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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

१४८ रसखान-ग्रन्थावली
'द्रौपदी औ गनिका गज गीध अजामिल सो कियो सो न निहारो।
गौतम गेहिनी कैसी तरी, प्रह्लाद की कैसे हर्यौ दुख भारो।
काहे कौ सोच करै रसखानि कहा करि है रविनन्द विचारो।
ताखन जाखन राखियै माखन-चाखनहारो सो राखनहारो॥'
रसखान ने जिस विषय का भी प्रस्तुतीकरण किया है, उसी को अत्यन्त
भावपूर्ण रीति से व्यक्त किया है। यथा-
रूप-माधुरी-
'आवत हैं वन ते मनमोहन गाइन संग लसे ब्रज-ग्वाला।
वेनु बजावत गावत गीत अभीत दूतै करिगो कछु स्याना।
हेरत हेरि थकै चहुँ ओर तै झाँकि झरोखन तें ब्रज-बाला।
देखि सु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्यौस को ताप-रसाला॥'
वक्र दृष्टि-
'आती लला घन सो अति सुन्दर तैसो लसै पियरो उपरैना।
गडनि पै छलकें छवि कुंडल मंडित कुंतल रूप की सैना।,
दीरघ वक्र विलोकन की अवलोकनि चारति चित्त को चैना।
मो रसखानि हर्यौ चित्त री मुसकाइ कहे अधरामृत बैना॥'
मुसकान माधुरी-
'वा मुख की मुसकान भटू अँखियन ते नेकु टरै नहि टारी।
जौ पलकें पल लागति हैं पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी।
दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम, गह्यो वजमारी।
प्रेम की वानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी॥'
सौन्दर्य-वर्णन-
'मोरपखा सिर कानन कुंडल कुंतल सो छवि गडनि छाई।
वक्र बिसाल रसाल विलोचन है दुख मोचन मोहन माई।
आली नवीन महाघन सो तन पीत पटा ज्यौं छटा वनि आई।
हौ रसखानि जकी सी रही कछु टोना चलाइ ठगौरी सी लाई॥'

समीक्षा भाग १४६
कुंजलीला--
'कुंजगली मैं अली निकसी तहाँ साँकरे ढोटा कियौ मटभेरो ।
माई री वा मुख की मुसकानि गयौ मन बूडि फिरै नहिं फेरो ।
जोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित्त डार्यौ है प्रेम को फद घनेरो ।
कैसी करौ अब क्यौ निकसौ रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ।।'
रसखान- काव्य मे कृत्रिम व्यापारो का अभाव है । वर्णन और चेष्टा दोनो
मे ही स्वाभाविकता है । नटखट कृष्ण गोपियो से छेडछाड करते है । गोपियाँ
कितनी स्वाभाविक भाषा मे उसकी भर्त्सना करती है—
'अन्त ते न आयौ याही गाँवरे को जायौ,
माई वापरे जिवायौ प्याइ दूध वारे बारे को ।
सोई रसखानि पहिचानि कानि छाँडि चाहै,
लोचन नचावत नचैया द्वारे द्वारे को ।
मैया की सौ सोच कछु मटकी उतारे को न,
गोरस के ढारे को न चीर चीरि डारे को ।
यहै दुख भारी गहै डगर हमारी माँझ,
नगर हमारे ग्वल बगर हमारे को ।।'
चेष्टाओ का भी रसखान ने स्वाभाविक वर्णन किया है । कृष्ण किसी गोपी
को मार्ग मे ही घेर लेते है । उनकी आँखे चार होती है । तब कृष्ण अपना
नटखटपना शुरू करते है । तब बेचारी विवश गोपी अपनी लज्जा बचाने
के लिए अपने ही वस्त्रो मे इस प्रकार लिपट जाती है जैसे सावन के बादल
मे छिपकर बिजली भीतर ही भीतर तडप रही हो—
'पहले दधि लै गई गोकुल मैं चख चारि भए नट नागर पै ।
रसखानि करी उनि मैनमई कहै दान दै दान खरे अरपै ।
नख ते सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कंपै डरपै ।
मनौ दामिनि सावन के घन मै निकसै नहीं भीतर ही तरपै ।।'
वस्तुत. रसखान की दृष्टि मे प्रेम एक अत्यन्त उदात्त भाव है । इन उदात्त
भावो से सम्वद्ध भावो मे कृत्रिप्रता लाना इसके औदात्य को नष्ट करना है ।
इसीलिए इन्होने सर्वत्र स्वाभाविकता का ध्यान रखा है ।
रसखान का काव्य भाव-प्रधान है । शब्दो का सचयन और संयोजन

