झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ झाँसी की रानी
जो और लड़कियां उन स्त्रियो के साथ थी, उनके विषय में मनू ने
प्रश्न किये । वे सब दासियो के रूप में मनू के पास रहने के लिये नियुक्त
कर दी गई थी, क्योकि विवाह का मुहूर्त आ रहा था । उसके बाद भी
उनको मनू के पास ही रहना था ।
ये लड़कियां अब्राह्मण जातियो में से रूप, रस इत्यादि; के पैमानो से
तौल कर चुनी जाती थी और उनको आजन्म अपनी रानी के साथ
कुमारी होकर रहना पडता था । यदि वे विवाह कर लेती तो उनको महल
की नौकरी छोडनी पडती था । दहेज मे दासियो और दासो का देना
महाराष्ट्र में नही था, शायद राजपूताने के कुछ रजवाडो से वहा पहुचा
हो । शायद इसका प्रारम्भ, भिक्षुणी और देवदासी प्रथा से निसृत हुआ
हो । इन दासियो के जीवन कितने कुतूहलो और कितने कोलाहलो से भरे
रहते होगे और इनके जीवन कितने दु खान्त होते होगे उसकी कल्पना की
जा सकती है । इनको जन्म देने वाले लगभग उसी प्रकार के माता-पिता,
केवल धन-लोभ से इनको महलो के सुपुर्द कर देते थे । फिर, या तो वे
अपने सौदर्य के जमाने मे राजा के विलास की सामग्री बनी रहती थी या
जीवन के स्वाभाविक मार्ग पर जाकर महल से अलग हो जाती थी ।
मनू ने दासियो के इस चित्र की कुछ कल्पना की ।
उसने अपनी उसी सहज मुस्कराहट से कहा, 'मै तुमको दासियां
बनाकर नही रक्खूंगी । तुम मेरी सखी-सहेली बनोगी । केवल एक शर्त है।
मनू ने अपने विशाल नेत्रो की दृष्टि को उन पर बिखेरा । बोली,
'जानती हो क्या ?'
उन सबो ने 'नाहीं' के सिर हिलाये ।
मनू ने कहा, 'मेरे साथ जो रहना चाहे—उसको घोडे की सवारी
अच्छी तरह आनी चाहिये । तलवार बन्दूक, बर्छा, छुरी-कटार, तीर-
तमञ्चा इत्यादि का चलाना—अच्छी तरह चलाना सीखना पड़ेगा । दोनो
हाथो से हथियार एक से चलाना सीख जावे तो और भी अच्छा ।