रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १३७
इस अलंकार का अधिक प्रयोग नही किया, परन्तु जो उदाहरण है वे पूर्णतया
प्रभावपूर्ण है । यथा—
'कस कुढ्यौ सुनि बानि अकास की ज्यावनहारहि मारन धायौ ।
भादव साँवरी आठई को रसखानि महा प्रभु देवकी जायौ ।
रैनि अँवेरी मैं लै वसुदेव महावन मै अरगै धरि आयौ ।
काहु न भौ जुग जागत पायौ सो राति जसोमति सोवत पायौ ।'
जिस कृष्ण को योगी भी अपनी जागृत अवस्था मे प्राप्त नही कर सकते,
वही यशोदा को आसानी से प्राप्त हो गया । अतः यहाँ समाधि अलकार है ।
उल्लेख—
जहाँ एक ही वर्णनीय विषय का निमित्त भेद से अनेक प्रकार का वर्णन
हो, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है । निम्नलिखित सवैये मे कृष्ण के अनेक
रूपो का वर्णन है—
'वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत है रैन-दिन,
सदा शिव सदा ही धरत ध्यान गाढै है ।
वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राजा रंक,
जोगी जती ह्वै कै सीत सतयौ अग डाढै है ।
वेई ब्रजचन्द रसखानि प्रान प्राननि के,
जाके अभिलेख लाख लाख भाँति बाढै है ।
जसुधा के आगे वसुधा के मान मोचन पै,
तामरस-लोचन खरोचन को ठाढै है ॥'
अत्युक्ति
संपत्ति, सौंदर्य, शौर्य, औदार्य सौकुमार्य आदि गुणो के मिथ्या वर्णन को
अत्युक्ति अलंकार कहते है । रसखान ने कृष्ण प्रीति के प्रतिपादन मे इस अल-
कार का प्रयोग किया है । यथा—
'कंचन-मंदिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा झलकैयत ।
प्रात ही ते सदा सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत ।
जदपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत ।
ऐसे भये तो कहा रसखानि जौ सावरे ग्वार सों नेहन लैयत ।'
इस सवैये में कृष्ण की प्रीति का बढा-चढाकर वर्णन करने के कारण
अत्युक्ति अलंकार है ।