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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

१३० रसखान-ग्रन्थावली
सोई रसखानि पहिचानि कानि छांड़ि चाहे,
लोचन नचावत नचैया द्वारे-द्वारे को।'
मैया की सी सोच कछु मटकी उतारे को न,
गोरस के ढारे को न चीर भीरि द्वारे को।
सहै दुख भारी गहै डगर हमारी मांझ,
नयर हमारे ग्वाल वगर हमारे को।।'
इस कवित्त मे शब्दो की योजना अत्यन्त भावपूर्ण है। 'नचैया' शब्द
आत्मीयता का सूचक है।
'कान्ह भरा वस वांसुरी के अब कौन सखी हमको चहि है।
निसद्योस रहे सग-साथ लगी यह सौतिन तापन क्यों सहि है।
जिन मोहि लियों मनमोहन को रसखानि सदा हमको दहि है।
मिलि आयो सबै सखी' भागि चले अब तो ब्रज मे वंसुरी रहि है ॥'
इस सवैये मे वांसुरी के प्रति गोपियो का सपत्नी-भाव व्यंजित है। इसमे
'कौन' शब्द कृष्ण के लिए प्रयुक्त हुआ है जो अत्यन्त आत्मीयता का सूचक
है। 'मनमोहन' शब्द का प्रयोग भी साभिप्राय है, इससे वांसुरी की महत्ता
सूचित होती है, क्योंकि जो कृष्ण सबका मन मोहने के कारण मनमोहन बने
हुए है, वे स्वयं वांसुरी द्वारा मोहित कर लिये गए है। 'मिलि आयो सबी' मे
सभी सखियो के दुख की तथा समान दुख होने से उनकी एकता की व्यंजना
होती है।
'कल काननि कु डल मोरपखा उर पै वनमाल बिराजति है।
मुरली कर मैं अधरा मुसकानि-तरग महाछवि छाजति है।
रसखानि लखें तन पीत पटा सत दामिनि की दुति लाजति है।
वहि बांसुरी की धुनि कानि परें कुल-कानि हियो तजि भाजति है॥'
इसमे 'वहि' शब्द का प्रयोग बांसुरी के उन प्रभावो की ओर संकेत करता
है जिनसे प्रभावित होकर गोपियाँ अपने कुल की लाज छोड़कर कृष्ण के आगे
पीछे दौड़ने लगती हैं।
शब्द-योजना के द्वारा वर्ण्य वस्तु का चित्र प्रस्तुत करने मे भी रसखान
सिद्धहस्त दिखाई पडते है। चित्रात्मकता का यह उदाहरण देखिए—
'जल की न घट परै पग की न पग घरै,
घर की न कछु करै बैठी भरै सांमु री।

समीक्षा भाग १३१
एकै सुनि लोट गई एकै लोट-पोट भई,
एकनि के दृगनि निकसि आए आँसु री।
कहै रसखानि सो सबै ब्रज-बनिता बधि,
बधिक कहाय हाय भई कुल हाँसु री।
करिये उपाय बाँस डारियै कटाय,
नाहि उपजैगौ बाँस नाहि वाजे फेरि बाँसुरी॥'
रसखान की शब्द-योजना भावाभिव्यक्ति मे पूर्णतया समर्थ एव सफल है।
साग रूपक की योजना प्रस्तुत करते समय प्रायः दुरूहता आ जाती है, पर
रसखान के काव्य मे यह दोष भी दिखाई नहीं देता। वर्षा-विषयक यह सांग
रूपक देखिए—
'दमकै रवि कुंडल दामिनि से धुरवा जिमि गोरज राजति है।
मुकताहल-वारन गोपन के सु तौ बूँदन की छवि छाजत है।
ब्रजबाल नदी उमही रसखानि मयकवधू-दुति लाजत है।
यह आवन श्री मनभावन की बरखा जिमि आज बिराजत है॥'
संगीतात्मकता भी रसखान की शब्द योजना की एक प्रमुख विशेषता है।
प्रत्येक शब्द अपने स्थान पर इस प्रकार बिठाया गया है कि क्या मजाल, कही
भी संगीतात्मकता को क्षति पहुँचे अथवा जिह्वा तथा स्वर की गति मे बाधा
पडे। रसखान का समूचा काव्य इसका उदाहरण है, फिर भी दो सवैये
प्रस्तुत हैं—
१ 'नद को 'दन है दुसकदन प्रेम के फदन बाँधि लई हौ।
एक दिना ब्रजराज के मदिर मेरी अली इक बार भई हौ।
हेर्यौ लला ललचाइ कै मोहन जोहन की चकडोर पई हौ।
दौरी फिरौ दृग डोरनि मैं हिय मै अनुराग की वेलि बई हौ॥'
२. 'दृग दूने खिचे रहे कानन लौ लट आनन पै लहराइ रही।
छकि छैल छबीली घटा लहराइ कै कौतुक कोटि दिखाइ रही।
झुकि भूमि झमाकनि चूमि भ्रमी चहि चाँदनी चंद चुराइ रही।
मन पाइ रही रसखानि महा छवि मोहन की तरसाइ रही॥'
इस विवेचन के उपरात यह कहना अन्यथा न होगा कि रसखान की
शब्द-योजना भावानुसारिणी, भावाभिव्यजक एव सफल है।

