सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

व्याख्या भाग १६७
प्राप्त कर ले। चाहे कोई किसी भी प्रकार अपना मनोवाञ्छित फल पाले,
किन्तु मेरा तो एकमात्र साधन कृष्ण ही है। कृष्ण के अतिरिक्त तीनो लोक
चाहे रहे, या नष्ट हो जाये, मुझे इसकी कोई चिन्ता नही है।
विशेष—'सेप सुरेस दिनेस गनेस अजैस धनेस महेस' मे छेकानुप्रास और
श्रुत्यनुप्रास अलकार है।
तुलना—'मेरे तो राधिका नामक ही गति लोक दुऊ रहौ कै नसि
जाओ।'
—हरिश्चन्द्र
सवैया
द्रौपदी ग्र ˙ गनिका गज गीध अजामिल सो कियो सो न निहारो।
गौतम-गेहिनी कैसी तरी, प्रहलाद को कैसे हरयौ दुख भारो।
काहे कौ सोच करै रसखानि कहा करि है रविनन्द विचारो।
ता खन जा खन राखियै माखन-चाखनहारो सो राखनहारो ॥१७॥
शब्दार्थ--द्रौपदी=पाडवो की स्त्री। गज=हाथी, जिसकी कृष्ण ने ग्राह
से रक्षा की थी। गीध=जटायु, जो सीता की रक्षा करते समय रावण के
बाणो से घायल हुआ था और अन्त मे राम ने जिसका उद्धार किया था।
अजामिल=एक व्यक्ति का नाम। गौतम-गेहनी=गौतम की स्त्री अहिल्याबाई।
रवि नन्द=यमराज। ताखन=उस समय। जा खन=जिस समय। माखन-
चाखनहारो=श्रीकृष्ण। राखनहारो=रक्षक।
अर्थ—जब कृष्ण रक्षक है तो मनुष्य को किसी भी प्रकार की चिन्ता नही
करनी चाहिए, इस भाव को व्यक्त करते हुए रसखान कहते है कि कृष्ण इतने
दयालु है कि अपने भक्तो की टेर सुनते ही तुरन्त उनकी रक्षा के लिए कटि-
बद्ध हो जाते है। द्रौपदी, गणिका, गज, गीध और अजामिल ने अपने जीवन
मे क्या कार्य किये थे, क्या उनके कार्य उनका उद्धार करने मे समर्थ थे ? इन
बातो पर कृष्ण ने कोई ध्यान नही दिया और तुरन्त उनका उद्धार कर दिया।
इसी प्रकार गौतम—स्त्री अहिल्याबाई को भी मुक्ति प्रदान की तथा हिरण्य-
कशिपु को मारकर प्रह्लाद के भारी दुख का हरण किया। अत हे मनुष्य !
जिस समय श्रीकृष्ण तुम्हारे रक्षक है, उस समय तुम्हे कोई चिन्ता नही करनी

१६८ रसखान-ग्रन्थावली
चाहिए, क्योकि उस समय तो यमराज भी तुम्हारा कुछ भी नही बिगाड़
सकता ।
विशेष—१. 'चाखनहारो सो राखनहारो' मे यमक अलंकार है ।
२. 'विचारो' शब्द यमराज की दुर्बलता को साकार कर रहा है, अतः
यह शब्द नितात औचित्यपूर्ण है ।
३. अन्तिम पंक्ति मे यति-दोष है ।
सवैया
देस विदेस के देखे नरेसन रीझ की कोऊ न बूझ करैंगौ ।
ताते तिन्हें तजि जानि गिर्यौ गुन सौ गुन औगुन गाँठि परैगौ ।
बाँसुरीवारो बडो रिझवार है स्याम जु नैसुक ढार ढरैगौ ।
लाडलो छैल वही तौ अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगौ ॥ १८॥
शब्दार्थ—रीझ की = प्रेम की । गिर्यो गुन = अवगुण । रिझवार =
रीझने वाला, प्रेम करने वाला । नैसुक = तनिक भी । ढार ढरैगौ = प्रीति
करेगा । पीर = दुख ।
अर्थ—कृष्ण भक्त-वत्सल है, इसी भाव को अभिव्यक्त करते हुए रसखान
कहते है कि हे मन ! तू देश-विदेश के राजाओ को परख ले, तेरे प्रेम का कोई
भी सम्मान नही करेगा । उनके प्रति प्रेम करना अवगुण ही है, क्योकि चाहे
तुममे कितने ही गुण सही, पर उनके साथ रहने से वे अवगुण बन जायेंगे ।
वह वशीधर कृष्ण बहुत ही रीझने वाला है, भक्त-वत्सल है, यदि तू उससे
तनिक भी प्रेम करेगा तो वह अहीर का लाड़ला पुत्र हमारे हृदय के सारे दुख
को दूर कर देगा ।
विशेष —१ 'देश विदेश' मे छेकानुप्रास; 'ताते तिन्हें तजि' मे वृत्यनु-
प्रास और 'सौगुन औगुन गाँठि परैंगौ' मे यमक अलकार है ।
२ 'रिझवार' शब्द का प्रयोग अत्यन्त भावपूर्ण है ।
सवैया
सपति सौ सकुचाइ कुवेरहि रुप सौ दीनी चिनौती अनगहि ।
भोग कै कै ललचाइ पुरन्दर जोग कै गगलर्ड घर मगहि ।
ऐसे भए तौ कहा रसखानि रसै रसना जी जु मुक्ति-तरगहि ।
दै चित ताके न रग रच्यौ जु रह्यौ रचि राधिका रानी के रगहि ॥१९॥

