रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 323, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २९१
केचित्तु व्याध्यादिप्रभव-बलनाशं ग्लानिमाहुः । तेषां मते चित्तवृत्त्यात्म-
केषु भावेषु नाशरूपायो ग्लानेः कथं समावेश इति ध्येयम् । यद्यपि—
बलस्यापचयो ग्लानिराधिव्याधि-समुद्भवः ।
इतिलक्षणवाक्यादपचयशब्देन नाश एव प्रतीयते, तथापि प्रागुक्तानुप-
पत्त्या बलनाशजन्यं दुःखमेव वलापचयशब्देन विवक्षितम् ।
विरहेति । विरहजन्याधिसम्भूतबलहानिरित्युक्तिरुचितेति कविशेखरचरणाः ।
श्रम इति । ननु श्रमेण परिक्लान्तापि प्रत्युद्गमादिकरणेऽसमर्था भवतीति प्रस्तुतोदा-
हरणेन श्रमभावस्यैव प्रतीतिरस्त्विति चेन्न, बहुतरशरीरायासहूपश्रमप्रतिपादककारणोप-
न्यासाभावात् ।
बलनाशमिति । बलाभावस्य चित्तवृत्तित्वाभावात् कथं भावत्वम् । भावस्य
चित्तवृत्त्यात्मकता अन्यैः स्वीकृता इत्याशयादिदमुक्तम् । यद्यपि भरतमुनिना तादृशबला-
पचयरूपैव ग्लानिरुक्ता । तत्रापचयेन नाशस्यैव प्रतीतिर्भवति, तथापि तेनैव पूर्वं भावस्य
चित्तवृत्तित्वं कथितम्, तदनुरोधेनात्र तन्नाशजन्यं दुःखमेव ज्ञेयम् ।
ग्लानि कहते हैं, जो मुख की विवर्णता अङ्ग की शिथिलता, आँखों का घूमना आदि
का कारण है । यथा—
परम सौन्दर्यमात्र शेष है, जिसमें ऐसी नवीन चन्द्रलेखा के समान क्षीण गात्र-
वाली नायिका शैवाल के बिछौने पर पड़ी हुई, समीप में आये हुए भी प्रिय का सत्कार
मधुर दृष्टि से ही करती है । ( शैवालशयन से, मन एवं शरीर का ताप है, जिसे शान्त
कर रही हैं, ऐसा ध्वनित होता है और मधुरदृष्टि से ही स्वागत से ध्वनित होता है कि
वह उठने में भी असमर्था है ।)
यहाँ ध्वनित प्रियविरह ( से उत्पन्न बलहानि ) ग्लानि का विभाव है, 'मधुर-
वीक्षणैरेव' में एव शब्द से बोध में आते हुए अगवानी करना, पैर पर गिरना,
आलिङ्गन देना आदि के अभाव ( नहीं करना ) अनुभाव हैं ।
इस पद्य में अगवानी आदि करने में अक्षमता से श्रमभाव व्यक्त होता है, ऐसा
नहीं कह सकते, क्योंकि श्रम के कारण 'बहुतरशरीरायास' का यहाँ अभाव है ।
कोई आचार्य 'व्याधि आदि से उत्पन्न बलनाश' को ही ग्लानि कहते हैं। उनके
मत में चित्तवृत्ति स्वरूप भावों में नाशरूप ( जो चित्तवृत्ति नहीं है ) ग्लानि का
समावेश कैसे होगा ? यह विचारणीय है । ( आचार्यों ने सभी भावों को चित्त में रहने
वाला ही माना है ) । यद्यपि "आधि-व्याधि से उत्पन्न बल की क्षीणता को ग्लानि
कहते हैं"—ऐसा भरतमुनिकृत लक्षण के 'अपचय' शब्द से नाश ही समझा जाता है,
तथापि उनके द्वारा पूर्व में कहे हुए ( चित्तवृत्तिविशेषो भावः ) वचन की अनुपपत्ति के
२१ र०