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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 414 में से

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पृष्ठ 202

१७० रसगङ्गाधरः
शृङ्गारहास्ययोः, वीराद्भुतयोः, वीररौद्रयोः, शृङ्गाराद्भुतयोश्चाविरोधः ।
शृङ्गारबीभत्सयोः, शृङ्गारकरुणयोः, वीरभयानकयोः, शान्तरौद्रयोः,
शान्तशृङ्गारयोश्च विरोधः । तत्र कविना प्रकृतंरसं परिपोष्टुकामेन
तदभिव्यञ्जके काव्ये तद्विरुद्धरसाङ्गानां निबन्धनं न कार्यम् । तथा हि
सति तदभिव्यक्तौ विरुद्धः प्रकृतं बाधेत । सुन्दोपसुन्दन्यायेन वोभयो-
रुपहतिः स्यात् । यदि तु विरुद्धयोरपि रसयोरेकत्र समावेश इष्यते तदा
विरोधं परिहृत्य विधेयः । तथा हि-- विरोधस्तावद्विविधः - स्थितिविरोधो
ज्ञानविरोधश्च । आद्यस्तदधिकरणवृत्तितारूपः । द्वितीयस्तज्ज्ञानप्रतिबध्य-
स्वयमेव वक्ष्यति । बाधेतेति । दुर्बलं प्रबल इति भावः । समबलत्वे तूभयो-
र्विरोधिनोराह-सुन्दोपसुन्देत्यादि । तदधिकरणेत्यादि । अयमेवैकाधिक-
रण्यविरोधीत्युक्तः पूर्वाचार्यैः । तज्ज्ञानेत्यादि । एकस्य ज्ञानेन प्रतिवद्धमव्यव-
हितोत्तरकालिकं ज्ञानं यस्य तत्त्वं लक्षणं यस्य विरोधस्य स तथेत्यर्थः । अयमेव
अतः शास्त्रकारों ने जो भक्ति को रस न मानते हुए केवल नौ रस कहे हैं वही
उचित है ।।
उक्त नौ रसों में कुछ रसों का परस्पर-विरोध और कुछ का अविरोध है । वीर
और शृङ्गार का, शृङ्गार और हास्य का, वीर-अद्भुत का, वीर-रौद्र का तथा
शृङ्गार-अद्भुत का परस्पर कोई विरोध नहीं है । इनके विपरीत शृङ्गार-बीभत्स
का, शृङ्गार-करुण का, वीर-भयानक का, शान्त-रौद्र का तथा शान्त-शृङ्गार का
परस्पर-विरोध है । अत कवियों को चाहिए कि वे अपने काव्यों में यदि मुख्य रस
की परिपुष्ट अभिव्यक्ति करना चाहें तो मुख्यरस की अपेक्षा उसके विरोधी रस
के अभिव्यञ्जक विभावादि का उत्कृष्ट वर्णन न करें, क्योंकि वैसा करने पर
प्रबल विरोधी अङ्ग-रस की अभिव्यक्ति से अङ्गी रस की अभिव्यक्ति बाधित हो
जायेगी । साथ हीं, विरोधी अङ्ग रस की अभिव्यक्ति-सामग्री का अङ्गी रस की
अभिव्यञ्जक-सामग्री के. समान प्रकर्ष से वर्णन भी न करें, क्योंकि इस स्थिति में
भी सुन्द उपसुन्द के समान दोनों की अभिव्यक्ति परस्पर बाधित हो जायेगी । अतः
यदि किसी कवि को अपने काव्य में किन्हीं दो विरोधी रसों की अङ्ग-अङ्गी के रूप में
अभिव्यक्ति करनी हो तो दोनों के विरोध का परिहार करके हीं उनकी अभिव्यक्ति
करनी चाहिए जिससे पूर्वोक्त बाध्य बाधकभाव न हो सके । विरोध-परिहार के
लिए विरोध के स्वरूप का ज्ञान आवश्यक है । अतः विरोध का स्वरूप बतलाया
जा रहा है । रसों का विरोध दो प्रकार का से होता-(क) दोनों की स्थिति में
विरोध और (ख) दोनों के ज्ञान में विरोध । प्रथम में यह होता कि एक के
अधिकरण में दूसरा रह हीं नहीं सकता । दूसरे विरोध में एक के ज्ञान से दूसरे का