रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १५१
एषा शिवेः कपोतं श्येनं प्रति चोक्तिः । अत्र कपोत आलम्बनम् ।
तद्गतं व्याकुलीभवनमुद्दीपनम् । तस्य कृते स्वकलेवरार्पणमनुभावः । न
चात्र शरीरदानप्रत्ययाद्दानवीरध्वनित्वापत्तिरिति वाच्यम्, श्येनकपोतयो-
र्भक्ष्यभक्षकभावापन्नतवेन शिविशरीरस्यार्थिनोऽभावात्तदप्रतिपत्तेः । श्येन-
क्षुदस्य कपोतस्य यः क्षुद्रः पोतोऽर्भकः तस्मै स्पृहा कस्यापि न घटते यदि तत्स्थाने
ततोऽधिकं चारु शरीरं प्रत्यर्प्यते केनचिदिति मनाक्स्पृहाऽभावे श्येनगतत्वेनाभिमते
हेतुरुक्तः । पद्यार्थः स्पष्टः ।
कपोतं श्येनं प्रतीति । यथाक्रमं पूर्वमुत्तरं च पद्यमित्यर्थः । कपोत
आलम्बनमिति । पूर्वपद्ये कपोतः साक्षादेवाशम्बनम्, द्वितीयेऽपि कपोतकपोतकस्य
कपोतत्वात्स आलम्बनमित्युक्तम् ।
शरीरदानमित्यतः पूर्वं शिविकर्तृकं श्येनोद्देश्यकमिति योजनीयम् । आपन्नतवे-
नेति । कपोतशरीरस्य दानप्रतीतौ सत्यामपीति शेषः । अर्थिन इति । शिविशरीर-
विषयकार्थित्वसहितस्य श्येनस्याभावादित्यर्थः । अत्र विशेषणाभावप्रयुक्तो
विशिष्टाभावः । तदप्रतिपत्तेः = शिविशरीरकर्मकदानाप्रतीतेः । यमुद्दिश्य
ये दोनों पद्य राजा शिवि की क्रमशः कपोत और बाज के प्रति उक्तियाँ हैं ।
दोनों में हीं शिविनिष्ठ दया का आलम्बन कपोत है । उस कपोत की व्याकुलता
उद्दीपन विभाव है और उसके बदले शिवि द्वारा अपने शरीर का समर्पण अनुभाव है ।
धृति आदि संचारिभाव भी व्यङ्ग्य हैं हीं । अतः यहाँ दयावीर रस है । यद्यपि यहाँ
शिवि द्वारा किए जाने वाले अपने शरीर के दान से शिवि के दानोत्साह की प्रतीति
होती-सी दिखाई पड़ती तथापि इसे दानवीर का उदाहरण नहीं माना जा सकता, क्योंकि
यहाँ शरीर का समर्पण दान है हीं नहीं । दान तो तब सम्भव है जब कोई सम्प्रदान
(= लेने वाला) हो । यहाँ श्येन कपोत-शरीर का अभिलाषी है, शिवि के शरीर का
नहीं । सम्प्रदान वह होता जो देय वस्तु लेना चाहता हो या कुछ देने के लिए दाता
को प्रेरित करता हो । शिवि को श्येन शरीर-दान के लिए न तो प्रेरित करता और न
वह अब तक शिवि का शरीर लेने के लिए अपनी इच्छा हीं व्यक्त कर पाया है। अतः
शिवि के शरीर के समर्पण की दृष्टि से श्येन (बाज) सम्प्रदान हीं नहीं, फिर उसको
दान कैसे किया जा सकता । यदि शिवि को उनके शरीर के समर्पण की प्रेरणा न
देने पर और उस शरीर को खाने के लिए प्राप्त करने की इच्छा से रहित
होने पर भी श्येन को अर्घ्यादिदान में सूर्य आदि की तरह सम्प्रदान मान भी लिया
जाय तो भी यह समर्पण दान नहीं कहला सकता, क्योंकि किसी वस्तु के बदले में
कुछ देना विनिमय है, दान नहीं । दान तो वस्तुतः वह है जो विना कुछ लिए हीं