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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

५७ झांसी की रानी
शास्त्री सोच विचार में पड गए ।
कुछ देर बाद उन्होने एक अनुरोध किया, 'कुछ न कुछ झूठ बनाना
पडेगा ।'
छोटी बोली, 'सिवाय उस झूठ के और जो कहिये कह दूंगी ।'
शास्त्री ने कहा, 'तुम कुछ ब्राह्मणो, बनियो इत्यादि के नाम लेकर
कह सकती हो कि इन-लोगो ने अपने जनेऊ उतार कर तुम्हारे हवाले
किये हैं ।'
छोटी ने उत्तर दिया 'जिन जिन लोगो ने मेरा धर्म मांगा, उन्ही-
उन्ही लोगो का नाम लूंगी । औरो के नही । पर जनेऊ कहा हैं ?'
शास्त्री ने समाधान किया, 'जनेऊ मैं देता हूँ । नये हैं, उनको मैला
कर लेना । कुछ उतारे हुये भी है, उनको नयो में मिला लेना ।'
छोटी बोली, 'जल्दी करिये । अभी तो मैं निकल जाऊँगी ।'
शास्त्री ने पूछा, 'कैसे ?'
छोटी ने कहा, 'आप अपना काम देखिये । मैं निकल जाऊँगी ।'
शास्त्री ने बहुतसे नये-पुराने जनेऊ छोटी को दे दिये ।
छोटीने प्रस्ताव किया, आप पौर का दिया भीतर रख दीजिये ।
किवाड़ खुलवाने का उपाय कीजिये । तब तक मैं खपरैल पर से कूद कर
घर जाती हू । देर लगी तो ये लोग मेरी जातवालो को दरवाजे पर
इकट्ठा कर देंगे, और फिर मैं बहुत मारी-पीटी जाऊँगी । अभी तो
मुझको कोई न छुयेगा ।'
शास्त्री ने मान लिया । उन्होने किवाड खोलने की कोशिश की,
परन्तु न खुले । हल्ला करना ठीक न समझा । छोटी खपरैल से कूदकर
निकल गई । परन्तु उसके मार्ग में रुकावट डाली गई । फिर भी यह
अपने घर पहुच गई, यद्यपि घिरी हुई थी ।

लक्ष्मीबाई ५५
[ १२ ]
जनेऊ का प्रश्न समाप्त नही हुआ था कि यह बिकट रौरा खडा हो
गया । जिन थोडे से लोगो का जीवन विविध समस्याओ के काटो पर
होकर सफलतापूर्वक गुजर रहा था, वे तो नारायण शास्त्री के कृत्य की
निन्दा करते ही थे, परन्तु जिनका भीतरी जीवन-बाहरी छल से भिन्न
था—जो जीवन के काटो पर गुलाब की सेजो को अंगूरी की—या महुये
की—मोहक सिंचाई से मीठा बना बनाकर हर घडी को मौजो में बाट
बाटकर, चल रहे थे—उन्होने नारायण शास्त्री की सबसे ज्यादा बुराई
की । पाखण्डी है, पाजी है, धर्म-द्रोही, राक्षस है, इत्यादि—और उसको
कम से कम प्राणदण्ड मिलना चाहिये । और छोटी को ? उसके टुकडे
टुकडे करके स्यारो को खिला देना चाहिये, क्योकि उसी ने तो एक विद्वान
ब्राह्मण को पतित किया । इतनी बडी बात बिना विलम्ब राजा के पास
न पहुँचे, यह असम्भव था । राजा ने जब सुना, कभी हँसी आती थी
और कभी उनको क्षोभ-संताप होता था ।
छोटी और नारायण शास्त्री बुलाये गये । मालूम होता था जैसे
शास्त्री कुछ घण्टो में ही बूढे हो गये हो । छोटी चिंतित थी, परन्तु उसके
पैर जम-जमकर किले की ओर गये थे । जब वह गंगाधरराव के सामने
पहुँची, तब उसको पसीना जरूर आ गया था ।
इस मामले का निर्धार सुनने के लिये भी तात्या टोपे गया ।
नारायण शास्त्री को उस बीभत्स में डूबा देखकर राजा को बडे ज़ोर
की हँसी आने को हुई । उन्होने कठोरता के साथ अपना दुस्सह सयम
किया । पूछ-ताछ शुरू की ।
राजा—‘यह क्या हुआ शास्त्री ?’
शास्त्री—‘जो होना था हो गया सरकार ।’
राजा—‘कैसे हुआ ?’
शास्त्री—‘क्या कहूँ श्रीमन्त ,’
राजा—‘बतलाना तो पड़ेगा । न बतलाने से ज्यादा नुकसान होगा ।’

५६ झांसी की रानी
शास्त्री—'क्या बतलाऊँ महाराज ?'
राजा—'यह कैसे हुआ ?'
शास्त्री—'तप और सयम के अतिरेक से । जब शरीर ने ताडना न
सह पाई, तब जो-जो कुछ उसके सामने आया, ग्रहण कर लिया ।'
राजा—'तुमको तो लोग बहुत दिन से शृङ्गार शास्त्री कहते हैं।'
शास्त्री—'वह तो उपकरण मात्र था ।'
राजा—'सुनता हूँ कोकशास्त्र का भी अध्ययन किया है ।'
शास्त्री—'हाँ सरकार ।'
राजा—'क्यो ?'
शास्त्री—'उस शास्त्र मे अपने सम्बन्ध के प्रसंग ढूँढने के लिये, और
यह जानने के लिये कि इसमें ऐसा क्या है, जिसने महर्षि वात्स्यायन से
कामसूत्र की रचना करवाई ।'
राजा—'क्या पाया ?'
शास्त्री—'प्रकृति के साथ जीवन की टक्कर ।'
राजा—'आगे क्या पाओगे ?'
शास्त्री—'यह मेरे हाथ मे नही है सरकार ।'
राजा—'तब किसके हाथ में है ?'
शास्त्री—'सरकार के ।'
राजा ने थोडी देर सोचा । उपस्थित लोगो पर दृष्टि घुमाई । छोटी
की विनम्र आंख को देखा । वडे पलक और वडी वरौनियां । फिर अपने
ब्राह्मणत्व का ख्याल किया । बोले, इस लडकी को तुरन्त झाँसी का
राज्य छोडना पडेगा । इसके लिये देश-निकाले का दण्ड काफी है ।
तुमको……'
छोटी ने तुरन्त दृढ स्वर में टोका, 'श्रीमंत सरकार शास्त्री महाराज
का कोई कसूर नही है । मै इनके पीछे पड गई, इसलिये इनका पतन
हुआ । मेरे दण्ड को बढाकर इनके दण्ड की कमी को पूरा कर लीजिये ।
में सिर कटवाने के लिये तैयार हूँ ।'

