रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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नव्यमतमुपस्थापयति-अस्त्येवेति । गौणत्वेऽपि रस-भावादि-व्यवहारो भवत्येव,
किन्तु तत्र ध्वनिव्यवहारकारणत्वं न भवति ।
अर्द्धाङ्गीकृतगिरिजः, पशुपतिरीशोऽप्यमानगुणशाली ।
गङ्गाप्रसृतभालः, फणिपतिमालः सुखं दद्यात् ॥
इति रसगङ्गाधर-प्रथमाननस्य मैथिलश्रोत्रियपण्डितगङ्गानाथशर्मतनूज-
विद्यावाचस्पतिश्रीशशिनाथशर्मकृता रसतरङ्गिणी
व्याख्या समाप्ता ।
अन्य आचार्यों के मत में रत्यादि के गौण रहने पर भी वे रसभावादि कहलाते
ही हैं, केवल उन्हें ध्वनि नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि व्यंग्य के प्रधान रहने पर ही
ध्वनि होता है ।
इति मिथिलाजनपदावयव-मधुवनीमण्डलान्तर्गत 'दीप' ग्राम-
वास्तव्य मैथिलश्रोत्रिय पण्डितगङ्गानाथशर्मपुत्र-
दरभङ्ग संस्कृतविश्वविद्यालयीय व्याकरण-
प्राध्यापक-विद्यावाचस्पति ( डॉ० )
शशिनाथशर्मकृत-रसगङ्गाधर-
रसतरङ्गिणी हिन्दी व्याख्या में
प्रथम आनन समाप्त ॥