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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 414 में से

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पृष्ठ 226

१९४ रसगङ्गाधरः
तु मते करुणशान्ताभ्यां विप्रलम्भस्य माधुर्यातिशये यदि सहृदयाना-
मनुभवोऽस्ति साक्षी, तदा स प्रमाणम् । वीरबीभत्सरोद्रेष्वोजसो यथोत्तर-
मतिशयः, उत्तरोत्तरमतिशयितायाश्चित्तदीप्तेर्जननात् । अद्भुतहास्यभयान-
कानां गुणद्वययोगित्वं केचिदिच्छन्ति, अपरे तु प्रसादमात्रम् । प्रसादस्तु
रौद्ररसयोरस्याधिक्यं क्रमेण तु' इति काव्यप्रकाशस्थाष्टमोल्लासस्थम् ।
वीरेत्यादि । एतच्च काव्यप्रकाशसाहित्यदर्पणयोः स्थितम् । ध्वन्यालोके तु
'रौद्रादयो रसा दीप्ता लक्ष्यन्ते काव्यवर्त्तिनः' इत्युक्तम् । तत्र 'आदिशब्दः प्रकारे;
तेन वीराद्भुतयोरपि ग्रहणम्' इत्युक्तं लोचने । अत्र चाद्भुतो रसो वीरविभावाभि-
व्यक्तो ग्राह्य इत्येके, बीभत्सस्थाने चाद्भुत इति प्रमादपाठ इत्यपरे व्याख्यातारः ।
गुणद्वययोगित्वम् इति । ओजः प्रसादश्चेति गुणद्वयमत्र विवक्षितम् । अभिनवगुप्त-
पादमते तु हास्ये शृङ्गाराङ्गतया माधुर्यमपि प्रकृष्टं विकासधर्मतया चौजोपि,
भयानके त्वोजः प्रकृष्टं विभावस्य दीप्तत्वात्, माधुर्यं चाल्पम्, बीभत्सेप्येवमेवेति
स्थितौ सर्वरससहचारिणं प्रसादमादाय च सर्वे एव त्रयो गुणास्तिष्ठन्तीति बोध्यम् ।
रौद्रवीराद्भुतेषु तु नाल्पमपि माधुर्यं मतेऽस्मिन् प्रतीयते । शान्ते पुनः सत्स्वपि
त्रिषु गुणेषु विभाववैचित्र्यात् कदाचिदोजः प्रकृष्टं कदाचिच्च माधुर्यमिति विवेकः ।
प्रसादस्यानन्दवर्धनाद्युक्तं मम्मटसम्मतं सर्वसाधारणत्वमाह—प्रसादस्त्वित्या-
चित्तद्रुति उत्पन्न होती है । किन्तु कुछ आचार्य मानते कि संयोग-शृङ्गार से
अधिक माधुर्य करुण और शान्त रसों में और इन दोनों से भी अधिक माधुर्य
विप्रलम्भ-शृङ्गार में होता जब कि कुछ अन्य आचार्यों के अनुसार संयोग-शृङ्गार
की अपेक्षा करुण, विप्रलम्भ-शृङ्गार और शान्त रसों में समान रूप से उत्कृष्टतर
माधुर्य होता, न कि अन्तिम तीन रसों में भी पूर्व-पूर्व से उत्तरोत्तर रस में क्रमशः
उत्कृष्टतर माधुर्य होता । उपर्युक्त मतों में से प्रथम तथा तृतीय मत का समर्थन
तो "करुणे विप्रलम्भे तच्छान्ते चातिशयान्वितम्" ( काव्यप्रकाश, उल्लास-८ ) इस
काव्यप्रकाशोक्त वचन से हीं हो जाता है । यदि "दीप्त्यात्मविस्तृतेर्हेतुरोजो --
तस्याधिक्यं क्रमेण तु" ( काव्यप्रकाश, उल्लास-८ ) इस उत्तरसूत्र से 'क्रमेण'
पद का अपकर्ष कर पूर्वसूत्र की व्याख्या की जाय तो प्रथम मत का अन्यथा—स्वतन्त्र
रूप में अपकर्ष के बिना हीं—व्याख्या की जाय तो तृतीय मत का समर्थन हो
जाता है । द्वितीय मत में जो करुण और शान्त रसों की अपेक्षा विप्रलम्भ-
शृङ्गार में अधिक माधुर्य कहा गया है उसमें यदि सहृदयों का अनुभव समर्थक
हो तो वह मत भी प्रामाणिक हो सकता है, अन्यथा नहीं । यतः वीर रस की अपेक्षा
बीभत्स और रौद्र रसों में क्रमशः अधिकाधिक चित्तदीप्ति उत्पन्न होती अतः वीर;
बीभत्स और रौद्र रसों में क्रमशः ओजोगुण के उत्कर्ष में तारतम्य होता । अद्भुत;