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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 368 में से

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पृष्ठ 169

१५२ रसखान-ग्रन्थावली
वाणी फूटती है और वाणी का यही प्रस्फुटन सरस एवं सच्चे काव्य को जन्म
देता है ।
अन्य स्वच्छन्दवादी कवियो की भाँति रसखान ने भी प्रेम के स्वस्थ रूप
का चित्रण किया है । प्रेम इनकी दृष्टि मे हृदय की सबसे उदात्त भावना है ।
इनके मत से शुद्ध और वास्तविक प्रेम वही है जिसमे अकारण ही आकर्षण
हो । गुण, यौवन, रूप आदि के आकर्षण से जो प्रेम होता है, उसे शुद्ध नही
कहा जा सकता । पुत्र, कलत्र आदि के प्रति किया गया प्रेम भी स्वाभाविक
और सच्चा नही है । वास्तव मे प्रेम भगवान का ही दूसरा रूप है । रसखान
ने प्रेम का सागोपाग विवेचन किया है एतद्विषयक इनके दोहे 'प्रेम-वाटिका' में
सगृहीत है ।
रसखान सच्चे हृदय से भक्त थे । रीतिकालीन कवियो की भाँति भक्ति
का वहाना इन्होने नही लिया था । इसलिए इनके काव्य मे आद्योपांत कृष्ण-
भक्ति की धारा प्रवाहित होती हुई दिखाई देती है । इनकी भक्ति साधना मे
वे सभी विशेषताएँ मिलती है जो वैष्णव-भक्ति के लिए अनिवार्य हैं ।
अत कहा जा सकता है कि रसखान-काव्य मे वे सभी गुण विद्यमान हैं
जो स्वच्छन्द काव्यधारा मे पनपे हैं । डा० मनोहरलाल गौड के शब्दो मे—
'....रसखान मे अपने समय की-काव्य प्रवृत्तियो तथा अनुभूति-विधानों
का परिचय तो दिखाई पडता है, पर अनुसरण नही । उन्होने अपना ही स्वानु-
कूल मार्ग बनाया । उस मार्ग मे विशुद्ध अप्रतिहत प्रेम की अनुभूति का प्राचुर्य
था और उसकी अनावृत्त अभिव्यक्ति थी जो स्वच्छन्द मार्ग की ओर सकेत
करती है, शास्त्रीय परम्परा की ओर नही । इसका तात्पर्य यह तो कदापि
नही कि रसखान ने जान-बूझकर शास्त्रीय मार्गों का सघटन किया है, या वे
काव्य के स्वच्छन्द मार्ग से यथाविधि परिचित थे । उनके जीवन का सयोग
मुसलमान प्रेमी भक्त होने के नाते विविध पद्धतियो के सम्मिश्रण का कारण
बन गया था । वैसा ही सम्मिश्रण कबीर मे भी हुआ था, पर कबीर ज्ञानमार्गी
होकर कठोर भी हो गये और खडन-परायण भी । हृदय की अनुभूतियो को
अपने ढंग से व्यक्त करने की सरस प्रवृत्ति उनमे नही आई जो रसखान में
आ गई ।'