१३२ रसखान-ग्रन्थावली
अलंकार-योजना
काव्य मे अलकारो का प्रयोग भाव-समृद्धि के लिए किया जाता है । जो
अलकार श्रमसाध्य होते हैं, अथवा भाव-सौन्दर्य मे किसी प्रकार से सहायक
नही होते, वे हेय समझे जाते है । सफल कवियो की वाणी मे भावो के साथ
अलंकार भी स्वत फूटते चलते है । अलकारो का यह स्वत. स्फुटन काव्य और
साहित्य की अमर एव भव्य निधि है ।
अलकारो के मुख्यतया दो भेद किये गये है—शब्दालंकार और अर्था-
लंकार । जो अलकार शब्दाश्रित होते है, उन्हे शब्दालंकार और जो अर्थाश्रित
होते है, उन्हे अर्थालंकार कहते है । रसखान ने दोनो प्रकार के अलकारो
का ही प्रयोग किया है । पहले हम शब्दालंकारो को लेते हैं ।
शब्दालंकारो मे रसखान ने अनुप्रास और यमक का सबसे अधिक प्रयोग
किया है । इस प्रयोग को देखकर यदि इन्हे अनुप्रास और यमक सम्राट् कहा
जाये तो अनुचित न होगा । अनुप्रास के कुछ उदाहरण प्रस्तुत है .
'गावैं गुनी गनिका गंधरब्ब औ सारद सेस सबै गुन गावत ।
नाम अनंत गनत गनेस ज्यौ ब्रह्म त्रिलोचन पार न पावत ।
जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरंतर जाहि समाधि लगावत ।
ताहि अहीर की छोहरिया छछिया परि छाछ पै नाच नचावत ।।'
इस सवैये मे 'ग', 'स', 'न' 'त', 'प', 'ज', 'द' और 'न' वर्णो की आवृत्ति
है । अत यह वृत्यनुप्रास है ।
मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन ।
जो पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नद की धेनु मंझारन ।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन ।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिन्दी कूल-कदम्ब की डारन ।।'
इस सवैये मे 'व', 'ग', 'न' और 'क' वर्ण की आवृत्ति है । यह छेकानु-
प्रास है ।
अनुप्रास की भाँति रसखान ने यमक का भी प्रचुरता से प्रयोग किया है ।
यमक के मुख्यतया तीन भेद होते है—
१. जहाँ दोनो आवृत्त वर्ग सार्थक हो ।
२. जहाँ दोनो आवृत्त वर्ग निरर्थक हो ।

समीक्षा भाग १३३
३, जहाँ आवृत्त वर्गों मे से एक वर्ग सार्थक और एक वर्ग निरर्थक
हो ।
रसखान ने इन तीनो प्रकार के यमको का सफलतापूर्वक प्रयोग किया
है। यथा—
'बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सो सानी ।
हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी ।
जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी ।
त्यौं रसखानि वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ।'
इस सवैये की अन्तिम पक्ति मे 'रसखानि' शब्द की आवृत्ति है । दोनो
शब्द सार्थक है ।
आजु गई हुती भोर ही हौ रसखानि रई वहि नन्द के भौनहि ।
वाकौ जियो जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यौ नहि ।
तेल लगाइ लगाइ कै अंजन भौंहे बनाइ बनाइ डिठौनहि ।
डारि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यौ चुचकारत छौनहि ।'
इस सवैये की अन्तिम पक्ति मे 'वारत' और 'चुचकारत' मे 'रत' वर्णों
की आवृत्ति है । दोनो ही आवृत्ति निरर्थक है ।
'लाल लसै पगिया सबके सबके यह कोटि सुगन्धनि भीने ।
अगनि अंग सजे सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने ।
मुकता गलमाल लसे सबके सब ग्वार कुमार सिगार सो कीने ।
पै सिगरे व्रज केहरि हो हरि ही के हरें हियरा हरि लीने ।
इस सवैये की अन्तिम पक्ति मे 'केहरी' और 'हरी' शब्द की आवृत्ति है ।
'केहरी' का 'हरी' निरर्थक है ।
अनुप्रास और यमक के अतिरिक्त रसखान ने सिंहावलोकन, वीप्सा,
श्लेष, वक्रोवित शब्दालकारो का भी प्रयोग किया है । इन अलकारो के
उदाहरण निम्नलिखित है—
सिंहावलोकन—
'होती जु पै कुवरी ह्याँ सखी भरि लातनि मूका वकोटती लेती ।
लेती निकारि हिये की सबै नक छेदि कै कौड़ी पिराइ कै देती ।
देती नचाइ कै नाच वा राँड को लाल रिझावन को फल सेती ।
सेती सदा रसखान लिये कुवरी के करेजनि सूल सी भेती ।'

१३४ रसखान-ग्रन्थावली
वीप्सा-
'तै न लख्यौ जब कुँजनि ते बनिके निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री ।
सोहत कैसो हरा टटक्यौ अरु कैसो किरीट लसै लटक्यौ री ।
को रसखानि फिरै भटक्यौ हटक्यौ ब्रजलोग भिरै भटक्यौ री ।
रूप सबै हरि या नट को हियरे अटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ।'
श्लेष—
'स्याम सघन घन घेरि कै, रस वरस्यौ रसखानि ।
भई दिमानी फनि करि, प्रेम मद्य मन मानि ।'
वक्रोक्ति—
'कौन ठगौरी भरी हरि आजु बजाई है बाँसुरिया रंग-भीनी ।
तान सुनी जिनही तिनही तबही तित लाज विदा करि दीनी ।
घूमे घरी घरी नन्द के द्वार नवीनी कहा कहूँ बाल प्रवीनी ।
या ब्रजमण्डल मे रसखानि सु कौन पटू जु लटू नहिं कीनी ।'
रसखान द्वारा प्रयुक्त शब्दालंकार केवल चमत्कारक नही, जैसा कि
प्रायः शब्दालंकारो के विषय मे कहा जाता है, वरन् ये भावो का उत्कर्ष
करने वाले भी है। इनके द्वारा प्रयुक्त अनुप्रास शब्दो को संगीत प्रदान करके
भावो को और भी अधिक ग्राह्य बना देते है। संगीतात्मकता अनुप्रास का
गुण है और रसखान द्वारा प्रयुक्त अनुप्रास मे यह गुण प्रचुर मात्रा मे पाया
जाता है। यमक को क्लिष्टत्व का रूप माना जाता है। इसीलिए सुकर और
दुष्कर भेद इसके किये गये है। लेकिन रसखान ने यमक का स्वाभाविक
और भावपूर्ण प्रयोग करके यह सिद्ध कर दिया है कि यमक भी अन्य
अलंकारो की भाँति प्रसादगुण-सम्पन्न हो सकता है। इसी प्रकार रसखान
ने अन्य शब्दालंकारो का प्रयोग भी भावपूर्ण किया है।
शब्दालंकारो की भाँति अर्थालंकारो का प्रयोग भी रसखान ने
भावोत्कर्ष के लिए किया है। ये प्रयोग कवि की वाणी से स्वतः प्रस्फुटित
हुए है, उसे इनके लिए कोई श्रम नही करना पड़ा है। यही कारण है कि
जो भी अलंकार जहाँ प्रयुक्त हुआ है, वह अपने स्थान पर ठीक युक्ति-
संगत और भावपूर्ण है। रसखान ने अनेक अर्थालंकारो का प्रयोग किया है।
उदाहरण के लिए कुछ अलंकारो के उदाहरण प्रस्तुत किये जाते है।

