रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
व्याख्या भाग १६७
जा रसखानि बिलोकत ही सहसा ढरि राँग सो अंग ढर्यौ है।
गाइन घेरतर हेरत सो पट फेरत टेरत आनि पर्यौ है ॥६० ॥
शब्दार्थ—धीरसमीर = वृन्दावन के एक कुंज का नाम। कलिन्दी =
यमुना। तीर = तट। डीठि पर्यौ है = दिखाई दिया है। ढारि राँग सो अंग
ढर्यौ है = ढले हुए राँग की भाँति शरीर ढल गया है, अर्थात् शरीर बहुत ही
शिथिल हो गया है। आनि पर्यौ है = हृदय मे बस गया है।
अर्थ—कृष्ण की सुन्दरता और उसके प्रति अपना आकर्षण व्यक्त करती
हुई कोई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मैने कभी कृष्ण
पर अपनी गाय का दूध भी नही निकलवाया, न कभी वह मेरी गली से होकर
ही निकला है जिसके कारण इससे मेरा पहला परिचय हो। मुझे तो वहाँ आज
ही यमुना के तट पर धीरसमीर कुंज मे खडा हुआ दिखाई दिया है। आनन्द
के सागर उस कृष्ण को देखते ही प्रेमाकर्षण के कारण मेरा सारा शरीर
अत्यन्त शिथिल हो गया है। गायो को घेरता हुआ, मेरी ओर देखता हुआ,
अपने वस्त्रो को सँभालता हुआ और पुकारता हुआ, अपनी इन रमणीय मुद्राओं
के कारण वह मेरे हृदय मे बस गया है।
विशेष—१. प्रेमाकर्षण का वर्णन स्त्री-सुलभ रीति से हुआ है।
२. अन्तिम पंक्तियो मे अनेक मुद्राओ के संकेत से घटना साकार
हो गई है।
३ 'ढरि राँग सो अंग ढर्यौ है' मे उपमा अलंकार है।
सवैया
खंजन मीन सरोजन को मृग को मद गंजन दीरघ नैना।
क जन ते निकस्यौ मुसकात सु पान पर्यौ मुख अमृत चैना ॥
जाइ रटे मन प्रान बिलोचन कानन मे रुचि मानत चैना।
रसखानि कर्यौ घर मो हिय मे निसिवासर एक पलौ निकसे ना ॥६१॥
शब्दार्थ—सरोजन को = कमल को। मद = घमण्ड। गंजन = चूर-चूर
करना। कानन मे = बन मे। निसिवासर = रात-दिन।
अर्थ—एक गोपी की कृष्ण से भेट हो गई है। उसी का वर्णन करती हुई
वह अपनी सखी से कह रही है कि कृष्ण के विशाल नेत्र खंजन, मीन, कमल
और मृग के घमण्ड को भी चूर-चूर करने वाले है। ऐसे सुन्दर नेत्रो वाला
कृष्ण कुंजो से मुसकराता हुआ बाहर आया। उसके अधरो पर मुख में
लगे हुए पान की लाली थी और उसकी वाणी अमृत के समान सुख देने वाली
थी। उसे देखते ही मेरा मन और मेरे प्राण मेरे वश मे नही रहे। ये उसी वन
मे बसने मे ही अपना आनन्द मानते है जहाँ कृष्ण से भेट हुई थी। रसखान
कवि कहते हैं कि वह गोपी अपनी सखी से कहने लगी कि कृष्ण ने तो मेरे
हृदय मे अपना घर ही कर लिया है और रात-दिन एक पल के लिए भी वह
बाहर नही निकलता।
विशेष—तृतीय पंक्ति मे विरोधाभास अलकार है।
दोहा
मन लीनो प्यारे चितै, पै छटाँक नहिं देत।
यहै कहा पाटी पढी, दल को पीछो लेत ॥ ६२ ॥
शब्दार्थ—मन = हृदय, चालीस सेर। छटाँक = कटाक्ष, सेर का सोलहवाँ
भाग। पाटी पढि = सीखा। दल को पीछो = ले, लेना।
अर्थ—कृष्ण की चतुराई का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि हे
कृष्ण तुम अपनी छवि दिखाकर मन को तो ले लेते हो, पर उसके बदले
कटाक्ष नही देते, अर्थात् तुम दूसरो को ही अपने ऊपर रिझाते हो, स्वय नही
रीझते। तुमने यह कहाँ से सीखा है कि केवल लेना ही जानते हो, देना
नही।
द्वितीय अर्थ—प्रथम पंक्ति का द्वितीय अर्थ यह होगा—
हे प्यारे! तुम बहका कर चालीस सेर तो ले लेते हो, पर उसके बदले मे
सेर का सोलहवाँ भाग भी नही देते।
विशेष—श्लेष अलकार।
तुलना—१ 'यह कौन धौ पाटी पढे हौ लला मन लेहु पै देत छटाँक नही।'
—घनानन्द
२ 'साहु कहावत फिरत है, चित सरसाये चाव।
तेरे नैन दिवालिया, मन ले देत न पाव ॥
—रसनिधि
दोहा
मो मन मानिक ले गयौ, चितै चोर नँदनद।
अब बेमन मै क्या करूँ, परी फेर के फन्द ॥ ६३ ॥
शब्दार्थ—वेमन = मन रहित, उदास। फेर = दुख। फद = बधन।
व्याख्या भाग १६६
अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन अपनी सखी से
करती हुई कहती है कि हे सखि ! मेरे मन रूपी मोती को चित्तचोर कृष्ण
चुरा कर ले गया है। अब मैं उदास हूँ। मैं तो वियोग दुख के बन्धन मे बंध
गई हूँ ।
विशेष—अनुप्रास और रूपक अलंकार ।
दोहा
नैन दलालनि चौहटे, मन मानिक पिय हाथ ।
रसखाँ ढोल बजाइके, बेच्यौ हिय जिय साथ ॥ ६४ ॥
शब्दार्थ—दलालनि = दलालो ने । चौहाटे = चौक मे, बाजार मे ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन
करती हुई कहती है कि इन नेत्र-रूपी दलालो ने मेरे हृदय को बीच बाजार मे
बेच दिया, कृष्ण ने मेरे प्राणो को अपने वश मे कर लिया । इस प्रकार मैने
ढोल बजाकर (प्रकट रूप से) अपने मन और प्राणो को बेच दिया है।
विशेष—१. रूपक अलंकार ।
२ द्वितीय पक्ति मे मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग ।
सोरठा
प्रीतम नन्दकिशोर, जा दिन ते नेननि लग्यौ ।
मन पावन चित चोर, पलक ओट नहि सहि सकौ ॥ ६५ ॥
