रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइत्येके। मतेऽस्मिन्साक्षात्कारो दुष्यन्तोऽयं शकुन्तलादिविषयकरतिमानि-
त्यादिः प्राग्वद्धर्म्यंशे लौकिक आरोप्यांशे त्वलौकिकः ॥
तत्काव्यात्मकशब्दजन्यं नटवृत्तिदुष्यन्तादिचेष्टालिङ्गिकानुमितिर्वा। यद्वा नटे
दुष्यन्तत्वारोपप्रयुक्त एव नटचेष्टादौ दुष्यन्तचेष्टादिभेदाग्रहस्तदेकत्वाध्यवसायो
वेति सुलभा रत्याद्यनुमितिः । अनुमितिपक्षेऽपि न तावन्मात्रेण विश्रान्तिः,
परोक्षात्मिकाया अनुमितेरलौकिकास्वादानुभवादिति साक्षात्कारपर्यन्तानुधावनम् ।
तथा चास्मिन् मते दुष्यन्तादिनिष्ठरत्यादिरेवारोपितदुष्यन्तादितादात्म्ये नटे
समारोपितः सामाजिकैः साक्षात्क्रियमाणो रस इति प्रतिफलति ॥
आरोपितदुष्यन्तत्वे नटे रत्यनुमितेर्न ज्ञानलक्षणसन्निकर्षत्वम्, लौकिकानुभवसा-
मग्रया अलौकिकानुभवसामग्रीतो बलवत्त्वात्; अत एव पर्वतो वह्निमानित्यादौ न
वह्निस्मृतेर्ज्ञानलक्षणसन्निकर्षत्वमाश्रित्य वह्निप्रत्यक्षमपि त्वनुमितिरेव; लौकिक-
प्रत्यक्षसामग्रया अनुमितिसामग्रीतो बलवत्त्वमपि समानविषयकत्वे सत्येव, नान्यथेति
धर्मिणो लौकिकप्रत्यक्षसामग्रीसत्त्वेऽपि तन्निष्ठत्वेनाभिमतरत्यादेरनुमितिसामग्रया
एव सत्त्वेन रत्यादेरनुमितिरेव, न प्रत्यक्षं लौकिकम्, तद्विषयकलोकिकप्रत्यक्षसामग्रय-
कर लेते जिसके कारण दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि का भी नटों में आरोप स्वतः
प्राप्त हो जाता। अब नटनिष्ठ आरोपित रत्यादि का सहृदयों को होने वाला
ज्ञान—'दुष्यन्तोऽयं शकुन्तलाविषयकरतिमान्' यतः साक्षात्कारात्मक है। अत एव
इसे ज्ञानलक्षणसन्निकर्ष द्वारा होने वाला अलौकिक साक्षात्कार माना जाता, क्योंकि
परगत रत्यादि आन्तरिक पदार्थों के साथ सहृदयों के इन्द्रिय का कोई लौकिक
सन्निकर्ष बन नहीं सकता। यह साक्षात्कार भी प्रमात्मक न होकर भ्रमात्मक है,
क्योंकि जिस नट में रत्यादि का साक्षात्कार होता उसमें रत्यादि हैं नहीं। यदि
उसमें अन्य प्रकार के रत्यादि हों भी तब भी शकुन्तलादिविषयक रत्यादि, जिनका
अलौकिक साक्षात्कार होता वे तो निश्चित हीं नहीं हैं। हाँ, रत्याभास हो सकता
है नट में भी, किन्तु उसके साक्षात्कार को रससाक्षात्कार नहीं कहा जा
सकता। अतः यह रत्यादिसाक्षात्कार शुक्ति में रजतत्व-साक्षात्कार के समान
भ्रमात्मक होता। आनन्द तो भ्रमज्ञान से भी होता हीं है। उक्त साक्षात्कार में भी,
पूर्वनिर्दिष्ट मत के समान, अलौकिकता केवल धर्मांश—आरोपित रत्यादि में हीं
है, धर्मी—दुष्यन्त के रूप में प्रतीयमान इदम्पदार्थ नट के अंश में तो लौकिकता हीं
है, क्योंकि उसके साथ तो सहृदय के चक्षु का संयोगात्मक लौकिक सन्निकर्ष होता
हीं है॥
भरतसूत्र के अन्य व्याख्याकार शङ्कुक आदि का रसास्वाद विषयक-मत लोल्लट