लक्ष्मीबाई ५७
राजा को रत्नावली नाटक का एक दृश्य प्रासंगिक न होने पर भी
याद आगया, रत्नावली को भगवान ने आत्मवध से बचाया था ।
राजा बोले—'ठहर जा लडकी । शास्त्री, तुमको विधिवत् प्रायश्चित
करना पडेगा । पञ्चगव्य इत्यादि ।'
शास्त्री—'और इसको देश-निकाला होगा ?'
राजा—'हा ।'
नतमस्तक अपराधी का सर ऊंचा हुआ । जैसे कीचड में से कमल
फूट पडा हो । बोला, 'सरकार, मै प्रायश्चित नही करूंगा । मैंने कोई
पाप नही किया है । यदि मुझको प्रायश्चित की आज्ञा दी जाती है तो
पहिले लगभग आधे शहर को पञ्चगव्य लेना पडेगा ।
'क्यो ?' राजा ने जरा विस्मय के साथ पूछा ।
शास्त्री ने छोटी से आग्रह किया, 'बतला दे सरकार को ।'
छोटी ने अपने वस्त्रो मे से मिट्टी की दो डबुलिया निकाली और
उनमें से जनेऊ ।
राजा ने उत्सुक होकर प्रश्न किया, 'यह क्या है छोकरी ?'
नीची गर्दन किए, बिना आख मिलाए छोटी ने उत्तर दिया, 'बडी
जातो के जिन-जिन लोगो ने मुझको फासने की कोशिश की उन सबके
मैंने जनेऊ उतरवाये और इन डबुलियो में इकट्ठे किये ।
सुनने वाले सन्नाटे में आगए । राजा जरा असमंजस मे पडे । फिर
यकायक हँस कर शास्त्री से बोले, 'तुमने इस स्त्री को केवल अपना तन ही
दिया, या मन भी ?'
शास्त्री ने कोई उत्तर नही दिया । छोटी कुछ कहना चाहती थी,
परन्तु राजा ने उसको हाथ के सकेत से वर्जित करके शास्त्री से फिर प्रश्न
किया, 'तुम इस स्त्री को भ्रष्ट समझते हो या नही ?'
शास्त्री के मुह से यकायक निकला, 'नही सरकार ।'

५८ झाँसी की रानी
गंगाधरराव कुछ क्षण विचार निमग्न रहे। फिर गम्भीर स्वर में बोले
'इस स्त्री के साथ और किसी का भी ससर्ग नहीं है, मैं इस नतीजे पर
पहुंचा हूं। इन यज्ञोपवीतो की कहानी तुम्हारी ही गढन्त जान पड़ती है।
मैं सूत के इन डोरो को छूना नही चाहता। यदि परीक्षा करू तो पुरानो
में ब्रह्मगाठ लगी होगी और नये बिना किसी गाठ के होगे। ये सब तुम्ही
ने इसको दिये होगे।'
शास्त्री पसीने में तर हो गये।
राजा कहते गये,'तुम समझते होगे कि तुम्हारे सिवाय सब मूर्ख हैं।
तुमको अवश्य कठोर दण्ड देता, परन्तु तुमको दण्ड देने से इस अभागी
का दण्डभार वढ जायेगा।'
छोटी रोने लगी। बोली, 'मै भुगतने को तैयार हू।'
राजा ने रूखे स्वर में शास्त्री से कहा, 'तुम प्रायश्चित पञ्चगव्य के
लिये तैयार नही हो, इसलिये तुमको भी झांसी तुरन्त छोडनी पडेगी।'
शास्त्री प्रसन्न हुये। बोले, 'बडा अनुग्रह हुआ। मै इसी के साथ
झांसी छोड़ देने को तैयार हू।'
वे दोनो चले गये।
राजा ने तात्या टोपे की ओर देखा। वह बिलकुल संतुष्ट जान
पडता था।
राजा ने सोचा, 'बहुत सस्ता छूटा यह। वह लडकी छोटी जाति की
होने पर भी इस ब्राह्मण से बडी है। देश-निकाला दे दिया, काफी है।
विठूर के लोग भी इसी निर्धार से सन्तुष्ट होगे। अधिक कड़ा दण्ड देने से
झांसी के बाहर बदनामी ज्यादा होती। और फिर अङ्गरेज • अङ्गरेज...'
फिर और आगे उन्होने नही सोच पाया।
छोटी और शास्त्री दूसरे दिन झांसी छोड़ कर चले गए।