समीक्षा भाग १३५
उपमा
उपमान और उपमेय के सादृश्य वर्णन मे उपमालंकार होता है । रसखान
के इस अलंकार का बहुत मात्रा मे और बहुत कुशलता से प्रयोग किया है ।
यथा—
'सुनियै सबकी कहिये न कछु रहिए इमि या भव-बागर मै ।
करिए व्रत नेम सच्चाई लिये जिनते तरियै भव-सागर मै ।
मिलियै सबसो दुरभाव बिना रहिए सत सग उजागर मै ।
रसखानि गुबिन्दहि यौ भजियै जिमि नागरि को चित्त गागर मै ॥'
भगवद्-भजन के लिए नागरी के चित्र की एकाग्रता का सादृश्य दिख-
लाया गया है ।
रूपक
उपमेय मे उपमान के निषेध रहित आरोप को रूपक अलंकार कहते है ।
इसके मुख्यतया दो भेद है—सांग रूपक और निरंग रूपक । जहाँ उपमेय
अवयवो के सहित उपमान के अवयवो का आरोप किया जाता है, वहाँ साग
अथवा सावयव रूपक होता है और जहाँ अवयवो से रहित उपमान का
उपमेय मे आरोप किया जाता है वहाँ निरंग अथवा निरवयव रूपक अलंकार
होता है । रसखान ने इस अलंकार का भी प्रचुर मात्रा मे प्रयोग किया है ।
यथा—
'अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है ।
सखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गाठन खोलत है ।
सुनि री सजनी अलबेलो लला वह कुजनि कुंजनि डोलत है ।
रसखानि लखे मन बूडि गयौ मधि रूप के सिंधु कलोलत है ।'
यहाँ सौन्दर्य पर सागर का आरोप किया गया है, पर अवयवों का उल्लेख
नही अत यहाँ निरंग रूपक हैं ।
उत्प्रेक्षा
जहाँ प्रस्तुत की—उपमेय की—अप्रस्तुत रूप मे—उपमान रूप मे—सभा-
वना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है । इस अलंकार के प्रयोग से भावों
में प्रभावशीलता आती है । अत. रसखान ने उपमा और रूपक की भाँति इस

१३६ रसखान-ग्रन्थावली
अलंकार का प्रयोग भी बहुलता से किया है। यथा—
'सांझ समै जिहि देखति ही तिहि पेखन कौ मन भीं ललके री ।
ऊँची अटान चढी ब्रजवाम सुलाज सनेह दुरैं उभकै री ।
गोधन धूरि की धूधरि मै तिनकी छवि यौं रसखान तकै री ।
पावक के गिरि ते बुझि मानी धुँवा-लपटी लपटैं लपकै री ॥'
यहाँ गोरज से धूसरित कृष्ण की दृष्टि मे आग के पहाड़ मे बुझकर उठते
हुए धुँए के वादल की संभावना की गई है, अत उत्प्रेक्षा अलंकार हैं ।
अतिशयोक्ति
लोक-मर्यादा के विरुद्ध वर्णन करने को—प्रस्तुत को वढा-चढाकर कहने
को—अतिशयोक्ति अलंकार कहते हे । रसखान ने इसका भी सफल प्रयोग
किया है—
"या छवि पै रसखानि अब, वारौं कोटि मनोज ।
जाकी उपमा कविन नहिं पाई रहे सु खोज ॥"
कृष्ण छवि की उपमा अभी तक कवियो को नही मिली है । वे अभी तक
पूर्ण परिश्रम के साथ उस उपमा को खोज रहे हे । यह कथन प्रस्तुत को वढ़ा-
चढ़ाकर कहने का द्योतक है । अत यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है ।
विरोधाभास
जहाँ कथन मे विरोध का आभास हो, पर वास्तव मे विरोध न हो, वहाँ
विरोधाभास अलंकार होता है । रसखान ने इसका कुशलता से प्रयोग किया
है । यथा—
'संकर से सुर जाहि जपें चतुरानन ध्यानन धैर्य वढ़ावैं ।
नैक हिये जिहि आनन ही जड मूढ महा रसखानि कहावै ।
जा पर देव अदेव-भू अंगना वारत आनन आनन पावैं ।
ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं ।'
इस सवैये की तीसरी पंक्ति मे प्रयुक्त—वारत आनन आनन पावैं' में
विरोधाभास अलंकार है ।
समाधि
जहाँ अचानक और कारणों के आ पड़ने से काम सुगम हो जाये, हाँ
समाधि अलंकार होता है । इसे समाहित अलंकार भी कहते हैं । रसखान ने