१५० रसखान-ग्रन्थावली
इतनी कुशलता से किया गया है कि सर्वत्र भावों की प्रवल धारा अपनी
अबाध और सहज गति से प्रवाहित हो रही है। कोई गोपी अपनी सखी से
अपने प्रेम को किस सरलता किन्तु भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है—
'काल्हि पढू मुरली-धुनि में रसखानि लियो कहुँ नाम हमारौ।
ता दिन तैं भई बैरिन सास हितो कियो झांकन देति न द्वारौ।'
होत चवाव बनाव सौ आनी री जौ भरि आंगिन भेंटियै प्यारौ।'
बाट परी अब ही ठिठनयौ हियरे अटकायौ पियरे पटवारौ।'
'पियरे पटवारौ' में अनन्त भावों की गरिमा के साथ-साथ अपार आत्मी-
यता सन्निहित है। 'दानलीला' में कृष्ण-राधा-संवाद के अन्तर्गत और भी
अधिक भावप्रवणता दृष्टिगोचर होती है। यथा—
कृष्ण—
'एरी कहा वृषभानुसुता कौ तौ दान दिये बिन जान न पैहौ।
जौ दधि-माखन देव जू चाहन भूगत लाँघन या मग ऐहौ।
नाहिं तौ जौ रस गौ रस लैहौ जु गोरस बेचन फेरि न जैहौ।
नाहक नारि तू रारि बढ़ावति गारि दियैं फिरि आपहि दैहौ॥'
राधा—
'गारी के देवैया बनवारी तुम कहौ कौन,
हम तो वृषभान की कुमारी सब जानौ हौ।
जोर तौ करोगे जाउ जामौ हरि पार पाहु,
भुरही ते आजु मों सों कैसो हठ ठानौ है!
बूझि देखौ मन माँहि अचंभत मग जात,
बूझि हौ निदान कान्ह जोन कह्यो मानौ हौ।
मेरे जान कोऊ मीरम्यान आवै दही छीनै,
तू तो है अहीर मोहि नाहि पहिचानौ है।'
आत्म-निवेदन भक्त की एक प्रमुख विशेषता होती है। इसके द्वारा भक्त
अपने जीवन के सारे कार्यों का—विशेषतः पापों का—अनावरण अपने
आराध्य के समक्ष कर देता है। इस अनावरण का कारण होता है अपने
आराध्य के प्रति अगाध विश्वास। रसखान में सूर अथवा तुलसी जैसा आत्म-

समीक्षा भाग १५१
निवेदन तो नही मिलता, पर अपने आराध्य के प्रति इन्होने अगाध विश्वास
अवश्य व्यक्त किया है । यथा-
'कहा करै रसखान का कोई चुगुल लबार ।
जो पै राखन हार है माखन चाखन हार ॥'
इस प्रकार के अनेक उदाहरण रसखान-काव्य मे मिलते है ।
आत्म-समर्पण भी अगाध विश्वास का एक अग है । रसखान जिस विधि
से स्वय को अपने भगवान के प्रति समर्पित करते है, वह विलक्षण है । इस
विषय मे इनका निम्नलिखित सवैया बहुत प्रचलित है-
'मानुष हौ तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जौ पसु हौ तौ कहा बस मेरो चरौ नित नद की धेनु मँझारन ।
पाहन हौ तौ वही गिरि को जो धर्यौ कर छत्र पुरदर धारन ।
जो खग हौ तौ बसेरो करौ मिलि कालिदी-कुल-कदम्ब की डारन ॥'
विरह-वेदना की अभिव्यक्ति भक्तो के लिए प्रमुख रही है । फारसी-
साहित्य मे तो यही एकमात्र सोपान है जिससे प्रियतम अथवा आराध्यदेव तक
पहुँचा जा सकता है । रसखान के विरह का अत्यन्त सजीव एव स्वाभाविक
वर्णन किया है । यथा-
'बाल गुलाब के नीर उसीर सो पीर न जाइ हियै जिन ढारौ ।
कज की माल करौ जु बिछावन होत कहा पुनि चंदन गारौ ।
एते इलाज बिकाज करौ रसखानि को काहे को जारे पै जारौ ।
चाहति हौ जु जिवायौ पटू तौ दिखावौ बड़ी-बड़ी अँखिनिवारौ ॥'
प्रियतम के सान्निध्य के बिना विरहिणी की विरह-वेदना का और
उपचार ही क्या हो सकता है ।
कही-कही परम्परा के अवाछित चक्कर मे आकर अथवा फारसी-प्रभाव
के कारण रसखान ऊहात्मक वर्णन भी कर गये है । पर ऐसे स्थल कम ही है ।
वास्तविक काव्य-आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त और कुछ है
भी नही । रसखान किसी काव्य-शास्त्रीय नियम से न तो अवगत ही है और
न यह विशेषता इनके लिए आवश्यक ही है । अपने भावावेश मे ही इनकी

१५२ रसखान-ग्रन्थावली
वाणी फूटती है और वाणी का यही प्रस्फुटन सरस एवं सच्चे काव्य को जन्म
देता है ।
अन्य स्वच्छन्दवादी कवियो की भाँति रसखान ने भी प्रेम के स्वस्थ रूप
का चित्रण किया है । प्रेम इनकी दृष्टि मे हृदय की सबसे उदात्त भावना है ।
इनके मत से शुद्ध और वास्तविक प्रेम वही है जिसमे अकारण ही आकर्षण
हो । गुण, यौवन, रूप आदि के आकर्षण से जो प्रेम होता है, उसे शुद्ध नही
कहा जा सकता । पुत्र, कलत्र आदि के प्रति किया गया प्रेम भी स्वाभाविक
और सच्चा नही है । वास्तव मे प्रेम भगवान का ही दूसरा रूप है । रसखान
ने प्रेम का सागोपाग विवेचन किया है एतद्विषयक इनके दोहे 'प्रेम-वाटिका' में
सगृहीत है ।
रसखान सच्चे हृदय से भक्त थे । रीतिकालीन कवियो की भाँति भक्ति
का वहाना इन्होने नही लिया था । इसलिए इनके काव्य मे आद्योपांत कृष्ण-
भक्ति की धारा प्रवाहित होती हुई दिखाई देती है । इनकी भक्ति साधना मे
वे सभी विशेषताएँ मिलती है जो वैष्णव-भक्ति के लिए अनिवार्य हैं ।
अत कहा जा सकता है कि रसखान-काव्य मे वे सभी गुण विद्यमान हैं
जो स्वच्छन्द काव्यधारा मे पनपे हैं । डा० मनोहरलाल गौड के शब्दो मे—
'....रसखान मे अपने समय की-काव्य प्रवृत्तियो तथा अनुभूति-विधानों
का परिचय तो दिखाई पडता है, पर अनुसरण नही । उन्होने अपना ही स्वानु-
कूल मार्ग बनाया । उस मार्ग मे विशुद्ध अप्रतिहत प्रेम की अनुभूति का प्राचुर्य
था और उसकी अनावृत्त अभिव्यक्ति थी जो स्वच्छन्द मार्ग की ओर सकेत
करती है, शास्त्रीय परम्परा की ओर नही । इसका तात्पर्य यह तो कदापि
नही कि रसखान ने जान-बूझकर शास्त्रीय मार्गों का सघटन किया है, या वे
काव्य के स्वच्छन्द मार्ग से यथाविधि परिचित थे । उनके जीवन का सयोग
मुसलमान प्रेमी भक्त होने के नाते विविध पद्धतियो के सम्मिश्रण का कारण
बन गया था । वैसा ही सम्मिश्रण कबीर मे भी हुआ था, पर कबीर ज्ञानमार्गी
होकर कठोर भी हो गये और खडन-परायण भी । हृदय की अनुभूतियो को
अपने ढंग से व्यक्त करने की सरस प्रवृत्ति उनमे नही आई जो रसखान में
आ गई ।'