लक्ष्मीबाई ५६
[ १३ ]
मोरोपन्त, मनूबाई इत्यादि के ठहरने के लिये कोठीकुआँ के पास
एक अच्छा भवन शीघ्र ही तै हो गया । तात्या टोपे कुछ दिन झाँसी
ठहरा रहा । निवास स्थान की सूचना बिठूर शीघ्र भेज दी ।
टोपे को बिठूर की अपेक्षा झाँसी ज्यादा पसन्द आई । उसकी कल्पना
गङ्गाधरराव की नाटकशाला में बार बार उलझ जाती थी । इसके
सिवाय झाँसी का रहन-सहन, यहाँ के स्त्री-पुरुष और यहाँ का प्राकृतिक
वातावरण उसको ब्रह्मावर्त के गङ्गा तट से अधिक मनोहर लगे । जब
बिठूर लौटा अवसर पाकर उन बालको ने झाँसी के विषय में सवालो
की झडी लगा दी ।
नाना — ‘क्या झाँसी बिठूर से बडा नगर है ?’
तात्या — ‘कुछ बडा ही होगा । किला वडा है । नगर के चारो ओर
परकोटा है । बस्ती पहाडी की ऊँचाई-निचाई पर बसी है । इसलिये
बरसात में कीचड नही मचती होगी । घर घर कुये हैं । नगर के भीतर
इधर-उधर फल-फूलो के बगीचे । भीतर-बाहर तालाब, अच्छे अच्छे
मन्दिर । किला पहाडी पर है । उसमें राजमहल है । महादेव और गण-
पति के मन्दिर हैं । एक वडा महल नीचे है । महल के पीछे नाटकशाला ।’
मनू — ‘नाटकशाला ! उसमें क्या होता है ?’
तात्या — ‘अच्छे अच्छे नाटक खेले जाते हैं । गायन-वादन होता है ।’
मनू — ‘मै भी देखूँगी ।’
तात्या — ‘श्रीमन्त राजा साहब तो नित्य ही नाटकशाला में जाते
हैं । मुझको भी बुलवा लेते हैं ।’
मनू — ‘हाथी कितने हैं ?’
तात्या — ‘दस या शायद ज्यादा हो ।’
मनू — ‘घोडे ?’

६० झांसी की रानी
तात्या—'सरकार को घोडे की सवारी पसन्द नही है। तामझाम
में चलते हैं।'
नाना—'सेना कितनी है?'
तात्या—'कई हजार है।'
मनू—'ठीक नही गिनी?'
तात्या—'बिलकुल ठीक तो नही, परन्तु आठ और दस हज़ार के
बीच में होगी।'
मनू—'लोग कैसे हैं?'
तात्या—'उनके शरीर दृढ़ और स्वस्थ हैं। व्योपार अच्छा है। शहर
में चहल-पहल मची रहती है। धनधान्य खूब है। गरीबी बहुत कम
देखने में आई है। स्त्री-पुरुष सुखी दिखलाई पडते थे। सन्ध्या समय लोग
फूलो की माला डाले बगीचो और बाजारो में घूमते हैं। स्त्रिया घी के
दिये थालो में सजाकर पूजन के लिये लक्ष्मी जी के मन्दिर में जाती हैं।'
रावसाहब—'कुश्ती मलखम्ब के अखाडे हैं?'
मनू—'मै भी यही पूछना चाहती थी।'
तात्या—'हैं तो, परन्तु लोगो में गाने-बजाने का अधिक शौक
दिखलाई पड़ता है।'
रावसाहब—'क्या रास्तो मे गाते-बजाते फिरते हैं?'
तात्या—'नही तो।'
मनू—'फिर क्या नाटकशाला मे गाते बजाते हैं?'
तात्या—'नही—घरो पर, समाजो, उत्सवो पर। जान पडता है
मानो गाने का मिस ढूँढ रहे हो। स्त्रिया तो गाने का कोई न कोई बहाना
लिये रहती हैं। पीसने के समय तो सब कही स्त्रिया गाती हैं, परन्तु
झांसी में पानी भरने जावे तो गाये, पानी भरते समय गाएँ। शायद
मरती भी गाते गाते होगी।'
मनू—'झांसी में तोपे कितनी हैं?'

लक्ष्मीबाई ६१
तात्या—'बडी तोपे चार हैं—बहुत बडी हैं। छोटी तो बहुत हैं।'
मनू—'किले के भीतर तालाब है?'
तात्या—'नही। एक पोखरा है। एक बडा कुआ भी है, उसमें
बहुत पानी रहता है। न जाने पहाड पर किसने खुदवाया होगा।'
नाना—'आदमियो ने खुदवाया होगा, देव-दानव तो खोदने आये
न होगे।'
तात्या को बाजीराव ने बुलवाया। बाजीराव ने पूछा, 'बच्चो में क्या
बात कर रहे थे?'
तात्या ने उत्तर दिया, 'झाँसी का हाल सुना रहा था।'
बाजीराव—'नारायण शास्त्री वाली बात तो नही सुनाई?'
तात्या—'नही सरकार। और न नाटकशाला की गाने-नाचने
वालियो की।'
बाजीराव—'तुम मोरोपन्त के साथ कुछ दिन के लिये झाँसी
जाओगे?'
तात्या—'हाँ श्रीमन्त।'
बाजीराव—'मुहूर्त पास का निकला है। जल्दी जाना होगा।'

