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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

६४८ रसतरङ्गिणी
भा.टी.—खानों से प्राप्त होनेवाले संखिया, हरताल, मैनसिल, पारद,
ताम्र आदि को तथा वनौषधियों से प्राप्त होनेवाले वत्सनाभ, शृंगिक, कुचला
आदि को स्थावर विष कहा जाता है और सर्प, बिच्छू, मकड़ी, बावलाकुत्ता
आदि के विष को जंगम विष कहा जाता है ॥ ३ ॥
स्थावरविषस्य भेदाः
अधिष्ठानविभेदेन विषं स्थावरसंज्ञकम् ।
समाख्यातं दशविधं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥ ४ ॥
भा.टी.—स्थावर संज्ञक विष अधिष्ठान (आश्रय) भेद से दस प्रकार
का रसतन्त्रज्ञों ने माना है ॥ ४ ॥
स्थावरविषस्य अधिष्ठानानि
कन्दः सारोऽथ निर्यासः पुष्पं मूलं फलं दलम् ।
त्वक् क्षीरं खनिरित्यस्य ह्यधिष्ठानानि वै दश ॥ ५ ॥
भा.टी.—कन्द, सार, निर्यास (गोंद), पुष्प, मूल, फल, पत्र, त्वचा,
दूध, तथा खान; ये दश स्थावर विष के आश्रय हैं ॥ ५ ॥
प्रकारान्तरेण स्थावरविषस्य द्वैविध्यम्
विषं चोपविषं चेति द्विविधं स्थावरं विषम् ।
प्रथमं वत्सनाभादि द्वितीयं तिन्दुकादिकम् ॥ ६ ॥
अपि च स्थावरं विषं विषोपविषभेदादपि द्विविधमाचख्युः प्राज्ञाः । तदेत-
दाह प्रथमं वत्सनाभादीति ॥ ६ ॥
भा.टी.—स्थावर विष के भी विष (प्रधान विष) तथा उपविष (अप्र-
धान विष) भेद से दो भेद होते हैं। विषों में वत्सनाभ, शृंगक, कालकूट,
हलाहल, संखिया आदि लिये जाते हैं। उपविषों में तिन्दुक (कुचला), कनेर,
गुञ्जा, अफीम कलिहारी आदि लिये जाते हैं ॥ ६ ॥
विषस्य नव भेदाः
हालाहलः कालकूटः शृङ्गकश्च प्रदीपनः ।
सौराष्ट्रिको ब्रह्मपुत्रो हारिद्रः सक्तुकस्तथा ॥ ७ ॥
वत्सनाभ इति ज्ञेया विषभेदा अमी नव ।
रसे रसायनादौ च वत्सनाभः प्रशस्यते ॥ ८ ॥

[Page-Header: चतुर्विंशस्तरङ्गः ६४६]

विषाणां सक्तुकान्तानां प्रयोगो नेह दृश्यते ।
अतस्तेषां विषाणां तु स्वरूपं न प्रदर्शितम् ॥ ६ ॥
अपि च स्थावरं विषं नवधा विभजन्ति पुराविदः । हालाहलः कालकूट
इत्यादिना । हालाहलादिविषाणां तन्त्रान्तरोक्तानि लक्षणानि—"गोस्तनाभफलो
गुच्छस्तालपत्रच्छदस्तथा । तेजसा यस्य दह्यन्ते समीपस्था द्रुमादयः ॥ असौ
हालाहलो ज्ञेयः किष्किन्धायां हिमालये । दक्षिणाब्धितटे देशे कोङ्कणेऽपि च
जायते ॥ देवासुररणे देवैर्हतस्य पृथुमालिनः । दैत्यस्य रुधिराजातस्तरुश्चत्थस-
न्निभः ॥ निर्यासः कालकू टोऽस्य मुनिभिः परिकीर्तितः । सोऽहिच्छत्रे शृङ्गवेरे
कोङ्कणे मलये भवेत् ॥ यस्मिन् गोशृङ्गके बद्धे दुग्धं भवति लोहितम् । स शृङ्गक
इति प्रोक्तो द्रव्यतत्त्वविशारदैः ॥ प्रदीप्लोहितो यः स्याद्दीप्तिमान् दहनप्रभः ।
महादाहकरः पूर्वैः कथितः स प्रदीपनः ॥ सुराष्ट्रविषये यः स्यात् स सौराष्ट्रिक
उच्यते ॥ वर्णातः कपिलो यः स्यात् तथा भवति सारकः । ब्रह्मपुत्रः स विज्ञेयो
जायते मलयाचले ॥ हरिद्रातुल्यमूलो यो हारिद्रः स उदाहृतः । यद्ग्रन्थिः सक्तु-
केनैव पूर्णमन्यः ससक्तुकः ॥" तदेत्कन्दजातीयमेव नवधा प्रकाशितं विषम् ।
वाग्भटेन कन्दविषेष्वेषां परिगणनात् । यद्यपि च—"साक्तुकं मुस्तकं शृङ्गी
बालकं सर्पपाह्वयम् । वत्सनाभञ्च कर्मण्यं विषं स्निग्धं घनं गुरु ॥ न जात्वन्यत्
प्रयोक्तव्यं कालकूटं विशेषतः ॥" इत्युक्तमभियुक्तैः, तथापि वत्सनाभातिरिक्त-
मुस्तकादिविषाणां परिचयानुपलम्भात् तदलभ्यत्वाद्वा प्रयोगो नेहोपलभ्यमानत-
न्त्रेषु दृश्यते । तदेतदाह-रसे रसायनादौ च वत्सनाभः प्रशस्यते ॥७-६॥
भा.टी.—प्राचीन शास्त्रकारों ने स्थावर विष के नौ भेद माने हैं । १—
हालाहल, २—कालकूट, ३—शृंगक, ४—प्रदीपन, ५—सौराष्ट्रिक, ६—ब्रह्म-
पुत्र, ७—हारिद्र, ८—सक्तुक, ६—वत्सनाभ । इन नौ विषों में से वत्सनाभ
विष रस क्रिया तथा रसायन प्रयोग में सर्वोत्तम माना जाता है । किन्तु सक्तुक
पर्यन्त विषों का प्रयोग नहीं पाया जाता है । अतएव इन सक्तुक, हारिद्र
आदि विषों का स्वरूप भी पूर्णरूप से नहीं दिखाया गया है ॥७-६॥
वत्सनाभक्षुपस्य परिचयः
सिन्दुवारदलः पार्श्वे तरुवृद्धिविवर्जितः ।
नीलपुष्पः कन्दविषो क्षुपो हस्तद्वयोच्छ्रितः ॥१०॥
वत्सनाभ इति ख्यातो रसतान्त्रविचक्षणैः ।
गढपाले च काश्मीरे नेपालादौ च जायते ॥ ११ ॥