सुजान-रस खान

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भक्ति-भावना
सवैया
मानुष हो तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जो पसु हौ तो कहा बसु मेरो चरौ नित नन्द की धेनु मंझारन ।
पाहन हौ तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन ।
जो खग हौ तो बसेरो करौ मिलि कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ।।१।।
शब्दार्थ—मानुष हौ=यदि मुझे आगामी जन्म मे मनुष्य-योनि मिले ।
मंझारन=मध्य मे । पाहन=पत्थर । छत्र=छाता । पुरन्दर=इन्द्र ।
धारन=गर्व नष्ट करने के लिए । कालिन्दी-कूल-कदम्ब=यमुना के तट पर
खड़े हुए कदम्ब के वृक्ष जिन पर कृष्ण अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते
थे । डारन=डालियो मे ।
अर्थ—कृष्ण के प्रति अपनी स्वतन्त्र भाव की भक्ति की अभिव्यक्ति
करते हुए रसखान कहते है कि यदि मुझे आगामी जन्म मे मनुष्य-योनि मिले
तो मैं वही मनुष्य बनूँ जिसे ब्रज और गोकुल गाँव के ग्वालो के साथ रहने
का अवसर मिले । आगामी जन्म पर मेरा कोई बस नही है, ईश्वर जैसी
योनि चाहेगा, दे देगा, इसलिए यदि मुझे पशु-योनि मिले तो मेरा जन्म ब्रज
या गोकुल मे ही हो, ताकि मुझे नित्य नन्द की गायो के मध्य मे विचरण
करने का सौभाग्य प्राप्त हो सके । यदि मुझे पत्थर-योनि मिले तो मै उसी
पर्वत का बनूँ जिसे श्रीकृष्ण ने इन्द्र का गर्व नष्ट करने के लिए अपने हाथ
पर छाते की भाँति उठा लिया था । यदि मुझे पक्षी-योनि मिले तो मैं ब्रज
मे ही जन्म पाऊँ ताकि मै यमुना के तट पर खडे हुए कदम्ब के वृक्ष की
डालियो मे निवास कर सकूँ ।
विशेष—१ कवि ने अपना सम्बन्ध उन्ही वस्तुओ से जोडने की इच्छा
प्रकट की है, जिनसे कृष्ण का सम्बन्ध रहा है । भक्त को चाहे जिस अवस्था
मे रहना पड़े, उसे उसके आराध्यदेव के दर्शन नित्य मिलते रहे, यही उसके
१५५

३५६ रसखान-ग्रन्थावली
जीवन का लक्ष्य होता है । रसखान ने भी उपर्युक्त सवैये मे इस लक्ष्य की
भावमयी अभिव्यञ्जना की है ।
२. 'बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन' मे तथा 'कालिन्दी-कूल-कदम्ब की'
मे छेकानुप्रास अलकार है ।
३. 'पाहन ही तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर-धारन' मे
निम्नलिखित अन्तर्कथा निहित है—
कृष्ण के आदेश से ब्रजवालो ने इन्द्र की पूजा छोडकर गौओ की पूजा
करनी आरम्भ कर दी । इस बात से इन्द्र अत्यन्त कुपित हुआ । उसने ब्रज को
डुवाने के लिए मूसलाधार वर्षा कर दी । कृष्ण ने ब्रज की रक्षा के लिए
गोवर्धन पर्वत को उठाकर छाते की भाँति ब्रज के ऊपर लगा दिया । तब
इन्द्र ब्रज का कुछ भी न बिगाड सका । उसका गर्व नष्ट हो गया ।
'पाठान्तर—'मानुष हौं तो वही रसखानि बसो नित गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जौ पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन ।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो ब्रज छत्र पुरन्दर-धारन ।
जौ खग हौं तौ बसेरो करौं वही कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ।'
तुलना—'ब्रज के लता पता मोहि कीजै ।' —हरिश्चन्द्र
सवैया
जो रसना रस ना बिलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन ।
मो कर नीकी करै करनी जु पै कुज-कुटीरन देहु बुहारन ।
सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि नहीं ब्रज-रेनुका-अंग-सवारन ।
खास निवास लियो जु पै तौ वही कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन ॥२॥
शब्दार्थ—रसना = जीभ । रस = इन्द्रियो को आनन्द देने वाले मधुर,
अम्ल, लवण, कटु, कपाय और तिक्त रस । नीकी = अच्छी । बुहारन = साफ
करना, झाडू देना । रेनुका = धूल । कालिन्दी-कूल = यमुना का तट ।
अर्थ—रसखान अपने आराध्यदेव से प्रार्थना करते हुए कहते है कि हे देव,
मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो, ताकि मेरी जीभ इन्द्रियो के आनन्द
मे डूब जाये । मुझे कुंजो मे बनी हुई अपनी कुटियो मे झाडू लगाने दो,