६२ झाँसी की रानी
[ १४ ]
यथा समय मोरोपन्त मनूबाई को लेकर झाँसी आगये । तात्या टोपे
भी साथ आया ।
विवाह का मुहूर्त शोधा जा चुका था । धूमधाम के साथ तैयारिया
होने लगी ।
नगर वाले गणेश मन्दिर में सीमन्ती, वर पूजा इत्यादि रीतियाँ
पूरी की गईं । राजा गङ्गाधरराव घोडे पर बैठकर गणेश मन्दिर गये ।
उस दिन मनूबाई ने पहले पहल गङ्गाधरराव को देखा । गङ्गाधरराव
का मुख-सौंदर्य अब भी वैसा ही था । आँखों का तेज लाल डोरो के
कारण आकर्षक कम, भयानक ज्यादा मालूम होता था । पेट कुछ बढा
हुआ, परन्तु भद्दा नही लगता था । रंग सांवलापन लिये हुये । सारी देह
एक बलवान पुरुष की ।
मनू का ध्यान शरीर के इन अंगो पर एकाध क्षण ठहरकर उनके
सवारी के ढंग पर जा अटका । वह मुस्कराई । अपनी सम्मति प्रकट
करने के लिये आस-पास लडकियो मे किसी उपयुक्त पात्र को मन ही
मन ढूंढने लगी । उस समय मनू ने सोचा, 'यदि इस घडी नाना या
राव यहा होते तो उनको सब बाते सुनाती समझाती ।'
राजा गङ्गाधरराव धीरे-धीरे, रुकते-रुकते गणेश मन्दिर को जा रहे
थे । नगर निवासी प्रणाम करते जाते थे और वे मुस्कराकर प्रणाम का
जवाब देते जाते थे ।
यकायक मनू के सामने एक मराठा-कन्या आई । आयु १५ से
कुछ ऊपर । शरीर छरेरा । रंग हलका सांवला । चेहरा जरा लम्बा ।
आंखें बडी । नाक सीधी । ललाट प्रशस्त और उजला । जैसे ही वह
मनू के पास आई उसने आंखें नीची करके आदरपूर्वक प्रणाम किया ।
मनू को ऐसा लगा मानो पहले से परिचित हो । उससे बात करने की
तुरन्त इच्छा उमड़ी ।

लक्ष्मीबाई ६३
बोली, 'तुम कौन हो ?'
उसने उत्तर दिया, 'आपकी दासी सुन्दर मेरा नाम है ।'
मनू — मेरी दासी ! कैसे ?'
सुन्दर — 'आप हमारी महारानी हैं में सेवा में रहूंगी । आपकी
दासी होकर अपना भाग्य बढाऊँगी ।'
मनू — 'मेरी दासी कोई न हो सकेगी । मेरी सहेली होकर रहोगी ।'
मनू ने उसका हाथ पकड कर अपनी ओर खीचा । वह झिझकी । मनू ने
उसका हाथ ढीला करके पूछा, 'तुम क्या सचमुच सदा मेरे पास रहोगी ?'
'सदा सरकार,' सुन्दर ने उत्तर दिया, 'हम १६ दासिया आपकी
सेवा में रहा करेगी ।'
मनू को हँसी आई, परन्तु उसने रोकली । गङ्गाधरराव की सवारी
अब भी सामने थी । मनू ने धीरे से सुन्दर से कहा, 'तुम घोडे पर चढना
जानती हो ?'
सुन्दर बोली, 'थोडा सा । दौडना खूब जानती हूँ । कोस भर दौड
जाऊँगी और हाफ न आयगी ।'
'धीरे धीरे जाने वाले घोडे को भी यह जाघ से कसे जा रहे हैं ।'
गङ्गाधरराव की ओर से सकेत करके मनू ने कहा ।
सुन्दर ने चकित होकर पूछा, 'आपने कैसे जाना सरकार ?'
मनू हँसी । दातो की सफेदी चेहरे के निखरे गोरे रग से होड लगाने
लगी ।
मनू ने कहा, 'तुम हथियार चलाना जानती हो सुन्दर ?'
'नही सीखा । सुन्दर ने जवाब दिया ।
इतने में गङ्गाधरराव की सवारी आगे बढगई । दो लडकियाँ और
मनू के निकट आई सुन्दर की ही उम्र की एक । दूसरी लगभग १४ वर्ष
की । उन्होने भी सिर झुकाकर प्रणाम किया ।
सुन्दर ने परिचय दिया, 'इसका नाम मुन्दर है और इसका काशी ।
मेरी तरह यह भी आपकी दासिया हैं ।'

६४ झांसी की रानी
मनू ने बिना किसी प्रयत्न के कहा, 'मेरी सहेलिया बनकर रहोगी ।
दासी मेरी कोई भी न होगी ।'
वे दोनो हर्ष के मारे फूल गई । काशी जरा छोटे कद की और
सुगठित शरीर वाली । मुन्दर छरहरे शरीर की और जरा लम्बी । मुन्दर
और काशी दोनो गौर वर्ण की । मुन्दर का चेहरा बिलकुल गोल, आँखे
सुन्दर से कुछ ही छोटी, परन्तु चञ्चल और तेज । काशी की कुछ बड़ी
और स्थिर ।
मनू ने तीनो से अलग अलग प्रश्न किये ।
'तुम लोग कौन हो ?'
तीनो ने उत्तर दिया, 'कुणभी ।'
'झांसी मे कब आईं ?'
'पुरखे आये थे ।'
'झांसी के आसपास घूमी हो ?'
'बहुत कम ।'
'घोडे पर चढ़ना जानती हो ?'
'थोडा थोडा ।'
'हथियार चलाना ?'
सुन्दर तो पहले ही बतला चुकी थी । मुन्दर ने तलवार चलाना
सीखा था और काशी ने बन्दूक । मनू को जानकर अच्छा लगा ।
बोली, 'मैं तुम लोगो को घोड़े पर चढ़ना सिखाऊँगी । हथियार
चलाना भी । मलखम्ब जानती हो ?'
वे तीनो सिर नीचा करके मुस्कराई । सिर हिला दिये,— 'नही
जानती ।'
'गाना-बजाना जानती हो ?' मनू ने बहुत सूक्ष्म चुटकी लेते हुये
कहा ।
सुन्दर बोली, 'वह तो हम तीनो जानती हैं । हम लोग जब सरकार
की मर्जी होगी, सुनावेगी ।'