६५० रसतरङ्गिणी
तत्र वत्सनाभक्षुपस्य परिचयः शिष्यमतिवैशद्यार्थः। अस्य पत्राणि सिन्दुवा-
रपत्रतुल्यानि परं पञ्चाङ्गुलवत् अस्योपरितनभागश्छिन्नमिव भवति ॥१०, ११॥
भा.टी.-वत्सनाभ पौधे के पत्ते सम्भालू के पत्तों से मिलते-जुलते होते हैं।
और पाँच-पाँच के ग्रूप ( झुण्ड ) में जुड़े होते हैं । इसके आस-पास के वृक्ष
बढ़ने नहीं पाते हैं। इसके पुष्प नीले रंग के निकलते हैं। इसके क्षुप की
ऊँचाई दो हाथ के करीब होती है। वह कन्द जातीय क्षुप होता है। इसी के
कन्द को रसशास्त्रज्ञ "वत्सनाभ" शब्द से कहा करते हैं। यह क्षुप प्रायः गढ़-
वाल, काश्मीर तथा नेपाल आदि पाँच हजार से अधिक ऊँचाईवाले शीत
पर्वतीय प्रान्तों में पाया जाता है ॥ १०, ११ ॥
वत्सनाभस्य परिचयः
दैर्घ्ये तु पञ्चाङ्गुलतः परं सप्ताङ्गुलोन्मितः ।
व्यासे चैकाङ्गुलात् सार्द्धद्वयङ्गुलप्रमितस्तथा ॥ १२ ॥
आमूलचूलं क्रमशः स्थूलश्च पाण्डुरप्रभः ।
कन्दोऽस्य भिषजां वयैर्वत्सनाभ इति स्मृतः ॥१३॥
दीर्घमूलं स्थूलकन्दं वत्सनाभविषक्षुपम् ।
उत्पाट्य शीतसमये वसन्ते वा समाहरेत् ॥१४॥
शीतसमये वसन्ते वा समाहरणं पूर्णवीर्य्यत्वात्तदानीमस्येति भावः॥१२-१४॥
भा.टी.-वत्सनाभ-कन्द प्रायः पाँच अंगुल से लेकर सात अंगुल तक
लम्बा होता है। इसकी मोटाई या व्यास एक अंगुल से लेकर ढाई अंगुल तक
होती है। यह मूल की तरफ से शिखा की तरफ मोटा होता है और वर्ण में
पांडुर अर्थात् पीत श्वेत वर्ण मिश्रित होता है। इसी कन्द को वैद्य लोग वत्स-
नाभ ( बछड़े की नाभि के आकार का होने से ) कहते हैं। क्योंकि इसके कन्द
में शीतऋतु अथवा वसन्त ऋतु में पूर्ण वीर्य-शक्ति प्राप्त हो जाती है, अतः
लम्बी मूलवाले स्थूल ( मोटा ) कन्द वत्सनाभ क्षुप को उखाड़ कर वसन्त या
शीत ऋतु में वत्सनाभ विष का सञ्चय करना चाहिए ॥ १२-१४ ॥
वत्सनाभस्य भेदाः
कृष्णाभः कपिशः पाण्डुर्वर्णातस्त्रिविधो मतः ।
वत्सनाभो विशेषेण क्रमेण गुणवत्तमः ॥१५॥
कृष्णाभ इति तस्य त्रैविध्यम् । कृष्णापेक्षया कपिशः कपिशापेक्षया च
पाण्डुरो गुणवान् इति ॥१५॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५१
भा.टी.-वत्सनाभ का कन्द वर्ण ( रंग ) भेद से तीन प्रकार का पाया
जाता है । १-कृष्णाभ ( कुछ काले रंग का ), २-कपिश ( पीला सफेद
भूरे रंग का ), ३-पाण्डु ( पीला सफेद ) । इनमें से कृष्णवर्ण वत्सनाभ की
अपेक्षा कंपिश और कपिश की अपेक्षा पाण्डुर वर्ण वत्सनाभ गुणों में उत्तम
माना जाता है ॥१५॥
वत्सनाभस्य नामानि
वत्सनाभो वत्सनागः दवेडोऽङ्गी च विषं मतम् ।
अमृतञ्च तदेवोक्तं रसतन्त्रविशारदैः ॥१६॥
रसशास्त्रज्ञ लोग, वत्सनाभ विष को वत्सनाभ, वत्सनाग, दवेड, विष तथा
अमृत शब्द से व्यवहार करते हैं ॥ १६ ॥
ग्राह्यवत्सनाभस्य स्वरूपम्
स्थूलं स्निग्धं गुरु नवं फलपाकोत्तरोद्धृतम् ।
कीटाद्यभक्षितञ्चैव विषं ग्राह्यमिहोच्यते ॥१७॥
भा.टी.-औषधिकार्य में लिया जानेवाला वत्सनाभ कन्द मोटा, बाहर से
चिकना स्पर्श, गुरुभार, नवीन और फलों ( वत्सनाभ फल ) के जाने के बाद
उखाड़ा हुआ तथा घुन आदि लगने से रहित होना चाहिए ॥१७॥
वत्सनाभसंशोधनस्य प्रयोजनम्
अविशुद्धं विषं दाहं मोहं हृद्गतिरोधनम् ।
मृत्युञ्च विदधात्याशु तस्मात्तं परिशोधयेत् ॥१८॥
भा.टी.-बिना शुद्ध किया हुआ वत्सनाभ विष सेवन करने या कराने से
शरीर में दाह, मूर्च्छा तथा हृदयगति का अवरोध करता है, जिससे कई बार
इसके अशुद्ध और अधिक प्रयोग से शीघ्र ही मनुष्य की मृत्यु हो जाया करती
है । अतः इन दोषों या विकारों को दूर करने के लिए इसको सदा शुद्ध करके
प्रयोग करना चाहिए ॥१८॥
वत्सनाभस्य प्रथमः शोधनप्रकारः
यथोक्तगुणसंपन्नं वत्सनाभं समाहरेत् ।
ततश्चणकसंस्थानं खण्डशः कारयेद्भिषक् ॥१६॥
पाषाणचषके वापि मृत्तिकाभाजने ततः ।
गोमूत्रेण समाप्लाव्य स्थापयेत्प्रखरातपे ॥२०॥
प्रत्यहं पूर्वनिक्षिप्तं गोमूत्रमपनीय तु ।
दत्त्वा च नूतनं मूत्रं तीव्रघर्मे तु विन्यसेत् ॥२१॥

६५२ रसतरङ्गिणी
एवं दिनत्रयं कृत्वा त्वचामपनयेत्ततः ।
शोषयेच्च विषं त्वेवं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२२॥
यथोक्तगुणसम्पन्नमिति प्रथमः शोधनप्रकारः । यथोक्ता गुणाः स्थूलस्निग्ध-
त्वादयः । संस्थानं आकृतिम् ॥१६-२२॥
भा.टी.-उक्त गुण (स्थूल, नव, पूर्ण रस वीर्य ) सम्पन्नवत्सनाभ विष
को लेकर उसको चने के बराबर छोटे-छोटे टुकड़े कर लें । अब इन वत्सनाभ
के टुकड़ों को किसी पत्थर के पात्र अथवा मिट्टी के पात्र में डालकर उसमें ताजा
गोमूत्र भर दें और पात्र को तेज धूप में रख दें । प्रतिदिन प्रातःकाल पुराना
पहिले का गोमूत्र निकालकर फिर उसी समय इस पात्र में नया गोमूत्र भरकर धूप
में रख दें । इस प्रकार तीन दिन नया मूत्र डाल धूप में रखने के बाद इसको
गोमूत्र से बाहर अलग निकालकर इसकी बाहरी त्वचा को धीरे-धीरे किसी
चाकू आदि से छिल कर अलग कर दें और भीतर के शुद्ध विष को धूप में रख-
कर सुखा लें । इस विधि से वत्सनाभ विष उत्तमरूप से शुद्ध हो जाता
है ॥१६-२२॥
द्वितीयः शोधनप्रकारः
विषं चणकसंस्थानं कृत्वा पोट्टलिकागतम् ।
सुरभीपयसा चेह दोलिकायन्त्रयोगतः ॥२३॥
यामद्वयं वा यामैकं स्वेदयेदतियत्नतः ।
संशोधितं विषं त्वेवं विशुद्ध्यति न संशयः ॥२४॥
गोदुग्धेन अजादुग्धेन वा दोलाया यामं स्वेदनादपि शुद्धयति ॥२३, २४॥
भा.टी.-वत्सनाभ विष को चने के बराबर टुकड़े करके एक स्वच्छ कपड़े
में बाँधकर इसको पोटली बना लें । अब इस पोटली को दोलायन्त्र में गाय का
दूध भरकर उसमें लटका दें और दोलायन्त्र को चूल्हे पर रखकर तीन अथवा
छः घंटे तक पकायें इस विधि से भी वत्सनाभ की शुद्धि हो जाती है ॥२३, २४॥
वक्तव्य-दोलायन्त्र में गोदुग्ध से स्वेदन करने के बाद विष को गरम
जल से धोकर सुखा लेना चाहिए ।
तृतीयः शोधनप्रकारः
खण्डीकृतो वत्सनाभः पोट्टलीगर्भसंस्थितः ।
अजादुग्धेन सुस्विन्नो यामतः शुद्धिमाप्नुयात् ॥२५॥
भा.टी.--वत्सनाभविष के छोटे-छोटे टुकड़े करके उनको एक कपड़े की

