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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 368 में से

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पृष्ठ 185

१६८ रसखान-ग्रन्थावली
चाहिए, क्योकि उस समय तो यमराज भी तुम्हारा कुछ भी नही बिगाड़
सकता ।
विशेष—१. 'चाखनहारो सो राखनहारो' मे यमक अलंकार है ।
२. 'विचारो' शब्द यमराज की दुर्बलता को साकार कर रहा है, अतः
यह शब्द नितात औचित्यपूर्ण है ।
३. अन्तिम पंक्ति मे यति-दोष है ।
सवैया
देस विदेस के देखे नरेसन रीझ की कोऊ न बूझ करैंगौ ।
ताते तिन्हें तजि जानि गिर्यौ गुन सौ गुन औगुन गाँठि परैगौ ।
बाँसुरीवारो बडो रिझवार है स्याम जु नैसुक ढार ढरैगौ ।
लाडलो छैल वही तौ अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगौ ॥ १८॥
शब्दार्थ—रीझ की = प्रेम की । गिर्यो गुन = अवगुण । रिझवार =
रीझने वाला, प्रेम करने वाला । नैसुक = तनिक भी । ढार ढरैगौ = प्रीति
करेगा । पीर = दुख ।
अर्थ—कृष्ण भक्त-वत्सल है, इसी भाव को अभिव्यक्त करते हुए रसखान
कहते है कि हे मन ! तू देश-विदेश के राजाओ को परख ले, तेरे प्रेम का कोई
भी सम्मान नही करेगा । उनके प्रति प्रेम करना अवगुण ही है, क्योकि चाहे
तुममे कितने ही गुण सही, पर उनके साथ रहने से वे अवगुण बन जायेंगे ।
वह वशीधर कृष्ण बहुत ही रीझने वाला है, भक्त-वत्सल है, यदि तू उससे
तनिक भी प्रेम करेगा तो वह अहीर का लाड़ला पुत्र हमारे हृदय के सारे दुख
को दूर कर देगा ।
विशेष —१ 'देश विदेश' मे छेकानुप्रास; 'ताते तिन्हें तजि' मे वृत्यनु-
प्रास और 'सौगुन औगुन गाँठि परैंगौ' मे यमक अलकार है ।
२ 'रिझवार' शब्द का प्रयोग अत्यन्त भावपूर्ण है ।
सवैया
सपति सौ सकुचाइ कुवेरहि रुप सौ दीनी चिनौती अनगहि ।
भोग कै कै ललचाइ पुरन्दर जोग कै गगलर्ड घर मगहि ।
ऐसे भए तौ कहा रसखानि रसै रसना जी जु मुक्ति-तरगहि ।
दै चित ताके न रग रच्यौ जु रह्यौ रचि राधिका रानी के रगहि ॥१९॥