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सर्वकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 368 में से

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पृष्ठ 232

व्याख्या भाग २१५
का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह नदपुत्र कृष्ण कामदेव से भी
अधिक मनोहर है, दुखो को दूर करने वाला है, सुख देने वाला है । उसका
वक्र दृष्टि से देखना दुखो को दूर करके प्रेम के फंदे मे बाँध लेता है । कृष्ण का
मुख इतना सुन्दर है कि उसे देख कर करोड़ो चन्द्रमा पराजित हो जाते है ;
अर्थात् उसके मुख की शोभा करोडो चन्द्रमाओ की शोभा से भी बढकर है ।
हे सजनी ! मैं तो सुख देन वाले कृष्ण ने मोल ले ली हूँ और मै उनके हाथों
मे विक भी गई हूँ । अर्थात् कृष्ण के प्रति अनुरक्त हो गई हूँ ।
सवैया
सोहत है चंदवा सिर मोर के तैसिय सुन्दर पाग कसी है ।
तैसिय गोरज भाल विराजति जैसी हिये वनमाल लसी है ॥
रसखानि बिलोकत बौरी भई दृगमू दि कै ग्वालि पुकारि हसी है ।
खोलि री नैननि, खोली कहा वह मूरति नैनन माँझ बसी है ॥ ६३ ॥
शब्दार्थ—गोरज = गोओ के द्वारा उडाई गई धूल । लसी है = सुशोभित
है । बौरी = पागल ।
अर्थ — कोई गोपी कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन अपनी सखी से करती हुई
कहती है कि हे सखि ! जिस प्रकार कृष्ण के सिर पर मोर-मुकुट सुशोभित
है, वैसे ही उनके सिर पर सुन्दर पगडी भी सुशोभित है । वैसे ही उनके माथे
पर गोरज तथा हृदय पर बनमाल शोभा प्राप्त कर रही है। हे सखि ! मैं तो
उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखकर पागल ही हो गई । यह कहकर वह
गोपी अपने नेत्रो को बन्द कर तथा करुण भाव को प्रकट करने वाले शब्दो
का उच्चारण करके हसी पढी । इस घटना को देखकर उसकी सखी ने
कहा—अरी ! आँखें तो खोल । उसने उत्तर दिया—मै आँखे नही खोल
सकती, क्योकि उस कृष्ण की सुन्दर मूर्ति मेरी आँखो मे ही बसी हुई है । यदि
आँखे खोल दी तो डर लगता है कि कहीं वे उनमे से निकल न जाये ।
विशेष —अन्तिम पक्ति मे गोपी नैन नही खोलती । इसका एक कारण
यह भी हो सकता है कि स्त्री यह नही चाहती कि जिससे वह प्रेम करती है,
उसे अन्य स्त्री भी प्रेम करे । उसे विश्वास है कि यदि उसकी आँखो मे बसी
हुई कृष्ण की छवि को उसकी सखी ने देख लिया तो वह अवश्य उनसे प्रेम