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५३
पोटली में बाँधकर बकरी के दूध के द्वारा दोलायन्त्र में तीन घण्टे तक स्वेदन
करने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ २५ ॥
अथ वत्सनाभस्य गुणाः
विषं तु कटुकं तिक्तमुष्णं चैव कषायकम् ।
योगवाहि परं चेतन्महोत्कृष्टं रसायनम् ॥ २६ ॥
त्रिदोषघ्नं विशेषेण मतं वातबलासनुत् ।
दीपनं शीतशमनं बृंहणं बलवर्द्धनम् ॥ २७ ॥
अग्निमान्द्यप्रशमनं प्लीहोदरनिबर्हणम् ।
वातरक्तापहं चैव श्वासकासविधूननम् ॥ २८ ॥
गुदामयग्रहणिाकागुल्मनिर्दलनं परम् ।
कुष्ठपाण्डुज्वरहरं त्वामवातप्रणाशनम् ॥ २६ ॥
विनिहन्ति विशेषेण तिमिरं च निशान्धताम् ।
अभिष्यन्दं नेत्रशोथं कर्णशोथञ्च दारुणम् ॥ ३० ॥
कर्णशूलं शिरःशूलं गृध्रसीं कटिवेदनाम् ।
आखुवृश्चिकसर्पाणां विषं चैवाविलम्बितम् ॥ ३१ ॥
विषन्तु कटुकमिति वत्सनाभस्य गुणाः । बृंहणं शरीरधातुवृद्धिकरम् ।
गुदामयाः अर्शांसि ॥ २६–३१ ॥
भा.टी—वत्सनाभ कटु तिक्त और कषायरस उष्ण गुण और उत्तम योग-
वाही धर्मवाला होता है । यह विधिपूर्वक सेवन करने से श्रेष्ठ रसायन गुण
करता है । यह अन्त:प्रयोग में त्रिदोष ( पित्त तथा कफ ) नाशक है, किन्तु
विशेष रूप से वात और कफनाशक है । इसके सेवन से अग्नि वृद्धि होती है
और शीत-प्रभाव शान्त हो जाता है । शरीर में पुष्टिके साथ बल की वृद्धि होती
है । इसके सेवन से अग्निमान्द्यरोग, प्लीहोदररोग, वातरक्तरोग तथा श्वास और
कास रोग नष्ट होते हैं । इसको बवासीर, संग्रहणी और गुल्महर योगों में मिला-
कर देने से उक्त व्याधियों को समूल नाश करता है। इसके सेवन से कुष्ठ (त्वचा
के रोग), पाण्डु तथा ज्वर और आमवात रोगों में आराम आता है । इसके
निरन्तर उपयोग से तिमिर तथा रात्र्यन्धता में विशेष रूप से आराम आता है ।
नेत्राभिष्यन्द, नेत्रशोथ, कर्णशोथ, कर्णशूल, गृध्रसी तथा कटिवेदना में इसका
प्रयोग सुखजनक होता है । इसीतरह बाह्य प्रयोग में यह चूहा, बिच्छू तथा
सर्प विषों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है ॥ २६–३१ ॥

६५४ रसतरङ्गिणी
वत्सनाभस्य विशिष्टा गुणाः
विषं प्राणप्रदमलं विधिना परिशीलितम् ।
तदेवाविधिना युक्तं मतं प्राणहरं परम् ॥ ३२ ॥
तस्माद्विषविधानज्ञो रोगाणां लक्षणानि तु ।
विमृश्य सूक्ष्मया बुद्ध्या प्रयुञ्जीत प्रयत्नतः ॥ ३३ ॥
विषं विशेषतो वातवेदनाहरमुत्तमम् ।
मूत्रलं स्वेदजननं शूलनिर्मूलनं परम् ॥ ३४ ॥
प्रवृद्धतापशमनं तथा शोथानिषूदनम् ।
तत्तद्धेतुप्रवृद्धाया हृद्गतेश्च नियामकम् ॥ ३५ ॥
स्वेदसञ्जनकान्येषाम् भेषजानामपेक्षया ।
परं तु तापशमनं न चार्त्तिस्वेदकृत्तथा ॥ ३६ ॥
प्रवृद्धरक्तसञ्चारसुसंयमनसंविधौ ।
अमोघाख्यमिदं ख्यातं सर्वोत्कृष्टं महौषधम् ॥ ३७ ॥
रसतंत्राच्चिकित्सायां बाहुल्येन निरूपिते ।
विषप्रयोगे भूम्ना तु प्रवृत्ते सति भारते ॥ ३८ ॥
पूर्वाचार्यविनिर्दिष्टं रक्तनिर्हरणादिकम् ।
इदानीमत एवेह तिरोभूतं तु निर्भरम् ॥ ३९ ॥
विशोधितं खलु विषं मात्रया परिशीलितम् ।
हृदयस्य गतिं नैवावसादयति कर्हिचित् ॥ ४० ॥
मस्तिष्कदेशे संवृद्धां रक्तसञ्चरणक्रियाम् ।
नाशयत्याशु मस्तिष्के जातं वा रक्तसञ्चयम् ॥ ४१ ॥
फुप्फुसच्छदशोथघ्नस्तथा फुप्फुसशोथनुत् ।
तथा शोथसमुद्भूतविविधज्वरवेगजित् ॥ ४२ ॥
शोथं विनाशयत्याशु हृदयावरणोत्थितम् ।
तथान्त्रावरणोद्भूतं ज्वरञ्च विनिहन्त्यलम् ॥ ४३ ॥
फुप्फुसच्छदशोथादिरोगाणां प्रक्रमे विषम् ।
प्रयुक्तं निरुणद्ध्येतत् केषांचिद्विषजां मतम् ॥ ४४ ॥
गलशोथं तुण्डिकेरीं तथैव गलशुण्डिकाम् ।
अन्यांशच तरुणान् कण्ठरोगानाशु निहन्त्यलम् ॥ ४५ ॥
तत्तन्स्थानसमुद्भूतं त्वभिघातादिहेतुजम् ।

बाह्यमाभ्यन्तरं रक्तस्रावं ह्रासयति द्रुतम् ॥ ४६ ॥
सदाहं सज्वरं तीव्रशिरोवेदनयान्वितम् ।
सदाहं भ्रूयुगं हन्ति प्रतिश्यायं नवोत्थितम् ॥ ४७ ॥
सकफां बहुरक्तां वा स्वल्परक्तामुपक्रमे ।
प्रवृद्धमलवेगाढ्यां विनिहन्ति प्रवाहिकाम् ॥ ४८ ॥
ऊर्ध्वजत्रुगता या तु नाडिका पञ्चमो मता ।
शूलं तदुत्थितं शीघ्रं विनिहन्ति विशेषतः ॥ ४९ ॥
बहुवेगं वाल्पवेगं प्रगाढरक्तलोहितम् ।
ज्वरान्वितं तूर्ध्वगतं रक्तपित्तं व्यपोहति ॥ ५० ॥
तावदेव प्रयोक्तव्यं विषं होरात्रयोत्तरम् ।
गात्रतापं भवेन्नेह यावत् खलु शतांशिकम् ॥ ५१ ॥
अन्तर्दाहसमायुक्तं द्रुतं प्रबलनाडिकम् ।
पिपासया परिगतं द्रुतहृद्गतिसंयुतम् ॥ ५२ ॥
अजीर्णाध्मानसंयुक्तं तथैव स्वेदवर्जितम् ।
अतिमात्राभिसंवृद्धगात्रतापांशसंगतम् ॥ ५३ ॥
कासकम्पशिरःशूलैः पर्याकुलमनारतम् ।
अस्थैर्य्यारतिवैचित्यभयोद्वेगादिसंयुतम् ॥ ५४ ॥
वातवेदनयाक्रान्तं त्वारक्तमुखमण्डलम् ।
शुष्कोष्णचर्मसंस्पर्शं प्रगाढारक्तमूत्रकम् ॥ ५५ ॥
शीतपूर्वं तु दाहान्तं ज्वरं विविधहेतुजम् ।
विषं विधिप्रयुक्तं तु नाशयत्याशु निश्चितम् ॥ ५६ ॥
त्रिविधोत्थानसंभूतान् विविधस्थानसंस्थितान् ।
निहन्ति तरुणानाशु शोथांस्तु विविधाकृतीन् ॥ ५७ ॥
विविधस्थानसंस्थानां त्वसह्यत्वप्रकाशिकाम् ।
स्पर्शासहां गात्रभवां वेदनाञ्च निहन्त्यलम् ॥ ५८ ॥
तत्तद्रागघ्नभैषज्ययुतं तु विमलं विषम् ।
योगवाहितया हन्ति सर्वानैव महामयान् ॥ ५९ ॥
नानारसप्रयोगेण शान्ति यान्ति न ये गदाः ।
विषप्रयोगेण तु ते शाम्यन्ति हि न संशयः ॥ ६० ॥
अथास्य भूयः गुणवर्णनं विस्तरेण यथानुभवमाह-यस्माद्विषमविधिना युक्तं

