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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 414 में से

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पृष्ठ 388

३५६ रसगङ्गाधरः

तेऽपि भावध्वनय एव, विद्यमानतया चर्व्यमाणेष्विव उत्पत्त्यवच्छिन्नत्व-
विनश्यदवस्थत्व-सन्धीयमानत्व-परस्परसमानाधिकरणत्वैः प्रकारैश्चर्व्यमाणेषु
भावेष्वेव प्राधान्यस्यौचित्यात्, चमत्कृतेस्तत्रैव विश्रान्तेः । यद्यप्युत्पत्ति-विनाश-
सन्धि-शबलतानां तत्सम्बन्धिनां भावानां च समानायां चर्वणाविषयतायां न
प्राधान्यं विनिर्गन्तुं शक्यते, तथापि स्थितौ भावेषु प्रधानतायाः क्लृप्तत्वाद्
भावशान्त्यादिष्वपि तेष्वेव शान्तिप्रतियोगित्वादिभिर्व्यज्यमानेषु तस्याः
कल्पयितुमौचित्यात् ।
ध्वनित्वेन प्रकाशिता भावध्वनिस्वरूपा एव, न तु शान्त्यादिध्वनिस्वरूपाः । ये हर्षादयो
भावा ध्वनित्वेनास्वाद्यन्ते ते विद्यमानावस्थापन्नत्वेन, तत्र यथा भावध्वनिरेव, न
विद्यमानत्वध्वनिस्तथैव भावशान्तौ नाशावस्थापन्नभावस्य, भावोदये उत्पत्त्यवस्थापन्न-
भावस्य, भावसन्धौ सन्धीयमानावस्थापन्नभावस्य, भावशबलतायां च परस्परसमानाधि-
करणावस्थापन्नभावस्यैव ध्वनित्वं, न तु नाशोदयादेः । नहि नाशमात्रस्य भावशान्तित्व-
मपि तु उत्पत्तिकालिकनाशस्यैव । तत्र नाशांशे नैवं चमत्कारोऽपितु विनश्यदवस्थापन्न-
भावांश एव । वस्तुतो भावः पञ्चधा—विद्यमानभावः ( शुद्धो भावः ), विनश्यद्भावः
( भावशान्तिः ), उत्पद्यमानभावः ( भावोदयः ), सन्धीयमानभावः ( भावसन्धिः ),
परस्परसमानाधिकरणभावः ( भावशबलता ) चेति । स्थितौ = विद्यमानदशायां
भावः प्रधानमिति सर्वसम्मतम् । एवमेव भावशान्त्यादिष्वपि भावस्यैव प्राधान्यं न तु
शबलता ध्वनि उदाहृत हुए हैं, वे भी भावध्वनि ही हैं, क्योंकि विद्यमानत्व रूप से
आस्वाद्यमान भावों की तरह उत्पत्तिकालिक अवस्था वाला, नाश होती हुई अवस्था
वाला, मिलती हुई अवस्था वाला ओर परस्पर समानाधिकरण की अवस्था वाला प्रभेद
से आस्वाद्यमान भावों में ही प्रधानता का औचित्य है, नाश, उत्पत्ति आदि में नहीं,
क्योंकि चमत्कार भावों पर ही विश्राम लेता है । तात्पर्य यह है कि ये जो हर्ष आदि
भाव ध्वनि कहलाते हैं, वे विद्यमान अवस्था वाले भाव हैं, वहाँ जैसे भाव ही प्रधान
हैं, विद्यमानावस्था नहीं, उसी तरह भावशान्ति आदि में नाश होने की अवस्था में
स्थित भाव में ही चमत्कार होने से वही प्रधान है, नाश नहीं; उत्पत्ति होने की अवस्था
वाले भाव में भी भाव ही प्रधान है, उत्पत्ति नहीं । इसी प्रकार भावसन्धि एवं भाव-
शबलता में भी भाव की प्रधानता जाननी चाहिए ।
यद्यपि उत्पत्ति, विनाश, सन्धि और शबलता तथा उनसे सम्बद्ध भावों का
आस्वाद विषय समान ही है, जिसमें किसी का प्राधान्य कहना सम्भव नहीं है कि
उत्पत्त्यादि प्रधान हैं या भाव, तथापि विद्यमान दशा वाले भावों ( जहाँ शुद्धं हर्ष
आदि भाव माने जाते हैं ) में भावों की ही प्रधानता ( विद्यमानत्व की नहीं ) का
पूर्व से स्वीकृत होने के कारण भावशान्ति आदि में भी शान्ति आदि के प्रतियोगी