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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 414 में से

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पृष्ठ 387

प्रथमाननम् ३५५
स्वोत्तरविशेषगुणेन जायमानस्तु नाशो न व्यङ्ग्यः, नवोपमर्दपदवाच्यः,
नापि चमत्कारी । तस्मात्—
नारिकेलजलक्षीर-सिताकदलमिश्रणे ।
विलक्षणो यथास्वादो भावानां संहृतौ तथा ॥
अत्रेदं बोध्यम्—य एते भावशान्त्युदय-सन्धिशबलताध्वनय उदाहृताः,
स्वोत्तरेति । न्यायसिद्धान्ते चित्तवृत्तिस्वरूपा हर्षादयो भावा ज्ञानेच्छादि-
विशेषगुणेष्वेवान्तर्भवन्ति । तथा च विशेषगुणस्वभाव एव पूर्वपूर्वगुणनाशोत्तरमेवोत्त-
रोत्तरगुणोदयः । एवमेव पूर्वभावनाशो हि उत्तरवर्तिभावेनावश्यक एवेति पूर्वोक्त-काव्य-
प्रकाशटीकाकृन्मतमेव सम्यगिति न मन्तव्यम्, तथाविधस्य नाशस्य स्वतःसिद्धत्वेन
व्यङ्ग्यत्वाभावात् । उपमर्दस्तु विद्यमानस्यैव भावस्य सम्भवति, न तु नष्टस्य, यथा दिने
विद्यमानस्यैव चन्द्रप्रकाशस्य सूर्यप्रकाशेनाभिभवो भवति । तथा च भावानां नाशो
नैवोपमर्दपदवाच्यः । यदि नाशस्यैव उपमर्दसंज्ञा क्रियते तथापि नासौ चमत्कारी । अतो
नैवोपमर्दोऽयं भावशबलतेति । तस्मादिति । बुद्धिगतविद्यमानानामेव भावानां शबल-
तेष्टा । भावानां सम्मिलनेन शबलत्वचमत्कारास्वादो हि विलक्षण एव पृथगवस्थितेभ्यो
भावेभ्यः । कथम् ? यथा लोके नारिकेलजलक्षीरसिता-कदलानां मिश्रणे स्वस्वास्वाद-
रहितो विलक्षणास्वादो भवति, तथैवात्रेति भावः ।
अत्रेदमिति । अत्र भावशान्त्यादिप्रकरणे ज्ञातव्यं यद् भावशान्त्यादयोऽपि
काव्यप्रकाश के टीकाकारों के पक्ष से युक्ति दी जाती है कि हर्षादि भाव
चित्तवृत्ति ( चित्त में रहने वाले ) होते हैं, जो ज्ञान, इच्छा आदि आत्मवृत्ति
( आत्मा में रहने वाले ) विशेष गुण के अन्तर्गत ही आते हैं । विशेष गुणों का स्वभाव
ही है कि एक गुण के नाश से ही अन्य गुण का उदय हो सकता हैं, एक साथ अनेक
गुण वहाँ रह ही नहीं सकते । ऐसी स्थिति में अगत्या उत्तर भाव से पूर्व भाव के
उपमर्द को ही शबलता कहना होगा ।
इसके उत्तर में कहते हैं कि पूर्व गुणों का उत्तर गुणों से होने वाला नाश तो
स्वतः सिद्ध ही है, व्यंग्य नहीं, अतः उसे शबलता भाव कहा नहीं जा सकता और उसे
उपमर्द ( दबाना ) भी नहीं कह सकते, क्योंकि विद्यमान वस्तु को ही दबाया जा
सकता है, नष्ट को नहीं । यदि इसी को आप उपमर्द कहें तो भी चमत्कारी न होने के
कारण यह भावशबलता नहीं हो सकता है । इसलिए—
नारियल का जल, चीनी, केला आदि के मिश्रण से जैसे एक विलक्षण आस्वाद
होता है, वैसे ही भावों के मिश्रण से भी होता है । बाह्यरूप से नष्ट होने पर भी सभी
भाव बुद्धिगत विद्यमान ही रहते हैं ।
यहाँ यह ज्ञातव्य है कि ये जो भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि और भाव-
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