६५६ रसतरङ्गिणी
मृत्युकरं तस्मात् सम्यग्विचार्य प्रयत्नतो युञ्जीतेति समन्वयः। यत्नश्च वृद्धवाग्-
भटोक्तोऽप्यनुसन्धेयः। तथाहि—"घृतोपस्कृतदेहस्य विशुद्धस्य हिताशिनः।
सात्त्विकस्योदिते भानौ योज्यं शीतवसन्तयोः ॥ ग्रीष्मेऽप्यात्ययिके व्याधौ।"
इति। तथा—"अभ्यस्तेऽपि विषे यत्नात् वर्जनीयान् विवर्जयेत्। कट्वम्ल-
तैललवणदिवास्वप्नातपानलान् ॥ रूक्षमन्नं विशेषेण भयं वाजीर्णतः सदा।
दृग्विभ्रमं कर्णरुजामन्यांश्चानिलजान् गदान् ॥ विषं रूक्षाशिनः कुर्यात् मृत्यु-
मेव त्वजीर्णतः" इति। प्रवृद्धस्तापः त्वगुष्मेति यावत्, तस्य शमनम्। पूर्वा-
चार्यैः सुश्रुतवाग्भटादिभिः। अत एवेति हेतुसमुच्चयः। यस्माद्विषं रक्तगति-
नियामकं तस्मादित्यर्थः। शुद्धं हृदयस्य गतिं नैवावसादयति। अशुद्धमतिमात्रं
वा शीलितन्तु हृदयावसादकरमस्त्येवेत्यर्थः। फुप्फुसच्छदशोथः “Pleurisy”
इत्याङ्गलभाषायाम्, तस्य विनाशकः। फुप्फुसशोथस्तु “Pneumonia”
इत्याख्यायते पाश्चात्यभिषक्तन्त्रेषु। हृदयावरणोत्थितः शोथः “Pericarditis”
इति। अन्त्रावरणोद्भूतं ज्वरमिति तत्र शोथहेतुतया जातमिति यावत्। अयं हि
“Peritonitis” इत्याख्यया प्रसिद्धः। प्रक्रम इति प्रारम्भकाले। तुण्डिकेरी
गलरोगविशेषः "शोथः स्थूलस्तोददाहप्रपाकी श्लेष्मासृग्भ्यां तुण्डिकेरी मता
तु” इत्युक्तलक्षणः। जत्रूर्ध्वगता पञ्चमी नाडिका “Fifth cranial Nerve”
“Trigeminal Nerves” वा कथ्यते। अन्तर्दाहसमायुक्तमित्यादिना ज्व-
रस्य सोपद्रवस्य आवस्थिकस्य विस्तरेण वर्णनम्। सत्स्वेषु लक्षणेषु विधिप्रयुक्तं
विषं ज्वरं हन्ति। तरुणान् बलवतो नवीनानिति विशेषः। न संशय इति
निश्चितानुभवप्रकाशनम् ॥ ३२-६० ॥
भा.टी.—यदि वत्सनाभ को विधिपूर्वक सेवन किया जाय तो यह अत्यन्त
हृद्य और बल्य होता है और यदि अविधिपूर्वक (मात्रा, देश, काल, अवस्था
आदि का बिना विचार किये ही) सेवन किया जाय तो वही प्राणघातक भी
हो जाता है। अतः विषप्रयोगज्ञ वैद्य को चाहिए कि वह रोगी के लक्षणों
का सूक्ष्म बुद्धि से विचार करके बड़ी सावधानी के साथ विष का अन्तःप्रयोग
करें। वत्सनाभ विशेष रूप से वातिक वेदनाओं के शान्त करने में उत्तम
औषधि है। इसके प्रयोग से मूत्र और पसीना अधिक मात्रा में आता
है। इसके सेवन से वातिकशूल तथा आमवातशूल शान्त हो जाते हैं।
ज्वरों में बढ़े हुए ताप को शान्त करने के लिए इसका सेवन कराया
जाता है। यह हृदयविकृति के कारण उत्पन्न शोथ को शान्त करता है।
अधिक परिश्रम आमवात, फिरंग, अति तीक्ष्ण उष्ण द्रव्य सेवन चिरकाल

४२ चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५७

तक तीव्रज्वर आदि कारणों से बढ़ी हुई हृदय की गति (Pulpitation) को
यह नियमित करता है । अन्य स्वेदजनक औषधियों की अपेक्षा (जो कि पसीना
लाकर ज्वर को कम करती हैं) यह उत्तम ज्वरशामक है और अधिक मात्रा में
पसीना भी नहीं लाता है। अति अधिक बढ़े हुए रक्तसञ्चार (Blood presure)
को घटाने और नियमित करने में यह वत्सनाभ अचूक और सर्वोत्कृष्ट महौ-
षधि है । रक्तभाराधिक्य को कम करने के लिये आजकल भारतवर्ष में अत्य-
धिक रूप से रसचिकित्सा में विष का प्रयोग होने के कारण हीं रक्तनिर्हरण
(फस्त खोलना) विरेचक रक्त के दबाव को कम करनेवाले उपचार प्रायः
लुप्त-से हो गये हैं । अर्थात् एकमात्र वत्सनाभ प्रयोग से फस्त खोलने आदि
उपचारों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है । क्योंकि शुद्ध वत्सनाभ मात्रापूर्वक
सेवन करने पर कभी हृदय-गति को मन्द नहीं करता है और नहीं उसमें अनि-
यमितता को उत्पन्न करता है। शुद्ध वत्सनाभ का प्रयोग मस्तिष्क में बढ़ी हुई
रक्तसञ्चारण क्रिया तथा मस्तिष्क में होनेवाले रक्तसञ्चय को शीघ्र ही दूर कर
देता है । शुद्ध वत्सनाभ अन्तःप्रयोग में फुप्फुसच्छदशोथ (Pleurisy) तथा
फुप्फुसशोथ (Pneumonia) और शोथजन्य विविधप्रकार के ज्वरों को नष्ट
करता है वत्सनाभ प्रयोग से हृदयावरणजन्यशोथ (Pericarditis) तथा
अन्त्रावरण शोथजन्य ज्वर (Perilenitis) नष्ट हो जाते हैं । कई चिकित्सकों
का मत है कि प्लुरिसी, निमोनिया आदि रोगों के प्रारम्भ में वत्सनाभ का
प्रयोग करने से इन रोगों की वृद्धि रुक जाती है । गले में होनेवाले गलशोथ,
तुण्डिकेरी तथा गलशुण्डिका आदि अन्यान्य कंठरोगों में विष प्रयोग से शीघ्र
आराम आता है । बाह्याभ्यन्तर शरीर के किसी स्थान से किसी अभि-
घात आदि के कारण होनेवाले रक्तस्राव को रोकने में वत्सनाभ का प्रयोग
किया जाता है । शुद्ध वत्सनाभ के प्रयोग से तीव्र शिरोवेदना, छींक, दाह तथा
आँखों के दोनों भौंओं में दाह के साथ होनेवाले नूतन प्रतिश्याय में आराम
आता है । कफयुक्त अधिक रक्त या अल्परक्त सहित अत्यधिक मल और वेग-
युक्त प्रवाहिका के प्रारम्भ में वत्सनाभ का प्रयोग करने से रोग भयंकर रूप
धारण नहीं कर सकता है और शान्त हो जाता है । जत्रु ऊर्ध्वगामी जो पञ्चमी
नाड़ी (Fifth cranial Nerve or Trigeminal Nerves) है उसमें
होनेवाले शूल को वत्सनाभ प्रयोग शीघ्र ही शांत कर देता है । तीव्रवेग या
अल्पवेग अत्यधिक गाढ़े लाल रंग के ज्वर सहित ऊर्ध्वगत रक्तपित्त में वत्स-
नाभ का प्रयोग शीघ्र लाभ पहुँचाता है। तापांश को कम करने के लिये वत्सनाभ