व्याख्या भाग १५७.
जिससे मेरे हाथ सत्कार्य करते रहे । मुझे ब्रज की धूल मे अपने शरीर को
धूसरित करने दो, जिससे मुझे अणिमा आदि आठो सिद्धियो का सुख मिल जाये ।
यदि आप मुझे निवास करने के लिए कोई स्थान देना चाहते है तो यमुना-तट
पर खडे हुए उन्ही कदम्ब की डालियो मे दीजिए जहाँ पर आप अनेक प्रकार
की क्रीडाएँ किया करते थे ।
विशेष—'जो रसना रसना विलसे' मे यमक तथा 'करै करनी,' 'कुज-
कुटीरन', 'सिद्धि-समृद्धि' और 'कालिदी-कूल-कदम्ब की' मे छेकानुप्रास-
अलकार है।
सवैया
'बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सो सानी ।
हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी ।
जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी ।
त्यौ रसखान वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ।'
शब्दार्थ—बैन = वाणी । सानी = युक्त । सरै = माला पहनाये । पाइ =
पैर, चरण । अनुजानी = अनुगामी । जान = प्राण । रसखानी = अन्तिम पक्ति
मे यह शब्द चार बार प्रयुक्त हुआ है, अत. इसके अर्थ क्रमश' ये है—(१)
कवि का नाम, (२) आनन्द का भण्डार, (३) श्री कृष्ण, (४) प्रेम का खजाना,
अर्थात् अत्यन्त प्रेम करने वाला ।
अर्थ—मनुष्य-जीवन की सफलता एव सार्थकता तभी है जब वह स्वयं
को अपने आराध्य देव के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दे, इसी भाव को प्रकट
करते हुए रसखान कहते है कि वही वाणी सार्थक है जो कृष्ण के गुणो का
गान करती है, वे ही कान सार्थक है जो कृष्ण की वाणी से युक्त रहते है,
वे ही हाथ सार्थक है जो कृष्ण के शरीर पर माला पहनाते है; वे ही चरण
सार्थक है जो कृष्ण का अनुगमन करते है, उनके पीछे-पीछे चलते है, वे ही
प्राण सार्थक है जो सदैव कृष्ण के साथ रहते है; वही मान सार्थक है जो कृष्ण
को द्रवित करके उनसे मनमानी बात करा लेता है । इसी प्रकार वही आनन्द
के भण्डार श्री कृष्ण है जो अपने भक्तो को अत्यन्त प्यार करते है ।
विशेष—इस सवैया की अन्तिम पक्ति मे यमक अलकार का अत्यन्त
चमत्कारपूर्ण एव भावपूर्ण प्रयोग है ।

१५८ रसखान ग्रन्थावली
दोहा
कहा करै रसखानि को, कोऊ चुगुल लवार ।
जो पै राखनहार है, माखन चाखनहार ॥४॥
शब्दार्थ—चुगुल = चुगलखोर । लवार = झूठा, दुष्ट । राखनहार =
रक्षक । माखनमाखनहार = श्रीकृष्ण ।
अर्थ—श्रीकृष्ण जिसके रक्षक हैं, उनका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता,
इस भाव को प्रकट करते हुए रसखान कहते हैं कि यदि श्रीकृष्ण मेरे
रक्षक हैं तो मेरा कोई भी चुगलखोर तथा दुष्ट व्यक्ति कुछ नही बिगाड़
सकता ।
विशेष— १. 'जो पै राखनहार है, माखन-चाखनहार' मे यमक अलकार है ।
२. कहते हैं कि बादशाह अकबर ने रसखान को दीने-इलाही में
दीक्षित होने के लिए कहा, किन्तु ये दीने-इलाही में सम्मिलित
न होकर कृष्ण-भक्त बन गये । तब किसी व्यक्ति ने बादशाह
से आकर इनकी चुगली की और इन्हे कठोर दण्ड देने का परा-
मर्श दिया । इस घटना की प्रतिक्रिया-स्वरूप रसखान ने उपर्युक्त
दोहे की रचना की ।
पाठान्तर—कहा करै रसखान को, लपट लोग लवार ।
जो पत राखनहार है, माखन-चाखनहार ॥
तुलना—१. 'जो प राखि है राम तो मारि है कोरे ।'
—तुलसीदास
२. रहिमन को कोउ का करै, ज्वारी चोर लवार ।
जो पत राखनहार है, माखन-चाखनहार ॥
—रहीम
दोहा
विमल सरल रसखानि, भई सकल रसखानि ॥
सोई नव रसखानि को, चित चातक रसखानि ॥५॥
शब्दार्थ—विमल = शुद्ध । रसखानि मिलि = कृष्ण से मिलकर । रसखानि
= कृष्ण ।