लक्ष्मीबाई ६५
मनू ने कहा, 'जब इच्छा होगी सुनूँगी । परन्तु मुझको उसका शौक
कुछ कम है वह अच्छा है, किन्तु घुडसवारी, हथियार चलाना, मलखब,
कुश्ती, प्राचीन गाथाओ का श्रवण—ये सब—मुझको बहुत अधिक
भाते हैं ।'
'कुश्ती !' सुन्दर ने अपने बडे नेत्रो को जरा घुमा कर आश्चर्य
प्रकट किया ।
मनू के होठो पर सहज मुस्कराहट आई । बोली, 'हा कुश्ती भी
यह बहुत आवश्यक है । फिर किसी समय बतलाऊँगी । अभी अवसर
नही है ।'
इतने में कुछ और स्त्रिया पास आने को हुईं, परन्तु कुछ दूर ठिठक
गई । मनू ने उनको उस समय अपने पास बुला लेने की जरूरत नही
समझी ।
मनू कहती गई, 'पुरुषो को पुरुषार्थ सिखलाने के लिए स्त्रियो को
मलखब, कुश्ती इत्यादि सीखना ही चाहिये । खूब तेज दौडना भी ।
नाचने-गाने से भी स्त्रियो का स्वास्थ्य सुधरता है, परन्तु अपने को
मोहक बना लेना ही तो स्त्री का समग्र कर्तव्य नही है ।'
चौदह वर्ष की मनू अपने से अधिक वय वाली लडकियो से जो कह
गई, वह पास ठिठकी हुई उन स्त्रियो ने भी सुन लिया ।
सुन्दर, मुन्दर और काशी यह सब सुनकर जरा झँपी । उनकी
मुस्कराहट चली गई । परन्तु मनू अब भी मुस्करा रही थी । वह
मुस्कराहट उन लडकियो को, उन स्त्रियो को जीवन के कोष में कुछ दे सा
रही थी । उन लडकियो का सहमा हुआ जी शीघ्र ही लहलहा गया ।
अन्य लडकियो तथा स्त्रियो को भी मनू ने अपने निकट बुला लिया । ये
स्त्रिया उन तीन लडकियो की अपेक्षा अधिक सहमी हुई थी ।
मनू ने उनको अपना मन खोलने के लिये उत्साहित किया । स्त्रियो
की ओर से प्रस्ताव, गायन इत्यादि द्वारा अपने हर्ष को प्रदर्शित करने का
हुआ । उसने बिना किसी विशेष उत्साह के स्वीकार किया ।

६६ झाँसी की रानी
जो और लड़कियां उन स्त्रियो के साथ थी, उनके विषय में मनू ने
प्रश्न किये । वे सब दासियो के रूप में मनू के पास रहने के लिये नियुक्त
कर दी गई थी, क्योकि विवाह का मुहूर्त आ रहा था । उसके बाद भी
उनको मनू के पास ही रहना था ।
ये लड़कियां अब्राह्मण जातियो में से रूप, रस इत्यादि; के पैमानो से
तौल कर चुनी जाती थी और उनको आजन्म अपनी रानी के साथ
कुमारी होकर रहना पडता था । यदि वे विवाह कर लेती तो उनको महल
की नौकरी छोडनी पडती था । दहेज मे दासियो और दासो का देना
महाराष्ट्र में नही था, शायद राजपूताने के कुछ रजवाडो से वहा पहुचा
हो । शायद इसका प्रारम्भ, भिक्षुणी और देवदासी प्रथा से निसृत हुआ
हो । इन दासियो के जीवन कितने कुतूहलो और कितने कोलाहलो से भरे
रहते होगे और इनके जीवन कितने दु खान्त होते होगे उसकी कल्पना की
जा सकती है । इनको जन्म देने वाले लगभग उसी प्रकार के माता-पिता,
केवल धन-लोभ से इनको महलो के सुपुर्द कर देते थे । फिर, या तो वे
अपने सौदर्य के जमाने मे राजा के विलास की सामग्री बनी रहती थी या
जीवन के स्वाभाविक मार्ग पर जाकर महल से अलग हो जाती थी ।
मनू ने दासियो के इस चित्र की कुछ कल्पना की ।
उसने अपनी उसी सहज मुस्कराहट से कहा, 'मै तुमको दासियां
बनाकर नही रक्खूंगी । तुम मेरी सखी-सहेली बनोगी । केवल एक शर्त है।
मनू ने अपने विशाल नेत्रो की दृष्टि को उन पर बिखेरा । बोली,
'जानती हो क्या ?'
उन सबो ने 'नाहीं' के सिर हिलाये ।
मनू ने कहा, 'मेरे साथ जो रहना चाहे—उसको घोडे की सवारी
अच्छी तरह आनी चाहिये । तलवार बन्दूक, बर्छा, छुरी-कटार, तीर-
तमञ्चा इत्यादि का चलाना—अच्छी तरह चलाना सीखना पड़ेगा । दोनो
हाथो से हथियार एक से चलाना सीख जावे तो और भी अच्छा ।