शब्दार्थ—जादिन ते नेननि लग्यौ = जिस दिन से देखा है। पलक ओट =
निमिष भर के लिए भी ।
अर्थ—कोई गोपी अपने प्रेम को अपनी सखी से प्रकट करती हुई कह रही
है कि जिस दिन से मुझे प्रियतम कृष्ण दिखाई दिये है, उसी दिन से उस
मन-भावन और चितचोर के वियोग को मै एक पल के लिए भी सहन नही
कर पाती ।
बंक बिलोचन
सवैया
मैन मनोहर नैन बडे सखि सैननि ही मनु मेरो हर्यौ है ।
गेह को काज तज्यौ रसखानि हिये ब्रजराजकुमार अर्यौ है ॥
आसन-वासन सास के आसन पाने न सासन र ग पर्यौ है ।
नेननि बक बिसाल की जोहनि मत्त महा मन मत्त कर्यौ है ॥ ६६ ॥
२०० रसखान-ग्रन्थावली
शब्दार्थ—मैन मनोहर=कामदेव के समान सुन्दर । आसन-वासन=
आशाओ की वासना से । त्रासन=डर । सासन=साँसो मे । रंग=प्रेम ।
मत्त=उन्मत्त, पागल ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती
हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के नेत्र कामदेव के नेत्रो के समान सुन्दर
और विशाल है । उन नेत्रो के सकेत से ही उसने मेरे मन को हर लिया है ।
रसखान कहते है कि तभी से कृष्ण हमारे हृदय मे बस गया है और उसके प्रेम
के कारण मैने घर का काम करना भी छोड़ दिया है । आशाओ की वासनाएँ
सासु के भय को भी नही मानती, क्योकि मेरी साँसो मे कृष्ण का प्रेम भरा
हुआ है । कृष्ण ने अपने विशाल नेत्रो की तिरछी दृष्टि से मेरे मन को अत्यन्त
पागल बना दिया है ।
विशेष—तृतीय पक्ति मे अनुप्रास अलकार ।
सवैया
भटू सुन्दर स्याम सिरोमनि मोहन जोहन मैं चित चोरत है ।
अवलोकन वक विलोचन मैं ब्रजवालन के दृग जोरत है ॥
रसखानि महावत रूप सलोने को मारग ते मन मोरत है ।
ग्रह काज समाज सबै कुल लाज लला ब्रजराज को तोरत है ॥६७॥
शब्दार्थ—भटू=सखी । सिरोमनि=शिरोमणि । दृग जोरत है=आँखें
मिलाता है, प्रेम करता है । सलोने को=सौन्दर्य का ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती
हुई कहती है कि हे सखि ! सुन्दर और शिरोमणि कृष्ण मन को मोहने वाला
है और देखते ही मन को चुरा लेता है । वह अपने वक्र नेत्रो से देखते ही
ब्रजवालाओ के नेत्रो को अपने नेत्रो से जोड लेता है । रसखान कहते है कि
उसका सौन्दर्य रूपी महावत हमारे मन रूपी हाथी को अपने मार्ग से मोड़
देता है । वह ब्रजराज सभी गृह-कार्यो को, समाज को और कुल की लाज को
तोड़ देता है ।
विशेष— रूपक अलंकार ।
पाठान्तर—इस सवैया की तृतीय पंक्ति का यह रूप भी मिलता है—
‘रसखान महावर रूप सलौने को मारग ते मन मोरत है ।’
व्याख्या भाग २०१
सवैया
आली लला घन सो अति सुन्दर तैसो लसै पियरो उपरैना ।
गठनि पै छलकै छवि कु डल मंडित कुन्तल रूप की सैना ॥
दीरघ बक बिलोकनि की अवलोकनि चोरति चित्त को चैना ।
मो रसखानि रट्यौ चित री मुसकाइ कहे अधरामृत बैना ॥६८॥
शब्दार्थ—पियरो = पीला । उपरेना = वस्त्र । कु तल = केश, माला ।
सैना = सेना ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! वे श्याम कृष्ण वादल से सुन्दर हैं। उसी प्रकार उनके
शरीर पर पीला वस्त्र सुशोभित है । उनके कपोलो पर कुंडलो की शोभा
झलक रही है । सुन्दर केश रूप का समूह हैं; अथवा रूप की सेना सुन्दर भाले
लिए हुए हैं। वे अपने दीर्घ नेत्रो की वक्र दृष्टि से देखते ही मन के चैन को
चुरा लेते हैं। हे सखि ! उस आनंद-सागर कृष्ण ने मुस्कराकर तथा अपने
ओठों से अमृत जैसे शब्दो को बोलकर मेरे मन को हर किया है ।
सवैया
वह नद को साँवरो छैल अली अब तौ अति ही इतरान लग्यौ ।
नित घाटन बाटन कुंजन मै मोहि देखत ही नियरान लग्यौ ।
रसखानि वखान कहा करियै तकि सैननि सो मुसकान लग्यौ ।
तिरछी बरछी सम मारत है दृग-बान कमान सुकान लग्यौ ॥६९॥
शब्दार्थ—छैला = छैला । अली = सखी । नियरान = समीप । सुकान
लग्यो = कानो तक खींचकर ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की आदतो का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! वह नद-पुत्र छैला कृष्ण अब तो बहुत अधिक इतराने
लगा है। वह प्रतिदिन घाटो पर, मार्गों पर और कुंजो मे मुझे देखकर मेरे
समीप आने लगा है, अर्थात् जहाँ भी मुझे देखता है, मेरे पास चला आता
है। रसखान कहते हैं कि मैं कहाँ तक उसकी आदतो का वर्णन करूँ । वह
मेरी ओर देखकर मुस्कराने लगता है। वह टेढी दृष्टि को मुझ पर बरछी की
भाँति मारता है और नेत्र-वाणो को कमान पर कानो तक खींच कर
चलाता है ।
विशेष—उपमा, रूपक अलकार ।
२०२ रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
मोहन रूप छकी वन डोलति घूमति री तजि लाज विचारैं ।
बंक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारैं ॥
रंगभरी मुख की मुसकान लखे सखी कौन जु देह सम्हारै ।
ज्यौ अरविन्द हिमत-करी झकझोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ॥७०॥