समीक्षा भाग १३७
इस अलंकार का अधिक प्रयोग नही किया, परन्तु जो उदाहरण है वे पूर्णतया
प्रभावपूर्ण है । यथा—
'कस कुढ्यौ सुनि बानि अकास की ज्यावनहारहि मारन धायौ ।
भादव साँवरी आठई को रसखानि महा प्रभु देवकी जायौ ।
रैनि अँवेरी मैं लै वसुदेव महावन मै अरगै धरि आयौ ।
काहु न भौ जुग जागत पायौ सो राति जसोमति सोवत पायौ ।'
जिस कृष्ण को योगी भी अपनी जागृत अवस्था मे प्राप्त नही कर सकते,
वही यशोदा को आसानी से प्राप्त हो गया । अतः यहाँ समाधि अलकार है ।
उल्लेख—
जहाँ एक ही वर्णनीय विषय का निमित्त भेद से अनेक प्रकार का वर्णन
हो, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है । निम्नलिखित सवैये मे कृष्ण के अनेक
रूपो का वर्णन है—
'वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत है रैन-दिन,
सदा शिव सदा ही धरत ध्यान गाढै है ।
वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राजा रंक,
जोगी जती ह्वै कै सीत सतयौ अग डाढै है ।
वेई ब्रजचन्द रसखानि प्रान प्राननि के,
जाके अभिलेख लाख लाख भाँति बाढै है ।
जसुधा के आगे वसुधा के मान मोचन पै,
तामरस-लोचन खरोचन को ठाढै है ॥'
अत्युक्ति
संपत्ति, सौंदर्य, शौर्य, औदार्य सौकुमार्य आदि गुणो के मिथ्या वर्णन को
अत्युक्ति अलंकार कहते है । रसखान ने कृष्ण प्रीति के प्रतिपादन मे इस अल-
कार का प्रयोग किया है । यथा—
'कंचन-मंदिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा झलकैयत ।
प्रात ही ते सदा सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत ।
जदपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत ।
ऐसे भये तो कहा रसखानि जौ सावरे ग्वार सों नेहन लैयत ।'
इस सवैये में कृष्ण की प्रीति का बढा-चढाकर वर्णन करने के कारण
अत्युक्ति अलंकार है ।

१३८ रसखान-ग्रन्थावली
अपह्नति—
जहाँ प्रकृत का—उपमेय का—निषेध करके अप्रकृत का—उपमान का—
आरोप किया जाता है वहाँ अपन्हुति अलंकार होता है। रसखान ने इस अल-
कार का प्रयोग निम्नलिखित सवैये में किया है।—
“है छलकी अप्रतीत की मूरति मोद बढ़ावै विनोद कलाम मे।
हाथ न ऐहै कछु रसखान तू क्यो बहकै विप पीवत धाम मे।
है कुच कंचन के कलसा न ये आम की गाठ मठीक की चाम मे।
बैनी नही मृगनैनिन की ये नसैनी लगी यमराज के धाम मे॥’
यहाँ पर कुच और चोटियो का निषेध करके उन पर आम की गांठ और
नसैनी का आरोप किया गया है।
व्यतिरेक
जहाँ उपमान की अपेक्षा उपमेय के उत्कर्ष का वर्णन किया जाए, वहाँ
व्यतिरेक अलंकार होता है। यथा—
‘धूरि भरे अति सोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनी बाजत पीरी कछौटी।
या छवि को रसखानि विलोकत वारत काम कला निज कोटी।
काग के भाग बडे सजनी हरि हाथ सो लै गयौ माखन रोटी।’
इस सवैये मे कामदेव के रूप की अपेक्षा कृष्ण के सौन्दर्य का उत्कर्षपूर्ण
वर्णन है।
दृष्टांत
जहाँ उपमेय, उपमान और साधारण धर्म का बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव हो,
वहाँ दृष्टांत अलंकार होता है। यथा—
‘जा दिन तै निरख्यो नन्द नन्दन कानि तजी घर बंधन छूट्यौ।
चारु विलोकनि कीनी सुमार सम्हार गई मन मोर न लूट्यौ।
सागर को सलिला जिमि धावे न रोकी रहै कुल को पुल टूट्यौ।
मत्त भयी मन संग फिरै रसखान सरूप सुधारस छूट्यौ।”
अर्थान्तरन्यास
जहाँ विशेष से सामान्य का, या सामान्य से विशेष साधर्म्य का वैधर्म्य के
द्वारा समर्थन किया जाए, वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है। यथा—

समीक्षा भाग १३६
'मोहन रूप छली बनी डोलति घूमति री तजि लाज विचारै ।
बंक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारै ।
रंगभरी मुख की मुसकान लसै सखी कौन जू देह सम्हारै ।
ज्यो अरविन्द हिमत करी भकफोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ।'
यहाँ मुस्कान विशेष का हिमत करी सामान्य से साधम्र्य के द्वारा समर्थन
किया गया है ।
प्रतीप
जहाँ उपमेय को उपमान कल्पित कर लिया जाए, वहाँ प्रतीप अलकार
होता है । यथा—
'मोहन के मन की सब जानति जोहन के मग मोहि लियो मन ।
मोहन सुन्दर आनन चन्द ते कुंजन देख्यौ मै स्याम सिरोमन ।
ता दिन ते मेरे नैननि लाज तजि कुल कानि की डौलत ही बन ।
कैसी करौ रसखानि लगी जकरी पकरी पिय केहित को पन ॥'
यहाँ चन्द्र की अपेक्षा आनन का उत्कर्ष वर्णित है, अतः प्रतीप अलकार है ।
संदेह
जहाँ किसी वस्तु के सम्बन्ध मे सादृश्य-मूलक संदेह हो, वहाँ संदेह अल -
कार होता है । यथा—
"वा मुख की मुसकानि पटू अखियनि ते नेकु टरै नहि टारी ।
जो पलकैं पल लागति है पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी ।
दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम गह्यौ बज्र मारी ।
प्रेम की बानि की जोग कलानि गहि रसखानि विचार विचारी ।"
इस सवैये की अंतिम पंक्ति मे संदेह अलकार है ।
असंगति
कारण कार्य की स्वाभाविक संगति के अभाव मे असंगति अलंकार होता
है । यथा—
'श्री वृषभान की छान छुजा अटकी सरकान ते आन लई री ।
वा रसखान के पानि की जानि छुड़ावति राधिका प्रेममयी री ।
जीवन मूरि सी नेज लिये इनहूँ चितयो उनहूँ चितई री ।
लाल लली दृग जोरत ही सुरझानि गुड़ी उरझाय दई री ।'