६५८ रसतरङ्गिणी
को तब तक हर तीसरे घण्टे बाद प्रयोग करना चाहिये जब तक कि शारीरिक
ताप १०० डिग्री तक न आ जाय । १०० सौ डिग्री से कम ताप हो जाने पर
विष का प्रयोग नहीं करना चाहिये । विभिन्न कारणों से उत्पन्न होनेवाले
शीतपूर्व और दाहान्त अर्थात् प्रायः मलेरिया (जिसमें भीतर अधिक गर्मी मालूम
पड़ती हो, नाड़ी बहुत तेज चलती हो, अत्यधिक प्यास और हृदय की गति
बहुत तेज हो, पेट में अफारा और अजीर्ण हो, पसीना न आता हो और शारी-
रिक तापांश बहुत बढ़ा हुआ अर्थात् १०५-१०७ डिग्री हो, रोगी कास, हस्त-
पादकम्प और शिरःशूल से बहुत बेचैन हो और रोगी को किसी तरह शान्ति,
चैन न आता हो और उसे बहुत घबड़ाहट और मृत्यु का डर हो, सारे शरीर
में वातिक वेदनायें होती हों, मुखमण्डल लाल हो रहा हो, शारीरिक त्वचा
खुश्क और गर्म हो और गाढे लाल रंग का मूत्र आ रहा हो) में तो वत्सनाभ
को विधिपूर्वक सेवन कराने से शीघ्र ही सब लक्षण और उपद्रव शान्त हो जाते
हैं । शरीर के विविध स्थानों में विविध कारणों से उत्पन्न होनेवाले अनेक तरुण
( नूतन) शोथों में वत्सनाभ शीघ्र लाभ पहुँचाता है। विविध कारणों से उत्पन्न
होनेवाली विभिन्न लक्षणोंवाली, स्पर्शासह, ( असहनीय ), रात्रि में होनेवाली
शारीरिक वेदना को वत्सनाभ प्रयोग शीघ्र शान्त कर देता है। विष के गुणों
के विषय में संक्षेप में यह समझना चाहिये कि शुद्ध वत्सनाभ को तत्तद् रोग-
नाशक औषधियों के साथ मिला कर प्रयोग करने से यह योगवाहि धर्मके कारण
सब प्रकार के भयंकर रोगों को नष्ट करता है। तत्तद् रोग नाशक प्रधान-प्रधान
रसों के सेवन कराने से जो रोग नष्ट नहीं हो पाते हैं, वे रोग विधिपूर्वक
विषके प्रयोग से शान्त हो जाते हैं ॥ ३२-६० ॥
वक्तव्य—वृद्धवाग्भट में विषसेवन के विषय में किन २ बातों पर विशेष
ध्यान देना चाहिये, उनको इस प्रकार से लिखा है—"घृतोपस्कृतदेहस्य विशु-
द्धस्य हिताशिनः। सात्त्विकस्योदिते भानौ योज्यं शीतवसन्तयोः॥ ग्रीष्मेप्यात्ययिके
व्याधौ" तथा "अभ्यस्तेऽपि विषे यस्मात् वर्जनीयान् विवर्जयेत् । कट्वम्लतै-
ललवणदिवास्वप्नातपानलान् ॥ रूक्षमन्नं विशेषेण भयं वाजीर्णतः सदा ।
दृग्विभ्रमं कर्णरुजामन्यांश्चानिलजान् गदान् । विषं रूक्षाशिनः कुर्यात् मृत्युमेव
त्वजीर्णतः ॥" इत्यादि ।
बहिः प्रयोग में वत्सनाभ स्थानिक संज्ञावाहिनियों को आरम्भ में थोड़ा सा
उत्तेजित कर फिर संज्ञा रहित कर देता है, जिससे उस स्थान में होनेवाली पीडा
शान्त हो जाती है । यह पराश्रयी जीवाणुहर भी है। थोड़ी मात्रा में मुख द्वारा

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५६
दिया जाय तो यह हृदय को बल देता है, जिससे निर्बल और तीव्र नाड़ी बल-
वती और मन्द हो जाती है। परन्तु यदि अधिक मात्रा में दिया जावे तो वह
हृदय को निर्बल कर देता है जिससे नाड़ी की प्रतिमिनट संख्या तथा शक्ति
कम हो जाती है। साधारण मात्रा में यह श्वास-संस्थान को उत्तेजित करता है
जिससे श्वास गहरा तीव्र हो जाता है। अधिक मात्रा में देने से श्वास मन्द हो
जाता है। इसके अन्तःप्रयोग से भी स्वेद आता है। हृदय को मन्द करने
तथा स्वेदक होने के कारण ज्वर की अवस्था में शरीर के बढ़े हुए तापमान
को घटाता है। यह शरीर की संज्ञा-वाहिनियों के शिरों को थोड़े काल के लिये
उत्तेजित कर फिर मन्द कर देता है जिससे शरीर के किसी भाग में शूल हो तो
मिट जाती है।
इसकी विषैली मात्रा खाये जाने के कुछ मिनट बाद मुख, गलप्रणाली
और आमाशय में दाह वमन होती है और त्वचा पर अधिक स्वेद आता है,
एवं त्वचा की संज्ञा पड़ जाती है। मंद नाड़ी निर्बल मन्द और विषम हो जाती
है। पुतलियाँ फैल जातीं श्वास कठिन हो जाता और रोगी अत्यन्त निर्बल
होकर मूर्च्छित हो जाता है और मूर्च्छा के बाद मृत्यु हो जाती है। किन्तु रोगी
की चेतना मृत्यु तक भी बनी रहती है।
उक्त विषैले लक्षणों के होने पर शीघ्र रोगी को वमन करा देना चाहिये
और हृदय को सबल करने के लिये उत्तेजक औषधियाँ देनी चाहिए। हाथ
और पैरों को गरम रखें और सारे शरीर को अच्छी तरह मलें। कस्तूरी वारुणी-
सार, विषमुष्टि वारुणीसार, मिलाकर मकरध्वज देना चाहिए।
विषप्रयोगस्य निषेधः
न बालेष्वतिवृद्धेषु रोगिणीगर्भिणीषु च ।
न चातिक्षीणगात्रेषु यदमलद्दमयुते न च ॥६१॥
न क्रोधिते न च श्रान्ते हृद्दौर्बल्ये विशेषतः।
वत्सनाभविषं वैद्यः प्रायशो न प्रयोजयेत् ॥६२॥
एतेष्वपि प्रयोक्तव्येऽवश्यं खलु विधानवित् ।
यत्नतोह्यल्पकालार्थं युञ्जीतात्यल्पमात्रया ॥६३॥
न बालेष्वतिवृद्धेष्विति विषप्रयोगनिषेधः तीक्ष्णवीर्यत्वात् हृदयावसादक-
त्वाच्च वत्सनाभस्य। अत्र चापि प्रयोगावश्यकता चेद् अत्यल्पकालमात्रोऽस्य
प्रयोगो निरापद इति ॥६१-६३॥