शब्दार्थ—वक विलोकनि = तिरछी दृष्टि । रंगभरी = प्रेम भरी । अर-
विन्द = कमल । हिमत-करी = हेमंत रूपी हाथी ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का तथा तज्जन्य प्रभाव
का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैं कृष्ण के सौन्दर्य से उन्मत्त
होकर तथा लोक-लाज को छोड़कर वन-वन घूमती फिर रही हूँ । कृष्ण की
तिरछी दृष्टि, विशाल नेत्रों की कोर सभी को अपने कटाक्षों से मार देती है।
हे सखि ! कृष्ण के मुख की प्रेमभरी मुस्कान को देखकर कौन ऐसी युवती है
जो अपने-आप को सँभाल सकती है, अर्थात् सभी उस मुस्कान के वशीभूत हो
जाती हैं और इस प्रकार व्यथित हो जाती हैं जैसे हेमत रूपी हाथी ने कमल
को झटके से तोड़कर तथा मरोड़कर डाल दिया हो ।
विशेष—रूपक और अर्थान्तरन्यास अलंकार है ।
पाठान्तर—इस सवैया का यह रूप भी मिलता है—
'मोहन रूप छकी वन डोलति घूमि गिरी तजि लाज विचारैं ।
बंक विलोकनि नैन विसाल सु दीपति कोर कटाछन मारैं ।
रंग भरे मुख की मुसकानि लखै सखि को निज देह संभारैं ।
ज्यो अरविन्दहि मत्त करी झकझोरि कै तोरि कै मोहि कै डारै ॥'
सवैया
आज गई ब्रजराज के मंदिर सुन्दर स्याम विलोक्यौ री माई ।
सोइ उठ्यौ पलिका कल कंचन बैठ्यौ महा मनहार कन्हाई ॥
ए सजनी मुसकात लख्यौ रसखानि विलोकनि वक सुहाई ।
मैं तब ते कुलकानि तजी सुवजी ब्रजमंडल माँह दुहाई ॥७१॥
शब्दार्थ—मंदिर = घर । पलिका = पलंग । कंचन = सोना । मनहार =
मन को हरने वाला । विलोकनि वक = वक्र दृष्टि ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की सुन्दरता का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि । आज मैं कृष्ण के घर गई थी, वहाँ पर मैने सुन्दर
व्याख्या भाग २०३
कृष्ण को देखा। वह मन को हरने वाला कृष्ण अपने सुन्दर सोने के पलंग पर
सोकर बैठा था। हे सजनी ! उस आनन्द-सागर कृष्ण को मुसकराता हुआ
तथा उसकी सुन्दर वक्र-दृष्टि को देखकर मैने तभी से कुल की मर्यादा को छोड़
दिया है, अर्थात् कृष्ण के प्रति अनुरक्त हो गई हूँ। इसी कारण ब्रजमण्डल मे
दुहाई मच रही है, अर्थात् कृष्ण सभी के मन का हरण करने वाले है, उससे
बचने के लिए सारी ब्रज-युवतियाँ रक्षा के लिए पुकार रही है।
पाठान्तर—इस सवैया की चौथी पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है—
'मै तृन लौ कुल कानि तजी सुवर्जा ब्रजमडल माँहि दुहाई।'
सवैया
मोहन के मन की सब जानति जोहन के मोहि मग लियो मन।
मोहन सुन्दर आनन चन्द ते कु जनि देख्यौ मै स्याम सिरोमन ॥
ता दिन ते मेरे नैननि लाज तजी कुलकानि की डोलति हौ बन।
कैसी करौ रसखानि लगी जक री पकरी पिय के हित को पन ॥७२॥
शब्दार्थ—जोहन के मग-दृष्टि के द्वारा। सिरोमन =शिरोमणि। जक =
धुन। हित को =प्रेम का। पन =प्रण।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! कृष्ण के मन
की सारी बाते मैं जानती हूँ। उसने दृष्टि के द्वारा मेरा मन अपने वश मे
कर लिया है। मैने उस मोहने वाले और चन्द्रमा से सुन्दर मुख वाले श्याम
शिरोमणि को जब से कुज मे देखा है, तभी से मेरे नेत्रो ने लोक-लज्जा और
कुल की मर्यादा छोड़ दी है और मै उनकी खोज मे बन-बन घूम रही हूँ।
रसखान कहते है कि हे सखि ! अब मै क्या करूँ मुझे उनसे मिलने की धुन
लगी हुई है और मै उस प्रियतम के प्रेम के प्रण मे बँधी हुई हूँ।
विशेष—द्वितीय पंक्ति मे प्रतीप अलकार।
सवैया
लोक की लाज तज्यौ तबहिं जब देख्यौ सखी ब्रजचन्द सलौने।
खजन मीन सरोजन की छबि गजन नैन लला दिन होनो॥
हेर सम्हारि सकै रसखानि सो कौन तिया वह रूप सुठोनो।
भौंहन कमान सो जोहन को सर बेधत प्राननि नन्द को छोनो ॥७३॥
शब्दार्थ—सलौनो = सुन्दर। सरोज =कमलो । गजन =खंडित ।,
२०४ रसखान-ग्रन्थावली
हेरै = देखकर । सुठोनो = सुन्दर । जोहन = देखना । छोनी = पुत्र ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का तथा उसके प्रति अपने
आकर्षण का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! जब से मैंने सुन्दर कृष्ण
को देखा है, तभी से मैंने लोकलाज त्याग दी है, अर्थात् निर्भय होकर उसके
प्रेम मे डूब गई हूँ । कृष्ण के दिन-दिन शोभा धारण करने वाले नेत्र ऐसे सुन्दर
हैं कि वे अपनी सुन्दरता के कारण खजन, मछली और कमलो की शोभा को
भी खंडित कर देते है । ब्रज मे ऐसी कौन-सी स्त्री है जो उसकी शोभा देखकर
स्वय को सम्भाल सके, अर्थात् उससे प्रेम न करने लगे ? उसकी भौंह कमान
के समान है, चितवन बाण के समान हैं । भौंह-रूपी कमान पर चितवन-रूपी
बाण चढाकर वह नन्द-पुत्र कृष्ण सभी के प्राणो को बींध देता है ।
विशेष—अन्तिम पंक्ति मे रूपक अलकार है ।
मुसकान माधुरी
सवैया
वा मुख की मुसकानि भटू अँखियानि ते नेकु टरै नहिं टारी ।
