रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १५१
निवेदन तो नही मिलता, पर अपने आराध्य के प्रति इन्होने अगाध विश्वास
अवश्य व्यक्त किया है । यथा-
'कहा करै रसखान का कोई चुगुल लबार ।
जो पै राखन हार है माखन चाखन हार ॥'
इस प्रकार के अनेक उदाहरण रसखान-काव्य मे मिलते है ।
आत्म-समर्पण भी अगाध विश्वास का एक अग है । रसखान जिस विधि
से स्वय को अपने भगवान के प्रति समर्पित करते है, वह विलक्षण है । इस
विषय मे इनका निम्नलिखित सवैया बहुत प्रचलित है-
'मानुष हौ तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जौ पसु हौ तौ कहा बस मेरो चरौ नित नद की धेनु मँझारन ।
पाहन हौ तौ वही गिरि को जो धर्यौ कर छत्र पुरदर धारन ।
जो खग हौ तौ बसेरो करौ मिलि कालिदी-कुल-कदम्ब की डारन ॥'
विरह-वेदना की अभिव्यक्ति भक्तो के लिए प्रमुख रही है । फारसी-
साहित्य मे तो यही एकमात्र सोपान है जिससे प्रियतम अथवा आराध्यदेव तक
पहुँचा जा सकता है । रसखान के विरह का अत्यन्त सजीव एव स्वाभाविक
वर्णन किया है । यथा-
'बाल गुलाब के नीर उसीर सो पीर न जाइ हियै जिन ढारौ ।
कज की माल करौ जु बिछावन होत कहा पुनि चंदन गारौ ।
एते इलाज बिकाज करौ रसखानि को काहे को जारे पै जारौ ।
चाहति हौ जु जिवायौ पटू तौ दिखावौ बड़ी-बड़ी अँखिनिवारौ ॥'
प्रियतम के सान्निध्य के बिना विरहिणी की विरह-वेदना का और
उपचार ही क्या हो सकता है ।
कही-कही परम्परा के अवाछित चक्कर मे आकर अथवा फारसी-प्रभाव
के कारण रसखान ऊहात्मक वर्णन भी कर गये है । पर ऐसे स्थल कम ही है ।
वास्तविक काव्य-आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त और कुछ है
भी नही । रसखान किसी काव्य-शास्त्रीय नियम से न तो अवगत ही है और
न यह विशेषता इनके लिए आवश्यक ही है । अपने भावावेश मे ही इनकी