रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १३६
'मोहन रूप छली बनी डोलति घूमति री तजि लाज विचारै ।
बंक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारै ।
रंगभरी मुख की मुसकान लसै सखी कौन जू देह सम्हारै ।
ज्यो अरविन्द हिमत करी भकफोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ।'
यहाँ मुस्कान विशेष का हिमत करी सामान्य से साधम्र्य के द्वारा समर्थन
किया गया है ।
प्रतीप
जहाँ उपमेय को उपमान कल्पित कर लिया जाए, वहाँ प्रतीप अलकार
होता है । यथा—
'मोहन के मन की सब जानति जोहन के मग मोहि लियो मन ।
मोहन सुन्दर आनन चन्द ते कुंजन देख्यौ मै स्याम सिरोमन ।
ता दिन ते मेरे नैननि लाज तजि कुल कानि की डौलत ही बन ।
कैसी करौ रसखानि लगी जकरी पकरी पिय केहित को पन ॥'
यहाँ चन्द्र की अपेक्षा आनन का उत्कर्ष वर्णित है, अतः प्रतीप अलकार है ।
संदेह
जहाँ किसी वस्तु के सम्बन्ध मे सादृश्य-मूलक संदेह हो, वहाँ संदेह अल -
कार होता है । यथा—
"वा मुख की मुसकानि पटू अखियनि ते नेकु टरै नहि टारी ।
जो पलकैं पल लागति है पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी ।
दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम गह्यौ बज्र मारी ।
प्रेम की बानि की जोग कलानि गहि रसखानि विचार विचारी ।"
इस सवैये की अंतिम पंक्ति मे संदेह अलकार है ।
असंगति
कारण कार्य की स्वाभाविक संगति के अभाव मे असंगति अलंकार होता
है । यथा—
'श्री वृषभान की छान छुजा अटकी सरकान ते आन लई री ।
वा रसखान के पानि की जानि छुड़ावति राधिका प्रेममयी री ।
जीवन मूरि सी नेज लिये इनहूँ चितयो उनहूँ चितई री ।
लाल लली दृग जोरत ही सुरझानि गुड़ी उरझाय दई री ।'