रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १६
भीतर पैठन न दियो। सो जइके गोविंदकुंड पर रह्यो। तीन दिन ताईं पर्यो
रह्यो। खायवे पीवे की कछू अपेक्षा राखी नाही। तब श्रीनाथ जी ने जानी
यह जीव दैवी है और शुद्ध है, और सात्विक है और मेरो भक्त है, या कूँ
दरसन देऊँ तो ठीक है। तब श्रीनाथ जी ने दरसन दिए। तब वो उठिकै श्री-
नाथ जी कूँ पकरिवे दौर्यो। सो श्रीनाथ जी भाज गये। फेर श्रीनाथ जी ने
गुसाईं जी सूं कही, ये जीव दैवी है और म्लेच्छ योनि कूँ पायो है, जासूँ
याके ऊपर कृपा करो, या कूँ सरन लेग्रो। जहाँ ताईं तुम्हारो सम्बंध जीव कूँ
नाही हावै तहाँ ताईं मै जीव कूँ स्पर्श नाही करत हूँ और वाके हाथ को
खाऊँ नाही, जासूँ अब याको अंगीकार करो। तब श्री गुसाईं जी श्रीनाथ
जी के वचन सुनिकै गोविंद कुंड पै पधारे और वाकूँ नाम सुनायो और
साक्षात् श्रीनाथ जी के दरसन श्री गुसाईं जी के सरुप मे वाकूँ भए। तब श्री
गुसाई जी विनकूँ संग लै पधारे और उत्थापन के दरसन कराए। महाप्रसाद
लिवायो। तब रसखान जी श्रीनाथ जी के सरुप मे आसक्त भए। तब रसखान
ने अनेक कीर्तन और कविता और दोहा बहुत प्रकार के बनाये। जैसे-जैसे
लीला के दरसन विनकूँ भए, वैसे ही बरनन किये। सो वे रसखान श्री गुसाईं
जी के ऐसे कृपापात्र हते जिनकूँ चित्र के दरसन करत मात्र ही संसार सूँ चित्त
खिंच के श्रीनाथ जी मे लग्यौ। इनके भाग्य की कहा बडाई करनी। वार्ता
सम्पूर्ण।'
२. मूल गुसाईं चरित — इस कृति के लेखक बाबा वेणीमाधवदास है।
इसमे बताया गया है कि जब 'रामचरितमानस' की रचना पूर्ण हो गई तो
सबमे पहले उसे मिथिला के रूपारण्य स्वामी ने अयोध्या मे सुना। तत्पश्चात्
स्वामी नंदलाल के शिष्य दयालदास (अथवा दलालदास) ने 'मानस' की प्रतिलिपि
करके उसे यमुना-तट पर अपने गुरु नंदलाल और रसखान को सुनाया—
'मिथिला के सुसंत सुजान हते। मिथिलाधिप भाव पगेर हते॥
सुचि काम रूपारुन स्वामी जुतो। तिहिं औसर ओध मे आयो हुतो॥
प्रथम यह मानस तेई सुने। तिनही अधिकारि गुसाईं गुने॥
स्वामी नंद (सु) लाल को सिष्य पुनी। तिसु नाम दलाल सुदास गुनी॥
लिखि के सोइ पोथी स्वठाम गयो। गुरु के ढिग जाइ सुनाम दयो॥
जमुना-तट पै त्रय वत्सर लौ। रसखानहिं जाइ सुनावत भौ॥