झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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यथा समय मोरोपन्त मनूबाई को लेकर झाँसी आगये । तात्या टोपे
भी साथ आया ।
विवाह का मुहूर्त शोधा जा चुका था । धूमधाम के साथ तैयारिया
होने लगी ।
नगर वाले गणेश मन्दिर में सीमन्ती, वर पूजा इत्यादि रीतियाँ
पूरी की गईं । राजा गङ्गाधरराव घोडे पर बैठकर गणेश मन्दिर गये ।
उस दिन मनूबाई ने पहले पहल गङ्गाधरराव को देखा । गङ्गाधरराव
का मुख-सौंदर्य अब भी वैसा ही था । आँखों का तेज लाल डोरो के
कारण आकर्षक कम, भयानक ज्यादा मालूम होता था । पेट कुछ बढा
हुआ, परन्तु भद्दा नही लगता था । रंग सांवलापन लिये हुये । सारी देह
एक बलवान पुरुष की ।
मनू का ध्यान शरीर के इन अंगो पर एकाध क्षण ठहरकर उनके
सवारी के ढंग पर जा अटका । वह मुस्कराई । अपनी सम्मति प्रकट
करने के लिये आस-पास लडकियो मे किसी उपयुक्त पात्र को मन ही
मन ढूंढने लगी । उस समय मनू ने सोचा, 'यदि इस घडी नाना या
राव यहा होते तो उनको सब बाते सुनाती समझाती ।'
राजा गङ्गाधरराव धीरे-धीरे, रुकते-रुकते गणेश मन्दिर को जा रहे
थे । नगर निवासी प्रणाम करते जाते थे और वे मुस्कराकर प्रणाम का
जवाब देते जाते थे ।
यकायक मनू के सामने एक मराठा-कन्या आई । आयु १५ से
कुछ ऊपर । शरीर छरेरा । रंग हलका सांवला । चेहरा जरा लम्बा ।
आंखें बडी । नाक सीधी । ललाट प्रशस्त और उजला । जैसे ही वह
मनू के पास आई उसने आंखें नीची करके आदरपूर्वक प्रणाम किया ।
मनू को ऐसा लगा मानो पहले से परिचित हो । उससे बात करने की
तुरन्त इच्छा उमड़ी ।