रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १९५
सर्वेषु रसेषु सर्वासु रचनासु च साधारणः ।
गुणानां चैषां द्रुतिदीप्तिविकासाख्यास्तिस्रश्चित्तवृत्तयः प्रयोज्याः,
तत्तद्गुणविशिष्टरसचर्वणाजन्या इति यावत् । एवमेतेषु गुणेषु रसमात्रधर्मेषु
व्यवस्थितेषु मधुरा रचना, ओजस्वी बन्ध इत्यादयो व्यवहारा आकारोऽस्य
शूर इत्यादिव्यवहारवदौपचारिका इति मम्मटभट्टादयः ।
येऽमी माधुर्यौजःप्रसादा रसमात्रधर्मतयोक्तास्तेषां रसधर्मत्वे किं
मानम् ? प्रत्यक्षमेवेति चेत्, न । दाहादेः कार्यानलगतस्योष्णस्पर्शस्य
दिना । रचना = वाक्यम् । औपचारिका इति । यथा शौर्यादेरात्मगुणस्य समवायेन
शरीरेऽभावेऽपि स्वसमवायिसंयुक्तत्वसम्बन्धेन स्वाश्रयाभिव्यञ्जकत्वसम्बन्धेन वा
शरीरवृत्तित्वमादाय शरीरे शूरत्वव्यवहारस्तथा रसाश्रितगुणविषयोऽपि शब्दार्थ-
वृत्तित्वव्यवहार इत्याशयः । मम्मटभट्टादय इत्यत्रादिपदादभिनवगुप्तविश्वनाथा-
दिपरिग्रहः ।
तदेवं मम्मटादिसम्मतं गुणानां रसधर्मत्वं प्रतिपाद्य तन्निरासायोपक्रमते —येऽमी
हास्य और भयानक रसों में कुछ आचार्य दो गुणों—प्रसाद एवम् ओज की स्थिति
मानते तो कुछ अन्य आचार्य केवल प्रसाद गुण की । वस्तुस्थिति यह है कि प्रसाद
गुण केवल अद्भुतादि तीन रसों में ही नहीं अपि तु सभी में विद्यमान होता ।
ये तीन गुण—माधुर्य, ओजस् और प्रसाद—क्रमशः द्रुति; दीप्ति और विकास
नामक तीन प्रकार की चित्तवृत्तियों के प्रयोजक हैं । तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त
तीन गुणों में से क्रमशः एक-एक गुण से विशिष्ट रस की चर्वणा से क्रमशः
उपर्युक्त एक-एक चित्तवृत्ति उत्पन्न होती है । इस प्रकार यह सिद्ध है कि ये
गुण केवल रस के धर्म हैं, रसातिरिक्त शब्दादि के नहीं । ऐसी स्थिति में
रसाभिव्यञ्जक रचना आदि में 'यह रचना मधुर है', 'यह बन्ध बड़ा ही ओजस्वी
है' इत्यादि व्यवहार में शब्दादि में प्रतीयमान माधुर्यादि उसके वास्तविक धर्म
नहीं, अपि तु औपचारिक हैं । जैसे आत्मनिष्ठ शौर्य आदि गुणों को आत्मा के
अभिव्यञ्जक आकार—शरीर में आरोपित कर के 'इसका आकार शूर है' इत्यादि
व्यवहार होते उसी प्रकार रसाभिव्यञ्जक रचना आदि में रस के माधुर्यादि गुणों
को आरोपित करके उपर्युक्त व्यवहारों का उपपादन करना चाहिए । यही काव्य-
प्रकाशकार मम्मट भट्ट आदि का मत है ।
अब विचारणीय यह है कि मम्मट आदि आचार्यों द्वारा माधुर्यादि गुणों को
जो रस मात्र का धर्म कहा गया है उसमें प्रमाण क्या है । इसमें मानस प्रत्यक्ष
तो प्रमाण हो नहीं सकता, क्योंकि अग्नि के दाहादि कार्य से अतिरिक्त उसके उष्ण
स्पर्श का जिस प्रकार त्वगिन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष होता उस प्रकार रस के कार्यभूत
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