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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 368 में से

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पृष्ठ 28

समीक्षा भाग ६
प्रेम की इसी अनन्यता के कारण इनके शृंगार वर्णन मे स्वच्छता, पवित्रता
और गभीरता मिलती है जिसका रीतिबद्ध कवियो मे अभाव मिलता है।
३. सौन्दर्य का सूक्ष्म रूप मे चित्रण जहाँ रीतिबद्ध कवियो ने अपने
काव्य मे नारी के स्थूल अंगो की नाप-जोख की है वहाँ इन्होने अपनी प्रेयसियो
के सौन्दर्य का वर्णन अत्यंत सूक्ष्म रूप मे किया है। वह उनके नख-शिख का
वर्णन न करके उसके स्थान पर सौन्दर्य की अनुभूतिपूर्ण झलक प्रस्तुत करते हैं।
घनानन्द के अनुसार—
"अंग अंग तरंग उठे द्युति की
परि है मनु रूप अवै घर च्वै।"
अर्थात् नायिका के प्रत्येक अंग से सौन्दर्य की लहरे उठ रही हैं। अभी इसका
रूप धरती पर चू पड़ेगा। इसी भाँति वे स्थूल विशेषताओ के स्थान पर सूक्ष्म
सौन्दर्य का चित्रण करते है। नायिका के होठो की लाली की अपेक्षा इन्हे उसकी
मुस्कराहट अधिक आकर्षित करती है। देखिए—
"छवि को सदन, गोरो वदन रुचिर भाल,
रस निचुरत मृदु मीठी मुसक्यानि मे।"
उसकी मीठी मुस्कराहट मे रस टपक रहा है। यह वाक्य हमे छायावादी
सौन्दर्य पद्धति का स्मरण कराता है। यहाँ 'मीठी' का प्रयोग विशेषण विपर्यय
के रूप मे हुआ है जो कि छायावाद की विशेषता मानी जाती है। इसी प्रकार
अन्य कवियो ने भी सौन्दर्य का अंकन सूक्ष्म रूप मे ही किया है।
४. शृंगार के संयोग और वियोग पक्ष का चित्रण— स्वच्छन्द
धारा के कवियो को विरह और मिलन दोनो मे प्रेमियो के हृदय के अन्त.स्थो
को उद्घाटित करने की ही लगी रहती है। वैसे तो इन्होने शृंगार के दोनो
स्थलो का चित्रण किया है, परन्तु इनकी मनोवृत्ति वियोग-पक्ष मे अधिक
रमी है। प्रेम को ये लोग आन्तरिक और गोपनीय वस्तु मानते हैं। रीति
मार्गीय कवियो की प्रेम-वक्रता के विरुद्ध ये लोग तो यह मानते है—
"अति सूधो सनेह को मारग है,
जहाँ नेक सयानप बाँध नही।"
परन्तु सयोग मे बाहरी जगत की प्रधानता होती है और उस समय कवि
की अन्तर-वृत्ति भी बहिर्मुखी होती है। ऐसी स्थिति मे प्रेम की सघनता व तर-