जो पलकैं पल लागति है पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी ॥
दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम गह्यौ वजमारी ॥
प्रेम की बानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी ॥७४॥
शब्दार्थ—भटू = सखी । वजमारी = कठोर ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन
करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के मुख की मुस्कान मेरी आँखो से
हटाने पर भी नही हटती, अर्थात् हर समय मुझे वह मुस्कान याद आती रहती
है । यदि मेरी पलके क्षणभर के लिए लग जाती है, तो वह पल ही पल में
पुकारो को पुकारने लगती है । दूसरी मुसीबत यह है कि इन आँखो ने कठोर
नियम धारण कर लिया है । रसखान कहते है कि सोचने-समझने पर भी यह
पता नही लगता कि यह प्रेम की आदत है अथवा भोग-विद्या ।
विशेष—सदेह अलकार ।
सवैया
कातिग क्वार के प्रात ही प्रात सरोज किते विकसात निहारे ।
डीठि परे रतनागर के दरके बहु दाड़िम विम्ब त्रिचारे ॥
व्याख्या भाग २०५
लाल सु जीव जिते रसखानि ते रगनि तोलनि मोलनि भारे ।
राधिका श्रीमुरलीधर की मधुरी मुसकानि के ऊपर वारे ॥७५॥
शब्दार्थ—कातिग=कातिक । सरोज=कमल । विकसात=खिलते हुए ।
रतनागर=रत्नो के भण्डार । दरके=फटे हुए ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से श्रीकृष्ण और राधा की मुस्कान का
वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैने कातिक और क्वार मास के
प्रातःकाल मे कितने ही खिलते हुए कमलो को देखा है। अनेक रत्नो के भण्डार
देखे है तथा फटे हुए अनेक अनारो के बिम्बो पर भी विचार किया है, पर
राधा और कृष्ण की मुस्कान की शोभा के आगे ये नगण्य ही सिद्ध हुए है।
रसखान कहते है कि इस भूमडल पर जितने भी प्राणी है उनसे कृष्ण के प्रेम
की तोल और मूल्य भारी ही है । ये सब राधा और कृष्ण की मधुर मुस्कान
के ऊपर मै न्योछावर करती हूँ ।
विशेष—तृतीय पंक्ति मे जीव का अर्थ बधूक भी किया जा सकता है !
सवैया
बक विलोचन है दुख-मोचन दीरघ रोचन रं ग भरे है।
घूमत बारुनी पान किये जिमि झूमत आनन रूप ढरे है ।।
गडनि पै झलकै छवि-कुडल नागरि-नैन बिलोकि भरे है।
बालनि के रसखानि हरे मन ईषद हास के पानि परे है ॥७६॥
शब्दार्थ — रोचन=लाल । वारुनी=शराब । नागरि-नैन=युवतियो के
नेत्र । विलोकि=देखकर । ईषद=थोडी-सी । पानि परे है=हाथो मे पड
गए है, वशीभूत हो गए है ।
अर्थ —कोई गोपी अपनी सखी से अपने-प्रेम का वर्णन करती हुई कहती
है कि कृष्ण के बॉके नेत्र दुख को दूर करने वाले है, विशाल है और लाल र ग
(प्रेम) से भरे हुए है । वे ऐसे प्रतीत होते है मानो वे मुख के सौन्दर्य की
शराब पीकर झूम रहे हो । उनके कपोलो पर कु डलो की शोभा छलकती है
जिसे देखकर ब्रज की युवतियो के नेत्र उस शोभा मे उलझ जाते है । रसखान
कहते है कि कृष्ण की थोड़ी-सी मुस्कराहट मे ही ब्रज-बालाओ के मन उस
मुस्कराहट के वशीभूत हो गए हैं, अर्थात् उस मुस्कान के कारण ब्रज-वालाये
कृष्ण के प्रेम मे बंध गई है ।
३०६ रसखान-ग्रन्थावली
कवित्त
अब ही खरिक गई गाइ के दुहाइवे कों,
बावरी ह्वै आई डारि ढोहनी यो पानि की ।
कोऊ कहै छरी कोऊ मौन परी डरी कोऊ,
कोऊ कहै मरी गति हरी अँखियानि की ॥
सास व्रत ठानै नन्द बोलत सयाने धाड़,
दौरि-दौरि मानै-जानै खोरि देवतानि की ।
सखी सब हँसै मुरझानि पहिचानि कहूँ,
देखी मुसकानि वा अहीर रसखानि की ॥७७॥
शब्दार्थ—पानि = हाथ ! सयाने = जादू-टोना करने वाले । खोरि =
मनौती ।
अर्थ—कृष्ण को देखकर कोई गोपी अपनी सुधि-बुधि खो बैठी है । इसी
का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! अभी-
अभी वह गौशाला मे गाय का दूध निकालने के लिए गई थी, लेकिन वह
अपने हाथ के दूधपात्र को फेंक कर पागल होकर वापिस आ गई है। उसकी
अवस्था को देखकर कोई तो यह कहती है कि किसी ने इसको छल लिया है,
कोई कहती है कि यह स्तब्ध हो गई है, कोई कहती है कि यह डर गई है,
कोई कहती है कि यह मर गई है और कोई कहती है कि इसकी आँखो की
ज्योति ही नष्ट हो गई है । उसको अच्छा करने के लिए सासु अनेक प्रकार के
व्रतो को करने का सकल्प करती है, नन्द दौड-दौड़कर सयानो को बोलकर
लाती है और जाने-अनजाने देवताओ की मनौती करती है। सारी सखियाँ
उसकी मूर्छा को पहिचान कर हँसती हैं और कहती है कि इसने आनन्द-सागर
कृष्ण की कही मुस्कराहट को देख लिया है और यह उसी का प्रभाव है ।
सवैया
मैन-मनोहर वन वर्जे सु सजे तन सोहत पीत पटा है ।
याँ दमकै चमकै झमकै दुति दामिनि की मनो स्याम घटा है ।
ए सजनी ब्रजराजकुमार अटा चढि फेरत लाल बटा है ।
रसखानि महा मधुरी मुख की मुसकानि करै कुलकानि कटा है ॥७८॥
शब्दार्थ—मैन = कामदेव । पटा = वस्त्र । दामिनि = बिजली । घटा =
व्याख्या भाग २०७
