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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 368 में से

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पृष्ठ 22

समीक्षा भाग ३
रीतिबद्धमार्गी शाखा की निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती है—
१. शृंगारिकता
२. आलंकारिकता
३. भक्ति और नीति
४ काव्यरूप
५. ब्रजभाषा की प्रधानता
६. जीवन-दर्शन का अभाव
१. शृंगारिता—रीतिकाल मे शृंगार-वर्णन की प्रधानता रही है । इसी
प्राधान्य के कारण कतिपय विद्वान् इस काल को ‘शृंगार काल’ कहना उप-
युक्त समझते है । शृंगार-रस का जितना सूक्ष्म विवेचन इस काल मे हुआ है,
उतना किसी काल मे नही हुआ । इस प्रवृत्ति का मुख्य कारण तत्कालीन राज-
नीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ है । कवियो का ध्येय अपने आश्रयदाता
का मनोरजन करना होता था और मनोरजन के लिए शृंगार के अलावा और
क्या विषय उपयुक्त हो सकता है । भक्तिकाल मे माधुर्य भक्ति का जो अबाध
स्रोत बहा और उसमे जिस शृंगार को अलौकिक रूप दिया गया, वही रीति-
काल मे आकर लौकिक और मांसल बन गया । प्रथम दर्शन से लेकर सुरतांत
तक के चित्रों का इस काल के कवियो ने बडे मनोयोग से चित्रण किया । इसी
कारण इनकी दृष्टि मे प्रेम और नारी का स्वस्थ स्वरूप न आ सका । डॉ०
भागीरथ मिश्र के शब्दो मे—
‘शृंगारिकता के प्रति उनका (रीतिकालीन कवियो का) दृष्टिकोण मुख्यतः
भोगपरक था, इसीलिए प्रेम के उच्चतर सोपानो की ओर वे न जा सके । प्रेम
की अनन्यता, एकनिष्ठता, त्याग, तपश्चर्या आदि उदात्त पक्ष भी उनकी दृष्टि
मे बहुत कम आए है । उनका विलासोन्मुख जीवन और दर्शन सामान्यतः प्रेम
या शृंगार के बाह्य पक्ष शारीरिक आकर्षण तक ही सीमित रहकर रूप को
मादक बनाने वाले उपकरण ही जुटाता रहा । यह प्रवृत्ति नायिका-भेद, नख-
शिख वर्णन, ऋतु-वर्णन, अलंकार निरूपण सभी जगह देखी जा सकती है ।’
२. आलंकारिकता—रीतिकालीन कवियो के काव्य के दो प्रमुख उद्देश्य
थे—मनोरंजन और पांडित्य-प्रदर्शन । आलंकारिकता का प्राधान्य इन दोनो ही
कारणो से रीतिकालीन काव्य मे समाविष्ट हुआ ।, यह सच है कि काव्य मे