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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

प्रथमाननम् १७१
ज्ञानकत्वलक्षणः । तत्राधिकरणान्तरे विरोधिनः स्थापने प्रथमो निवर्तते ।
यथा नायकगतत्वेन वीररसे वर्णनीये प्रतिनायकस्य भयानकस्य । रसपदेनात्र
प्रकरणे तदुपाधिः स्थायिभावो गृह्यते, रसस्य सामाजिकवृत्तित्वेन नायका-
द्यवृत्तित्वात्, अद्वितीयानन्दमयत्वेन विरोधासंभवाच्च ।
उदाहरणम्—
कुण्डलीकृतकोदण्डदोर्दण्डस्य पुरस्तव ।
मृगारातेरिव मृगाः परे नैवावतस्थिरे ॥
नैरन्तर्यविरोधीति प्राचीनैरुक्तम् । नैरन्तर्येण ज्ञानासम्भवो यत उभयोः, एकप्रतीत्याऽ-
व्यवहितोत्तरकालिकाया अपरप्रतीतेः प्रतिबन्धादिति हेतोः । प्रथमः = तदधिकरणा-
वृत्तित्वरूपो विरोधः । निवर्त्तत इति । तदुक्तम्—
विरुद्धैकाश्रयो यस्तु विरोधी स्थायिनो भवेत् ।
स विभिन्नाश्रयः कार्यस्तस्य पोषेऽप्यदोषता ॥ इति ।
स्थायिभाव इति । रस्यत आस्वाद्यत इति व्युत्पत्तेरित्यर्थः । अयं चार्थः
सर्वसम्मतः । स्थायित्वमपि क्वचिद् वैवक्षिकमेवेत्यपि बोध्यम् । सहृदयकर्तृक-
स्वादविरोधं परिहरति—अद्वितीयेत्यादिना ।
आद्यविरोधपरिहारप्रकारमुदाहरति — उदाहरणमिति । कुण्डलीकृतः कर्णा-
न्ताकर्षणेन कुण्डलवद् वर्तुलीकृतः कोदण्डो धनुर्याभ्यां दोर्भ्यां बाहुभ्यां तावेव दण्डौ
यस्य तस्य तव पुरः परे शत्रवस्तथैव नावतस्थिरे यथा मृगारातेः सिंहस्य पुरो मृगा
ज्ञान प्रतिबन्धित हो जाता । अतः प्रथम विरोध का परिहार करने के लिए दोनों
विरोधी रसों का एकाश्रित वर्णन न कर उन्हें भिन्न-भिन्न आश्रय में वर्णित करना
चाहिए । जैसे —यदि नायक में वीर-रस का वर्णन अभीष्ट हो तो उसके विरोधी
भयानक रस का वर्णन प्रतिनायक में करना चाहिए, नायक में कदापि नहीं । इस
प्रसंग में यह भी ज्ञातव्य है कि रसों का जो विरोध कहा गया है उसमें रस का
अर्थ स्थायिभाव है, क्योंकि रसों में कोई विरोध सम्भव ही नहीं । इसके दो
कारण है—एक तो यह कि रस सामाजिकनिष्ठ होते, नायकादिनिष्ठ नहीं । दूसरे
यह कि सभी रस वस्तुतः परमानन्दस्वरूप हैं, फिर इनमें विरोध हो ही नहीं
सकता—वैसा होने पर तो इनकी आनन्दरूपता हीं ( रसत्व हीं ) निरस्त हो
जायेगी ।
प्रथम विरोध के परिहार का उदाहरण निम्ननिर्दिष्ट है—
"हे राजन् ? जैसे सिंह के समक्ष मृग नहीं टिकते उसी तरह धनुष को पूरी
तरह कुण्डलाकार में ताने हुए बाहुदण्डों वाले आपके समक्ष समराङ्गण में आपके-