६६० रसतरङ्गिणी
भा.टी..—वैद्य को चाहिए कि वत्सनाभ विष को जहाँ तक हो सके प्रायः
बालक, अत्यन्त वृद्ध, गर्भवती, रुग्णा, अतिक्षीण शरीर, राजयक्ष्मा के लक्षण
युक्त अवस्था में, क्रोधित मनुष्य को और अतिभ्रान्त मनुष्य को हृदय की दुर्ब-
लावस्था में ( विशेष रूप से ) वत्सनाभ का प्रयोग ( अन्तःप्रयोग ) न करें।
यदि अल्पवयस्कों को बिना विषप्रयोग किये हुए कार्य नहीं चलता हो तो
बड़ी सावधानी के साथ बहुत अल्प मात्रा में और बहुत थोड़े समय के लिये
प्रयोग कर सकते हैं ॥६१-६३॥
विषस्य मात्रायां प्रयोगे फलवैशिष्ट्यम्
विषं भवति पीयूषं मात्रया विनियोजितम् ।
तदेवामात्रया युक्तं द्रुतं मुष्णाति जीवितम् ॥६४॥
तस्मात्पूर्वन्तु रोगाणां रोगिणां च बलाबलम् ।
वीक्ष्य देशादिकञ्चापि विषमात्रां प्रकल्पयेत् ॥६५॥
वत्सनाभविषस्य मात्रा
कलांशतो रक्तिकाया वस्वशप्रमितं विषम् ।
विमलं विनियुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥६६॥
विषं भवति पीयूषममृतं मात्रया विनियोजितम् । मात्रा च रोगिदेशकाल-
बलापेक्ष्येति बोधयति तस्मात् पूर्वन्विति । रक्तिकायाः षोडशांशतः अष्टमांश-
पर्यन्तमस्य मात्रानिर्धारणम् ॥६४-६६॥
भा.टी.—वत्सनाभ को यदि मात्रापूर्वक सब बातों का ध्यान रखते हुए
प्रयोग किया जाय तो यह शरीर में अमृत का कार्य करता है अर्थात् जीवन-
दान करनेवाला होता है। यदि इसे अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो
हृदय क्रिया को बन्द करके यह जीवन ही नष्ट कर देता है। अतः विषप्रयोग
करने के पूर्व रोग और रोगी का बलाबल और देश, काल, अवस्था, प्रकृति,
सात्म्य आदि का पूर्ण विचार करके विष की मात्रा निर्धारित करनी चाहिये।
रोग और रोगी का बलाबल देश काल आदि का निश्चय करके रत्ती के सोल-
हवें भाग से लेकर रत्ती का आठवाँ भाग तक वत्सनाभ की मात्रा प्रयोग करनी
चाहिये ॥६४-६६॥
अथ वत्सनाभविषस्य आमयिकः प्रयोगः ।
मृत्युञ्जयरसः
अमृतं द्विगुणामलेज्जुलाढ्यं त्रिदिनं त्वार्द्रकवारिणा निपिष्टम् ।
बलिमागधिकामारचटङ्कैः समभागैः परिपेषयेन्मकासम् ॥६७॥

वाटिकाः कारयेद्यत्नात् ततो विषविधानवित् ।
गुञ्जार्धसम्मिता वापि गुञ्जापादांशसम्मिताः ॥ ६८ ॥
रसोऽयं तु समाख्यातो मृत्युञ्जयसमाह्वयः ।
अयं वातज्वरहरस्तथा फुप्फुसशोथहृत् ॥ ६६ ॥
प्रवाहिकाप्रशमनो विविधज्वरनाशनः ।
आध्मानाजीर्णसंयुक्तसंनिपातनिपातनः ॥ ७० ॥
अस्य च रोगयोग्यप्रयोगक्रमे प्रथमो मृत्युञ्जयरसः—यद्यपि तन्त्रान्तरेषु विष-
हिंगुलयोराद्रर्कवारिणा पेषणां नोक्तं तथापि अनुभूतचरत्वादुपयुक्तमत्वाच्चात्र
कथितमाचार्यैरिति । अस्य च आवस्थिकः प्रयोगः स्वानुभूतचरस्तन्त्रान्तरानु-
क्तोऽप्याविष्कृतः ॥ ६७–७० ॥
भा.टी.—शुद्ध वत्सनाभ एक भाग में दो भाग शुद्ध हिंगुल मिलाकर खरल
में तीन दिन तक अदरख के स्वरस से खूब अच्छी तरह मर्दन करें । अब इसमें
वत्सनाभ के बराबर भाग, शुद्ध गन्धक, पिप्पलीचूर्ण, कालीमिर्चचूर्ण और सुहागा
खील; प्रत्येक मिलाकर अच्छी तरह मर्दन करें । जब गोली बाँधने योग्य हो
जाय तो इसकी चौथाई रत्ती से आधी रत्ती तक की गोलियाँ बना लें । इसको
“मृत्युञ्जयरस” नाम से कहा जाता है । यह रस अन्तः प्रयोग में वातज्वर
( Dengoe ), फुप्फुस शोथ (निमोनिया), प्रारम्भिक प्रवाहिका तथा विविध
प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है। इसके अतिरिक्त यह रस आध्मान तथा अजीर्ण
युक्त सन्निपात ज्वर आन्त्रज्वर आदि को भी नष्ट करता है ॥ ६७–७० ॥
मृत्युञ्जयरसस्य आमयिकः प्रयोगः
आरक्तवक्त्रे प्रबलज्वरे च श्वासोच्छ्रये कष्टदकासवेगे ।
देयो दिनेऽयं प्रथमे द्वितीये मृत्युञ्जयः फुप्फुसशोथरोगे ॥७१॥
रसोऽयं शीलितस्तीव्रज्वरवेगसमन्वितम् ।
आध्मानाजीर्णसंयुक्तं कृमिरोगं विनाशयेत् ॥ ७२ ॥
विविद्योत्सेधजं वापि हृदावरणशोथजम् ।
ज्वरमारम्भवेलायां हन्ति मृत्युञ्जयो रसः ॥ ७३ ॥
नवज्वरायमाणं च त्वजीर्णाध्मानसंयुतम् ।
सन्निपातं निहन्त्याशु रसोऽयं निम्बुकाम्भसा ॥ ७४ ॥
गौरवारुचिसंसृष्टं सामं वापि निरामकम् ।

६६२ रसतरङ्गिणी
रसोऽयं निम्बूकद्रावैर्निहन्ति विषमज्वरम् ॥ ७५ ॥
पिप्पलीमधुसंयुक्तो रसोऽयं परिशीलितः ।
नवज्वरायमानन्तु जीर्णज्वरमपोहति ॥ ७६ ॥
सोत्सेधारक्तशिश्राग्रं सदाहं वेदनान्वितम् ।
निहन्त्यारम्भवेलायामौपसर्गिकमेहकम् ॥ ७७ ॥
भा.टी.-फुप्फुस शोथ रोग ( निमोनिया ) में प्रारम्भ के पहिले और दूसरे
दिन जब कि ज्वर बहुत तीव्र हो और रोगी का मुखमंडल लाल दिखाई देता
हो और भयंकर कष्टदायक कास के साथ श्वास की अधिकता हो तो इस रस
के प्रयोग करने से रोग का प्रभाव कम पड़ता जाता है। इस रस को तीव्र ज्वर-
वेग युक्त और अजीर्ण तथा आध्मान सहित उदरकृमि-रोग में प्रयोग करने से
शीघ्र लाभ होता है। हृदय में शोथ के कारण अथवा अन्य किसी शारीरिक
भीतरी अंग के शोथ के कारण होनेवाले ज्वरों की प्रथमावस्था में इस रस का
प्रयोग करने से शीघ्र ही इन रोगों के प्रभाव को शान्त कर देता है। अजीर्ण
और आध्मान युक्त नूतन सन्निपातज्वर में इस रस को निम्बू के स्वरस के साथ
अन्तः प्रयोग करने से शीघ्र ही सन्निपात ज्वर में लाभ होता है। अंग गौरव और
अरुचि के साथ आम या निराम लक्षण युक्त विषमज्वर में इसको नीबू के रस
के साथ सेवन कराने से आराम आता है। नवीन जीर्ण ज्वर में इस रस को
पिप्पलीचूर्ण और शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से आराम आता है।
औपसर्गिकमेह अर्थात् सुजाक की प्रथमावस्था में जब इन्द्रिय के अग्रभाग में
बहुत शोथ और लालिमा के साथ तीव्र दाह और वेदना हो तो इसके प्रयोग से
ये सब लक्षण शान्त हो जाते हैं ॥ ७१-७७ ॥
हिंगुलेश्वरो रसः
अमृतं त्रिमलं युगतोलमितं दरदं च कणासममेव समम् ।
परिपेष्य भृशं खलु सार्द्धयवप्रमिता वटिका विदधीत बुधः ॥७८॥
रसोऽयं तु समाख्यातो विबुधैर्हिङ्गुलेश्वरः ।
आमवातप्रशमनस्तथा वातज्वरापहः ॥ ७६ ॥
हिंगुलेश्वरः— शुद्धविषं द्वितोलकम्, हिंगुलं द्वितोलकम्, पिप्पली द्वि-
तोलकमिता । वारिणा पेषयित्वा सार्धयवप्रमिताः वटिकाः विधेयाः । सोऽयमाम-
वातादिशमनः ॥ ७८, ७६ ॥
भा.टी.-शुद्धवत्सनाभ दो तोला और पिप्पलीचूर्ण दो तोला, इन सबको