गेंद । कटा = नष्ट ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का तथा तज्जन्य प्रभाव
का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह कामदेव के समान मधुरवाणी
बोलता है । उसके शरीर पर सुन्दर पीला वस्त्र सुशोभित है उसके शरीर की
कांति इस प्रकार चमकती और झमकती है मानो काले बादल मे बिजली
चमक रही हो । हे सजनी ! कृष्ण अटारी पर चढकर अपनी लाल गेंद को
फेकते है । रसखान कहते है कि उसके मुख का भारी सौन्दर्य और उसकी
मुस्कान कुल लज्जा को नष्ट कर देती है अर्थात् उसकी मुस्कराहट को देखकर
ब्रज ललनाये उसके प्रेम मे इतनी आबद्ध हो जाती हैं कि वे अपने कुल की
मान-मर्यादा का भी ध्यान नही रखती ।
विशेष—उत्प्रेक्षा अलकार ।
सवैया
जा दिन ते मुसकानि चुभी चित ता दिन ते निकसी न निकारी ।
कुंडल लोल कपोल महा छवि कुंजन ते निकस्यौ सुखकारी ॥
हौ सखि आवत ही डगरे पग पैड तजी रिझई बनवारी ।
रसखानि परी मुसकानि के पाननि कौन गनै कुलकानि बिचारी ॥७६॥
शब्दार्थ—लोल = चंचल । डगरे = मार्ग मे । पैड़ = मार्ग । पाननि =
हाथो मे ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन
करती हुई कहती है कि हे सखि ! जिस दिन से कृष्ण की मुस्कराहट मेरे मन
मे चुभी है उस दिन से वह निकाले से नही निकलती । वह सुख देने वाला
कृष्ण चंचल कुण्डलो को अपने कपोलो पर हिलाते हुए तथा अत्यन्त सौन्दर्य
धारण किए हुए कुंजो से निकला था । हे सखि ! उसके मार्ग पर आते ही
अर्थात् उसे देखते ही मैने अपना मार्ग छोड़ दिया और मै उस पर पूर्ण रूप से
रीझ गई । अब तो मैं आनन्द-सागर कृष्ण की मुस्कान के हाथो मे पड गई
हूँ । ऐसी स्थिति मे बेचारी कुल मर्यादा की गणना ही क्या है ? अर्थात् ऐसी
स्थिति मे कुल-मर्यादा नही रह सकती ।
विशेष—अन्तिम पंक्ति मे मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है ।
पाठान्तर—इस सवैया की प्रथम पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है—
२०८ रसखान-ग्रन्थावली
'जा दिन ते मुसकान चुभी उर ता दिन ते जु भई विजनारी।'
सवैया
काननि दै अँगुलि रहिवो जबही मुरली धुनि मन्द बजैहै।
मोहनी ताननि सो रसखानि अटा चढि गोधन गैहै तौ गैहै॥
टेरि कहौ सिगरे ब्रज लोगनि काल्हि कोऊ मु कितौ समझैहै।
माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै न जैहै न जैहै॥८०॥
शब्दार्थ - काननि = कानो मे।
अर्थ - कृष्ण के प्रति अपने अनुराग का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी
सखी से कहती है कि जब कृष्ण की मन्द-मन्द मुरली बजती है, तब चाहे कोई
मेरे कानो मे अँगुरी दे दे, अर्थात् मुझे वह तान न सुनने दे, चाहे कृष्ण अटारी
पर चढकर मोहने वाली तानो के साथ गौचारण के गीत गायें; मैं सारे ब्रज
के लोगो से पुकार-पुकार कर इस बात को कहती हूँ कि कल चाहे कोई
कितना ही समझाये, परन्तु हे सखि! मुझसे कृष्ण के मुख की मुस्कान
सम्भाली नही जाती, अर्थात् मैं कृष्ण के प्रेम मे बहुत ही व्याकुल और उन्मत्त.
हो गई हूँ।
विशेष - १. अन्तिम पंक्ति मे 'न जैहै' का वीप्सा-युक्त प्रयोग गोपी की
मनोव्यथा को द्विगुणित कर रहा है।
१. 'काननि दै अँगुरी रहिवो' मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है।
तुलना - 'अब ही सुधि भूली हौ मेरी भटू,
भ्रमरो जनि मीठी सी तानन मे।
कुल-कानि जो अपनी राखी चहौ,
दै रहौ अँगुरी दोउ कानन मे।'
- निवाज
सवैया
आजु सखी नन्द-नन्दन की तकि ठाढी हो कुंजन की परछाही।
न विसाल की जोहन को सब भेदि गयी हियरा जिन माही॥
घाइल घूमि सुमार गिरी रसखानि सम्हारति अँगनि जाही।
एते पै वा मुसकानि की डौड़ी बजी ब्रज मै अबला कित जाती। ८१॥
शब्दार्थ - हियरा जिय माही = हृदय के भी हृदय मे। घूमि = चक्कर
व्याख्या भाग २०६
खाकर। सुमार = भयंकर मार। डोरी = ढोल।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखि से कहती है कि हे सखि ! आज मैंने
कृष्ण को कुंजो की छाया मे खडे हुए देखा था। उसके विशाल नेत्रो का
दृष्टि-रूपी बाण मेरे हृदय के हृदय को भी छेद गया। उस बाण की भयंकर
मार से मै घायल होकर तथा चक्कर खाकर पृथ्वी पर गिर पडी और मुझे
अपने अंगो को भी संभालने का होश नही रहा। इतनी सी घटना घटित
होने पर ही उसकी मुस्कान का, हम दोनो के प्रेम का, ढोल समूचे व्रज मे बज
गया। अब तुम्ही बताओ कि हम जैसी अबलाएं इस व्रज को छोडकर और
कहाँ जाये।
दोहा
ए सजनी लोनो लला, लखौ नन्द के गेह।
चितयौ मृदु मुसकाइ कै, हरी सबै सुधि देह ॥८२॥
शब्दार्थ—लोनो=सुन्दर। लखौ=देखा। गेह=घर। हर=हरण कर
ली, प्रसन्न हो गई।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छबि का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सजनी ! मैंने नन्द के घर मे सुन्दर कृष्ण को देखा। उसने