१४० रसखान-ग्रन्थावली
यहाँ सुलझाने वाली गुडी उलझा देती है । अतः असंगति अलंकार है ।
इस विवेचन के पश्चात् यह कहना कठिन नहीं कि रसखान की अलंकार
योजना बहुत ही सफल और प्रभाववर्द्धक है । इन्होंने अलंकारों का प्रयोग श्रम
द्वारा नहीं किया वरन् ये तो स्वतः भावावेग में आ गए हैं । स्वाभाविक रूप
से आए हुए अलंकार भावों में प्रभाव और गति उत्पन्न कर देते हैं, यह निर्वि-
वाद मत है । जहाँ अलंकार अभिव्यक्ति के साधन और सहायक होते हैं वहीं
इनका प्रयोग सार्थक होता है । रसखान की अलंकार-योजना ऐसी ही है ।
गुण-योजना
रस के उत्कर्ष को बढ़ाने वाले धर्मों को गुण कहा जाता है । वस्तुतः गुण
शब्द-योजना का ही दूसरा नाम है । वही काव्य सर्वोत्तम माना जाता है जो
भाव-गरिमा से भी मंडित हो और क्लिष्ट भी न हो; अर्थात् प्रसादगुण-सम्पन्न
हो । रसखान के काव्य में यह विशेषता पाई जाती है । उनका शब्द-चयन
अत्यन्त प्रचलित शब्दों का है । संस्कृत, उर्दू तथा फ़ारसी के वे ही शब्द इन्होंने
अपनाए हैं जो खूब प्रचलित हैं । इनके पदों की भाव-मयता और सरलता में
प्रायः होड़ सी लगी हुई है । प्रसादगुण के उदाहरणार्थ इनका समूचा काव्य
प्रस्तुत किया जा सकता है; फिर भी कुछ पदों को उद्धृत करना उचित प्रतीत
होता है । नायिका की सुकुमारता से सम्बद्ध दो सवैये देखिए—
'कौन की नागरि रूप की आगरि जाति लिये संग कौन की बेटी ।
जाको लसै मुख चन्द समान सुकोमल अंगनि रूप-लपेटी ।
लाल रही चुप लागिहै डीठि भुजाकै कहैं उर बात न पेटी ।
टोकत ही टटकार लगी रसखानि भई मनौ कारिख-पेटी ॥'
× × ×
'यह जाको लसै मुख चन्द समान कमान सी भौंह गुमान हरै ।
अति दीरघ नैन सरोजहु तैं मृग खंजन मीन की पाँति डरै ।
रसखानि उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै ।
कही नीके नवैं कटि हार के भार सो तामों कहै सब काम करै ॥'
छन्द-योजना
छन्द और काव्य का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है । आदिकाल से ही काव्य
में छन्द की महिमा मानी गई है । वेदों में एक कथा आती है जिसमें बताया
गया है कि देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए छन्द का परिधान ग्रहण किया

१४१
समीक्षा भाग
था। इसका तात्पर्य यह है कि छन्द काव्य को अमरता प्रदान करता है।
प्राचीन साहित्य की जीवन-रक्षा के एकमात्र आधार छन्द ही है। छन्द-प्रयोग
से ही काव्य मे सरसता, सजीवता एव प्रभावोत्पादकता आती है।
रसखान ने अपने काव्य मे तीन छन्दो का प्रयोग किया है—सवैया, कवित्त
और दोहा। सवैया वर्णिक वृत्त है। इसके लय तथा सौष्ठव की आचार्यो द्वारा
भारी प्रशसा की गई है। लय के आरोह और अवरोह के साथ पाठक अथवा
श्रोताओ के हृदयो को चमत्कृत कर देना इस छन्द की प्रमुख विशेषता है। इसमे
एक निश्चित स्वर-विधान होता है जिसके कारण इसमे एक अनूठे संगीत का
जन्म होता है। गणो तथा अन्त के गुरु-लघु अक्षरो की दृष्टि से सवैया के
अनेक भेद हो सकते हैं, पर इसके तीन भेद मुख्य है—
१. भगणाश्रित सवैया
२ सगणाश्रित सवैया
३ जगणाश्रित सवैया
भगणाश्रित सवैया के मदिरा, मोद, मत्तयगद, चकोर, अरसात और
किरीट छ भेद माने गये है। मदिरा मे सात भगण और अन्त का अक्षर गुरु
होता है। मोद मे पाँच भगण, एक मगण, एक सगण और अन्त का अक्षर गुरु
होता है। मत्तगमंद मे सात भगण और अन्त का अक्षर गुरु होता है। चकोर
मे सात भगण और अन्त के अक्षर गुरु-लघु होते है। अरसात मे सात भगण
और अन्त मे रगण होता है। किरीट मे आठ भगण होते है। भगणाश्रित
सवैया के इन भेदो को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—
मदिरा भगण ७ + S
मोद भगण ५ + मगण + सगण + S
मत्तगयद भगण ७ + S
चकोर भगण ७ + S I
अरसात भगण ७ + रगण
किरीट भगण ८
जगणाश्रित सवैया के तीन भेद होते है—सुमुखी, मुक्तहरा और बाम।
सुमुखी मे सात जगण और अंत के अक्षर लघु-गुरु होते है। मुक्तहरा मे आठ
जगण होते है। बाम मे सात जगण और एक यगण होता है। ये भेद इस
प्रकार दिखाये जा सकते है—

