत्पश्चात्
स्वामी नंदलाल के शिष्य दयालदास (अथवा दलालदास) ने 'मानस' की प्रतिलिपि
करके उसे यमुना-तट पर अपने गुरु नंदलाल और रसखान को सुनाया—
'मिथिला के सुसंत सुजान हते। मिथिलाधिप भाव पगेर हते॥
सुचि काम रूपारुन स्वामी जुतो। तिहिं औसर ओध मे आयो हुतो॥
प्रथम यह मानस तेई सुने। तिनही अधिकारि गुसाईं गुने॥
स्वामी नंद (सु) लाल को सिष्य पुनी। तिसु नाम दलाल सुदास गुनी॥
लिखि के सोइ पोथी स्वठाम गयो। गुरु के ढिग जाइ सुनाम दयो॥
जमुना-तट पै त्रय वत्सर लौ। रसखानहिं जाइ सुनावत भौ॥
२० रसखान-ग्रन्थावली
इस उद्धरण से यह ज्ञात होता है कि रसखान ने तीन वर्ष तक, अर्थात् संवत्
१६३४ से १६३७ तक, यमुना किनारे 'रामचरितमानस' की कथा का श्रवण
किया था। चाहे 'मूल गुसाईं चरित' प्रामाणिक हो, अथवा अप्रामाणिक, पर
यह कहना अनुपयुक्त नहीं कि इससे रसखान की धर्म के प्रति उदारता का पता
चलता है। यद्यपि ये मूलतः कृष्ण-भक्त है, पर अन्य धार्मिक सम्प्रदायो के प्रति,
तुलसी की भाँति, इनकी पूज्य दृष्टि है। तभी तो ये जिस श्रद्धा से कृष्ण की
स्तुति करते हैं, उसी श्रद्धा से शिव और गंगा की महिमा का भी गुणगान
करते हैं।
३. भक्तमाल—वार्त्ता-साहित्य मे भक्तमाल का जितना संवर्द्धन हुआ है
इतना और किसी कृति का नही हुआ। यही कारण है कि समय-समय पर अनेक
कवियो ने भक्तमाल की रचना की है, जैसे-भक्तमाल प्रसग, भक्तमाल प्रदीपन,
भक्तमाल उत्तरार्द्ध, नवभक्तमाल आदि। भक्तमाल के सर्वप्रथम लेखक नाभादास
माने जाते है। नाभादासकृत 'भक्तमाल' मे संवत् १६४३ तक के कृष्ण-भक्तो का
ही उल्लेख है, पर रसखान के विषय मे कुछ नही कहा गया है। इसका कारण
यह हो सकता है कि जब तक रसखान राजनीतिक कारणो से गुप्त जीवन यापन
कर रहे होगे और इसीलिए कृष्ण-भक्तो मे इन्हे इतनी ख्याति प्राप्त न हुई
होगी कि ये 'भक्तमाल' मे स्थान पा सके। 'भक्तमाल' पर अनेक टीकाएँ भी
लिखी गई है। वस्तुत ये टीकाएँ न होकर ग्रन्थ का संवर्द्धन ही कही जा सकती
हैं, क्योकि जैसे-जैसे कृष्ण-भक्तो की सख्या बढती गई, वैसे ही टीका के नाम
पर इस कृति मे कृष्ण-भक्तो का समावेश होता गया। सवत् १७४४ मे प्रियादास
जी के पौत्र वैष्णवदास ने 'भक्तमाल-प्रसग' नामक टीका के द्वारा इस कृति का
संवर्द्धन किया और तब उन्होने रसखान को भी कृष्ण-भक्तो मे सम्मिलित कर
लिया। 'भक्तमाल-प्रसंग' मे रसखान-विषयक प्रमाण इस प्रकार है—
'पातस्याह् न देखी तुरक कंठी पैरन लगे। तब रसखान बुलाए। देखे
तो सो कंठी नार मे परी है। तब पूंछी रसखान, कंठी क्यो राखे है ? तब ये
बोले—हजरत ! काठ की नाव पै पत्थर तिरै याते मै राखी है। ये काठ है, मै
पत्थर हों। तब कही—भले राखो, परन्तु इतेक तो हिन्दू हू नाही राखे। तद
रसखान बोल्यो—वे हलके है। मै भारी पत्थर हों।'
समीक्षा भाग २१
यद्यपि इस कंथा का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नही मिलता, परन्तु यह जरूर
मिलता है कि मुगल राजाओ ने कंठी-माला धारण पर रोक लगाई हुई थी।
यह रोक गोस्वामी गोकुलनाथ जी के प्रयास से जहाँगीर ने समाप्त की। इस
विषय पर तत्कालीन अनेक कवियो की उक्तियाँ मिलती है।
१. 'जयति विट्ठल सुवन, प्रगट वल्लभ बली,
प्रबल पन करि तिलक माल राखी।'
—हरिराम जी
२ 'माला तिलक न तजी कबहू, परी जदपि पुकार।'
—कल्याणदास
३. 'बिट्ठलेस के सपूत गोकुलेस के हुलास,
