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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग १३३
३, जहाँ आवृत्त वर्गों मे से एक वर्ग सार्थक और एक वर्ग निरर्थक
हो ।
रसखान ने इन तीनो प्रकार के यमको का सफलतापूर्वक प्रयोग किया
है। यथा—
'बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सो सानी ।
हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी ।
जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी ।
त्यौं रसखानि वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ।'
इस सवैये की अन्तिम पक्ति मे 'रसखानि' शब्द की आवृत्ति है । दोनो
शब्द सार्थक है ।
आजु गई हुती भोर ही हौ रसखानि रई वहि नन्द के भौनहि ।
वाकौ जियो जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यौ नहि ।
तेल लगाइ लगाइ कै अंजन भौंहे बनाइ बनाइ डिठौनहि ।
डारि हमेलनि हार निहारत वारत ज्यौ चुचकारत छौनहि ।'
इस सवैये की अन्तिम पक्ति मे 'वारत' और 'चुचकारत' मे 'रत' वर्णों
की आवृत्ति है । दोनो ही आवृत्ति निरर्थक है ।
'लाल लसै पगिया सबके सबके यह कोटि सुगन्धनि भीने ।
अगनि अंग सजे सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने ।
मुकता गलमाल लसे सबके सब ग्वार कुमार सिगार सो कीने ।
पै सिगरे व्रज केहरि हो हरि ही के हरें हियरा हरि लीने ।
इस सवैये की अन्तिम पक्ति मे 'केहरी' और 'हरी' शब्द की आवृत्ति है ।
'केहरी' का 'हरी' निरर्थक है ।
अनुप्रास और यमक के अतिरिक्त रसखान ने सिंहावलोकन, वीप्सा,
श्लेष, वक्रोवित शब्दालकारो का भी प्रयोग किया है । इन अलकारो के
उदाहरण निम्नलिखित है—
सिंहावलोकन—
'होती जु पै कुवरी ह्याँ सखी भरि लातनि मूका वकोटती लेती ।
लेती निकारि हिये की सबै नक छेदि कै कौड़ी पिराइ कै देती ।
देती नचाइ कै नाच वा राँड को लाल रिझावन को फल सेती ।
सेती सदा रसखान लिये कुवरी के करेजनि सूल सी भेती ।'