१४५ रसखान-ग्रन्थावली
सुमुखी जगण ७+७ । ऽ
मुखतहरा जगण ८
वाम जगण ७+यगण
सगणाश्रित सवैया के भी तीन भेद होते है—दुर्मिल, सुन्दरी और अर-
विन्द । दुर्मिल मे आठ सगण होते है। सुन्दरी मे आठ सगण और अन्त का
अक्षर लघु होता है। अरविन्द मे आठ सगण और अंत का अक्षर लघु होता
है। इन भेदो को इस प्रकार दिखाया जा सकता है—
दुर्मिल सगण ८
सुन्दरी सगण ८+ऽ
अरविन्द सगण ८+।
रसखान के काव्य मे इनमे से अधिकांश भेद मिल जाते है। सवैया लिखने
मे इन्हे जैसी सफलता मिली है, वैसी हिन्दी के विरले कवियो को ही मिल
पाई है। इसलिए रसखान और सवैया दोनो शब्द पर्यायवाची से बन
गये है।
कवित्त के अनेक भेद हो सकते है, पर मुख्य दो ही माने जाते हैं—मनहर
और घनाक्षरी । मनहर मे ३१ तथा घनाक्षरी मे ३२ अक्षर होते हैं। आठ-
आठ अक्षरो के वाद यति का विधान है। पर यह विधान लय पर निर्भर होता
है, इसीलिए कभी-कभी १६ अक्षर के बाद भी विराम दिया जाता है। कही-
कही पर आठ के स्थान पर ७ या ६ पर भी यति पड जाती है। इनके अति-
रिक्त इनके विषय मे और भी अनेक सूक्ष्म नियम है जो लय माधुरी के आधार
पर निर्धारित किये गये हैं। दोहे मे विषम चरणो मे तेरह-तेरह मात्राएं और
सम चरणो मे ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती है। रसखान ने कवित्त और दोहे
का भी प्रचुरता से प्रयोग किया है। प्रेम-वाटिका तो दोहो मे ही रची गई है।
अतः कहा जा सकता है कि छन्द-योजना की दृष्टि से भी रसखान
सफल है।
लोकोक्तियां
लोकोक्तियो के प्रयोगो से भाषा मे सजीवता आती है। रसखान ने अपने
कवित्तो मे और सवैयो मे यथावसर लोकोक्तियो के प्रभावशाली प्रयोग किये
है। यथा—
१. 'मोल कला के लला न विकैहो'

समीक्षा भाग १४३
२. नाहिं उपजैगो बाँस नाहि बाजै फेर बाँसुरी'
३. 'छोरा जायो कि मेव मँगायो'
४. 'नेम कहा जब प्रेम कियो'
इस विवेचन के उपरान्त यह कहना अनुचित नही कि रसखान की भाषा
सभी दृष्टियो से सफल एव सार्थक है। एक विशिष्ट भाषा मे जिन गुणो की
अपेक्षा होती है, वे सब रसखान की भाषा मे मिलते है। आचार्य रामचन्द्र
शुक्ल के शब्दो मे—
'इनकी (रसखान की) भाषा बहुत चलती, सरल और शब्दाडम्बर मुक्त
होती थी। शुद्ध ब्रजभाषा का जो चलतापन और सफाई रसखान और घनानंद
की रचनाओ मे है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।'

: ११ :
स्वच्छन्दधारा और रसखान
रीतिकाल मे दो धाराएँ प्रमुख थी—रीतिबद्ध धारा और रीति-मुक्तधारा
रीतिबद्ध धारा के कवि और आचार्य परम्परा के निर्वाह मे सदैव सतर्क और
जागरूक रहते थे । भावो की अपेक्षा वे परम्परा तथा काव्य शास्त्रीय नियमों
को प्राथमिकता देते थे। रीतिमुक्तधारा के कवियो के आदर्श रीतिबद्धधारा
के कवियो के आदर्शों के बिल्कुल विपरीत थे। वे काव्यशास्त्रीय नियमो
तथा परम्परा की अपेक्षा भावो को अधिक महत्व देते थे। इसीलिए इस धारा
को स्वच्छन्दधारा भी कहा जाता है। इस धारा की निम्नलिखित विशेषताएँ
है—
१. भावावेश का प्राधान्य
२ कृत्रिम व्यापारो का त्याग
३. भावो की प्रधानता
४ आत्म-निवेदन
५. विरह-वेदना
६. आत्मानुभूति
७. प्रेम का स्वस्थ निरूपण
८ भक्ति का वास्तविक रूप
१ भावावेश का प्राधान्य—रीतिबद्ध और रीतिमुक्त कवियों के काव्य-
रचना के प्रयोजनो मे आकाश-पाताल का अन्तर था। रीतिबद्ध कवि केवल
दो प्रयोजनो से काव्य-रचना किया करते थे—आश्रयदाता का मनोरजन और
पांडित्य-प्रदर्शन । इसलिए इनके काव्य प्राय श्रमसाध्य होते थे । इसके विपरीत
रीतिमुक्त कवि भावावेश के कारण ही काव्य-रचना करते थे । इस विषय की
ओर संकेत करते हुए घनानन्द ने लिखा है—
१४४

समीक्षा भाग १४५
'लोग है लाग कवित्त बनावत मोही तो मेरे कवित्त बनावत ।'
यही कारण है कि रीति बद्ध कवियो की अपेक्षा रीति मुक्त कवियो के
काव्यो मे अधिक भावप्रवणता है ।
२. कृत्रिम व्यापारो का त्याग—रीतिमुक्त कवियो का काव्य भावनापूर्ण
था, अत इसमे अभिव्यक्ति व कृत्रिम व्यापारो का त्याग स्वाभाविक ही था ।
इन कवियो ने न तो श्रम करके शब्दो की योजना की है और न भाषा के रूप
को सँवारा है । इनकी भाषा सहज और स्वाभाविक है । उसमे कही भी कृत्रि-
मता दृष्टिगोचर नही होती । अलकार और लोकोक्तियाँ आदि के प्रयोग भी
स्वाभाविक होने के कारण भावाभिव्यक्ति मे पूर्णत सहायक हुए है ।
इनके अतिरिक्त विषयो की कृत्रिमता भी इन कवियो को ईप्सित नही
थी । बाह्य कृत्रिमताओ को सोचना और उनका वर्णन करना इन कवियो को
न तो रुचता था और न वे इस ओर ध्यान ही देते थे । ये उन व्यापारो के
प्रदर्शन की चेष्टाओ को भी निरर्थक मानते थे । यही कारण है कि स्वच्छन्द-
धारा के कवियो मे विरह और मिलन दोनों मे प्रेमियो के हृदय के आन्तरिक
पक्षो को उद्घाटित करने की होड सी लगी रही है ।
३. भावो की प्रधानता—इन कवियो के काव्यो मे भावो की प्रधानता है ।
भाव-प्रधान होने के कारण इनके काव्यो मे चिन्तन-पथ दुर्बल है । रीतिबद्ध
कवि बुद्धि के बल से ही भावो का अनुमान करते थे और बुद्धि के बल से ही
प्रेम के बाह्य रूप का विधान करते थे । रीतिमुक्त कवि हृदय को ही प्रधान
मानते थे और अपने समूचे काव्य की रचना हृदय की प्रेरणा के आधार पर
ही करते थे ।
४. आत्म-निवेदन—अपने भावो को अभिव्यक्ति मे ये कवि इतने निर्भीक
है कि जो कुछ कहना चाहते है, स्पष्ट कह देते है । किसी अन्य माध्यम का
सहारा नही लेते । रीतिबद्ध कवि अपनी प्रेमाभिव्यजना के लिए, सामाजिक
भय के कारण जिन आवरणो को लपेटते चलते है, उनका इन कवियो के काव्यो
मे एकदम अभाव है । साथ ही इन कवियो मे भक्ति की सच्ची एव वास्तविक
अनुभूति थी, अत अपने आराध्य के समक्ष अपना हृदय खोलकर रख देने की
इनमे क्षमता है ।