माल राखि सौ कलेस काहु मे न राख्यो है।'
—प्रसिद्धि कवि
प्रसिद्धि कवि ने तो इस विषय पर एक प्रबंधकाव्य की ही रचना कर
डाली थी।
इन उक्तियो से यह निष्कर्ष निकालना कठिन नही कि तत्कालीन मुगल उस
मुगल को हीन दृष्टि से देखते थे जो हिन्दुओ की भाँति माला-तिलक धारण
करता था। यह भी संभव है, हिन्दू भी सार्वजनिक स्थानो पर तिलक और
माला धारण करके न जा सकते हैं। इसीलिए तो गोस्वामी गोकुलनाथ जी
को उक्त आज्ञा को हटवाने के लिए काफी प्रयत्न करना पडा। इस पृष्ठभूमि
मे यह अनुमान लगाना भी असंगत नही है कि कंठी धारण करने के कारण
रसखान को भी अनेक यातनाओं का सामना करना पडा होगा। वे यातनायें
चाहे राजा की ओर से हो, या कट्टर पथी मुसलमानो की ओर से।
'भक्तमाल-प्रदीपन' मे रसखान से सम्बद्ध जहां अनेक अन्य कथाओ का
उल्लेख है, वहाँ यह कंठी वाली वार्ता भी पाई जाती है। 'भक्तमाल प्रदीपन'
की कथा इस प्रकार है—
'रसखान जी परम भक्त भगवत के हुए। पहिले मुसलमान थे। बगरज
तवाफ़ (परिक्रमा की इच्छासे) भावः (मक्का-स्थित एक मंदिर जिसे मुसल-
मान ईश्वर का घर मानते हैं।) जो बिंद्रावन मे पहुँचे तो पहले जन्मो के
२२ रसखान-ग्रन्थावली
= सवावो (पुण्यकर्मों का फल ) ने ज़हूर (प्रत्यक्षीकरण) किया। यानी (अर्थात्)
ब्रिज चंद महाराज ने उस सुरूप सोभायमान ब्रिज सुंदर से कि मोर मुकुट सर
पर, बनमाला पहने हुए, जेवरात (आभूषण) हरेक उजू (प्रत्येक अंग) मे
विराजमान, फूल जा बजा (जहाँ तहाँ) गुँथे हुए, लिवास (पहिचान) ज़र्क वर्क
(तडक भडक वाला) का शोभित, एक हाथ मे मुरली और दूसरे हाथ में
घडी, गो चराते है, दरसन हुए। बमूजिब (अनुसार) देखने इस रूप माधुरी
और दिलरुबा (चितचोर, प्रेमपात्र) के कुछ हालत (दशा) और ही हो गई ।
इस रूप मे महव (तल्लीन) होकर बेहोश (मूर्च्छित) जमीन पर गिर पडे ।
मुरशिद (धर्मगुरु, पीर) हमराह (रहपंथी) था। गश (मूर्च्छा) समझकर दरपए
इलाज (चिकित्सा का इच्छुक) हुआ और पुकारा कि आँखे खोलो। रसखान
जी ने कहा कि उनको उसी वक्त (समय) सब उलूम (विद्याएँ) व मतालिब
(अर्थ समूह, व्याख्याए) जाहिर (व्यक्त) व बातिन (अन्तर्गत, अंतरंग) व
शायरी से वह (काव्यकला-सम्पन्न) हो गया था। कवित्त मे उस मनोहर
मूर्ति का, जो देखी थी, मान (वर्णन) करके आखिर (अं त मे) कहा कि आँखे
क्या खोलू, वह मूर्ति दिल मे बस गई है। मुरशिद (पीर) ने फिर कहा कि
कावे (मक्का-स्थित एक मंदिर) को चलो। रसखान जी ने जवाब दिया कि
कैसा काब और कैसा किब्ल (मक्का का वह स्थान जहाँ काला पत्थर स्था-
पित है और जिसकी ओर मुँह कर नमाज पढ़ी जाती है) जो है सो सब जहाँ
मौजूद (उपलब्ध) है। अब मैं कहाँ जाता हूँ ? ब्रिज का हो चुका। और एक
कवित्त मे बयान (वर्णन) किया कि अगर, आदमी जिस्म (शरीर) मुझको
मिलेगा तो ब्रिज के ग्वाले और लोगो मे रहूँगा और अगर चरिन्द (पशु) हुआ
तो नद बाबा को गौ बछडो मे और अगर सग (पत्थर) हुआ तो गिरिज (गिरि-
राज गोवर्धन) का और अगर परंद हुआ तो ब्रिज के दरखतो (वृक्षो) का।
मुरशिद (पीर) को इन कलामात (वचनो) से ताजुव्व (आश्चर्य) हुआ और
चाहा कि रथ पर डालकर जबरदस्ती (बल पूर्वक) ले जाऊँ। रसखान जी भाग-
कर वन मे जा छिपे और बिरन्दावन मे वास करके हजारहः (सहस्रो) कवित्त
विरन्दावन के, व सुभाव (स्वभाव, गुण) व शोभा प्रिया-प्रियतम के तसनीफ
(पुस्तक लिखकर) भेट किए। और लिवास बैस्नवी धारन किया। माला