व्याख्या भाग १६६
शब्दार्थ-चिनौती = चुनौती। अनंगहि = कामदेव को। भोग = ऐश्वर्य,
'पुरन्दर = इन्द्र । मगहिं = सिर पर । मुक्ति तरंगहि मुक्ति की तरंगो मे, ज्ञान
की चरम कोटि पर । रग = प्रेम । रंगहिं = प्रेम मे ।
अर्थ - रसखान मनुष्य को कृष्ण-प्रेम के लिए प्रेरित करते हुए कहते है कि
हे मनुष्य ! चाहे तुमने इतनी सम्पत्ति प्राप्त कर ली है कि उसकी विपुलता
देखकर कुवेर को भी संकोच होता है, चाहे तुम इतने रूपवान हो कि अपने
सौन्दर्य से कामदेव को चुनौती दे सकते हो, चाहे तुम्हारे पास इतनी सम्पत्ति
ही गई है कि जिसे देखकर इन्द्र का मन भी ललचा जाए; चाहे तुमने योग-
साधना के द्वारा गंगाधर शिव-रूप को प्राप्त कर लिया, चाहे तुम्हारी जीभ
मुक्ति की लहरो मे डूब गई है, अर्थात् तुम ज्ञान की चरम कोटि पर पहुँच गये
हो; किन्तु यदि तुमने मन लगाकर उस कृष्ण से प्रेम नही किया जो राधा-
रानी से प्रेम करते है तो तुम्हारी ये उपलब्धियाँ व्यर्थ और निस्सार है ।
सवैया
कंचन-मन्दिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा भलकैयत ।
प्रात ही ते सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत ।
जद्यपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मधवा ललचैयत ।
ऐसे भए तौ कहा रसखानि जौ साँवरे ग्वार सो नेह न लैयत ॥२०॥
शब्दार्थ-कंचन मन्दिर = सोने के महल । मानिक = मोती । नग =
हीरा । मधवा = इन्द्र । सावरे ग्वार सो = कृष्ण से । नेह = स्नेह, प्रेम ।
अर्थ - कृष्ण के प्रति प्रेम ही मनुष्य की सर्वाधिक मूल्यवान सम्पत्ति है ।
जिसे कृष्ण से प्रेम नही, उसके सभी प्रकार के वैभव निरर्थक है । इसी भाव
को प्रस्तुत सवैया मे प्रकट करते हुए रसखान कहते है कि माना तुमने सोने के
ऊँचे-ऊँचे महल बनाकर उन्हे मोतियो से सदैव भलका रक्खा है। तुम्हारे पास
इतने हीरे और मोती है कि प्रात काल से ही सारी नगरी उन्हे तराजूओ मे
तोलने लगती है और फिर भी वे तुल नही पाते । तुम इतने वैभवपूर्ण राजा
बन गए हो कि तुम्हारा वैभव देखकर इन्द्र का मन भी ललचाता है, अर्थात्
तुम्हारे वैभव की तुलना मे वह अपने वैभव को अत्यन्त तुच्छ मानकर स्वय को
दीन-हीन अनुभव करता है और चाहता है कि तुम्हारा जैसा वैभव उसके पास
भी हो । यदि तुमने कृष्ण से प्रीति नही की है तो तुम्हारा यह सब अपार

१७० रसखान-ग्रन्थावली
वैभव व्यर्थ है।
कहने का भाव यह है कि कृष्ण की प्रीति ही सबसे विशाल वैभव है।
सारे सांसारिक वैभव उसके सामने तुच्छ और नगण्य है।
विशेष—कृष्ण की प्रीति का अत्युक्तिपूर्ण वर्णन होने से इस सवैया मे
अत्युक्ति अलंकार है।
पाठान्तर—तीसरी पंक्ति का यह रूप भी मिलता है—
'पालैं प्रजानि प्रजापति सो अरु सम्पति सो मघवाहि लजैयत।'
तुलना—'ऐसे भये तो कहा तुलसी जु पै जानकीनाथ के रंग न राते।'
—तुलसी
कवित्त
कहा रसखानि सुखसम्पत्ति सुमार कहा,
कहा तन जोगी ह्वै लगाए अंग छार को।
कहा साधे पंचानल, कहा सोए बीच नल,
कहा जीति लाए राज सिंधु आर-पार को।
जप वार-वार तप संजम बयार-व्रत,
तीरथ हजार अरे बूझत लवार को।
कीन्हौ नही प्यार नही सेयौ दरवार, चित,
चाह्यौ न निहार्यौ जौ पै नंद के कुमार को॥२१॥
शब्दार्थ—रसखानि = आनन्द देने वाले भंडार। सुमार = गणना। छार =
धूल, भस्म। पंचानल = पाँच प्रकार की अग्नियों से तप करना; चारो ओर
से जलने वाली चार अग्नियाँ तथा ऊपर से सूर्य की प्रखर गर्मी। नल = जल
बयार-व्रत = बिल्कुल भूखा रहकर तप करना। लवार = मूर्ख। नन्द के कुमार
को = कृष्ण को।
अर्थ—कृष्ण की भक्ति के बिना और सभी तप तथा योग साधनाएँ व्यर्थ
है, इस भाव को प्रकट करते हुए रसखान कहते है कि हे मनुष्य ! यदि तुमने
कृष्ण से प्रेम नही किया, उसकी शरण मे नही गए, भावपूर्ण मन से उसे नही
चाहा और प्रेममयी दृष्टि से उसे नही देखा तो तुम्हारे आनन्द देने वाले सारे
भंडार व्यर्थ है, तुम्हारी सुख देने वाली सम्पत्ति की कोई गणना नही है, अर्थात्
वे भी नगण्य है। शरीर पर भस्म लगाकर योगी बनने से कोई लाभ नही

व्याख्या भाग १७१
है, पाँच अग्नियो के मध्य बैठकर तप करना अथवा जल मे समाधि लगाना भी
निरर्थक है। समुद्र के आर-पार तक का राज्य जीत लेने से भी कोई
लाभ नही है। हे मूर्ख ! कृष्ण के प्रेम के बिना वार-वार जप करने को, निरा-
हार रहकर तप और सयम करने को तथा हजारो तीर्थो की यात्रा करने को
कौन बूझता है ? अर्थात् ये सब बेकार है।
विशेष—१. ‘कीन्हो नही प्यार, नही सेयौ दरबार, चित चाह्यौ, न
निहारयौ जो मै नन्द के कुमार को’ मे कोमल वर्णो से युक्त
वृत्यनुप्रास है।
२ कृष्ण भक्तो की यह प्रमुख विशेषता है कि वे कृष्ण को छोडकर अन्य
प्रकार की साधनाओ को निरर्थक और आडम्बरपूर्ण मानते है। रसखान के
प्रस्तुत कवित्त मे यही विशेषता परिलक्षित होती है।
पाठान्तर— कहा तन जोगी ह्वै’ और ‘कहा सोए बीच नल’ के स्थान पर
‘कहा महा जोगी ह्व ’ और ‘कहा सोए बीच जल’ पाठ भी मिलते है।
कवित्त
कचन के मन्दिरनि दीठि ठहराति नाहिं,
सदा दीपमाल लाल-मानिक-उजारे सो।
और प्रभुताई अब कहाँ लौ बखानौ, प्रति,
टारन की भीर भूप टरत न द्वारे सो।
गगाजी मे न्हाइ मुक्ताहलहू लुटाइ, वेद,
बीस बार गाइ, ध्यान कीजत सवारे सो।
ऐसे ही भए तौ नर कहा रसखानि जो पै,
चित्त दै न कीनी प्रीति पीतपटवारे सो ॥२२॥
शब्दार्थ—कचन के मन्दिरनि = सोने के महलो पर । दीठि = दृष्टि ।
लाल मानिक = लाल मोती । प्रतिहारन की भीर = द्वारपालो की भीड ।
मुक्ताहलहू = मोतियो को । सवारे सो = शीघ्रता से, प्रात काल मे । पीतपट-
वारे सो = कृष्ण से ।
अर्थ—कृष्ण की प्रीति के अभाव मे दुनिया के सारे वैभव और सारी
साधनाएँ निरर्थक है, इस भाव को व्यक्त करते हुए रसखान कहते है कि हे