जब मधुर मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा तो उसने मेरे शरीर की सारी
सुधि का हरण कर लिया; अथवा मेरा रोम-रोम प्रसन्नता से खिल उठा।
विशेष—अन्तिम चरण मे श्लेष अलंकार है।
कृष्ण-सौन्दर्य
दोहा
जोहन नन्दकुमार को, गई नन्द के गेह।
मोहिं देखि मुसकाइ कै, वरस्यौ मेह सनेह ॥८३॥
शब्दार्थ—जोहन=देखने के लिए। गेह=घर। सनेह=प्रेम।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को प्रकट
करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण को देखने के लिए मै नन्द के घर
गई थी। मुझे देखकर कृष्ण मुस्करा दिया। उसकी मुस्कराहट से प्रेम का
मेह बरसा ! अर्थात् मै उसके प्रेम मे आबद्ध हो गई।
विशेष—रूपक अलंकार।
२१० रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
मोरपखा सिर कानम कुण्डल कुंतल सो छवि गंडनि छाई।
वंक विसाल रसाल विलोचन है दुखमोचन मोहन माई।
आली नवीन महा घन सो तन पीट घटा ज्यौ पटा बनि आई।
हौ रसखानि जकी सी रही कछु टोना चलाइ ठगौरी सी लाई ॥८४॥
शब्दार्थ-रसाल= आनन्द देने वाली। पटा = वस्त्र। टोना = जादू।
ठगौरी = ठग विद्या।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के सिर पर मोरपखो का मुकुट और कानो मे
कुण्डल सुशोभित है। उनके केशो की शोभा उनके कपोलो पर बिखरी हुई
है। उनकी वक्र दृष्टि आनन्द देने वाली और विशाल है। वह दुख को दूर
करने वाली तथा मन को मोहने वाली है। हे सखि ! उनका श्याम शरीर
नवीन विशाल वादल के समान है जिस पर पीले वस्त्र की शोभा बहुत ही
प्रभावशाली है। रसखान कहते है कि मैं उनकी शोभा को देखकर स्तब्ध-सी
रह गई और उसने मेरे ऊपर कुछ जादू-सा करके मुझे ठग लिया।
विशेष-तृतीय पक्ति मे उपमा अलकार है।
सवैया
जा दिन ते वह नन्द को छोहरा या वन धेनु चराइ गयौ है।
मोहिनी ताननि गोधन गावत वेनु वजाइ रिझाइ गयौ है।
वा दिन सो कछु टोना सो कै रसखानि हिये मैं समाइ गयौ है।
कोऊ न काहू की कानि करै सिगरो व्रज वीर । विकाइ गयौ है ॥८५॥
शब्दार्थ-छोहरा = पुत्र। गोधन = गोचारण के गीत। टोना = जादू।
कानि करै = लज्जा करती है। वीर = सखी।
अर्थ-एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! जिस दिन से
वह नन्द-पुत्र कृष्ण इस वन मे गाये चरा कर गया है, मधुर तानो के साथ
बंशी बजाकर तथा गोचारण के गीत गाकर रिझा गया है, उस दिन से कुछ
जादू-सा करके वह आनन्द-सागर कृष्ण हृदय मे समा गया है। इसलिए यहाँ
पर कोई स्त्री भी किसी की लज्जा नही करती। वास्तविकता तो यह है कि
सारा व्रज ही उसके हाथों विक गया है; अर्थात् व्रज के सब नर-नारी पूर्ण-
रूप से कृष्ण के वश मे हो गये हैं, उसे प्रेम करने लगे हैं।
व्याख्या-भाग २११
पाठान्तर—इस सवैया की प्रथम पंक्ति का यह रूप भी मिलता है—
'ऐ सजनी वह नन्द को साँवरो या वन धेनु चराइ गयौ है।'
सवैया
आयौ हुतौ नियरै रसखानि कहा कहौँ तू न गई वहि ठैया ।
या ब्रज मे सिगरी बनिता सब बारति प्राननि लेति बलैया ।
कोऊ न काहु की कानि करै कछु चेटक सो जु कियौ जदुरैया ।
'गाइ' गौ तान जमाइ गौ नेह रिझाइ गौ प्रान चराइ गौ गैया ॥८५॥
शब्दार्थ—आयौ हुतौ=आया था। रसखानि=आनन्द-सागर कृष्ण ।
ठया = स्थान । सिगरी=सब । बनिता=स्त्रियाँ । कानि करै=लज्जा करती
है। चेटक=जादू। जदुरैया—कृष्ण । नेह=स्नेह, प्रेम ।
अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज आनन्द-
सागर कृष्ण पास आया था। क्या कहती हो कि तुम उस स्थान पर नही
गई । इस ब्रज मे सारी स्त्रियाँ कृष्ण के ऊपर अपने प्राणो को न्यौछावर
करती है और उसकी बलैया लेती है। यहाँ पर सभी कृष्ण के प्रेम मे इतनी
उन्मत्त हैं कि कोई किसी की लज्जा नही करती । इस प्रकार का कुछ जादू-सा
कृष्ण ने सबके ऊपर कर दिया है। वह कृष्ण तान बजाकर, हृदय मे प्रेम
उत्पन्न करके, प्राणो को रिझाकर और गायो को चराकर चला गया ।
विशेष—अन्तिम पंक्ति मे विविध भावो की सुन्दर योजना है।
सवैया
कौन ठगौरी भरी हरि आजु बजाई है बाँसुरिया रंग-भीनी ।
तौन सुनी जिनही तिनही तबही तित साज बिदा करि दीनी ।
घूमै घरी घरी नन्द के द्वार नवीनी कहा कहूँ बाल प्रवीनी ।
याँ ब्रज-मण्डल मे रसखानि सु कौन भटू जू लटू नहिं कीनी ॥८७॥
शब्दार्थ—ठगौरी भरी=जादू से भरी हुई । रंग-भीनी=प्रेम से
पूर्ण ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन
करती हुई कहती है कि हे सखि ! न जाने कृष्ण ने किस जादू से भरी हुई
तथा प्रेम से परिपूर्ण बाँसुरी बजाई कि जिस भी गोपी ने उसे सुना, उसने
भी उसी समय अपनी लाज को त्याग दिया, अर्थात् वह लाज त्याग कर
अपने घर से बाहर निकल पड़ी । हे सुन्दर तथा प्रवीण सखि ! तब से सभी
२१२ रसखान-ग्रन्थावली
गोपियाँ प्रत्येक समय नन्द के दरवाजे का चक्कर काटने लगीं। हे सखि !
