रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७२ रसखान-ग्रन्थावली
मनुष्य ! यदि तुमने चित्त लगाकर कृष्ण से प्रीति नही की है तो तुम्हारे सोने
के वे महल बेकार है जो सदा लाल मोतियो की दीपमालाओ से प्रकाशित रहते
हैं और जिन्हे देखते ही दृष्टि चौंधिया जाती है। तुम्हारी अधिक प्रभुता का
तो क्या वर्णन करूँ, यदि तुम इतने प्रभुत्व सम्पन्न हो गए हो कि अनेक राजा
तुम्हारे प्रतिहार बने हुए है और उनकी भीड कभी भी तुम्हारे द्वार से नही
हटती तो कृष्ण के प्रेम के अभाव मे यह प्रभुता व्यर्थ है। चाहे तुम—गगाजी
मे स्नान करके मुक्त हस्त से मोतियो का दान करो, अनेक बार वेदो का पाठ
करो और प्रात काल ध्यानावस्थित हो, किन्तु जब तक तुम कृष्ण से प्रीति नही
करोगे, तब तक तुम्हारी ये साधनाएँ निष्फल ही रहेगी।
कहने का भाव यह है कि कृष्ण की भक्ति ही सर्वोपरि और सर्वोच्च
भक्ति है।
विशेष—१. ‘दीठि ठहराति नाहिं’ मुहावरे का भावपूर्ण प्रयोग है।
२. इस कवित्त मे ‘प्रतिहारन’ शब्द खडित है, अतः यहाँ पद-भग
दोष है।
सवैया
एक सु तीरथ डोलत है इक वार हजार पुरान बके हैं।
एक लगे जप मे तप मे इक सिद्ध समाधिन मे अटके है।
चेत जु देखत हौ रसखान सु मूढ महा सिगरे भटके है।
साँचहि वे जिन आपुनपौ यह स्याम गुपाल पै वारि दके है ॥२३॥
शब्दार्थ—बके है = कहे है, कथाएँ सुनाई है। चेत = सावधान। सिगरे =
सारे। आपुनपौ = अपनापन, स्वय को। छके है = मस्त है।
अर्थ—तीर्थादि वाह्याडम्बरो का खडन और कृष्ण-प्रेम का मडन करतेहुए
रसखान कहते है कि कोई मनुष्य तो तीर्थों की यात्रा करता हुआ घूमता है,
कोई हजारो बार पुराणों की कथाओ को सुनाता है, अर्थात् पुराणो का पाठ
करता है। कोई जप-तप मे लगा हुआ है, कोई सिद्ध बनकर समाधि मे अटका
हुआ है। रसखान कहते है कि यदि सावधान होकर इन्हे देखा जाता है तो
यही निष्कर्ष निकलता है कि ये सब महामूर्ख बनकर भटक रहे हैं। सही तो
वे मनुष्य है जो स्वय को कृष्ण के लिए अर्पित करके उस समर्पण की मस्ती से