रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ रसखान-ग्रन्थावली
'जा दिन ते मुसकान चुभी उर ता दिन ते जु भई विजनारी।'
सवैया
काननि दै अँगुलि रहिवो जबही मुरली धुनि मन्द बजैहै।
मोहनी ताननि सो रसखानि अटा चढि गोधन गैहै तौ गैहै॥
टेरि कहौ सिगरे ब्रज लोगनि काल्हि कोऊ मु कितौ समझैहै।
माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै न जैहै न जैहै॥८०॥
शब्दार्थ - काननि = कानो मे।
अर्थ - कृष्ण के प्रति अपने अनुराग का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी
सखी से कहती है कि जब कृष्ण की मन्द-मन्द मुरली बजती है, तब चाहे कोई
मेरे कानो मे अँगुरी दे दे, अर्थात् मुझे वह तान न सुनने दे, चाहे कृष्ण अटारी
पर चढकर मोहने वाली तानो के साथ गौचारण के गीत गायें; मैं सारे ब्रज
के लोगो से पुकार-पुकार कर इस बात को कहती हूँ कि कल चाहे कोई
कितना ही समझाये, परन्तु हे सखि! मुझसे कृष्ण के मुख की मुस्कान
सम्भाली नही जाती, अर्थात् मैं कृष्ण के प्रेम मे बहुत ही व्याकुल और उन्मत्त.
हो गई हूँ।
विशेष - १. अन्तिम पंक्ति मे 'न जैहै' का वीप्सा-युक्त प्रयोग गोपी की
मनोव्यथा को द्विगुणित कर रहा है।
१. 'काननि दै अँगुरी रहिवो' मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है।
तुलना - 'अब ही सुधि भूली हौ मेरी भटू,
भ्रमरो जनि मीठी सी तानन मे।
कुल-कानि जो अपनी राखी चहौ,
दै रहौ अँगुरी दोउ कानन मे।'
- निवाज
सवैया
आजु सखी नन्द-नन्दन की तकि ठाढी हो कुंजन की परछाही।
न विसाल की जोहन को सब भेदि गयी हियरा जिन माही॥
घाइल घूमि सुमार गिरी रसखानि सम्हारति अँगनि जाही।
एते पै वा मुसकानि की डौड़ी बजी ब्रज मै अबला कित जाती। ८१॥
शब्दार्थ - हियरा जिय माही = हृदय के भी हृदय मे। घूमि = चक्कर