झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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मोरोपन्त, मनूबाई इत्यादि के ठहरने के लिये कोठीकुआँ के पास
एक अच्छा भवन शीघ्र ही तै हो गया । तात्या टोपे कुछ दिन झाँसी
ठहरा रहा । निवास स्थान की सूचना बिठूर शीघ्र भेज दी ।
टोपे को बिठूर की अपेक्षा झाँसी ज्यादा पसन्द आई । उसकी कल्पना
गङ्गाधरराव की नाटकशाला में बार बार उलझ जाती थी । इसके
सिवाय झाँसी का रहन-सहन, यहाँ के स्त्री-पुरुष और यहाँ का प्राकृतिक
वातावरण उसको ब्रह्मावर्त के गङ्गा तट से अधिक मनोहर लगे । जब
बिठूर लौटा अवसर पाकर उन बालको ने झाँसी के विषय में सवालो
की झडी लगा दी ।
नाना — ‘क्या झाँसी बिठूर से बडा नगर है ?’
तात्या — ‘कुछ बडा ही होगा । किला वडा है । नगर के चारो ओर
परकोटा है । बस्ती पहाडी की ऊँचाई-निचाई पर बसी है । इसलिये
बरसात में कीचड नही मचती होगी । घर घर कुये हैं । नगर के भीतर
इधर-उधर फल-फूलो के बगीचे । भीतर-बाहर तालाब, अच्छे अच्छे
मन्दिर । किला पहाडी पर है । उसमें राजमहल है । महादेव और गण-
पति के मन्दिर हैं । एक वडा महल नीचे है । महल के पीछे नाटकशाला ।’
मनू — ‘नाटकशाला ! उसमें क्या होता है ?’
तात्या — ‘अच्छे अच्छे नाटक खेले जाते हैं । गायन-वादन होता है ।’
मनू — ‘मै भी देखूँगी ।’
तात्या — ‘श्रीमन्त राजा साहब तो नित्य ही नाटकशाला में जाते
हैं । मुझको भी बुलवा लेते हैं ।’
मनू — ‘हाथी कितने हैं ?’
तात्या — ‘दस या शायद ज्यादा हो ।’
मनू — ‘घोडे ?’