ऽव्याख्या भाग १५६
अर्थ—रसखान कवि कहते हैं कि शुद्ध एव सरल स्वभाव वाली गोपियाँ
जिस कृष्ण से मिलकर उसी का रूप बन गई, मेरा मन उसी दयालु रसखान
(आनन्द-सागर कृष्ण) का घातक बना हुआ है।
विशेष— १. यमक अलकार ।
२. चातक का प्रेम आदर्श प्रेम माना गया है, अतः अपने प्रेम की
अभिव्यक्ति सभी भक्त-कवियो ने चातक के माध्यम से ही की है। गोस्वामी
तुलसीदास ने तो चातक प्रेम का सागोपाग ही वर्णन किया है।
दोहा
सरस नेह लवलीन नव, द्वै सुजान रसखानि।
ताके आस बिसास सो पगे प्रान रसखानि ॥६॥
शब्दार्थ—नेह = प्रेम। लवलीन = तन्मय। नव = नूतन। द्वै = दोनो,
कृष्ण और राधा।
अर्थ—कवि कृष्ण और राधा के मिलन की स्तुति करता हुआ कहता है
कि जो राधा और कृष्ण के सरस तथा नूतन प्रेम मे तन्मय हैं, उन्ही की दया
की आशा और विश्वास से मेरे प्राण सदैव सम्पृक्त है।
कृष्ण का अलौकिकत्व
सवैया
ऽसकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढावै।
नैक हिये जिहि आनत ही जड मूढ महा रसखानि कहावै।
जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावै।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥७॥
शब्दार्थ—सकर से सुर = शिव जैसे देव। चतुरानन = ब्रह्मा। नैक =
थोडा-सा। आनत ही = लाते ही। जड़ मूढ = अत्यन्त मूर्ख। महा रसखानि =
विपुल ज्ञान के भंडार। अदेव = किन्नर। भू-अगना = पृथ्वी पर रहने वाली
स्त्रियाँ। वारत प्रानन = प्राणो को न्यौछावर करके।
अर्थ—कृष्ण की भक्त-वत्सलता एव लौकिक लीला का वर्णन करते हुए
रसखान कहते हैं कि जिस कृष्ण का जप शकर जैसे देव करते हैं, जिनका

१६० रसखान-ग्रन्थावली

ध्यान करके वह्मा अपने धर्म मे वृद्धि करते है, जिसका तनिक सा ध्यान भी
हृदय मे लाते ही अत्यन्त मूर्ख भी विपुल ज्ञान के भडार बन जाते है, जिस पर
देव, किन्नर और पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्राणो को न्यौछावर करके
सजीवता प्राप्त करती है, उसी कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ
के लिए नाच नचाती है ।
विशेष—'सकर से सुर', 'ध्यानान धर्म', 'छोहरिया छछिया भरि छाछ' मे
छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास, 'नैक हिये जिहि आनत ही जड़ मूढ महा
रसखानि कहावै' मे द्वितीय विभावना, 'वारत प्रानन प्रानन पावै'मे विरोधाभास
और जापर देव अदेव भू-अगना' मे यमक अलकार है ।
पाठान्तर—इस सवैया की तृतीय पंक्तित के निम्नलिखित पाठांतर मिलते
है—
१. जापर सुन्दर देववधू नहिं वारत प्रान अवार लगावै ।
२. जापर देव भुवंग वरगना वारति प्रान सु प्रान से पावै ।
३. जापर देव अदेव भुवंगम वारत प्रानन पार न पावै ।
सवैया
सेप गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावै ।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड अछेद अभेद सु वेद बतावै ।
नारद से सुक व्यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावै ।
ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥८॥
शब्दार्थ—सेष=शेषनाग । महेस=शिव । दिनेस=सूर्य ! सुरेस=इन्द्र ।
अछेद=अच्छेद्य, अमर । अभेद=अभेद्य, जिसका रहस्य न जाना जा सके ।
पचि=कोशिश करके ।
अर्थ—कृष्ण की भक्त-वत्सलता एव लौकिक लीला का वर्णन करते हुए
रसखान कहते हे कि जिस कृष्ण के गुणो का शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य, इन्द्र
निरन्तर स्मरण करते है । वेद जिसके स्वरूप का निश्चित ज्ञान प्राप्त न करके
उसे अनादि, अनन्त, अखण्ड, अच्छेद्य, अभेद्य आदि विशेषणो से युक्त करते है ।
नारद, शुकदेव और व्यास जैसे प्रकाड पडित भी अपनी पूरी कोशिश करके
जिसके स्वरूप का पता न लगा सके और हार मानकर बैठ गए, उन्ही कृष्ण को,