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६३
एकत्र खरल में जल के साथ मर्दन करके गोली बनाने योग्य हो जाने पर डेढ़
जौ के बराबर अर्थात् आधी रत्ती की गोली बना लें। इसको हिंगुलेश्वर रस
कहते हैं। यह रस आमवात शामक और वातज्वरहर है ॥ ७८, ७६ ॥
हिंगुलेश्वरस्य आमयिकः प्रयोगः
तीव्रज्वरं साङ्गमर्दं सन्धिशूलसमन्वितम् ।
आमवातं निहन्त्याशु शीलितो हिङ्गुलेश्वरः ॥ ८० ॥
शीतकम्पाङ्गमर्दाढ्यं शिरोवेदनयान्वितम् ।
रसोऽयं शीलितो हन्ति वातिकज्वरमुल्बणम् ॥ ८१ ॥
नवज्वरायमाणान्तु जीर्णज्वरमथापि वा ।
सविरामज्वरं हन्ति रसोऽयं परिशीलितः ॥ ८२ ॥
सविरामज्वरमिति विरम्य पुनर्वेगोदये जनिशीलम् ॥ ८०-८२ ॥
भा.टी.—तीव्र ज्वर, अंगमर्द तथा सन्धिशूल युक्त आमवात में इस रस
का सेवन करने से शीघ्र ही आराम आता है। सब शरीर में शीत कम्प अंगमर्द
और तीव्र शिरोवेदना के साथ होनेवाला वातिक ज्वर इसके प्रयोग से शान्त हो
जाता है। इसके अतिरिक्त नवज्वर अथवा जीर्णज्वर और सविरामज्वर (एक
या दो दिन रुककर आनेवाला) में भी यह लाभ करता है ॥८०-८२ ॥
पञ्चामृतरसः
अमृतं तोलकमितं रसं गन्धञ्च तन्मितम् ।
मरिचं टङ्कणञ्चैव तोलकत्रितयोन्मितम् ॥ ८३ ॥
समादाय ततो वारा वटिका रक्तिकोन्मिताः ।
निर्यापयेद्भिषग्वर्यो रसः पञ्चामृताभिधः ॥ ८४ ॥
विविधोत्थानसंस्थानं विविधस्थानसंस्थितम् ।
ज्वरातःसार युक्तञ्च शोथं हन्त्यविशालम्बितम् ॥८५॥
जलोदरं शिरःशूलं पीनसञ्च गलग्रहम् ।
नासारोगं कण्ठरोगं हन्ति च श्लैष्मिकामयम् ॥ ८६ ॥
भा.टी.—शुद्ध वत्सनाभ एक तोला, शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गन्धक
एक तोला, कालीमिरच तथा शुद्ध टंकण; प्रत्येक तीन-तीन तोला लेकर एकत्र
खरल में जल से पीस लें, जब गोली बनने योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक
रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको पञ्चामृत रस कहते हैं। विविध कारणजन्य

६६४ रसतरङ्गिणी
और विविध लक्षण युक्त शरीर के विविध भागों में होनेवाले ज्वरातिसार सहित
शोथ को यह रस नष्ट करता है। इसी प्रकार जलोदर (जलंधर पेट में पानी
भरना) शिरःशूल, पीनस, गलग्रह, नासिकारोग, कण्ठरोग तथा कफप्रयोग जन्य
रोगों को भी यह रस नष्ट करता है ॥ ८३-८६ ॥
अस्य आमयिकः प्रयोगः
पुनर्नवाकषायेण रसोऽतं वार्द्रकद्रवैः ।
विविधोत्थानसंस्थानं शोथं हन्त्याशु सर्वगम् ॥ ८७ ॥
आर्द्रकद्रवयोगेन रसोऽयं परिशीलितः ।
शिरःशूलं निहन्त्याशु वृत्तं शक्राशनिर्यथा ॥ ८८ ॥
भा.टी.-सर्वशरीरग, विविध कारणजन्य तथा विविध लक्षण युक्त शोथ
को शान्त करने के लिये इस पञ्चाननरस को पुनर्नवा कषाय अथवा अदरक
स्वरस के साथ देने से शीघ्र आराम आता है। अदरक स्वरस के साथ इस रस
का सेवन करने से शिरःशूल शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ ८७, ८८ ॥
शिवताण्डवरसः
विषं तु तोलकमितं रससिन्दूरकं तथा।
तालकं विमलं सूतं बलिं च समभागिकम् ॥ ८६ ॥
चूर्णीकृतं च मरिचं चतुस्तोलकसंमितम् ।
समादाय भिषग्वर्यः पेषयेदार्द्रकद्रवैः ॥ ६० ॥
निर्यापयेद्विधानज्ञो वटिका रक्तिकोन्मिताः ।
रसोऽयं तु समाख्यातः शिवताण्डवसंज्ञकः ॥ ६१ ॥
दृढदन्तं लिप्तदेहं भ्रान्ततारकलोचनम् ।
विषयाशक्तकरणं सन्निपातं निपातयेत् ॥ ६२ ॥
शिवताण्डवरसः—विषादिगन्धकान्तानां प्रत्येकमेकतोलकम्, मरिचस्य च
चतुस्तोलकं गृहीत्वा आर्द्रकरसैः पेषयेत् । व्याख्यासमानमन्यत् ॥ ८६-६२ ॥
भा.टी.-शुद्ध वत्सनाभ एक तोला, रससिन्दूर एक तोला, शुद्ध हरताल एक
तोला, शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गन्धक एक तोला और कालीमिर्च चूर्ण चार
तोला लेकर इसको एकत्र खरल में अदरक स्वरस से अच्छी तरह मर्दन करें। गोली
बनाने योग्य होने पर इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इस रस को वैद्य
लोग शिवताण्डव रस कहते हैं। यह रस सन्निपात की उस अवस्था में लाभ करता है