१४६ रसखान-ग्रन्थावली
५. विरह-वदना--इन कवियो ने प्रेम की हृदयगम्य अभिव्यक्ति की है और
इनका प्रेम लौकिक से अलौकिक बना है, अत. इनमे प्रेम के विरह पक्ष की
वास्तविकता मिलती है । ये कवि जिस प्रकार सयोग-वर्णन मे अन्तर्मुख रहते
है और उसी प्रकार वियोग वर्णन मे भी रहते हैं । बल्कि वियोग वर्णन में
इनकी अन्तर्मुखता और भी अधिक बढ जाती है । इसीलिए इनके विरह-वर्णन
मे जो स्वाभाविकता और मार्मिकता है, वह रीतिबद्ध कवियों के काव्यो मे
नही मिलती । विरह के प्राय सभी पक्षो को लेकर ये कवि चले हैं । इनमें
विरह-वेदना की इतनी प्रधानता है कि सयोग मे भी ये लोग एक प्रकार का
वियोग-सा ही देखते है । अत इन्हे न तो सयोग मे शान्ति है और न वियोग
मे । इनका विरह-वर्णन अन्तर्मुखी है, रीतिबद्ध कवियो की भाँति बहिर्मुखी
और मासल नही ।
६. आत्मानुभूति--रीतिमुक्त कवियो ने सदैव हृदय को प्रधानता दी, फलतः
इनके काव्यो मे अत्मानुभूति का अंश पर्याप्त मात्रा मे पाया जाता है । रीति-
बद्ध कवियो की भाँति बुद्धि के बल पर, इन्होने दूर की कौड़ी लाने का कभी
प्रयत्न नही किया, जिन भावो से इनका परिचय था और जो भाव इनके हृदय
की सीमा मे सहज स्वाभाविक रूप से आ सकते थे, उन्हे ही इन कवियो ने
अपनाया और उन्ही की अभिव्यक्ति की । इसीलिए इन कवियो के काव्यो में
आत्मानुभूति का पक्ष प्रबल है ।
७ प्रेम का स्वस्थ रूप--रीतिकालीन रीतिबद्ध कवियो ने लौकिक
श्रृंगार को महत्ता दी और अथ से इति तक उसी का वर्णन किया । फलतः
उनके काव्य मे प्रेम का मासल रूप ही सुरक्षित रह गया । प्रेम-भाव के जो
अन्य सूक्ष्म एव उदात्त अंग होते हैं, उनकी ओर न तो इन कवियो ने कोई
ध्यान ही दिया और न ऐसा करना इनके लिए आवश्यक था । अत. प्रेम इनकी
दृष्टि मे एक प्रकार का प्रमुखतम काम-भाव ही बनकर रह गया । इसके
विपरीत रीतिमुक्त कवियो ने प्रेम को हृदय के एक उदात्त भाव के रूप मे
ग्रहण किया और इसकी स्वस्थता का आद्योपात वर्णन किया । इनकी दृष्टि मे
प्रेम का पथ ही एक ऐसा पथ है जो परमात्मा तक आत्मा को ले जाने मे
समर्थ है । एक बात और, रीतिबद्ध कवियो ने प्रेम के सम-रूप पर जोर दिया
है और रीतिमुक्त कवियो ने विषम-रूप पर । इनकी दृष्टि से, स्वच्छन्द प्रेम

समीक्षा भाग १४७

का चरम् उत्कर्ष विषमता मे ही निष्पन्न होता है । ये लोग सम-रूप को
'पारिवारिक प्रेम के लिए ही उचित समझते है ।
८. भक्ति का वास्तविक रूप—भक्तिकाल मे कृष्ण-भक्ति का जो आन्दो-
लन चला वह दिनप्रति दिन इतना जोर पकडता गया कि राधा और कृष्ण मानस
मानस मे रम गये । उनकी लीलाएँ सभी के मनो को आप्लावित करने लगी ।
रीतिकालीन रीतिबद्ध कवियो ने कृष्ण भक्ति की इस प्रसिद्धि का लाभ उठाया
और भक्तिकाल से अत्यन्त सुपरिचित राधा और कृष्ण को नायिका तथा
नायक के रूप मे ग्रहण कर लिया और मन खोलकर इनके श्रृंगार का वर्णन
किया । भक्तिकाल मे जो श्रृंगार अलौकिक माना जाता था, रीतिकाल में
आकर वह अलौकिक और मासल बन गया । रीतिकालीन कवियो ने राधा और
कृष्ण को अपनाया इसलिए था कि उनके काव्य मे प्रभावोत्पादकता तथा
चमत्कार आ जाये । राधा-कृष्ण की भक्ति से उनका दूर का भी कोई सम्बन्ध
नही है । एक रीतिकालीन कवि ने तो स्पष्ट ही कहा है—
'आगे के सुकवि रीझै है तो कविताई,
न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है ।'
'सुमिरन के बहाने मे' भक्ति की वास्तविकता कितनी होती है, यह बताने
की आवश्यकता नही है । इसके विपरीत रीतिमुक्त कवियो के हृदयो मे भक्ति
की सच्ची एव स्वाभाविक भावना थी । ये लोग पहले भक्त थे और बाद में
कवि । कविता इनके लिए साधन थी, रीतिबद्ध कवियो की भाँति साध्य नही ।
स्वच्छन्द धारा की इन प्रमुख विशेषताओ पर दृष्टिपात करने के पश्चात्
अब इनके आधार पर रसखान के काव्य की समीक्षा करना आवश्यक है ।
रसखान और स्वच्छन्द मार्ग
रसखान का काव्य भावो की मंजूषा है । जिधर भी देखिये, इनके काव्य
मे भावो का अजस्र स्रोत प्रवाहित होता हुआ दृष्टिगोचर होता है । यदि ये
भक्ति-परक भावो की अभिव्यजना करते है तो उसी हृदय से जो एक वास्त-
विक भक्त का हृदय होता है । अपने आराध्य के प्रति पूर्ण विश्वास भक्त-
हृदय की पूर्णतम विशेषता होती है । रसखान भी इसी विश्वास को धारण
किये हुए है और कहते है कि कृष्ण जिसका रक्षक है, उसका कोई कुछ नहीं
बिगाड सकता, यहाँ तक कि यमराज भी उसे कुछ हानि नही पहुँचा सकता—