३७२ रसखान-ग्रन्थावली
मनुष्य ! यदि तुमने चित्त लगाकर कृष्ण से प्रीति नही की है तो तुम्हारे सोने
के वे महल बेकार है जो सदा लाल मोतियो की दीपमालाओ से प्रकाशित रहते
हैं और जिन्हे देखते ही दृष्टि चौंधिया जाती है। तुम्हारी अधिक प्रभुता का
तो क्या वर्णन करूँ, यदि तुम इतने प्रभुत्व सम्पन्न हो गए हो कि अनेक राजा
तुम्हारे प्रतिहार बने हुए है और उनकी भीड कभी भी तुम्हारे द्वार से नही
हटती तो कृष्ण के प्रेम के अभाव मे यह प्रभुता व्यर्थ है। चाहे तुम—गगाजी
मे स्नान करके मुक्त हस्त से मोतियो का दान करो, अनेक बार वेदो का पाठ
करो और प्रात काल ध्यानावस्थित हो, किन्तु जब तक तुम कृष्ण से प्रीति नही
करोगे, तब तक तुम्हारी ये साधनाएँ निष्फल ही रहेगी।
कहने का भाव यह है कि कृष्ण की भक्ति ही सर्वोपरि और सर्वोच्च
भक्ति है।
विशेष—१. ‘दीठि ठहराति नाहिं’ मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है।
२. इस कवित्त मे ‘प्रतिहारन’ शब्द खडित है, अतः यहाँ पद-भग
दोष है।
सवैया
एक सु तीरथ डोलत है इक वार हजार पुरान बके हैं।
एक लगे जप मे तप मे इक सिद्ध समाधिन मे अटके है।
चेत जु देखत हौ रसखान सु मूढ महा सिगरे भटके है।
साँचहि वे जिन आपुनपौ यह स्याम गुपाल पै वारि दके है ॥२३॥
शब्दार्थ—बके है = कहे है, कथाएँ सुनाई है। चेत = सावधान। सिगरे =
सारे। आपुनपौ = अपनापन, स्वय को। छके है = मस्त है।
अर्थ—तीर्थादि वाह्याडम्बरो का खडन और कृष्ण-प्रेम का मडन करतेहुए
रसखान कहते है कि कोई मनुष्य तो तीर्थों की यात्रा करता हुआ घूमता है,
कोई हजारो बार पुराणों की कथाओ को सुनाता है, अर्थात् पुराणो का पाठ
करता है। कोई जप-तप मे लगा हुआ है, कोई सिद्ध बनकर समाधि मे अटका
हुआ है। रसखान कहते है कि यदि सावधान होकर इन्हे देखा जाता है तो
यही निष्कर्ष निकलता है कि ये सब महामूर्ख बनकर भटक रहे हैं। सही तो
वे मनुष्य है जो स्वय को कृष्ण के लिए अर्पित करके उस समर्पण की मस्ती से

व्याख्या भाग १७३

मस्त बने हुए हैं ।
विशेष १ अनन्यभाव का प्रेम अभिव्यजित है ।
२. 'वक' शब्द का प्रयोग कवि के मन की अतिशय घृणा का सूचक है ।
३. श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रथावली' में
यह सवैया नही है ।
सवैया
सुनियै सब की कहिये न कछू रहियै इमि या भव-वागर मै ।
करियै व्रत-नेम सच्चाई लिये जिन ते तरियै मन-सागर मै ।
मिलियै सब सो दुरभाव बिना रहिये सतसंग उजागर मै ।
रसखानि गुविन्दहि यौ भजियै जिमि नागरि को चित गागर मै ॥२४॥
शब्दार्थ—इमि = इस प्रकार । भव-बागर मै = असत्य ससार मे । उजा-
गर = प्रकाश । नागरि = स्त्री । गागर = पानी का बर्तन ।
अर्थ—रसखान सासारिक मनुष्य को उपदेश देते हुए कहते है कि हे
मनुष्य ! तुम इस असत्य ससार मे इस प्रकार रहो कि सबकी सुनो, पर अपनी
बात किसी से भी मत कहो । जो भी व्रत और नियम ग्रहण करो वे सत्य हो ।
सत्य व्रत और नियमो से ही मन का सागर पार किया जा सकता है, अर्थात्
मन को अपने वश मे किया जा सकता है; सबसे अच्छी भावना लेकर मिलो
और सदैव सत्सग के प्रकाश मे रहो, अर्थात् अच्छी सगति मे ही उठो-बैठो
और एकाग्रमन से कृष्ण की भक्ति करो तुम्हारा मन कृष्ण की भक्ति मे उसी
प्रकार एकाग्रता से लगना चाहिए जिस प्रकार स्त्री का मन अपने पानी के
बर्तन मे लगा होता है । (स्त्रियाँ अपने सिर पर जब पानी का बर्तन लेकर
चलती हैं तो उसके हाथ नही लगाती । वह गिर न जाये, इसलिए उसका
सन्तुलन बनाये रखने के लिए वह उसकी ओर एकाग्र मन लगाये रहती है) ।
विशेष—१ 'भव-बागर' और 'मन-सागर' मे रूपक अलकार; 'मिलियै
सब सो दुरभाव बिना' मे विनोक्ति अलकार, 'रसखानि गुविन्दहि यौ भजियै
जिमि नागरि को चित गागर मैं' मे उपमा अलकार है ।
२. 'जिमि नागरि को चित गागर मे' इस पदाश का एक अर्थ यह भी हो
सकता है—