इस ब्रज मे कोई भी ऐसी युवती नहीं है जिसे आनन्द-सागर कृष्ण ने
अपने प्रेम के वश मे नहीं कर लिया है।
विशेष — अन्तिम पंक्ति मे 'लटू नहीं' बौनी मुहावरे का भावमय प्रयोग
है।
तुलना — १. किती न गोकुल कुल-वधू, किहि न काहि मिस दीन ।
कौने तजी न कुल गली, है मुरली सुर-लीन ॥'
—बिहारी
२ 'सखि मोहि न मोहन को मुख देषि,
सु ऐसी धौ गोकुल को कुल की ।'
—ब्रह्म कवि
सवैया
बांकी धरै कलगी सिर ऊपर बांसुरी-तान कटै रस बीर के ।
कुण्डल कान लसै रसखानि बिलोकन तीर अनंग तुनीर के ।
डारि ठगोरी गयो चित चोरि लिए हैं सबै सुख सोखि सरीर के ।
जात चलावन मो अवला यह कौन कला है भला बे अहीर के ॥८८॥
शब्दार्थ — कलगी — मुकुट । अनंग = कामदेव । सोखि = सुखाना ।
अर्थ — कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी
सखी से कहती है कि वह अपने सिर पर सुन्दर मोर-मुकुट धारण किये हुए
है, बांसुरी मे वह आनन्द से भरी हुई तान बजाता है । उसके कानो मे कुण्डल
शोभायमान है जिन्हे देखकर कामदेव के तूणीर के बाणो-जैसा प्रभाव पडता
है, अर्थात् मन काम-वासना के वशीभूत हो जाता है । ऐसा कृष्ण मेरे ऊपर
जादू डालकर मेरा मन चुरा कर ले गया है और उसने मेरे शरीर के सारे
सुखो को नष्ट कर दिया है । फिर वह कृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहती
है कि हे अहीर के पुत्र ! इसमे तुम्हारी कौनसी वीरता है, जो तुम मुझ अबला
पर काम-बाण चलाते हो ।
विशेष — १. 'बे' शब्द का प्रयोग अत्यधिक आत्मीयता का सूचक है ।
२. 'अबला' शब्द का सार्थक प्रयोग है, अतः परिकर अलंकार है ।
व्याख्या भाग २१३
सवैया
कौन की नागरि रूपकी आगरि जाति लिएँ सँग कौन की बेटी ।
जाको लसै मुख चंद-समान सु कोमल अँगनि रूप-लपेटी ॥
लाल रहौ चुप लागि है डीठि सु जाके कहूँ उर बात न मेरी ।
टोकत ही टटकार लगी रसखानि भई मनौ कारिख-पेटी ॥ ८६ ॥
शब्दार्थ—आगरि=भंडार । लागि है डीठि=दृष्टि लग जाना । बात=
प्रणय करना । टटकार=तुरन्त, तत्काल । कारिख-पेटी=कालिख का सन्दूक ।
अर्थ—जाती हुई राधा को देखकर कृष्ण एक गोपी से पूछते है कि यह
युवती जो सौन्दर्य का भंडार है, जिसका मुख चन्द्रमा के समान सुशोभित है,
सम्पूर्ण कोमल अगो मे छवि लिपटी हुई है, किसकी स्त्री है, ? किसके साथ
जा रही है ? किसकी पुत्री है ? यह सुनकर गोपी कहती है कि हे लाल ! चुप
रहो । इसके हृदय को अभी तक प्रणय की हवा नहीं लगी है, अतः मुझे डर
है, कि कही तुम्हारी दृष्टि इसे न लगा जाये । रसखान कवि कहते है कि उसे
टोकते ही वह तत्काल रुक गई और भय से इतनी स्याह पड गई मानो वह
कालिख की सन्दूक बन गई हो ।
विशेष—उपमा, उत्प्रेक्षा अलकार ।
सवैया
मकराकृत कुंडल गूँज की माल के लाल लसै पग पॉवरिया ।
बछरानि चरावन के मिस भावतो दै गयौ भावती भाँवरिया ॥
रसखानि बिलोकत ही सिगरी भईँ बावरिया ब्रज-डॉवरिया ।
सजनी इहिँ गोकुल मैंँ विष सो बगरायौ हे नद के साँवरिया ॥ ६० ॥
शब्दार्थ—मकराकृत =मकरकी आकृति वाले । पॉवरिया=जूती । मिस=
बहाने से । भावतो=प्रिय । भावती = सुहावनी । ब्रज—डॉकरिया=ब्रज-
बलाएँ । बगरायौ है=बिखेर दिया है ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के कानों
से मकर की आकृति वाले कुं डल गले मे गुँजो की माला और पैरों मे जूतियाँ
सुशोभित थी । वह प्रिय बछडो को चराने के बहाने से सुहावनी भाँवर दे गया ।
रसखान कहते हैं कि उसे देखते ही सारी ब्रज-वालाए पागल होगई । हे सजनी !