व्याख्या भाग १६१
अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती है ।
विशेष—श्रुत्यनुप्रास, छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास का सुन्दर प्रयोग
हुआ है ।
सवैया
गावै गुनी गनिका गंधरब्ब औ सारद सेष सबै गुन गावत ।
नाम अनत गनत गनेस ज्यौ ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत ।
जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि लगावत ।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत ॥६॥
शब्दार्थ—गनिका = अप्सरा । गंधरब्ब = गंधर्व, संगीत-प्रिय देवयोनि ।
सारद = शारदा । सेष = शेषनाग । त्रिलोचन = शिव । छोहरियाँ = लड़की ।
छछिया = मिट्टी का छोटा-सा पात्र ।
अर्थ—कृष्ण की भवत-वत्सलता एव लोक-लीला का वर्णन करते हुए
रसखान कहते है कि जिस कृष्ण के गुणो का गान अप्सरा, गंधर्व, शारदा और
शेषनाग सभी करते है, गणेश जिसके अनत नामो का स्मरण करते है, ब्रह्मा
और शिव जिसके रहस्य को नहीं जान पाते, जिसे प्राप्त करने के लिए योगी,
यति, तपस्वी और सिद्ध निरन्तर समाधि लगाये रहते है, फिर भी उसका भेद
नही जान पाते, उन्ही कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए
नाच नचाती है ।
विशेष—इस सवैया मे छेकानुप्रास और वृत्यनुप्रास का सुन्दर प्रयोग है ।
पाठान्तर—'गावत', 'पावत', 'लगावत' और 'नचावत' के स्थान पर क्रमशः
'गावै', 'पावै,' 'लगावै', ओर 'नचावै' पाठ भी मिलते है ।
सवैया
लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक योगी भये पर अन्त न पावै ।
साँझ ते भोरहि भोर ते साझति सेस सदा नित नाम जपावै ।
ढूंढ़ फिरे तिरलोक मे साख सुनारद लै कर बीन बजावै ।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछियां भर छाछ पै नाच नचावै ॥१०॥
शब्दार्थ—भोर = प्रात काल । साँझ ते भोरहि भोर ते साझहि = सन्ध्या-
काल से प्रात काल तक और प्रात काल से सन्ध्याकाल तक; अर्थात् हर समय,

१६२ रसखान-ग्रन्थावली
निरन्तर । सेस = शेषनाग । तिरलोक मे = तीनों लोकों मे । सुनारद = महर्षि
नारद । साख = साक्षी ।
अर्थ- कृष्ण के अलौकिकत्व का प्रतिपादन करते हुए रसखान कहते हैं
कि ब्रह्मा आदि अनेक योगी उस कृष्ण को जानने के लिए समाधि लगाये हुए
हैं, पर वे उसका अन्त नही पाते, अर्थात् कृष्ण दुर्बोध्य और अनन्त हैं। शेष-
नाग अपनी सहस्रो जिह्वाओ से निरन्तर उसका नाम जपते रहते हैं। महर्षि
नारद अपने हाथ मे वीणा लेकर उसे बजाते हुए तीनो लोको मे ढूँढ़ फिरे हैं,
पर कोई भी ऐसी साक्षी नही मिली, जिसके आधार पर वे यह दावा कर सकें
कि उन्होने कृष्ण के रूप को जान लिया है। ऐसे दुर्बोध्य, अनन्त कृष्ण को
अहीर की लडकियाँ एक मटकी छाछ के लिए नाच नचाती हैं।
विशेष - यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-
ग्रन्थावली' मे नही है।
सवैया
गुज गरें सिर मोरपखा अरु चाल गयद की मो मन भावै ।
साँवरो नन्दकुमार सबै ब्रजमंडली मैं ब्रजराज कहावै ।
साज समाज सबै सिरताज औ लाज की बात नही कहि आवै ।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥११॥
शब्दार्थ-गुज = गले मे पहनने का एक आभूषण । गयंद = हाथी ।
छाज = शोभा ।
अर्थ - कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का तथा उनकी लौकिक
लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि उनके गले मे गुंज नामक आभूषण
है, सिर पर मोर-पखो का बना हुआ मुकुट है। हाथी जैसी मस्तानी चाल है
जो मुझे बहुत ही अच्छी लगती है। यह साँवरा कृष्ण सारे ब्रज का शिरोमणि
है, इसीलिए ब्रजराज कहलाता है। यह सारी शोभा का और सारे समाज का
सिरताज है। इसकी शोभा का वर्णन नही किया जा सकता। ऐसे कृष्ण को
अहीर की लड़कियाँ छछिया भर छाछ के लिए नचाती रहती हैं।
विशेष - 'साज समाज सबै सिरताज' मे वृत्यनुप्रास है।

व्याख्या भाग १६३

सवैया

ब्रह्म मै ढूँढ्यौ पुरानन गानन बेद-रिचा सुनि चौगुने चायन ।
देख्यौ सुन्यौ कबहुँ न कितूँ वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन ।
टेरत हेरत हारि पर्यौ रसखानि बतायौ न लोग लुगायन ।
देखौ दुरौ वह कुज-कुटीर मै बैठौ पलोटत राधिका पायन ॥१२॥

शब्दार्थ—पुरानन गानन=पुराण के गीतो मे । चायन=चाव से ।
कितूँ=कही भी । सुभायन=स्वभाव । टेरत=पुकारता हुआ । हेरत=
खोजता हुआ । लुगायन=स्त्रियो ने । दुरौ=छिपा हुआ । पलोटत राधिका
पायन=राधा के पैर दबा रहा है ।

अर्थ—कृष्ण की प्रेमाधीनता का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि
मैने ब्रह्म को पुराणो के गीतो मे ढूँढा, वेद-ऋचाओ को चौगुने चाव से इसी-
लिए सुना कि शायद उन्ही से ब्रह्म का पता चल जाये । मेरे सारे प्रयत्न
निष्फल हुए । मैने उसे न तो कही सुना और न कही देखा । मै यह भी नही
जान पाया कि उसका स्वरूप और स्वभाव कैसा है । उसे पुकारते हुए, उसकी-
खोज करते हुए मै थक गया और किसी भी नर या स्त्री ने उनका पता नहीं
बताया । अन्त मे वह मुझे कुज-कुटीर मे छिपकर बैठे हुए राधा के पैरो को
दबाता हुआ दिखाई दिया ।

सवैया

कस कुढ्यौ सुनि बानी अकास की ज्यावनहारहि मारन धायौ ।
भादव साँवरी आठई को रसखान महाप्रभु देवकी जायौ ।
रैनि अँधेरी मे लै वसुदेव महावन मे अरगै धरि आयौ ।
काहु न चौजुग जागत पायौ सो राति जसोमति सोवत पायौ ॥१३॥