लक्ष्मीबाई ६७
पुरुषो जैसे काम सीखने की बात सुनते ही स्त्रियो के चेहरो पर लाज
की हल्की लाली दौड गई । परन्तु मनके हर्ष और उत्साह ने लाज को
दबा दिया ।
काशी ने स्थिर दृष्टि और स्थिर स्वर में कहा, 'हम लोगो को जो
कुछ सिखलाया गया है उतना ही हम जानती हैं । अब जो कुछ सरकार
की आज्ञा होगी उसको हम लोग जी लगाकर और दृढता के साथ
सीखेगे । परन्तु कुश्ती और मलखब कौन सिखलावेगा ?'
मनू ने तुरन्त बतलाया, 'जितना मै जानती हूँ, मै सिखलाऊँगी ।
वाकी बिठूर के प्रसिद्ध आचार्य बाला गुरू । उनको यहाँ बुला दूँगी ।'
बाला गुरू का नाम सुनते ही लडकिया शरमा गई और उनसे बडी
उम्र की स्त्रिया हँस पडी । उस हँसी पर मनू के मन में क्षोभ उठा,
परन्तु मनू ने उसको नियन्त्रित कर लिया ।
फिर उसी मुस्कराहट के साथ बोली, 'बाला गुरू देवता हैं, और न
भी हो तो तुमको क्या डर ? स्त्रिया दृढता का कवच पहिने तो फिर
ससार में ऐसा पुरुष कोई हो ही नही सकता जो उनको लूट ले । बाला
गुरू के साथ लडकर कुश्ती सीखने की जरूरत नही पडेगी । वह बतलाया
भर करेगे । अखाडे मे उतरकर सिखलाऊँगी मैं ।'
गणेश मन्दिर पास ही था । वाद्य बज रहे थे । उनमे होकर कभी
कभी मीठी शहनाई की चहक भी सुनाई पड जाती थी । स्त्रिया मनू से
श्रृंगाररस की बात करने आई थी । अपने आदर के झरोखे मे होकर ।
मनू के मन की धारा गंगाधरराव की सवारी, बाजो-गाजो और झासी
निवासियो के हर्षोन्माद से सघर्ष पाकर दूसरी ओर चली गई थी ।
सब स्त्रिया लडकिया भी अपने अच्छे से अच्छे वस्त्र और आभरण
पहिने हुये थी । केश खूब संवारे गये थे और उनमें रंग-बिरगे और
सुगन्धित फूल गुँथे हुये थे । मनू के केशो मे भी फूल थे । मनू ने हँसकर
कहा, 'तुम लोग यदि कुश्ती सीखने के लिये इसी समय अखाडे मे उतरो
तो क्या हो ?'
सुन्दर मुस्कराकर बोली 'तो इन फूलो से सारा अखाड़ा भर जावेगा ।'

६८ झांसी की रानी

मनू ने हँसकर कहा, 'और तुम्हारे बालो मे अखाडे की मिट्टी भर
जावेगी।'
वे सब खिलखिला पडी ।
मनू बोली, 'परन्तु वह मिट्टी तुम्हारे केशो पर इन फूलो से कही
अधिक सुहावनी लगेगी।'
मुन्दर बोली, 'सरकार, बालो की शोभा मिट्टी से ?'
मनू ने मुन्दर का कन्धा हिलाकर कहा, 'ये फूल कहा से आये ? कहा
जायेगे ? ये क्या मिट्टी से बढकर हैं ?'
मनू की बात मे, अपनी दादियो से सुनी हुई ससार की अस्थिरता
की झांई सुनकर वे सब सहम गई ।
मनू समझ गई। बोली, 'नही फूलो से नाता बनाये रक्खो, परन्तु
मिट्टी से सम्बन्ध तोड कर नही।'
स्त्रियो के मन पर एक दार्शनिक झकोर ठोकर दे गई। उन्होने ऊंचे
स्वर में 'हा, हा' कही, परन्तु आँखो से ऐसा जान पडता था, मानो
उनका आनन्द कही भाग गया, उन्हे अपनी असगत अवस्था मे क्लेश
होने लगा, मानो मनू ने उनके फूलो की भर्त्सना की हो और उनके आदर
का अपमान।
मनू ने उन सब स्त्रियो से कहा, 'तुम गणेश मन्दिर मे जाकर देखो
क्या होता है। मै तब तक इन तीनो से बात करती हूँ। परन्तु एक बात
सुनती जाओ। मुझको तुम्हारे फूल बहुत अच्छे लगे इनको फेक मत देना।'
इस बात पर प्रसन्न होकर वे सब चली गई । केवल सुन्दर, मुन्दर
और काशी रह गई ।
मनू बोली, 'मै सुनती हू झासी के लोग फूलो को बहुत प्यार करते
हैं। अच्छा है। मुझको भी पसन्द है, परन्तु क्या दुबले पतले घोडे पर
सोने-चादी का जीन अच्छा लगता है ?'
सुन्दर ने उमग के साथ तुरन्त कहा, 'सरकार मै आपकी बात अब
समझी।'