ऐसा प्रतीत होता है कि नद कुमार कृष्ण इस गोकुल मे विष बिखेर गया
२१४ रसखान-ग्रन्थावली
है, जिसके कारण सभी व्रज-बालाएँ व्याकुल हैं ।
विशेष—हेतूत्प्रेक्षा अलकार ।
रूप-प्रभाव
सवैया
नवरंग अनंग भरी छवि सौ वह मूरति आँखि गडी ही रहै ।
बतिया मन की मन ही मै रहै घटिया उर वीच अडी ही रहै ॥
तबहूँ रसखानि सुजान अली नलिनी दल बूँद पडी ही रहै ॥
जिय की नहिँ जानत हौ सजनी रजनी अँसुवान लडी ही रहै ॥ ६१ ॥
शब्दार्थ—नवरग=यौवन । अनग=कामदेव । घटिया=प्रेम की घाते ।
रजनी=रात ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को प्रकट हुई
कहती है कि हे सखि ! कृष्ण का यौवन कामदेव की शोभा से भरा हुआ है;
अर्थात् उनका रूप अत्यन्त मन मोहक है। उनकी यह मन मोहक-मूर्ति सदैव
आँखो मे समाई रहती है। उन्होने जो मुजसे प्रेम भरी बाते की थी, वे मन-ही
मन रह गई है; अर्थात् मैं किसी से उन्हे कह नही पाती । प्रेम की घाते
हृदय के बीच अडी हुई है। रसखान कहते है कि हे सखि ! फिर भी नलिनी
के समूह पर बूँदे पडी रहती है। हे सजनी ! मेरे मन पर क्या बीत रही हैं,
इसे कोई नही जानता । मेरी आँखो मे सारी रात आँसुओ की लडी रहती है,
अर्थात् मैं रातभर कृष्ण को स्मरण करके हरती रहती हूँ ।
विशेष—१ रूप-प्रभाव का सजीव वर्णन है।
२ वियोग-वर्णन परम्परामुक्त है।
सवैया
मैन मनोहर ही दुख ददन है सूख क दन नद को नदा ।
वक विलोचन की अवलोकनि है दुख योजन प्रेम को फदा ॥
जा को लखै मुख रूप अनूपम होत पराजय कोटिक चदा ।
हौ रसखानि विकाउ गई उन मोल लई सजनी सुखबन्दा ॥ ६२ ॥
शब्दार्थ—मेन=कामदेव । दुखो को दूर करने वाले । सुख क दन=सुख
देने वाले । नद को नदा=नन्द पुत्र कृष्ण ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा और तज्जन्य प्रभाव
व्याख्या भाग २१५
का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह नदपुत्र कृष्ण कामदेव से भी
अधिक मनोहर है, दुखो को दूर करने वाला है, सुख देने वाला है । उसका
वक्र दृष्टि से देखना दुखो को दूर करके प्रेम के फंदे मे बाँध लेता है । कृष्ण का
मुख इतना सुन्दर है कि उसे देख कर करोड़ो चन्द्रमा पराजित हो जाते है ;
अर्थात् उसके मुख की शोभा करोडो चन्द्रमाओ की शोभा से भी बढकर है ।
हे सजनी ! मैं तो सुख देन वाले कृष्ण ने मोल ले ली हूँ और मै उनके हाथों
मे विक भी गई हूँ । अर्थात् कृष्ण के प्रति अनुरक्त हो गई हूँ ।
सवैया
सोहत है चंदवा सिर मोर के तैसिय सुन्दर पाग कसी है ।
तैसिय गोरज भाल विराजति जैसी हिये वनमाल लसी है ॥
रसखानि बिलोकत बौरी भई दृगमू दि कै ग्वालि पुकारि हसी है ।
खोलि री नैननि, खोली कहा वह मूरति नैनन माँझ बसी है ॥ ६३ ॥
शब्दार्थ—गोरज = गोओ के द्वारा उडाई गई धूल । लसी है = सुशोभित
है । बौरी = पागल ।
अर्थ — कोई गोपी कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन अपनी सखी से करती हुई
कहती है कि हे सखि ! जिस प्रकार कृष्ण के सिर पर मोर-मुकुट सुशोभित
है, वैसे ही उनके सिर पर सुन्दर पगडी भी सुशोभित है । वैसे ही उनके माथे
पर गोरज तथा हृदय पर बनमाल शोभा प्राप्त कर रही है। हे सखि ! मैं तो
उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखकर पागल ही हो गई । यह कहकर वह
गोपी अपने नेत्रो को बन्द कर तथा करुण भाव को प्रकट करने वाले शब्दो
का उच्चारण करके हसी पढी । इस घटना को देखकर उसकी सखी ने
कहा—अरी ! आँखें तो खोल । उसने उत्तर दिया—मै आँखे नही खोल
सकती, क्योकि उस कृष्ण की सुन्दर मूर्ति मेरी आँखो मे ही बसी हुई है । यदि
आँखे खोल दी तो डर लगता है कि कहीं वे उनमे से निकल न जाये ।
विशेष —अन्तिम पक्ति मे गोपी नैन नही खोलती । इसका एक कारण
यह भी हो सकता है कि स्त्री यह नही चाहती कि जिससे वह प्रेम करती है,
उसे अन्य स्त्री भी प्रेम करे । उसे विश्वास है कि यदि उसकी आँखो मे बसी
हुई कृष्ण की छवि को उसकी सखी ने देख लिया तो वह अवश्य उनसे प्रेम
२१६ रसखान-ग्रन्थावली
करने लगेगी । इसीलिए वह वह अपनी आंखो को नही खोलती ।
सवै या
सुनि री ! पिय मोहन की बतियाँ अति ढीठ भयौ नहिं कानि करै ।
निसि वासर औसर देत नही छिनही छिन द्वार ही आनि अरै ॥
निकसौ मति नागरि डौंडी बजी ब्रज मंडल मैं यह कौन भरै ।
अब रूप की दौर परी रसखानि रहै तिय कोऊ न माँझ घरै ॥६४॥
शब्दार्थ—पिय = प्रिय । ढीठ = धृष्ट । कानि = लज्जा । निसि वासर =
रात-दिन । रौर = शोर ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! सुनो, कृष्ण की बाते अत्यन्त प्रिय होती है, पर वह
बहुत धृष्ट है और किसी भी प्रकार की लज्जा नही करता । वह मुझे कभी
भी अवसर नही देता, बल्कि रात-दिन प्रत्येक क्षण मेरे द्वार पर आकर अड़
जाता है । हे नारियो ! घर से बाहर मत निकलो, क्योकि समूचे ब्रज मे कृष्ण
की धृष्टता का ढोल बज रहा है, अत ब्रज मे नारियो को अपने दिन काटने
कठिन हो रहे है । रसखान कहते है कि अब तो सारे ब्रज मे कृष्ण के रूप का
शोर मचा हुआ है, इसीलिए सारी स्त्रियाँ उसे देखने को इतनी उत्सुक रहती
है कि कोई भी अपने घर मे नही ठहरती ।
सवैया
रंग भयौ मुसकात लला निकस्यौ कल कुन्जन ते सुखदाई ।
मै तबही निकसी घर ते तकि नैन बिसाल की चोट चलाई ॥
घूमि गिरी रसखानि तबै हरिनी जिमि बान लगै गिरी जाई ।
टूटि गयौ घर को सब बंधन छूटिगौ आरज लाज वडाई ॥ ६५ ॥
शब्दार्थ—रंग = प्रेम । कल = सुन्दर । आरज-लाज = आर्य धर्म की
लज्जा ।
अर्थ —कृष्ण से भेट होने पर गोपी की क्या दशा हुई, इसी का वर्णन
करती हुई वह अपनी सखी से कह रही है कि हे सखि ! जब प्रेम से मुसकराता
हुआ कृष्ण सुख देने वाले सुन्दर कुंजन मे बाहर निकला तो सयोग से मैं भी
तभी अपने घर से निकली । मुझे देख कर उसने मुझ पर अपने विशाल नेत्रो से
चोट चलाई । मै उस चोट को सहन न कर सकी और जिस प्रकार बाण लगने
पर हिरनी चक्कर खा कर पृथ्वी पर गिर पडती है, उसी प्रकार मै भी अपनी