१४८ रसखान-ग्रन्थावली
'द्रौपदी औ गनिका गज गीध अजामिल सो कियो सो न निहारो।
गौतम गेहिनी कैसी तरी, प्रह्लाद की कैसे हर्यौ दुख भारो।
काहे कौ सोच करै रसखानि कहा करि है रविनन्द विचारो।
ताखन जाखन राखियै माखन-चाखनहारो सो राखनहारो॥'
रसखान ने जिस विषय का भी प्रस्तुतीकरण किया है, उसी को अत्यन्त
भावपूर्ण रीति से व्यक्त किया है। यथा-
रूप-माधुरी-
'आवत हैं वन ते मनमोहन गाइन संग लसे ब्रज-ग्वाला।
वेनु बजावत गावत गीत अभीत दूतै करिगो कछु स्याना।
हेरत हेरि थकै चहुँ ओर तै झाँकि झरोखन तें ब्रज-बाला।
देखि सु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्यौस को ताप-रसाला॥'
वक्र दृष्टि-
'आती लला घन सो अति सुन्दर तैसो लसै पियरो उपरैना।
गडनि पै छलकें छवि कुंडल मंडित कुंतल रूप की सैना।,
दीरघ वक्र विलोकन की अवलोकनि चारति चित्त को चैना।
मो रसखानि हर्यौ चित्त री मुसकाइ कहे अधरामृत बैना॥'
मुसकान माधुरी-
'वा मुख की मुसकान भटू अँखियन ते नेकु टरै नहि टारी।
जौ पलकें पल लागति हैं पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी।
दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम, गह्यो वजमारी।
प्रेम की वानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी॥'
सौन्दर्य-वर्णन-
'मोरपखा सिर कानन कुंडल कुंतल सो छवि गडनि छाई।
वक्र बिसाल रसाल विलोचन है दुख मोचन मोहन माई।
आली नवीन महाघन सो तन पीत पटा ज्यौं छटा वनि आई।
हौ रसखानि जकी सी रही कछु टोना चलाइ ठगौरी सी लाई॥'

समीक्षा भाग १४६
कुंजलीला--
'कुंजगली मैं अली निकसी तहाँ साँकरे ढोटा कियौ मटभेरो ।
माई री वा मुख की मुसकानि गयौ मन बूडि फिरै नहिं फेरो ।
जोरि लियौ दृग चोरि लियौ चित्त डार्यौ है प्रेम को फद घनेरो ।
कैसी करौ अब क्यौ निकसौ रसखानि पर्यौ तन रूप को घेरो ।।'
रसखान- काव्य मे कृत्रिम व्यापारो का अभाव है । वर्णन और चेष्टा दोनो
मे ही स्वाभाविकता है । नटखट कृष्ण गोपियो से छेडछाड करते है । गोपियाँ
कितनी स्वाभाविक भाषा मे उसकी भर्त्सना करती है—
'अन्त ते न आयौ याही गाँवरे को जायौ,
माई वापरे जिवायौ प्याइ दूध वारे बारे को ।
सोई रसखानि पहिचानि कानि छाँडि चाहै,
लोचन नचावत नचैया द्वारे द्वारे को ।
मैया की सौ सोच कछु मटकी उतारे को न,
गोरस के ढारे को न चीर चीरि डारे को ।
यहै दुख भारी गहै डगर हमारी माँझ,
नगर हमारे ग्वल बगर हमारे को ।।'
चेष्टाओ का भी रसखान ने स्वाभाविक वर्णन किया है । कृष्ण किसी गोपी
को मार्ग मे ही घेर लेते है । उनकी आँखे चार होती है । तब कृष्ण अपना
नटखटपना शुरू करते है । तब बेचारी विवश गोपी अपनी लज्जा बचाने
के लिए अपने ही वस्त्रो मे इस प्रकार लिपट जाती है जैसे सावन के बादल
मे छिपकर बिजली भीतर ही भीतर तडप रही हो—
'पहले दधि लै गई गोकुल मैं चख चारि भए नट नागर पै ।
रसखानि करी उनि मैनमई कहै दान दै दान खरे अरपै ।
नख ते सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कंपै डरपै ।
मनौ दामिनि सावन के घन मै निकसै नहीं भीतर ही तरपै ।।'
वस्तुत. रसखान की दृष्टि मे प्रेम एक अत्यन्त उदात्त भाव है । इन उदात्त
भावो से सम्वद्ध भावो मे कृत्रिप्रता लाना इसके औदात्य को नष्ट करना है ।
इसीलिए इन्होने सर्वत्र स्वाभाविकता का ध्यान रखा है ।
रसखान का काव्य भाव-प्रधान है । शब्दो का सचयन और संयोजन