लक्ष्मीबाई ६६
[ १५ ]
सीमन्ती इत्यादि की प्रथाएँ पूरी होने के उपरान्त गणेश ' मन्दिर में
गायन-वादन और नृत्य हुये और, एक दिन विवाह का भी मुहूर्त आया ।
विवाह के उत्सव पर आसपास के राजा भी आये । उनमें दतिया के
राजा विजयबहादुरसिंह खासतौर से उत्साह प्रदर्शन कर रहे थे ।
कोठी कुआँ वाले भवन में भावर पडने को थी । बाहर गायन-वादन
और नृत्य हो रहा था । सामने वाले मकान में मोतीबाई, जूहीबाई इत्यादि
अभिनेत्रिया भरपो के पीछे वस्त्राभूषणो और पुष्पो से लदी बैठी थी ।
बाहर दुर्गाबाई का नृत्य और उस काल के प्रसिद्ध धुरपदिये मुगलखा का
गायन अभ्यन्तर के साथ हो रहा था । मुगलखा के ध्रुवपद-अालाप
इत्यादि पर अनेक लोग वाह वाह कर रहे थे, परन्तु जनता दुर्गाबाई के
नृत्य के लिये बार-बार अकुला उठती थी । इसलिये मुगलखा ने अपना
तम्बूरा रख दिया और दुर्गाबाई को खडे होने का इशारा किया । राजा
विजयबहादुर महफिल में मसनद पर बैठे थे । उन्हे ऊँचे दर्जे के गायन
और नृत्य-दोनो का व्यसन था । दुर्गाबाई नृत्य करने को खडी होने को
ही थी कि भीतर से इत्रपान का सामान आया । सोने के वर्कों से लिपटे
पान और वढिया इत्र । पान लाने वाले एक सरदार थे । उन्होने कहा कि
भावर शुरू हो गई । उसी समय भीतर एक घटना हुई ।
पुरोहित ने मनूबाई की गाठ गंगाधरराव से जोडने के लिये वर की
चादर और वधू की साडी के छोर हाथ में पकडे । वृद्धावस्था
के कारण हाथ काँप रहा था । गाठ लगाने में जरा सा विलम्ब हुआ ।
गाठ अच्छी तरह नहीं बँध पारही थी । बार-बार हाथ काप जाता था ।
मनू मे सोचा, 'मै ही क्यो न इसको बाध दू ?'
परन्तु उसने विचार को नियन्त्रित कर लिया । गाठ तो पुरोहित ने
बाघली, लेकिन वह कापते हुये हाथो से गाठ का फन्दा कसने में कुछ

७० झांसी की रानी
क्षणों का विलम्ब कर रहे थे। मनू से न रहा गया। बिना मुस्कराहट के
और दृढ स्वरं में बोली, 'ऐसी बाधिये कि कभी छूटे नही।'
गंगाधरराव सिकुड गये। मोरोपन्त मन ही मन क्षुब्ध हुये। होठ
सिकोड लिया। परन्तु पुरोहित खिलखिला कर हंस पडा। उसके पास
वाले सब स्त्री पुरुष हँस पडे। कह-कहे लग गये। मनू-पुलकित हो गई।
आंखे नीची करके उसने थोडा सा मुस्करा भर दिया। इस कह कहे की
आवाज बाहर पहुची और मनू की कही हुई बात भी। वहा भी कह कहे
लगे। चारो ओर उस वाक्य की चर्चा हो उठी।
सामने वाले मकान में भी समाचार पहुचा। जूही ने, जो अब
यौवनावस्था में लहराने को थी, कहा, 'मै तो नाचना चाहती हूँ। ऐसे
अवसर पर चुपचाप बैठे-बैठे थक गई हू। इतनी खुशी के समय भी न
नाचे तो कब नाचेगे?'
मोतीबाई में बाहरी गम्भीरता आगई थी, परन्तु मन आल्हाद में
फुदक रहा था। बोली, नाचो कोई हर्ज नही। मै भी नाचना चाहती हूँ,
परन्तु घुँघरू बाँधकर नही। बाहर बड़े बड़े राजे महाराजे बैठे हैं। शोर-
गुल सुनेगे तो क्या कहेगे?'
जूही बोली, 'तबला घुघरू हमको कुछ नही चाहिये, शोर-गुल न
होगा। इस पर भी महाराज अगर कुछ कहेगे तो मै भुगत लूगी। आखिर
नाटक होगा ही। हमलोग रंगशाला मे नाचे और गावें गे ही। राजे
महाराजे नाटक-शाला मे पास से सब कुछ देखेगे ही। मै नही मानूगी।'
उन दोनो ने मनमाना नृत्य किया और नर्तकियो ने ताल दिया,
परन्तु मीठी थपकी से।
बाहर मुगलखा खडा हो गया। बोला, 'वाह जैसा राज्य है, वैसी
ही महारानी हमको मिली। दिल चाहता है कि मैं नाचू, परन्तु कभी
सीखा नही इसलिये मजबूर हू।' और उसकी आंख मे आसू आगये, बैठ
गया। .

लक्ष्मीबाई ७१

दुर्गाबाई खड़ी हो गई। बोली, 'उस्ताद यह काम मेरा है। मैं दिल
और पैर दोनो से नाचूँगी। आप अकेले दिल से, खेलिये या नाचिये।'
और उसने सिर नीचा कर लिया।
विजयबहादुर प्रसन्न हुये। स्वभाव से ही जरा सनकी थे। इस समय
सनक कुछ तीव्रतर हो गई। बोले, 'दुर्गा खूब अच्छी तरह नाचो, इनाम
मिलेगा।'
'बहुत अच्छा सरकार।' कहकर दुर्गा पूरे उत्साह के साथ गाने और
नाचने लगी। मुगलखा को इसका गाना खटक रहा था, परन्तु उसके मन
की इस चोट को दुर्गा का नृत्य सम्भाल ले गया।
थोड़ी देर में भावर की रस्म पूरी हो गई। अन्य रस्मो के पूरा होने
पर गङ्गाधरराव वर की सजधज में पावडो पर, फूलो और चावलो की
वरसा में, बाहर आये। सबने ताजीम दी। गाना बजाना थोड़ी देर के
लिये वन्द हो गया। गङ्गाधरराव एक ऊँची मसनद पर जा बैठे और
इधर उधर बारीकी के साथ देखने लगे कि मनू के उस वाक्य का असर
भद्देपन की किस हद तक हुआ है। उनकी आँख जम नही रही थी।
आँखो के लाल डोरो में, रौव की जगह को सकोच ने पकड लिया था।
वहाँ के उपस्थित लोगो के जी मे वही वाक्य बार-बार और ज़ोर के
साथ चक्कर काट रहा था। आँखें सबकी गङ्गाधरराव के दूल्हा वेश पर
जा रही थी और मन के मना करने पर भी आँखें उसी वाक्य को दोहरा
रही थी।
उस मकान की भरप के भीतर का नृत्य वन्द हो गया था। उन
अभिनेत्रियो की आँखो पर भी वही वाक्य सवार था।
जूही ने धीरे से मोतीबाई से कहा, 'असली राजा तो झासी को अब
मिला वाई जी।'
मोतीबाई ने आँख तरेर कर जूही का हाथ दबाया, 'राजा सुनेंगे तो
गर्दन काटकर फिकवा देगे। खबरदार।'
'मैने तो आपसे कहा,' जूही बोली, 'आपके हाथ जोडती हू किसी
को मेरी बात मालूम न होने पावे।

