रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३७३
एवमेषां रसादीनां प्राधान्येन निरूपितान्युदाहरणानि। गुणीभावे तु
वक्ष्यन्ते, नामानि च। तत्र प्राधान्य एवेषां रसादित्वम्, अन्यथा तु रत्यादित्व-
मेव। नामनि रसपदं तु रत्यादिपरमित्येके। अस्त्येव रसादित्वं, किन्तु न ध्वनि-
व्यपदेशहेतुत्वमित्यपरे।
इति तैलङ्ग-पण्डितराज-जगन्नाथ-विरचिते रसगङ्गाधरे प्रथमाननं सम्पूर्णम्।
रसविशेषप्रकरणे जगदण्डकमित्यत्रत्य-कप्रत्ययेन वीररसाभिव्यक्तिरिति। भैरवादिरागैः
प्रभातादिव्यङ्ग्यं, चेष्टादिभिर्युवत्वादिव्यङ्ग्यं प्रसिद्धमेव।
प्राधान्येनेति। यत्र वाक्यादौ रसस्य प्रधानता तत्र रसत्वस्य सर्वसम्मतत्वमेव,
तेषामुदाहरणानि ग्रन्थेऽस्मिन् प्रदर्शितानि। गुणीभावे त्विति। यत्र तु रसस्य वस्त्व-
लङ्कारादीनामङ्गत्वं, रसस्य गौणता तेषां स्वरूपम्, उदाहरणानि, नामानि रसवत्-प्रेय-
ऊर्जस्वि-समाहितालङ्कारस्वरूपाणि अलङ्कारप्रकरणे प्रतिपादयिष्यन्ते।
अत्र मतद्वयं दर्शयति—तत्रेति। रसस्य यत्र प्रधानता तत्रैव तस्य 'रस'-
पदवाच्यत्वम्, अन्यथा रत्यादेः इतराङ्गतया रत्यादिवस्तुतैव न रसत्वम्। रसवदित्यादौ
रसपदं रत्यादौ लाक्षणिकमेवेति प्राचां मतम्।
व्यञ्जक है। इसी तरह भैरव आदि संगीतशास्त्रीय राग, नटों की चेष्टा आदि भी
रसादि के व्यञ्जक होते हैं, जिनकी रसादिव्यञ्जकता में सहृदयों के हृदय ही
प्रमाण हैं।
अब रसादि प्रकरण का उपसंहार करते हुए कहते हैं कि इस प्रकार इन रस-
भाव आदि के प्रधान व्यंग्य रहने पर ( उनके ) उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किये गये। जहाँ
ये गुणीभूतव्यंग्य होते हैं ( रस आदि किसी अन्य के अंग के रूप में रहते हैं ), वहाँ
इनकी स्थिति गौण होती है, जिनके उदाहरण अलंकार-प्रकरण में दिये जायेंगे और
उनके नाम भी रसवत्, प्रेयस्, ऊर्जस्वि और समाहित भी कहे जायेंगे। 'रसवत्' इस
नाम में रस पद का लक्षणा द्वारा रति आदि ही अर्थ है, क्योंकि रत्यादि के गौण रहने
पर कतिपय आचार्यों के मत में वहाँ रसत्व रहता ही नहीं है, अपितु बहुत स्थलों में
रत्यादि वस्तु बनते हैं और रसवत् आदि में अलङ्कार ही कहे जाते हैं।