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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 368 में से

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पृष्ठ 182

व्याख्या भाग १६५
बाल-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि । शिव जिसको आराध्य
मानकर ध्यान करते हैं, सारा संसार जिसकी पूजा करता है, जिससे महान्
और दूसरा देव मैने कोई नही देखा । वही कृष्ण साकार बनकर अवतरित
हुआ है जिसका रूप-रंग मुझे कुछ-कुछ अद्भुत सा लगा है । हे सखि ! क्या
कहूँ, मुझसे तो उसकी उस अवस्था का वर्णन ही नही हो पा रहा है । बस
यह जान लो कि नंद जी के आँगन मे मैने एक तमाशा देखा है । जो कृष्ण
संसार की रचना करने वाला है, महापुरुष है, विराट रूप धारण करने वाला
है, किसी भी प्रकार के प्रभावो से परे है-प्रभावातीत है, केवल एक हैं;
अर्थात् वही एक केवल सत्ताव्रत है, और सारा संसार तो उसी की सत्ता की
माया है, उसे मैने मिट्टी खाते हुए देखा है ।
विशेष-१. इस कविता का भावपक्ष निर्बल और दार्शनिकता सबल है ।
२. श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली'
मे यह कवित्त नही है ।
तुलना-'शृणु सखि कौतुकमेकं नंद निकेतांगणे मया दृष्टम् ।
गोधूलि धूसरांगो नृत्यति वेदान्त सिद्धातः ॥'
कवित्त
वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत हैं रैन-दिन,
सदासिव सदा ही धरत ध्यान गाढे है ।
वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राजा रंक,
जोगी जती ह्वै कै सीत सह्यो अग डाढे है ।
वेई ब्रजचंद रसखानि प्रान प्रानन के,
जाके अभिलाख लाख-लाख भाँति बाढे है ।
जसुधा के आगे बसुधा के मान-मोचन मे,
तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है ॥ १५ ॥
शब्दार्थ-वेई = वही कृष्ण । सदासिव = सदा भक्त वत्सल शिव ।
गाढ़े = गंभीर । जाके काज = जिसके लिए ! मानी = अहंकारी । मूढ = मूर्ख ।
रंक = निर्धन । ब्रजचंद = कृष्ण । रसखानि = आनंद के भंडार । जसुधा =
यशोदा । वसुधा = पृथ्वी, पृथ्वी पर रहने वाले लोग । मान-मोचन = अहंकार
को नष्ट करने वाले । तामरस-लोचन = कमलनयन । खरोचन = खुरचनी ।