७२ झांसी की रानी
फिर ये सब झरपो के पास खडी होकर जो कुछ दूसरी ओर हो
रहा था, देखने-सुनने लगी ।
गङ्गाधर, विजयबहादुर से बोले, 'आपने मुगलखाँ का ध्रुवपद
सुना ?'
विजयबहादुर ने कहा, 'पहले भी सुना है । इनकी होरी भी सुनी
है । परन्तु दुर्गा का नाच मुझको बहुत भाया ।'
मुगलखा की आँख बदल पडी, परन्तु उसने सिर नीचा कर लिया
गङ्गाधरराव ने देख लिया । वे बोले, मुगलखा ताव खाने पर बहुत
अच्छा गाता है । अब सुनियेगा । इसके ध्रुवपद का मुकाबिला कही हैं
ही नही । नृत्य अपनी जगह अच्छा है, परन्तु मुगलखाँ का ध्रुवपद राजा
है और दुर्गाबाई का नाच उसका चाकर ।'
मुगलखाँ हर्ष के मारे फूल गया । आँखो मे आसू छलक आये ।
उनको जल्दी पोछकर हाथ जोडकर खडा हो गया । बोला, 'श्रीमन्त
सरकार का हुकुम हो तो लखनऊ वाली बात सुना दूँ ।'
मनू के उस वाक्य से गङ्गाधरराव को छुटकारा नही मिल रहा था ।
उनको विश्वास था कि उपस्थित लोग भी उसमे उसी प्रकार उलझे
होगे । प्रतिघात से उमग की एक लहर उठी और उन्होने मूगलखाँ से
कहा, 'महाराजा साहब को ज़रूर सुनाओ और फिर गाओ । बैठकर
सुनाओ ।'
मुगलखा की बात सुनने के लिये वहाँ सन्नाटा छा गया ।
मुगलखा ने कहा, 'सरकार मैं गाने के लिये लखनऊ गया । वहाँ
के गवैयो ने सलाह करली कि मैं नवाब साहब के सामने पहुच ही
न पाऊँ । इसलिये उन्होने कहा, 'पहले हमको सुनाओ । समझेगे कि
उस्ताद हो, तो नवाब साहब के सामने पेश कर देगे, वरना अपने वनखड
को वापिस जाना । मै अपने देश के कपडे पहिने था । पहले तो उसका
मज़ाक उडाया गया, बुन्देलखण्ड्डी है । क्या ऊल-जलूल साफा वाघे है !
जूते आपके-माशा-अल्लाह ! दाढी बुन्देलखण्ड के रीछो जैसी ! बातचीत
जङ्गलियो सी ! बर्ताव ठीक भेडियो का ! इत्यादि सुनते सुनते कलेजा

लक्ष्मीबाई · ७३
पक गया। फिर मैंने गाया। जो कुछ गाने के बाद हुआ उसको मैं कह
नही सकता।'
गंगाधरराव उत्साह के साथ बोले, 'मैं बतलाता हू महाराजा साहबं।
जब उस्ताद ने आठो अङ्ग सहित ध्रुवपद सुनाया तब सच्चे स्वरो की
वर्षा हो उठी, निन्दा करने वाले उसमें बह गये। उस्ताद के उन लोगो
ने पैर छुये और इनको नवाब साहब के सामने पेश किया। नवाब
साहब स्वय संगीत के बडे जानकार हैं। उस्ताद को काफी इनाम दिया।
बुन्देलखण्ड को उन्होने जी खोलकर सराहा।'
फिर मुगलखा ने तल्लीन होकर गाया। लगभग सारी जनता मुग्ध
हो गई। राजा विजयबहादुर इस अवसर पर पुरस्कार बांटने के लिये
अपने साथ काफी रुपया लाये थे। सनक तो सवार थी ही, अपने बख्शी
से बोले, 'मुगलखा के साफे मे जितने रुपये आवे दे दो, तबले वाले के
तबलो में चाहे फोडकर चाहे वैसे ही भरदो। सारङ्गी वालो की सारङ्गी
में रुपये ठूंस दो। दुर्गा जितना बोझ बांध ले उतना बाध लेने दो।'
इस आज्ञा के सुनते ही अनेक वाद्य वाले खडे हो गये। इनमें से एक
शहनाई वाला भी था उसकी शहनाई में बहुत थोडे रुपये जा सकते थे।
इसलिये गुस्से में आकर उसने शहनाई तोड डाली। बोला, 'सरकार
ऐसा बाजा किस काम का जो रुपये का मेल न खा सके।'
राजा विजयबहादुर ने उसकी शहनाई को सोने से भरने का आदेश
किया।
उस युग की प्रथा के अनुसार उस दिन सबको कुछ न कुछ दिया।
गया। रात को नाटक हुआ। बहुत अच्छा। विजयबहादुर ने नाटकशाला
से सम्बन्ध रखने वाले सब लोगो को काफी इनाम दिया।
विवाह की समाप्ति पर दरबार हुआ। नजर-न्योछावरे हुई। पुरस्कार
बँटे। बडे बडे सरदारो की नज़र-न्योछावरो के उपरांत छोटे जागीरदारो
की बारी आई। एक मऊ का जागीरदार अपने को आनन्दराय कहते हुये