३. प्रेम-वाटिका (प्रेम-तत्व, दोहा संग्रह व भक्ति-रहस्य)

१७४ रसखान-ग्रन्थावली
जिस प्रकार पनिहारी का ध्यान सिर पर रखे हुए पानी भरे घडे की ओर
होता है। पनिहारी सिर पर जल का घडा लिए चलती-फिरती, हाथ हिलाती
तथा बातें करती रहती है, पर उसका ध्यान अपने घटे की ओर से विचलित
नही होता । (इसी प्रकार मनुष्य को समार मे रहते हुए भी, उसके नैमित्तिक
कार्यों को करते हुए भी, अपना एकाग्र ध्यान कृष्ण-भक्ति की ओर लगाये रखना
चाहिए)।
तुलना—'श्री हरिदाम के स्वामी स्यामा कु जविहारी सो चित्त ज्यो मिर
पर दोहनी ।' —हरिदास
सवैया
है छल की अप्रतीत की मूरति मोद बढ़ावै विनोद कलाम मे ।
हाथ न ऐहे कछू रसखान तू क्यो वहकैं विष पीवत काम मे ।
है कुच कंचन के कलसा न ये आम की गाँठ मढ़ीक की चाम मे ।
वैनी नही मृगनैनिन की ये नसैनी लगी यमराज के धाम मे ॥२५॥
शब्दार्थ—अप्रतीत=विश्वासघात । कलाम=वाक्य, वचन । काम=
काम-वासना । वैनी=चोटी । नसैनी=सीढ़ी ।
अर्थ—नारियो के गोन्दर्य पर मुग्ध होकर कृष्ण-भक्ति को भूल जाने वाले
मनुष्यो को चेतावनी देते हुए रसखान कहते है कि हे मनुष्यो ! ये सुन्दर
नारियाँ छल और विश्वासघात की मूर्ति हैं। विनोद के वाक्य कह-कहकर ये
जो आनन्द प्रदान करती हैं, वह आनन्द झूठा है । अत तुम काम-भावना के
वशीभूत होकर तथा पथ-भ्रष्ट होकर क्यो विष-पान कर रहे हो, इसमे कुछ
भी हाथ नही लगेगा । इनके उन्नत कुच स्वर्ण-कलश नहीं है, वरन् चाम मे
मढ़ी हुई आम की गाँठ है। ये सुन्दर नारियो की चोटियाँ नहीं हैं, वरन् नरक
को ले जाने वाली सीढियाँ है ।
विशेष १ शुद्धापन्हुति अलकार ।
२. श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रंथावली' मे यह
सवैया नही है ।

व्याख्या भाग १७५
मिलन
सवैया
मोर के चन्दन मौर बन्यौ दिन दूलह है अली नद को नंदन ।
श्री वृषभानुसुता दूलही [दिन जोरि वनी विधना सुखकदन ॥
आवै कह्यो न कछू रसखानि ही दोऊ बँधे छवि प्रेम के फदन ।
जाहि बिलोके सबै सुख पावत ये ब्रजजीवन है दुखदंदन ॥२६॥
शब्दार्थ—मोर के चंदन = मोर-पखो के चन्दवे। अली = सखी । श्रीवृष-
भानुसुता = राधा। सुखकदन = सुख देने वाली । ब्रजजीवन = कृष्ण ।
दुखदंदन = दुख दूर करने वाले ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती
हुए कहती है कि हे सखि ! मोर-पखों के चन्दवो का मुकुट पहने हुए कृष्ण
दूल्हा बने हुए है और अत्यन्त सुख देने वाली राधा दूलहिन बनी हुई है ।
रसखान कहते है कि उन दोनो की अवस्था का वर्णन नही किया जा सकता ।
दोनो प्रेम के बंधन मे बँधे हुए हैं। जिनको देखकर सभी लोगो को सुख प्राप्त
होता है, वे दुख दूर करने वाले श्री कृष्ण है ।
सवैया
मोहिनी मोहन सो रसखानि अचानक भेट भई वन माही ।
जेठ की घाम भई सुखधाम अनद ही अग ही अग समाही ॥
जीवन को फल पायौ भटू रस-बातन केलि सो तोरत नाही ।
कान्ह को हाथ कँधा पर है मुख ऊपर मोर किरीट की छाही ॥२७॥
शब्दार्थ—मोहिनी = राधा । घाम = धूप । सुखधाम = सुख का भण्डार ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती
हुई कहती है कि हे सखि ! आज अचानक राधा और कृष्ण की भेट वन के
अन्दर हो गई। उस मिलन मे उन्हे जेठ की तपती हुई धूप भी सुख का भंडार
बन गई । वे आनन्द के कारण अगो मे अगो को छिपाने का प्रयास करने लगे ।
हे सखि ! उन्होने प्रेम-पूर्ण बातो के द्वारा ही जीवन का फल पा लिया, अर्थात्
उनका जन्म सफल हो गया । वे अपनी क्रीड़ा को अवाध गति से चलाते रहे ।

