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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 414 में से

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पृष्ठ 201

इति हि प्राचां सिद्धान्तात् । न च तर्हि कामिनीविषयाया अपि
रतेर्भावत्वमस्तु, रतित्वाविशेषात् । अस्तु वा भगवद्भक्तेरेव स्थायित्वम्,
कामिन्यादिरतीनां च भावत्वम्, विनिगमकाभावाद् इति वाच्यम् ।
भरतादिमुनिवचनानामेवात्र रसभावत्वादिव्यवस्थापकत्वेन स्वातन्त्र्य-
योगात् । अन्यथा पुत्रादिविषयाया अपि रतेः स्थायिभावत्वं कुतो न स्यात् ।
न स्याद्वा कुतः शुद्धभावत्वं जुगुप्साशोकादीनाम्, इत्यखिलदर्शनवैयाकुली
स्यात् । रसानां नवत्वगणना च मुनिवचननियन्त्रिता भज्येत इति यथा-
शास्त्रमेव ज्यायः ॥
एतेषां परस्परं कैरपि सहाविरोधः, कैरपि विरोधः । तत्र वीरशृङ्गारयोः,
अविरोध इति । ध्वन्यालोकवृत्तौ तु रौद्रशृङ्गारयोरप्यविरोध उक्तः । अयं
च विशेषेण विप्रलम्भेन सहेति बोध्यम् । अत्र चाविरोधे येन क्रमेण रसनिर्देशः स
क्रमोऽपि ग्राह्यः । अतो वीरस्य शृङ्गारेणाऽविरोधेऽपि शृङ्गारस्य वीरेण विरोधो
दर्पणाद्युक्तः संगच्छते, वीरचर्वणानन्तरं शृङ्गारचर्वणेऽविरोधोऽपि, विपर्यये विरोधात् ।
अधिकं दर्पणादिभ्यो ज्ञेयम् । शृङ्गारकरुणयोश्च विरोधो ध्वन्यालोकाद्यनुक्तोऽपि
यौक्तिकत्वादुक्तो गङ्गाधरकृता । विरोधश्चायमुभयोः प्रधानीभूतवाक्यार्थत्व एवेति
कहा गया है किन्तु शास्त्रीय तथा लौकिक मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले रत्यादि
तथा अन्य भाव 'रस' एवं 'भाव' न होकर वस्तुतः 'रसाभास' और 'भावाभास'
कहलाते ॥”
इस पर पुनः एक प्रश्न है—यदि देवादि-विषयक रति 'भाव' है तो कामिनी-
विषयक रति को भी 'भाव' क्यों न मान लिया जाय, क्योंकि दोनों रति हीं तो हैं;
अथवा कामिनी विषयक रति को हीं 'भाव' और देवादि-विषयक रति को 'स्थायि-
भाव' क्यों न मान लिया जाय, क्योंकि इसमें जो वैपरीत्य (कामिनी-विषयक रति को
'स्थायिभाव' और भगवद्विषयक रति को 'भाव' मात्र मानना ) अभीष्ट है
उसमें विनिगमक ( =एक पक्ष का समर्थक युक्ति ) तो कोई है नहीं ? उत्तर में
कहा गया है कि भरत आदि मुनियों के वचन हीं यहां विनिगमक हैं, कारण यह
है कि किसे 'स्थायिभाव' कहा जाय और किसे 'भाव' मात्र—इसमें ये हीं काव्य-
तत्त्वद्रष्टा स्वतन्त्र हैं, हम साधारण जन नहीं । तभी तो पुत्र-पौत्रादि-विषयक रति
पूर्वपक्षी की दृष्टि में भी शृङ्गार का 'स्थायिभाव' नहीं है । यदि यदृच्छा से सभी
रतियां 'स्थायिभाव' हों तो पुत्रादिविषयक रति को भी 'स्थायिभाव' कहना हीं
होगा । साथ हीं, जुगुप्सा, शोक आदि भी फिर केवल 'भाव होंगे, स्थायिभाव
नहीं । ऐसी दशा में समस्त कवि-सम्प्रदाय तो अस्तव्यस्त होगा हीं, महामुनि द्वारा
रसों की नौ संख्या का नियम टूट जाने से उनके वचन से भी विरोध होगा ।