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सर्वकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 368 में से

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पृष्ठ 229

२१२ रसखान-ग्रन्थावली
गोपियाँ प्रत्येक समय नन्द के दरवाजे का चक्कर काटने लगीं। हे सखि !
इस ब्रज मे कोई भी ऐसी युवती नहीं है जिसे आनन्द-सागर कृष्ण ने
अपने प्रेम के वश मे नहीं कर लिया है।
विशेष — अन्तिम पंक्ति मे 'लटू नहीं' बौनी मुहावरे का भावमय प्रयोग
है।
तुलना — १. किती न गोकुल कुल-वधू, किहि न काहि मिस दीन ।
कौने तजी न कुल गली, है मुरली सुर-लीन ॥'
—बिहारी
२ 'सखि मोहि न मोहन को मुख देषि,
सु ऐसी धौ गोकुल को कुल की ।'
—ब्रह्म कवि
सवैया
बांकी धरै कलगी सिर ऊपर बांसुरी-तान कटै रस बीर के ।
कुण्डल कान लसै रसखानि बिलोकन तीर अनंग तुनीर के ।
डारि ठगोरी गयो चित चोरि लिए हैं सबै सुख सोखि सरीर के ।
जात चलावन मो अवला यह कौन कला है भला बे अहीर के ॥८८॥
शब्दार्थ — कलगी — मुकुट । अनंग = कामदेव । सोखि = सुखाना ।
अर्थ — कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी
सखी से कहती है कि वह अपने सिर पर सुन्दर मोर-मुकुट धारण किये हुए
है, बांसुरी मे वह आनन्द से भरी हुई तान बजाता है । उसके कानो मे कुण्डल
शोभायमान है जिन्हे देखकर कामदेव के तूणीर के बाणो-जैसा प्रभाव पडता
है, अर्थात् मन काम-वासना के वशीभूत हो जाता है । ऐसा कृष्ण मेरे ऊपर
जादू डालकर मेरा मन चुरा कर ले गया है और उसने मेरे शरीर के सारे
सुखो को नष्ट कर दिया है । फिर वह कृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहती
है कि हे अहीर के पुत्र ! इसमे तुम्हारी कौनसी वीरता है, जो तुम मुझ अबला
पर काम-बाण चलाते हो ।
विशेष — १. 'बे' शब्द का प्रयोग अत्यधिक आत्मीयता का सूचक है ।
२. 'अबला' शब्द का सार्थक प्रयोग है, अतः परिकर अलंकार है ।