१७६ रसखान-ग्रन्थावली
कृष्ण का हाथ राधा के कन्धे पर था और उसके मुख पर मोर-मुकुट की
छाया थी ।
पाठान्तर-कुछ थोडे से परिवर्तनो के साथ इस सवैया का यह रूप भी
मिलता है-
'मोहनी मोहन सो रसखान अचानक भेट भई वन माही ।
जेठ को घाम भयौ सुखधाम अनग प्रभंजन अग समाही ।
जीवन को फल पायौ भटू रस बातन की लरु तोरत नाही ।
कान्ह के हाथ कँधा पै लसै मुख ऊपर मोर किरीट की छाही ॥
सवैया
लाडली लाल लसै लखि वै अलि कुंजनि क जनि मैं छवि गाढी ।
ऊजरी ज्यौं विजुरी सी जुरी चहुँ गुजरी केलि-कला सम बाढी ।
त्यौ रसखानि न जानि परै सुखिया तिहुँ लोकन की अति वाढी ।
बालक लाल लिये विहर छहरै वर मोरमुखी सिर ठाढी ॥२८॥
शब्दार्थ-लाल = कृष्ण । अलि = सखी । पुंजनि = समूह । ऊजरी = उज्ज्वल ।
सुखमा = शोभा ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से मिलन-लीला का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखी ! राधा और कृष्ण को कुंजो के समूहो मे देखकर उन
कुंजो की शोभा बहुत अधिक बढ गई । राधा के शरीर की उज्ज्वल कांति
बिजली की कान्ति के समान मालूम होती थी जिसके चारो ओर घिरी हुई
गुर्जरीयाँ केलि-कला के समान चमक रही थी । रसखान कहते है कि इस
प्रकार उस सौन्दर्य का वर्णन अगम्य था क्योकि उसके कारण तीनो लोको
का सौन्दर्य बहुत अधिक बढ गया था। वह कृष्ण गोपियो के लिये हुए उन
कुंजो मे विहार कर रहे थे धीर उनके सिर के ऊपर सुन्दर मोरपंखो का
मुकुट सुशोभित था।
विशेष-उपमा, वृत्यानुप्रास अलकार ।
बाल-लीला
सवैया
लाल की आज छठी ब्रज लोग अनन्दित नन्द बड्यौ अन्हवावत ।
चाइन चारु बधाइन लै चहुँ ओर कुटुम्ब अघात न यावत ।

व्याख्या भाग १७७
नाचत बाल बड़े रसखान छके हित काहू के लाज न आवत ।
तैसोइ मात पिताउ लह्यौ उलह्यौ कुल ही कुलही पहिरावत ॥२६॥
शब्दार्थ—लाल=कृष्ण। छठी=जन्म के छठे दिन का उत्सव । अन्ह-
वावत=स्नान कराते है । चाइन=चाव से । चारु=आनन्दपुर । छके हित=
प्रेम मे मस्त । उलह्यौ=आनन्द । कुल ही=सारा परिवार ही । कुल ही=
एक प्रकार की टोपी ।
अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छठी-उत्सव का वर्णन करती
हुई कहती है कि हे सखि ! आज कृष्ण के जन्म के छठे दिन का उत्सव है ।
सारे ब्रज के लोग आनन्द से भरे हुए है । नन्द अत्यन्त आनन्दित होकर कृष्ण
को स्नान करा रहे है । लोग चाव से तथा चारो ओर से आनन्दप्रद बधाइया
लेकर आ रहे हैं । कुटुम्ब मगल-गीत गाता हुआ तृप्त नही हो रहा है ।
इच्चे और बड़े सभी आनन्द-सागर कृष्ण के प्रेम से इतने मस्त होकर नाच
रहे है कि उन्हे किसी प्रकार की लज्जा का अनुभव नही हो रहा है। इसी
प्रकार का आनन्द माता यशोदा और पिता नन्द को भी प्राप्त हो रहा है ।
सारा परिवार उन्हे कुलही पहिना रहा है ।
विशेष—१. अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार ।
२. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित
'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है ।
तुलना—'आजु भोर तमचुर के दोल ।
गोकुल मे आनन्द होत है, मगल-धुनि महराने टोल ।
फूले फिरत नन्द अति सुख भयौ, हरषि मगावत फूल-तमोल ।
फूली फिरति जसोदा तन-मन, उबटि कान्ह अन्हवाइ अमोल ।'
—सूरदास
सवैया
'ता' जसुदा कह्यो धेनु की ओट ढिंढोरत ताहि फिरै हरि भूलै ।
ढूँढन कूँ पग चारि घलै मचलै रज माँहि विथूरि दुकूलै ।
हेरि हंसे रसखान तबै उर भाल तै टारि कै बार लटूलै ।
सो छवि देखि अनन्दन नन्दजू अंगन अंग समात न कूलै ॥३०॥

१७८ रसखान-ग्रन्थावली
शब्दार्थ—'ता' जसुदा कह्यो घेनु की ओट=यशोदा ने कृष्ण को खिलाते
समत गाय की ओट मे होकर 'ता' शब्द कहा । ढिंढोरत ताहि=यशोदा को
ढूंढ़ते हैं। रज मांहि विथूरि दुकूलै=अपने वस्त्रों को धूल से लथपथ कर
लेते हैं। उर भाल तें=मस्तक के बीच से। वार लूतलैं=लम्बे-लम्बे
बाल।
अर्थ—कृष्ण की बाल-लीला का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी
से कहती है कि हे सखी ! कृष्ण को खिलाने के लिए यशोदा ने गाय की
ओट मे होकर 'ता' शब्द कहा जिसे सुनकर कृष्ण अपनी और बातों को
भूलकर उन्हे ढूढते हैं। वे उन्हे ढूढने के लिए कुछ ही पग चलते हैं, किन्तु
यशोदा को न पाकर वे मचल जाते हैं और पृथ्वो पर लोट-लोटकर अपने
वस्त्रो को धूल से लथपथ कर लेते हैं। तब यशोदा उनके पास आती हैं। उन्हें
देखकर कृष्ण हँसने लगते है और यशोदा उनके मस्तक पर पड़े हुए लम्बे-लम्बे
बालों को हटाकर उनका मुह चूम लेती हैं। इस शोभा को देखकर नन्द इतने
प्रसन्न होते हैं कि उनकी प्रसन्नता उनके अंगो मे नही समा पाती ।
विशेष—१. बाल-लीला का अत्यन्त स्वाभाविक वर्णन है ।
२. अन्तिम पंक्ति मे यमक अलंकार है ।
३ श्री विश्वनाथ मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' में यह
सवैया नही है ।
तुलना—'गैया की सुओट ह्वै ललैया बिलुकैया दै दै,
जसोमति मैया जबै कन्हैया सो 'ता' कहै।'
—अज्ञात
सवैया—
आजु गई हुती भोर ही हों रसखान रई वटि नन्द के भौनहिं ।
वाकौ जियो जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यो नहिं ।
तेल लगाइ लगाइ कै अँजन भौंहे बनाइ बनाइ डिठौनहिं ।
डांलि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यौं चुचकारत छौनहिं ॥३१॥
शब्दार्थ—रई=अनुरक्त हो गई। भौनहिं=भवन में । जुग=युग।
अंजन=काजल । डिठौनहिं=डिठौने को; अपने पुत्र को नजर से बचाने के
लिए माताएं उनके मुख पर काजल का काला दाग लगा देती हैं, जिसे डिठौना