शब्दार्थ—बानी अकास=आकाशवाणी । ज्यावनहारहि=जन्म लेने
वाला ही, देवकी के गर्भ से उत्पन्न होने वाला ही । भादव साँवरी आठई
को=भादौ की कृष्ण अष्टमी को । अरगै=धीरे-धीरे, चुपचाप । चौजुग=
चारो युगो मे—सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग । जागत=जागृत
अवस्था ।

अर्थ—कृष्ण-जन्म का वर्णन करते हुए रसखान कहते है कि जब कस ने
यह आकाशवाणी सुनी कि देवकी के गर्भ से उत्पन्न होने वाला पुत्र ही तुझे

१६४ रसखान-ग्रन्थावली
मारने के लिए अवतार ले रहा है तो वह बहुत अप्रसन्न हुआ । आकाशवाणी
के अनुसार ही भादो की कृष्णाष्टमी को आनन्द सागर महाप्रभु कृष्ण ने
देवकी के गर्भ से जन्म लिया । कस के भय से भयभीत होकर वसुदेव उस
नवजात शिशु को अँधेरी रात मे चुपचाप लेकर महावन (मथुरा) की ओर
चल दिए । जिस कृष्ण को चारो कालो का कोई भी योगी अपनी समाधि की
जागृतावस्था मे भी प्राप्त नही कर सका है, उसी कृष्ण को यशोदा ने रात को
अपने पास सोते हुए पाया ।
विशेष १. समाधि अलकार ।
२. यह सवैया श्री विश्वनाथ मिश्र द्वारा सापादित 'रसखान
ग्रंथावली' मे नही है ।
तुलना १. 'गावत वेद विरंच न पायौ सो गोधन गावत गोपन पायौ ।
—केशव
२ 'जग जाकी गोद मे सो जसुदा की गोद मे ।'
—ब्रजेश
कवित्त
संभु धरै ध्यान जाको जपत जहान सब,
ताते न महान् और दूसर अवरेख्यौ मैं ।
कहै रसखान वही बालक सरुप धरै,
जाको कछु रूप रंग अद्भुत अवलेख्यौ मैं ।
कहा कहूँ आली कछु कहती बनै न दसा,
नन्द जी के अँगना मे कौतुक एक देख्यो मैं ।
जगत को ठाटी महापुरुष विराटी जो,
निरंजन निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं ॥१४॥
शब्दार्थ—अवरेख्यौ मै = मैने देखा। अवलेख्यौ मै = मैने देखा। कौतुक =
तमाशा । जगत को ठाटी = ससार की रचना करने वाला, सृष्टि-स्रष्टा ।
विराटी = विराट रूप धारण करने वाला । निरंजन = विमल, प्रभावातीत ।
निराटी = अकेला, एकमेव ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की अलौकिकता और उनकी

व्याख्या भाग १६५
बाल-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि । शिव जिसको आराध्य
मानकर ध्यान करते हैं, सारा संसार जिसकी पूजा करता है, जिससे महान्
और दूसरा देव मैने कोई नही देखा । वही कृष्ण साकार बनकर अवतरित
हुआ है जिसका रूप-रंग मुझे कुछ-कुछ अद्भुत सा लगा है । हे सखि ! क्या
कहूँ, मुझसे तो उसकी उस अवस्था का वर्णन ही नही हो पा रहा है । बस
यह जान लो कि नंद जी के आँगन मे मैने एक तमाशा देखा है । जो कृष्ण
संसार की रचना करने वाला है, महापुरुष है, विराट रूप धारण करने वाला
है, किसी भी प्रकार के प्रभावो से परे है-प्रभावातीत है, केवल एक हैं;
अर्थात् वही एक केवल सत्ताव्रत है, और सारा संसार तो उसी की सत्ता की
माया है, उसे मैने मिट्टी खाते हुए देखा है ।
विशेष-१. इस कविता का भावपक्ष निर्बल और दार्शनिकता सबल है ।
२. श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली'
मे यह कवित्त नही है ।
तुलना-'शृणु सखि कौतुकमेकं नंद निकेतांगणे मया दृष्टम् ।
गोधूलि धूसरांगो नृत्यति वेदान्त सिद्धातः ॥'
कवित्त
वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत हैं रैन-दिन,
सदासिव सदा ही धरत ध्यान गाढे है ।
वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राजा रंक,
जोगी जती ह्वै कै सीत सह्यो अग डाढे है ।
वेई ब्रजचंद रसखानि प्रान प्रानन के,
जाके अभिलाख लाख-लाख भाँति बाढे है ।
जसुधा के आगे बसुधा के मान-मोचन मे,
तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है ॥ १५ ॥
शब्दार्थ-वेई = वही कृष्ण । सदासिव = सदा भक्त वत्सल शिव ।
गाढ़े = गंभीर । जाके काज = जिसके लिए ! मानी = अहंकारी । मूढ = मूर्ख ।
रंक = निर्धन । ब्रजचंद = कृष्ण । रसखानि = आनंद के भंडार । जसुधा =
यशोदा । वसुधा = पृथ्वी, पृथ्वी पर रहने वाले लोग । मान-मोचन = अहंकार
को नष्ट करने वाले । तामरस-लोचन = कमलनयन । खरोचन = खुरचनी ।

