रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० रसगङ्गाधरः
द्वितीयो यथा —
न कपोत भवन्तमण्वपि स्पृशतु श्येनसमुद्भवं भयम् ।
इदमद्य मया तृणीकृतं भवदायुःकुशलं कलेवरम् ॥
अथवैवं विन्यासः—
न कपोतकपोतकं तव स्पृशतु श्येन मनागपि स्पृहा ।
इदमद्य मया समर्पितं भवते चारुतरं कलेवरम् ।'
दानवीरमुदाहरति — द्वितीयेत्यादिना ।
न कपोतेत्यादि । शिविपरीक्षार्थं कपोतवेषधारिणं धर्मं श्येनवेषधारीन्द्र
आचक्राम । तस्माच्च श्येनाद्विभ्यत् कपोतः शिविशरणमात्मरक्षार्थमाजगाम । तं च
कपोतं प्रति शिवेरियमूक्तिः । हे कपोत ? भवन्तं श्येनसमुद्भवमण्वपि भयं न
स्पृशतु, यतोऽद्येदं भवदायुःकुशलं क्षेमकरं कलेवरं मया तृणीकृतम् तृणवदुत्सृष्टं श्येनाय
क्षुन्निवृत्त्यै । तथा चैतेन मदीयेन शरीरेण पूर्णोदरः श्येनो भवन्तं नेच्छेदिति
पदार्थः ।
अत्र पद्ये श्येनस्य सम्बोध्यत्वाभावात् कपोतमात्रमुद्दिश्य प्रवृत्तः श्येनोऽनवहित-
शिविवचनः सहसैव कपोतं निपतेदिति तस्य भयशङ्कायां सत्यां पूर्वार्द्धमसङ्गतं
स्यादिति हेतोः श्येनाभिमुखीकारकं विन्यासान्तरमाह — अथवेत्यादिना ।
न कपोतकपोतकमिति । कपोतकपोतकयोरुभयत्र 'अल्पे' कन् प्रत्ययः । एतेन
उत्साह कर्ण की आत्म-स्तुति अथवा कविकृत कर्ण-स्तुति का अनुमापक हो
सकता है । इसके विपरीत 'यस्योद्दाम..........' इत्यादि पद्यद्वय में राजा और
बलि की स्तुतियों के वक्तृतातपर्यविषय होने से उनमें स्तुतियों की वाक्यार्थता
स्पष्ट है । अतः यहां तो वाक्यार्थभूत दानोत्साह एवं स्तुतियों में गुणप्रधानभाव का
स्वीकार उचित हीं है ॥
अब दयावीर का उदाहरण प्रस्तुत है—
“अरे कपोत ? इस बाज का भय तुझे जरा भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि तेरे
जीवन की रक्षा के लिए मेरा यह शरीर तेरे बदले उस बाज को समर्पित है ।”
इस पद्य में कपोत सम्बोध्य है । किन्तु उसे उक्त आश्वासन देने पर भी उस
आश्वासन को न जानने वाला बाज कदाचित् सहसा हीं उसके ऊपर आक्रमण कर
सकता है । अतः बाज का ही सम्बोधन कर ऐसी रचना करनी चाहिए —
“अरे बाज ! इस क्षुद्र कपोत के बच्चे की तुझे जरा भी स्पृहा नहीं करनी
चाहिए । देख—उसके बदले मेरा यह शरीर, जो उससे स्वाद ओर मात्रा दोनों में
उत्कृष्ट है, तुझे समर्पित है ।”