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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 690

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६५
जब कि रोगी के दाँत बैठ गये हों, सारे शरीर में स्वेद आ रहा हो और रोगी
की पुतलियाँ तथा नेत्र टेढ़े पड़ गये हों और इन्द्रियों की विषय ग्रहण शक्ति
नष्ट हो गयी हो ॥८६-६२॥
आनन्दभैरवरसः
अमृतं गव्यमूत्रेण यत्नतो विमलीकृतम् ।
मागधी मरिचं चैव सौभाग्यं दरदं तथा । ६३ ।
समं समं समादाय वारिणा परिपेषयेत् !
रक्तिकार्द्धमिताश्चैव वटिकाः कारयेत्ततः ॥६४॥
प्रवाहिकाप्रशमनः पूयमेहप्रणुत्परम् ।
ज्वरातिसारजिन्नाम्ना रसो ह्यानन्दभैरवः ॥६५॥
आनन्दभैरवः—यत्नतो विमलीकरणं प्रागुक्तम् । दरदं हिंगुलम् । सर्वे
समानमानम् । पूयमेहः “Gonorrhea” इत्याङ्गलभाषायाम् ॥६३-६५॥
भा.टी.—गोमूत्र से अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ वत्सनाभ चूर्ण, पिप्पली-
चूर्ण, मरिचचूर्ण, शुद्ध सुहागाचूर्ण और शुद्ध हिंगुल; प्रत्येक समभाग में लेकर
एकत्र खरल में डालकर जल से मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय
तो इसकी आधी-आधी रत्ती की गोलियाँ बना सुखाकर रखलें। यह रस आनन्द-
भैरव नाम से कहा जाता है। इसके सेवन से प्रवाहिका ( पेचिश ) की शान्ति
होती है और सुजाक में तथा ज्वरातिसार में आराम आता है ॥६३-६५॥
आनन्दभैरवस्य आमयिकः प्रयोगः
सशोथारक्तशिश्नाग्रं दाहकण्डूयनान्वितम् ।
पूयमेहं निहन्त्याशु रसो ह्यानन्दभैरवः ॥६६॥
अतिसारं ज्वरोद्भूतं ज्वर वाप्यतिसारजम् ।
बहुतापं वातिवेगं हन्त्ययं तु रसोत्तमः ॥६७॥
अजीर्णशूलप्रबलज्वरायां प्रवाहिकायां कफवातजायाम् ।
ज्वरौशान्त्यै विनियोजनीयः फलेन्द्रपत्रस्वरसादियोगात् ॥६८॥
सशोथारक्तशिश्नाग्रमिति प्रयोगयोग्यरोगावस्थानिर्देशः । फलेन्द्रपत्रं राज-
जम्बूवृक्षपत्रम् ॥६६-६८॥
भा.टी.—पूयमेह (सुजाक) में जब मूत्रेन्द्रिय के मुख पर शोथ और रक्त-
सञ्चय के साथ दाह (जलन) और कण्डू (खुजली) होती हो तो आनन्दभैरवरस