रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 228, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या-भाग २११
पाठान्तर—इस सवैया की प्रथम पंक्ति का यह रूप भी मिलता है—
'ऐ सजनी वह नन्द को साँवरो या वन धेनु चराइ गयौ है।'
सवैया
आयौ हुतौ नियरै रसखानि कहा कहौँ तू न गई वहि ठैया ।
या ब्रज मे सिगरी बनिता सब बारति प्राननि लेति बलैया ।
कोऊ न काहु की कानि करै कछु चेटक सो जु कियौ जदुरैया ।
'गाइ' गौ तान जमाइ गौ नेह रिझाइ गौ प्रान चराइ गौ गैया ॥८५॥
शब्दार्थ—आयौ हुतौ=आया था। रसखानि=आनन्द-सागर कृष्ण ।
ठया = स्थान । सिगरी=सब । बनिता=स्त्रियाँ । कानि करै=लज्जा करती
है। चेटक=जादू। जदुरैया—कृष्ण । नेह=स्नेह, प्रेम ।
अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज आनन्द-
सागर कृष्ण पास आया था। क्या कहती हो कि तुम उस स्थान पर नही
गई । इस ब्रज मे सारी स्त्रियाँ कृष्ण के ऊपर अपने प्राणो को न्यौछावर
करती है और उसकी बलैया लेती है। यहाँ पर सभी कृष्ण के प्रेम मे इतनी
उन्मत्त हैं कि कोई किसी की लज्जा नही करती । इस प्रकार का कुछ जादू-सा
कृष्ण ने सबके ऊपर कर दिया है। वह कृष्ण तान बजाकर, हृदय मे प्रेम
उत्पन्न करके, प्राणो को रिझाकर और गायो को चराकर चला गया ।
विशेष—अन्तिम पंक्ति मे विविध भावो की सुन्दर योजना है।
सवैया
कौन ठगौरी भरी हरि आजु बजाई है बाँसुरिया रंग-भीनी ।
तौन सुनी जिनही तिनही तबही तित साज बिदा करि दीनी ।
घूमै घरी घरी नन्द के द्वार नवीनी कहा कहूँ बाल प्रवीनी ।
याँ ब्रज-मण्डल मे रसखानि सु कौन भटू जू लटू नहिं कीनी ॥८७॥
शब्दार्थ—ठगौरी भरी=जादू से भरी हुई । रंग-भीनी=प्रेम से
पूर्ण ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन
करती हुई कहती है कि हे सखि ! न जाने कृष्ण ने किस जादू से भरी हुई
तथा प्रेम से परिपूर्ण बाँसुरी बजाई कि जिस भी गोपी ने उसे सुना, उसने
भी उसी समय अपनी लाज को त्याग दिया, अर्थात् वह लाज त्याग कर
अपने घर से बाहर निकल पड़ी । हे सुन्दर तथा प्रवीण सखि ! तब से सभी