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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 368 में से

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पृष्ठ 149

१३२ रसखान-ग्रन्थावली
अलंकार-योजना
काव्य मे अलकारो का प्रयोग भाव-समृद्धि के लिए किया जाता है । जो
अलकार श्रमसाध्य होते हैं, अथवा भाव-सौन्दर्य मे किसी प्रकार से सहायक
नही होते, वे हेय समझे जाते है । सफल कवियो की वाणी मे भावो के साथ
अलंकार भी स्वत फूटते चलते है । अलकारो का यह स्वत. स्फुटन काव्य और
साहित्य की अमर एव भव्य निधि है ।
अलकारो के मुख्यतया दो भेद किये गये है—शब्दालंकार और अर्था-
लंकार । जो अलकार शब्दाश्रित होते है, उन्हे शब्दालंकार और जो अर्थाश्रित
होते है, उन्हे अर्थालंकार कहते है । रसखान ने दोनो प्रकार के अलकारो
का ही प्रयोग किया है । पहले हम शब्दालंकारो को लेते हैं ।
शब्दालंकारो मे रसखान ने अनुप्रास और यमक का सबसे अधिक प्रयोग
किया है । इस प्रयोग को देखकर यदि इन्हे अनुप्रास और यमक सम्राट् कहा
जाये तो अनुचित न होगा । अनुप्रास के कुछ उदाहरण प्रस्तुत है .
'गावैं गुनी गनिका गंधरब्ब औ सारद सेस सबै गुन गावत ।
नाम अनंत गनत गनेस ज्यौ ब्रह्म त्रिलोचन पार न पावत ।
जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरंतर जाहि समाधि लगावत ।
ताहि अहीर की छोहरिया छछिया परि छाछ पै नाच नचावत ।।'
इस सवैये मे 'ग', 'स', 'न' 'त', 'प', 'ज', 'द' और 'न' वर्णो की आवृत्ति
है । अत यह वृत्यनुप्रास है ।
मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन ।
जो पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नद की धेनु मंझारन ।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन ।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिन्दी कूल-कदम्ब की डारन ।।'
इस सवैये मे 'व', 'ग', 'न' और 'क' वर्ण की आवृत्ति है । यह छेकानु-
प्रास है ।
अनुप्रास की भाँति रसखान ने यमक का भी प्रचुरता से प्रयोग किया है ।
यमक के मुख्यतया तीन भेद होते है—
१. जहाँ दोनो आवृत्त वर्ग सार्थक हो ।
२. जहाँ दोनो आवृत्त वर्ग निरर्थक हो ।