रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १७५
मिलन
सवैया
मोर के चन्दन मौर बन्यौ दिन दूलह है अली नद को नंदन ।
श्री वृषभानुसुता दूलही [दिन जोरि वनी विधना सुखकदन ॥
आवै कह्यो न कछू रसखानि ही दोऊ बँधे छवि प्रेम के फदन ।
जाहि बिलोके सबै सुख पावत ये ब्रजजीवन है दुखदंदन ॥२६॥
शब्दार्थ—मोर के चंदन = मोर-पखो के चन्दवे। अली = सखी । श्रीवृष-
भानुसुता = राधा। सुखकदन = सुख देने वाली । ब्रजजीवन = कृष्ण ।
दुखदंदन = दुख दूर करने वाले ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती
हुए कहती है कि हे सखि ! मोर-पखों के चन्दवो का मुकुट पहने हुए कृष्ण
दूल्हा बने हुए है और अत्यन्त सुख देने वाली राधा दूलहिन बनी हुई है ।
रसखान कहते है कि उन दोनो की अवस्था का वर्णन नही किया जा सकता ।
दोनो प्रेम के बंधन मे बँधे हुए हैं। जिनको देखकर सभी लोगो को सुख प्राप्त
होता है, वे दुख दूर करने वाले श्री कृष्ण है ।
सवैया
मोहिनी मोहन सो रसखानि अचानक भेट भई वन माही ।
जेठ की घाम भई सुखधाम अनद ही अग ही अग समाही ॥
जीवन को फल पायौ भटू रस-बातन केलि सो तोरत नाही ।
कान्ह को हाथ कँधा पर है मुख ऊपर मोर किरीट की छाही ॥२७॥
शब्दार्थ—मोहिनी = राधा । घाम = धूप । सुखधाम = सुख का भण्डार ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती
हुई कहती है कि हे सखि ! आज अचानक राधा और कृष्ण की भेट वन के
अन्दर हो गई। उस मिलन मे उन्हे जेठ की तपती हुई धूप भी सुख का भंडार
बन गई । वे आनन्द के कारण अगो मे अगो को छिपाने का प्रयास करने लगे ।
हे सखि ! उन्होने प्रेम-पूर्ण बातो के द्वारा ही जीवन का फल पा लिया, अर्थात्
उनका जन्म सफल हो गया । वे अपनी क्रीड़ा को अवाध गति से चलाते रहे ।