व्याख्या भाग १७६
कहते है। छौनहिं=पुत्र को, कृष्ण को।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! मै आज ही प्रात.काल नन्द के उस भवन मे गई थी
जहाँ रस के सागर कृष्ण थे। मैं उन्हे देखते ही उनमे अनुरक्त हो गई। उन
जैसा पुत्र पाकर यशोदा जी को जो सुख मिला है, उसका वर्णन नही किया
जा सकता। मै तो भगवान् ने प्रार्थना करती हूँ कि उनका पुत्र लाख करोड
युगो तक जीवित रहे। यशोदा जी ने उसके सिर पर तेल लगाकर और आँखों
मे काजल लगाकर तथा उसकी भौहो को सँवार कर उसके मुख पर डिठौना
लगा दिया। उसके गले मे हमेल और हार डालकर यशोदा जी उनके सौन्दर्य
को निहारती रही, उस पर स्वय को न्यौछावर करती रही और उसे
चूमती रही।
विशेष—'डालि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यो चुचकारत छौनहि' के दोनो
पदो मे यमक अलकार है।
सवैया—
धूरि भरे अति सोभित स्यामजू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरै अगना पग पैजनी बाजति पीरी कछोटी।
वा छवि को रसखानि बिलोकत वारत काम कला निज कोटी।
काग के भाग बडे सजनी हरि-हाथ सो लै गयौ माखन-रोटी ॥३२॥
शब्दार्थ—धूरि भरे=धूल से सने हुए। पीरी=पीली। वारत=
न्यौछावर करती है। काम=कामदेव। कला=सुन्दरता। कोटी=कोटि,
करोड़ो।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की सुन्दरता का वर्णन करती
हुई कहती है कि धूल से सने हुए शरीर वाले श्री कृष्ण अत्यन्त शोभायमान
थे। ऐसी ही शोभा से युक्त उनके सिर की सुन्दर चोटी बनी हुई थी। वे
खेलते हुए और माखन-रोटी खाते हुए अपने आगन मे घूम रहे थे। उनके
पैरो की पैजनी बज रही थी। वे पीली लगोटी पहने हुए थे। उनकी उस
समय की शोभा को देखकर कामदेव भी अपनी करोडो सुन्दरताओ को उस
पर न्यौछावर कर रहा था। हे सखि ! उस कौवे का बहुत बडा सौभाग्य है

१८० . रसखान-ग्रन्थावली
है जो कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी झपटकर उड़ गया ।
विशेष—१. कृष्ण की बाल-लीला का सुन्दर एव स्वाभाविक वर्णन है ।
२. 'वा छवि को रसखानि बिलोकत वारत काम कला निज
कोटी' मे व्यतिरेक अलकार है ।
पाठान्तर—चतुर्थ पंक्ति का यह पाठ भी मिलता है
काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सो ले गयौ माखन-रोटी ।
तुलना— 'सोभित कर नवनीत लिए ।
घुटुरुनि चलत रेनु तन मण्डित, मुख दधि लेप किए ।
चारु कपोल, लोल लोचन, गोरोचन-तिलक दिए ।
लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहि पिए ।
कठुला-कंठ, ब्रज केहरि-नख, राजत रुचिर हिए ।
धन्य सूर एको पल इहि सुख, का सत कल्प जिए ॥
—सूरदास
रूप-माधुरी
सवैया
मोतिन माल बनी नट के, लटकी लटवा लट घूँघरवारी ।
अँग ही अँग जराव लसै अरु सीस लसै पगिया जरतारी ॥
पूरब पुन्यनि ते रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी ।
चार्यो दिसानि की लै छवि आनि कै झांके झरोखे मै बाँके विहारी ।३३।
शब्दार्थ—लट=केश-राशि । जराव=जड़ाऊ आभूषण । जरतारी=
जरीवाली ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई
कहती है कि उस नटवर कृष्ण के गले मे मोतियो की माला पड़ी हुई है।
घूँघरदार केश-राशि लटक रही है। अंग के प्रत्येक भाग मे जडाऊ आभूषण
और सिर पर जरी वाली पगड़ी सुशोभित है । रसखान कहते है कि पूर्व जन्म
के पुण्यो के कारण ही इस मोहिनी मूर्ति के दर्शन हुए है। चारो दिशाओ की
शोभा लेकर बाँके कृष्ण आकर तभी झरोखे मे झाँकने लगे ।
विशेष—कृष्ण की रूप-माधुरी का परम्परागत वर्णन है ।

व्याख्या भाग १८१
पाठान्तर—इस सवैया का यह रूप भी मिलता है—
'मोतिन माल हिये लटकै लटकै लट चौलट घूँघरवारी ।
अंगनि अंग जराव कसे यह सीस लसै पगिया जरतारी ।
पूरव पूरे ही पुन्यनि ते रसखान ये मूरति नैन निहारी ।
चारौ दिसा के महा अघ हाँके जो झाँके झरोवनि बाँके विहारी ॥
सवैया
आवत है बन ते मनमोहन गाइन सग लसै ब्रज-ग्वाला ।
बेनु बजावत गावत गीत अभीत इतै करिगौ कछु ख्याला ॥
हेरत टेरि ककै चहुँ ओर तै झाँकि झरोखन ते ब्रज-वाला ।
देखि सु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्योस को ताप-कसाला ॥३४॥
शब्दार्थ—गाइन = गायो के । लसै = सुशोभित हो रहे है । अभीत =
निडर होकर । ख्याला = खेल । द्योस = दिन । ताप-कसाला = थकान ।
अर्थ— श्रीकृष्ण गाये चराकर शाम को बन से ब्रज लौट रहे है । गायों के
साथ ब्रज के ग्वाले सुशोभित हो रहे है । बंशी बजाते हुए गोचारण के गीत
गाते हुए निडर होकर कृष्ण इधर कुछ खेल-सा कर गये है । उन्हे देखने के
लिए चारो ओर से ब्रजवालाये आकर झरोखो से झाँकने लगी है । रसखान
कवि कहते है कि उनके मुख की शोभा को देखकर सारी ब्रज-वनिताएँ अपनी
दिन-भर की थकान को भूल गई, अर्थात् उनके जीवन मे नवीन चेतना और
स्फूर्ति आ गई ।
पाठान्तर—'आवत है वन ते मनमोहन गाइन सग लसै ब्रज-ग्वाला ।
बेनु बजावत गावत गीत अभीत इतै करिगौ कछु ख्याला ।
हेरत टेर थकी चहुँ ओर तै झाँकि झरोकनि सो ब्रजवाला ।
देखत आनन को रसखान तज्यौ सब द्यौस को ताप कसाला ॥'
कवित्त
गोरज विराजै भाल लहलही बनमाल,
आगे गैयाँ पाछे ग्वाल गावै मृदु तानि री ।
तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर मधुर जैसी,
बंक चितवनि मन्द मन्द मुसकानि री ।