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६५
जब कि रोगी के दाँत बैठ गये हों, सारे शरीर में स्वेद आ रहा हो और रोगी
की पुतलियाँ तथा नेत्र टेढ़े पड़ गये हों और इन्द्रियों की विषय ग्रहण शक्ति
नष्ट हो गयी हो ॥८६-६२॥
आनन्दभैरवरसः
अमृतं गव्यमूत्रेण यत्नतो विमलीकृतम् ।
मागधी मरिचं चैव सौभाग्यं दरदं तथा । ६३ ।
समं समं समादाय वारिणा परिपेषयेत् !
रक्तिकार्द्धमिताश्चैव वटिकाः कारयेत्ततः ॥६४॥
प्रवाहिकाप्रशमनः पूयमेहप्रणुत्परम् ।
ज्वरातिसारजिन्नाम्ना रसो ह्यानन्दभैरवः ॥६५॥
आनन्दभैरवः—यत्नतो विमलीकरणं प्रागुक्तम् । दरदं हिंगुलम् । सर्वे
समानमानम् । पूयमेहः “Gonorrhea” इत्याङ्गलभाषायाम् ॥६३-६५॥
भा.टी.—गोमूत्र से अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ वत्सनाभ चूर्ण, पिप्पली-
चूर्ण, मरिचचूर्ण, शुद्ध सुहागाचूर्ण और शुद्ध हिंगुल; प्रत्येक समभाग में लेकर
एकत्र खरल में डालकर जल से मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय
तो इसकी आधी-आधी रत्ती की गोलियाँ बना सुखाकर रखलें। यह रस आनन्द-
भैरव नाम से कहा जाता है। इसके सेवन से प्रवाहिका ( पेचिश ) की शान्ति
होती है और सुजाक में तथा ज्वरातिसार में आराम आता है ॥६३-६५॥
आनन्दभैरवस्य आमयिकः प्रयोगः
सशोथारक्तशिश्नाग्रं दाहकण्डूयनान्वितम् ।
पूयमेहं निहन्त्याशु रसो ह्यानन्दभैरवः ॥६६॥
अतिसारं ज्वरोद्भूतं ज्वर वाप्यतिसारजम् ।
बहुतापं वातिवेगं हन्त्ययं तु रसोत्तमः ॥६७॥
अजीर्णशूलप्रबलज्वरायां प्रवाहिकायां कफवातजायाम् ।
ज्वरौशान्त्यै विनियोजनीयः फलेन्द्रपत्रस्वरसादियोगात् ॥६८॥
सशोथारक्तशिश्नाग्रमिति प्रयोगयोग्यरोगावस्थानिर्देशः । फलेन्द्रपत्रं राज-
जम्बूवृक्षपत्रम् ॥६६-६८॥
भा.टी.—पूयमेह (सुजाक) में जब मूत्रेन्द्रिय के मुख पर शोथ और रक्त-
सञ्चय के साथ दाह (जलन) और कण्डू (खुजली) होती हो तो आनन्दभैरवरस

६६६ रसतरङ्गिणी
के सेवन से उक्त सब कष्ट मिट जाते हैं । तीव्र ज्वर में होनेवाले अतीसार में
अथवा अतीसार में होनेवाले तीव्र वेग और अत्यन्त तापांशवाले ज्वर में यह
आनन्दभैरवरस उत्तम कार्य करता है । इसी तरह इस आनन्दभैरवरस को
अजीर्णशूल और प्रबलज्वरयुक्त कफवातप्रकोपजन्य प्रवाहिका में, ज्वर और
प्रवाहिका में बड़ी जामुन के पत्तों के स्वरस के साथ सेवन करने से शीघ्र
आराम आता है ॥६६-६८॥
जयावटी
विषं निशा कटुत्रिकं कृमिघ्ननिम्बुमुस्तकम् ।
समं समं समोन्मितं जयन्तिकाशफारजः ॥६६॥
समाहरेद्भिषग्वरो वटीं द्विगुञ्जासंमिताम् ।
प्रमापयेत्तु नामतो बुधैर्मता जयावटी ॥१००॥
जयावटी विशेषतः प्रमेहकासपाण्डुजित् ।
नवज्वरापहा परं तथैव रक्तपित्तनुत् ॥१०१॥
जयावटी—निशा हरिद्रा, कृमिघ्नं विडङ्गम् । रोगप्रयोगस्तु यद्यप्यनुपान-
भेदेन तन्त्रान्तरेषु विस्तरेणोक्तः, तथापि विषप्रयोगमधिकृत्य विशेषतो येषु येषु
रोगेषु प्रयुज्यते तेषामेव परिसंख्यानम् ॥६६-१०१॥
भा.टी.—शुद्धवत्सनाभ, हरिद्राचूर्ण, सोंठचूर्ण, मरिचचूर्ण, पिप्पलीचूर्ण,
वायविडंग चूर्ण, निम्बपत्रचूर्ण, मुस्ता (मोथा) चूर्ण, जयन्तीमूलचूर्ण; प्रत्येक
समभाग में लेकर एकत्र खरल में जल के साथ मर्दन करें। गोली बनाने के
योग्य हो जाने पर इसको दो-दो रत्ती की गोलियाँ बनालें । इसको विद्वान् वैद्य
लोग जयावटी के नाम से व्यवहार करते हैं । यह जयावटी विशेष रूप से प्रमेह
कास तथा पाण्डुरोग नाशक है । नवज्वर में प्रयोग करने से ज्वर शान्त हो
जाता है और रक्तपित्त रोग में भी यह उत्तम लाभ पहुँचाती है ॥६६-१०१॥
जयावटिकाया आमयिकः प्रयोगः
चन्दनस्य कषायेण शीलिता तु जयावटी ।
रक्तपित्तं निहन्त्याशु सज्वरं त्वविलम्बितम् ॥१०२॥
बलामूलकषायेण शालिता तु जयावटी ।
जत्रूर्ध्वपञ्चमीनाडीगतं शूलं व्यपोहति ॥१०३॥
मुस्तेन्द्रयवविश्वानां क्वाथेन तु जयावटी ।
शीलिता ग्रहणीं हन्ति सज्वरामतिदारुणाम् ॥१०४॥
पर्पटस्य कषायेण जया तु परिशीलिता ।

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६७
विनाशयति पित्तोत्थं ज्वरं खल्वतिदारुणम् ॥ १०५ ॥
भा.टी.—ज्वरयुक्त रक्तपित्त में जयावटी को रक्तचन्दन के कषाय के साथ
सेवन कराने से शीघ्र ही रक्तपित्त में आराम आता है। यदि जयावटी को खरेंटी-
मूलकषाय के साथ सेवन कराया जाय तो जत्रु के ऊर्ध्वभागगामी पञ्चमी नाडी
(Fifth Nerves) के शूलमें (सूर्यावर्त, अर्धावभेदक आदि) शीघ्र आराम
आ जाता है। अति भयंकर ज्वरयुक्त संग्रहणी रोग में इस जयावटी को मोथा,
इन्द्रजौ और सोंठ के कषाय के साथ प्रयोग कराने से शीघ्र आराम आता है।
अति भयंकर पित्तप्रकोपजन्य ज्वर में जयावटी को पित्तपापड़े के कषाय के
साथ सेवन कराने से शीघ्र ज्वर कम हो जाता है ॥ १०२-१०५ ॥
कफकेतुरसः
अमृतं तोलकंमितं गोमूत्रपरिशोधितम् ।
पिप्पली शंखभसितं टङ्कणं चैव तन्मितम् ॥ १०६ ॥
शृङ्गवेररसेनैव पेषयेत्त दिनत्रयम् ।
गुञ्जाधेमात्रा वटिकाः कर्त्तव्याः खलु यत्नतः ॥ १०७ ॥
रसोऽयं भाषितो नाम्ना कफकेतुसमाह्वयः ।
प्रतिश्यायं तथा कासं कण्ठरोधं विनाशयेत् ॥ १०८ ॥
गलग्रहं कर्णरोगं श्वासं प्रतमकाभिधम् ।
विनिहन्ति विशेषेण रसोऽयमविलम्बितम् ॥ १०६ ॥
कफकेतुरसः—शृङ्गवेररसेन आर्द्रकरसेन । अनुपानानि आवस्थिकः प्रयोग-
कालश्चानुभूतचरो विशदीकृतः ॥ १०६-१०६ ॥
भा.टी.—गोमूत्र से शुद्ध किया हुआ अमृत (वत्सनाभविष) एक तोला
पिप्पलीचूर्ण, शंखभस्म और शुद्ध टंकण (सुहागा); प्रत्येक विष के समभाग
लेकर सब को एकत्र खरल में अदरख के स्वरस के साथ तीन दिन
तक मर्दन करें। गोली बनाने पर इसकी आधी-आधी रत्ती की गोलियाँ बना-
कर सुखा लें। इसको कफकेतुरस कहते हैं। यह कफकेतुरस प्रतिश्याय, कास
तथा कण्ठ के रोगों को नष्ट करता है। गले में कफ प्रकोप से रुकावट होने पर
और कर्णरोगों तथा विशेषरूप से प्रतमक श्वास (दमा) रोग में यह बहुत
शीघ्र ही लाभ पहुँचाता है ॥ १०६-१०६ ॥
अस्य आमयिकः प्रयोगः
क्षौद्रार्द्रकरसोपेतो रसोऽयं परिशीलितः ।