१६६ रसखान-ग्रन्थावली
अर्थ—प्रस्तुत कवित्त मे रसखान कृष्ण के अलौकिकत्व एवं बाल-लीला
की ओर संकेत करते है कि वही कृष्ण ब्रह्म जिनकी पूजा ब्रह्मा जी रात-दिन
किया करते हैं, भक्त-वत्सल शिव जिनका सदा गभीर ध्यान करते हैं;
वही कृष्ण-विष्णु जिनके लिए अहकारी, मूर्ख, राजा, निर्धन, सभी प्रकार के
लोग भोगी बनकर गीतादि के द्वारा अपने अगो को शिथिल बनाते हैं, वही
आनन्द के भडार कृष्ण जो प्राणो के प्राण हैं और जिन्हें देखने के लिए लाखो
अभिलाषायें लाखो प्रकार से बढती है, जो पृथ्वी पर रहने वाले लोगों का
अहकार मिटाने वाले हैं कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाले हैं, यशोदा के सामने
खुरचनी लेने के लिए खडे हुए हैं।
विशेष—१ इस कवित्त मे कृष्ण के ब्रह्म-रूप की ओर सकेत है।
२ जसुधा के आगे वसुधा के मान-मोचन मे और तामरस-लोचन
खरोचन कौ ठाढे है। मे यमक अलकार है।
३ कृष्ण का अनेक रूपो मे वर्णन होने से उल्लेख अलकार हैं।
तुलना—आगे नंदरानी के तनक गम पीने काज,
तीन लोक ठाकुर सो सुनुकत ठाढो है।
—पद्माकर
अनन्य भाव
सवैया
सेप सुरेस दिनेस गनेस अजैस धनेस महेस मनावौ।
कोऊ भवानी भजौ मन की सब आस सबै विधि जाइ पुरावौ।
कोऊ रमा भजि लेहु महा धन कोऊ कहूँ मन वांछित पावैौ।
पै रसखानि वही मेरो साधन और त्रिलोक रहौ कि नसावौ ॥ १६ ॥
शब्दार्थ—सेप = शेषनाग। सुरेस = इन्द्र । दिनेस = सूर्य । अजैस =
ब्रह्मा। धनेस = कुवेर। महेस = शिव। भवानी = पार्वती । पुरावौ = पूर्ण
करे। रमा = लक्ष्मी। नसावौ = नष्ट हो जाये।
अर्थ—अनन्य भाव की भक्ति की अभिव्यक्ति करते हुए रसखान कहते
हैं कि चाहे कोई शेषनाग, इन्द्र, सूर्य, गणेश, ब्रह्मा, कुबेर और शिव की भक्ति
करे। चाहे कोई पार्वती की भक्ति करके अपने मन की सभी अभिलाषाओ
को सभी प्रकार पूर्ण कर ले। चाहे कोई लक्ष्मी की पूजा करके भारी धन

व्याख्या भाग १६७
प्राप्त कर ले। चाहे कोई किसी भी प्रकार अपना मनोवाञ्छित फल पाले,
किन्तु मेरा तो एकमात्र साधन कृष्ण ही है। कृष्ण के अतिरिक्त तीनो लोक
चाहे रहे, या नष्ट हो जाये, मुझे इसकी कोई चिन्ता नही है।
विशेष—'सेप सुरेस दिनेस गनेस अजैस धनेस महेस' मे छेकानुप्रास और
श्रुत्यनुप्रास अलकार है।
तुलना—'मेरे तो राधिका नामक ही गति लोक दुऊ रहौ कै नसि
जाओ।'
—हरिश्चन्द्र
सवैया
द्रौपदी ग्र ˙ गनिका गज गीध अजामिल सो कियो सो न निहारो।
गौतम-गेहिनी कैसी तरी, प्रहलाद को कैसे हरयौ दुख भारो।
काहे कौ सोच करै रसखानि कहा करि है रविनन्द विचारो।
ता खन जा खन राखियै माखन-चाखनहारो सो राखनहारो ॥१७॥
शब्दार्थ--द्रौपदी=पाडवो की स्त्री। गज=हाथी, जिसकी कृष्ण ने ग्राह
से रक्षा की थी। गीध=जटायु, जो सीता की रक्षा करते समय रावण के
बाणो से घायल हुआ था और अन्त मे राम ने जिसका उद्धार किया था।
अजामिल=एक व्यक्ति का नाम। गौतम-गेहनी=गौतम की स्त्री अहिल्याबाई।
रवि नन्द=यमराज। ताखन=उस समय। जा खन=जिस समय। माखन-
चाखनहारो=श्रीकृष्ण। राखनहारो=रक्षक।
अर्थ—जब कृष्ण रक्षक है तो मनुष्य को किसी भी प्रकार की चिन्ता नही
करनी चाहिए, इस भाव को व्यक्त करते हुए रसखान कहते है कि कृष्ण इतने
दयालु है कि अपने भक्तो की टेर सुनते ही तुरन्त उनकी रक्षा के लिए कटि-
बद्ध हो जाते है। द्रौपदी, गणिका, गज, गीध और अजामिल ने अपने जीवन
मे क्या कार्य किये थे, क्या उनके कार्य उनका उद्धार करने मे समर्थ थे ? इन
बातो पर कृष्ण ने कोई ध्यान नही दिया और तुरन्त उनका उद्धार कर दिया।
इसी प्रकार गौतम—स्त्री अहिल्याबाई को भी मुक्ति प्रदान की तथा हिरण्य-
कशिपु को मारकर प्रह्लाद के भारी दुख का हरण किया। अत हे मनुष्य !
जिस समय श्रीकृष्ण तुम्हारे रक्षक है, उस समय तुम्हे कोई चिन्ता नही करनी