रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १४९
ननु 'अकरुणमवकृत्य -' इत्यत्रापि प्रतीयमानस्य दानवीरस्य
कर्णस्तुत्यङ्गत्वत्कथं ध्वनित्वमिति चेत् ? सत्यम् । अत्र कवेः कर्णवचनानु-
वादमात्रतात्पर्यकत्वेन कर्णस्तुतौ तात्पर्यविरहात्, कर्णस्य च महाशयत्वे-
नात्मस्तुतौ तात्पर्यानुपपत्तेः स्तुतिरवाक्यार्थ एव । परं तु वीररसप्रत्ययान-
न्तरं तादृशोत्साहेन लिङ्गेन स्वाधिकरणे साऽनुमीयते । राजवर्णनपद्ये तु
राजस्तुतौ तात्पर्याद्वाक्यार्थतैव तस्याः ।
उदाहरणप्रत्युदाहरणयोर्व्यतिरेकाभावं शङ्कते - नन्विति । अकरुणमवकृत्ये-
त्यादिवचनस्य मूलवक्ता कर्ण एवेति तस्य स्तुतितात्पर्यकत्वे स्वकर्तृकस्तुत्यापत्तेर्महा-
पुरुषत्वहानिः कर्णस्य प्रसज्यते । प्रत्युदाहरणेषु पुनः कवेरेव मूलवक्तृत्वान्न तथेति
तेषां स्तुतितात्पर्यकत्वे न किमप्यनिष्टं प्रसज्यत इति भवत्युभयोर्व्यतिरेक इत्याशयः ।
स्वाधिकरणे = उत्साहाधिकरणे कर्णे । अनुमीयत इति । तथा च स्तुतेरवाक्यार्थत्वान्न
तस्या दानोत्साहं प्रत्यङ्गत्वमिति भावः ।
हैं—आपका कौन-सा गुण लोकोत्तर नहीं ? आपका जन्म महर्षि जमदग्नि से हुआ
है, भगवान् पिनाकपाणि शिव आपके गुरु हैं, आपके पराक्रम की शब्दों में
अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती—वह तो आपके वीर-कर्मों से ही अनुमेय है, ) आप
का त्याग भी ऐसा है जिसकी पराकाष्ठा है सात समुद्रों से परिवेष्टित सम्पूर्ण
पृथिवी का निष्छल दान ॥
शिवधनुर्भङ्ग के बाद स्वयम्बरभूमि में उपस्थित अत्यन्त कुपित परशुराम के
प्रति रामचन्द्र की यह उक्ति है । यहाँ ( तृतीय पाद में ) यद्यपि वाच्य-आक्षेप्य
विभावादि से परशुराम का दानोत्साह अभिव्यज्यमान है तथापि वह वक्तृतात्पर्य-
विषयीभूत परशुराम की स्तुति का अङ्ग है । अतः इसे रसध्वनि का उदाहरण देना
अनुचित है ।
अब प्रश्न यह है—'अकरुणमवकृत्य…………' इत्यादि पद्य में भी जब कर्ण
की स्तुति प्रतीयमान है तो फिर कर्ण के दानोत्साह को उसका अङ्ग होना चाहिए;
ऐसी स्थिति में वह रसध्वनि का उदाहरण कैसे माना जा सकता ? इसका यह
उत्तर है—यहाँ स्तुति की दो सम्भावनाएँ हैं—एक कवि द्वारा वह स्तुति की गई हो
और दूसरी यह कि कर्ण स्वयं अपनी स्तुति कर रहा हो । इनमें पहला विकल्प
मान्य नहीं हो सकता, क्योंकि कवि का तात्पर्य-विषय कर्ण के वचन का अनुवाद-
मात्र है, कर्ण की स्तुति नहीं । दूसरा विकल्प भी असंगत हैं, क्योंकि कर्ण जैसे
महापुरुष का आत्मश्लाघा में कभी तात्पर्य हो नहीं सकता । अतात्पर्यविषयीभूत
पदार्थ कदापि वाक्यार्थ का अङ्ग नही होता । अतः अवाक्यार्थ कर्ण-स्तुति को व्यङ्ग्य
मानना असम्भव है । हाँ, वीररस की प्रतीति के पश्चात् वही रसकाष्ठापन्न प्रकृष्ट