१८२ रसखान-ग्रन्थावली
कदम विटप के निकट तटनी के तट,
अटा चढि चाटि पीत पट फहरानि री ।
रस वरसावै तन तपनि बुझावै नैन,
प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥३५॥
शब्दार्थ—लहलही = सुन्दर । विटप = वृक्ष । तटनी =-नदी, यमुना नदी ।
रस = आनन्द । तन-तपनि = शरीर के दुख ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई
कहती है कि उसके मस्तक पर गोरज तथा हृदय पर सुन्दर बनमाला सुशोभित
है । उसके आगे आगे गाये है, पीछे-पीछे ग्वाले है। गायो और ग्वालो के मध्य
मे वह मनोहर बांसुरी बजा रहा है। जितनी सुन्दर बासुरी की ध्वनि है, उतनी
ही सुन्दर उसकी वक्र चितवन और मन्द हंसी है। वह यमुना नदी के तट पर
कदम्ब वृक्ष के पास है। हे सखि ! यदि तू उसके पीले वस्त्रों के फहराने को
देखना चाहती है तो अटारी पर चढकर देख ले। आनन्द की वर्षा करता हुआ,
शरीर के दुखो को नष्ट करता हुआ तथा नेत्र और प्राणों को मोहित करता
हुआ वह आनन्द-सागर कृष्ण आ रहा है।
सवैया
अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है ।
लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गांठन खोलत है ॥
सुनि री सजनी अलबेलो लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है ।
रसखानि लखे मन बूडि गयौ मधि रूप के सिंधु कलोलत है ॥३६॥
शब्दार्थ—महामृदु = अत्यन्त मधुर । बूडि गयौ = डूब गया । मधि =
मध्य मे, अन्दर । कलोलत है = किल्लोले करता है ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! कृष्ण अत्यन्त सुन्दर है और वे अत्यन्त मधुर वाणी
बोलते है । वे मुझे देखकर अपने नेत्रो की कोरो से कटाक्ष चलाकर लाज को
दूर कर देते है, अर्थात् उनसे इतना प्रेम हो जाता है कि लोक-लाज की कोई
चिन्ता नही रहती । हे सजनी ! सुनो, वह विलक्षण कृष्ण प्रत्येक कुंज मे
घूमता रहता है । उस आनन्द-सागर कृष्ण को देखकर मेरा मन उसके रूप-
सागर मे डूबकर किल्लोले करता है ।

व्याख्या भाग १८३

विशेष—रूपक अलंकार ।
पाठान्तर—इस सवैये की दूसरी पंक्ति का यह रूप भी मिलता है—
‘वह नैन की कोर कटाछन लाय कै लाज की ग्रथनि खोलत है ।’
तुलना—‘चित्त चप जाय परे सोभा के समुद्र माँझ,
रही न सभार कछु और भई पल मे ।
मन मेरो गरूवो गयौ री बूडि मै न पायौ,
नैन मेरे हरूवे तिरत रूप जल मे ।’
गंग कवि
सवैया
तै न लख्यौ जब कुंजनि ते बनिकै निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री ।
सोहत कैसो हरा टटक्यौ अरु कैसो किरीट लसै लटक्यौ री ॥
को रसखानि फिरै भटक्यौ हटक्यौ ब्रज लोग फिरै भटक्यौ री ।
रूप सबै हरि वा नट को हियरे अटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ॥३७॥
शब्दार्थ—बनिकै=सुन्दर रूप धारण करके । हरा=हार । किरीट=
मुकुट । भटक्यौ=रूप से झकझोरा हुआ । हटक्यौ=मना करने पर भी ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! तब कृष्ण भटकता हुआ और मटकता हुआ सुन्दर रूप
धारण करके कुंज मे से निकाला था, तब तूने उसे नही देखा । उसके हृदय पर
पड़ा हुआ हार कितना शोभायमान था और सिर पर लटकता हुआ मुकुट
कितना सुन्दर दिखाई पड रहा था । रसखान कहते है कि ब्रजवासियो के मना
करने पर भी वह रूप से झकझोरा हुआ कृष्ण भटकता हुआ फिर रहा था ।
उस नटवर कृष्ण का सारा सौन्दर्य मेरे हृदय मे अटक गया है, अर्थात् उसके
सौन्दर्य का गम्भीर प्रभाव मेरे हृदय पर पड़ा है ।
विशेष—अन्तिम पंक्ति मे ‘अटक्यौ’ शब्द की तीन बार आवृत्ति प्रभाव-
शीलता मे सहायक है । वीप्सा अलंकार ।
पाठान्तर—इस सवैये की अन्तिम पंक्ति का यह रूप भी मिलता है—
‘रूप सबै हरि वा नट को हियरे फटक्यौ भटक्यौ अटक्यौ री ।’

१८४ रसखान ग्रन्थावली
सवैया
नैननि वक्र विसाल के वाननि झेलि सकै अस कौन नवेली ।
बेधत हैं हिय तीछन कोर सुमार गिरी तिय कोटिक हेली ॥
छोरै नहीं छिनहूँ रसखानि सु लागी फिरै द्रुम सो जनु बेली ।
रोरि परी छवि की ब्रजमण्डल कुंडल गंडनि कुंतल केली ॥३८॥
शब्दार्थ—नवेली=नई, युवती । सुमार=भयंकर मार से । कोटिक=
करोड़ों । हेली=सखी । द्रुम=वृक्ष । रोरि=कोलाहल । कुंडल गंडनि कुन्तल
केली=कुंडल से सुशोभित गंडस्थल पर केशों की क्रीड़ा ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! ऐसी कोई भी
युवती नहीं है जो कृष्ण के वक्र एवं विशाल नेत्र-रूपी बाणों की चोट को सह
सके । ये बाण अपनी तीक्ष्ण नोकों से हृदय को बेधते हैं और करोड़ों नारियाँ
इनकी भयंकर मार से गिर गई हैं । आनन्द-सागर कृष्ण फिर उन नारियों से
क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़े जाते और वे उनसे उसी प्रकार चिपट जाती हैं
जिस प्रकार वृक्ष से बेल लिपट जाती है । सारे ब्रज में कृष्ण की शोभा तथा
उनके कुंडल से सुशोभित गंडस्थल पर केशों की क्रीड़ा का कोलाहल मचा
हुआ है ।
विशेष—रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकार ।
सवैया
अलवेली विलोकनि बोलनि औ अलवेलियै लोल निहारन की ।
अलवेली सी डोलनि गंडनि पै छवि सो मिली कुंडल वारन की ॥
भटू ठाढ़ी लख्यौ छवि कैसे कहौं रसखानि गहे द्रुम डारन की ।
हिय मै जिय मै मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ॥३९॥
शब्दार्थ—अलवेली=विलक्षण । विलोकनि=दृष्टि । लोल=चंचल ।
गंडनि पै=गंडस्थलों पर । वारन=हाथी । द्रुम=वृक्ष । निरवारन की=
छूटने की ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! उसकी दृष्टि और वाणी विलक्षण हैं; उसकी चंचल
दृष्टि भी विलक्षण-सी है । उसके कपोलों पर कुंडलों की छवि हाथी के गड-

व्याख्या भाग १८५
स्थल पर पड़ी हुई छवि की भाँति विलक्षण है। हे सखि ! मैने उसको (कृष्ण
को) पेड़ की डालियाँ पकड़ कर खड़े हुए देखा था। उस समय उसकी जो
शोभा थी, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उसकी रस से भरी हुई मुस-
कान मेरे हृदय मे और मन मे भर गई है। उसको छूटने की मुझे कौन शिक्षा
दे सकती है ? अर्थात् किसी के कहने से भी वह नहीं छूट सकती।
पाठान्तर—'अलबेली विलोकनि बोलनि है अलबेली सु लोलनि हारन की।
अलबेली सी डोलनि गडनि पै छवि कुंडल सो मिलि बारन की।
भटू ठाढो लख्यो छवि कैसे कहौ रसखान गहै द्रुम डारन की।
हिय मे जिय मे मुसकानि रमी गति को सिखवै निरवारन की॥'
सवैया
बाँकी बड़ी अँखियाँ बडरारे कपोलनि बोलनि कौ कल बानी।
सुन्दर रासि सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी ॥
ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी।
डोलति है बन बीथिन मै रसखानि मनोहर रूप-लुभानी ॥ ४० ॥
शब्दार्थ—बडरारे = बड़े, विशाल। कल = सुन्दर। सुधानिधि = चन्द्रमा।
सुधारस-सानी = अमृत से युक्त।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से किसी अन्य नवीन गोपी का, जो कृष्ण
से प्रेम करती है, वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि । जब से
उस नवीन गोपी ने अत्यन्त सुख देने वाले, वक्र तथा विशाल नेत्र वाले, पुष्ट
कपोल वाले मधुर भाषण करने वाले, सुन्दर हँसी वाले, चन्द्रमा के समान मुख
वाले और अमृत जैसे प्रेम से युक्त शरीर वाले कृष्ण को देखा है, तब से वह
उनकी खोज मे वनो मे और गलियो मे घूमती फिर रही है तथा उनके
मनोहर रूप पर लुब्ध हो गये है।
विशेष—द्वितीय पंक्ति मे उपमा अलंकार।
सवैया
दृग इने खिंचे रहैं कानन लौ लट आनन पै लहराइ रही ।
छकि छैल छबील छटा छहराइ कें कौतुक कोटि दिखाइ रही ॥
झुकि भूमि झमाकनि चूमि भ्रमी चरि चाँदनी चन्द चुराइ रही।
मन भाइ रही रसखानि महा छवि मोहन की तरसाइ रही ॥ ४१ ॥

१८६ रसखान-ग्रन्थावली
शब्दार्थ—कानन लौ = कानो तक। आनन = मुख । कौतुक = खेल ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई
कहती है कि उनके दोनो नेत्र कानो तक खिंचे रहते है ; अर्थात् उनके नेत्र
विशाल है , उनके केश मुख पर लहराते रहते हैं उनकी सुन्दर शोभा की
कांति बिखर कर करोडो प्रकार के खेल दिखा रही है। उसकी शोभा झुककर,
घूमकर और, अमृत को चूमकर चन्द्रमा की चाँदनी को चुरा रही है । रसखान
कहते हैं कि कृष्ण की महा छवि मनमोहक है, इसीलिए वह मन को तरसा रही
है।
विशेष —द्वितीय और तृतीय पंक्ति मे छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास ।
सवैया
लाल लसै पगिमा सब के सबके पट कोटि सुगवंधि भीने ।
अंगनि अंग सजे सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने ॥
मुकता गलमाल लसै सब के सब ग्वार कुंवार सिंगार सो कीने ।
पै सिगरे ब्रज के हरि ही हरि ही के हरै हियरा हरि लीने ॥ ४२ ॥
शब्दार्थ—कोटि = करोड़ । जराउ = आभूषण ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की छवि का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! सारे ग्वालो के सिर पर लाल पगड़ी सुशोभित
है, सभी के वस्त्र करोड़ों प्रकार की सुगन्धियो से सुगन्धित हो रहे है । रसखान
कहते है कि सभी के अंग अनेक प्रकार के आभूषणो से सुशोभित है । सभी के
गलो मे मोतियो की मालाये सुशोभित हैं, सारे युवक ग्वाल शृंगार किये हुए
हैं, किन्तु श्रीकृष्ण सारे ब्रज के सिंह हैं । अर्थात् सभी मे श्रेष्ठ है । उन्होने
अपने हृदय पर पड़ी हुई लहलहाती वनमाला से ही सबके हृदय अपने वश
मे कर लिए ।
विशेष—अंतिम पंक्ति मे यमक अलंकार ।
सवैया
वह घेरनि धेनु अवेर सबेरनि फेरनि लाल लकुट्टनि की ।
वह तीछन चच्छु कटाछन की छवि मोरनि भौह भृकुट्टनि की ॥