झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
३६ झाँसी की रानी
दीक्षित—'बहुत घनिष्ठ। मित्रो जैसा। कोई नही कह सकता कि
पेशवा मालिक हैं और मोरोपन्त नौकर। कन्या को पेशवा ने बिलकुल
अपनी पुत्री की तरह मान रक्खा है। मै स्वयं देख आया हू।'
राजा—'वे लोग सम्बन्ध को स्वीकार कर रहे हैं?'
दीक्षित—'कर लेंगे। मुझको विश्वास है।'
राजा—'तब सगाई मगनी इत्यादि के लिये आपको ही बिठूर जाना
पड़ेगा।'
हर्ष के मारे दीक्षित का दिमाग चक्कर खा गया। बोले, 'अवश्य
जाऊँगा, सरकार।' फिर गला भर आया। आँख मे एक आँसू।
'यह क्या दीक्षित जी?' राजा ने मिठास के साथ कहा।
दीक्षित गला सयत करके बोले, 'झांसी की जनता को यह समाचार
बहुत हर्ष देगा, श्रीमन्त।'
लक्ष्मीबाई ३७
[ ७ ]
राज्य के अन्य कर्मचारियो के साथ तात्या दीक्षित बिठूर गये।
मोरोपन्त और बाजीराव को सम्वाद सुनाया। उन्होने स्वीकार कर लिया।
गङ्गाधरराव की आयु का कोई लिहाज नही किया गया।
मनूबाई का शृंगार कराया गया। रंगीन रेशमी साड़ी, स्वर्ण के
आभूषण, मानिक मोती के हार। बाजीराव ने अपने वे सब आभरण
मनूबाई से फिर वापिस नही लिये।
मनूबाई के बडे बडे गोल नेत्र मणि मुक्ताओ को भी आभा दे रहे थे।
दुर्गा सी जान पड़ती थी।
सगाई वाग्दान की रीति होने के बाद मनूबाई नाना साहब और
रावसाहब एक ही कमरे में इकट्ठे हुये। वे दोनो लड़के भी रेशमी-वस्त्रो
और आभूषणो से लदे थे। सगाई का उत्सव बाजीराव ने धूम-धाम से
करवाया। बालको में बातचीत होने लगी।
नाना—'अब तो मनू तू झाँसी से हाथियो पर बैठकर ब्रह्मावर्त आया
करेगी।'
मनू—'एक हाथी पर या दस पर?'
नाना—'एक पर बैठेगी, बाकी पर मंत्री, सेनापति इत्यादि बैठे
आवेगे।'
मनू—'मुझको तो घोडे की सवारी पसन्द है।'
नाना—'झाँसी में बैठ पावेगी?'
मनू—'कौन रोक लेगा?'
नाना—'सुनता हू राजा बडा क्रोधी है।'
मनू—'तो क्या मुझे सूली मिलेगी?'
रावसाहब—'अरे नही। पर नवकर झुककर चलना पडेगा।'
मनू ने नवकर झुककर कमरे का एक चक्कर काटा। हँस कर बोली,
'ऐसे? ऐसे चलना पड़ेगा?'
३८ झांसी की रानी
वे दोनो लडके भी हँस दिये । मनू की कान्ति से वह घर झिलमिला
उठा । और जब वे बालक हँसे, उनके दातो की दीप्ति से वह घर दमक
उठा ।
रावसाहब—'मनू तुम्हारे चले जाने पर हम लोगो को सब तरफ सूना
सूना लगेगा ।'
मनू—'तो साथ चले चलना ।'
नाना—'काका एकाध महीने के लिये जाने दे सकते हैं अधिक समय
के लिये नही ।'
मनू—'अधिक समय तो यही रहना चाहिये ! बाला गुरू से तुमको
अभी बहुत सीखना है। आया ही क्या है ? मलखम्भ, कुश्ती इत्यादि
से शरीर को खूब कमाओ। अच्छी तरह से हथियार चलाना सीखो....'
नाना—'और फिर दिल्ली पर धावा बोल दो ।'
मनू—'दिल्ली मे क्या रक्खा है ! दादा, काका और अखाडे के सब
समझदार लोग चर्चा करते हैं कि दिल्ली के कटघरे में अब एक कठपुतली
भर रह गई है ।'
नाना—'अब तो सब तरफ अंगरेज़ो का चरचराटा है ।'
मनू हँस पडी ।
रावसाहव ने कहा, 'तो क्या अङ्गरेज़ हमको वैसे ही निगल जायेंगे ?'
मनू हँसते हँसते बोली, 'नाना साहव को कदाचित् विश्वास नही होता
कि अङ्गरेज़ भी हराये जा सकते हैं ।'
नाना जरा कुढ गया । कहने लगा, 'छबीली को सिवाय घमंड मारने
के और कुछ आता ही नही ।'
उन उज्वल विशाल नेत्रो को और भी विस्तार मिला । मनू बोली,
'फिर छबीली कहा ?'
नाना हँस पडा । 'आज तो तुमने अपने ही मुँह से छबीली कह
दिया ! ओह मात खाई !' नाना ने कहा ।
मनू भी हँसी । बोली, 'आगे कभी मत कहना ।'
लक्ष्मीबाई ३६
नाना ने गंभीर मुख मुद्रा कर के कहा, 'अब तो झांसी की रानी
कहा करूंगा।'
मनू मुसकराई।
उस मुस्कान में झांसी का कितना महान और कैसा अमर इतिहास
छिपा पड़ा था।
उसी समय वहा बाजीराव और मोरोपन्त आ गये। बाजीराव प्रसन्न
थे और मोरोपन्त आनन्द विभोर। उन बच्चो को सुखी देखकर वे लोग
उस कमरे के वातावरण में समा गये। बाजीराव के मुँह से निकल पडा,
'मनू तू ऐसी भाग्यवती हो कि भाग्यो को बाटती रहे।'
मोरोपन्त ने मनू को चिढाने के तात्पर्य से कहा, 'श्रीमन्त ने इसका
छुटपन में क्या नाम रक्खा था ? मै तो भूल ही गया।'
मनू ने गर्दन मोडकर ओठ सिकोडे। आखो में क्रोध लाने की चेष्ठा
की। 'ऊँ' निकला और मुस्करा दी।
बाजीराव बोले, 'क्या नाम था मनू ? तू ही बदलादे बेटी।'
बाजीराव के पेट पर अपना सिर रखकर मनू ने कहा, 'नही दादा।
छवीली नाम अच्छा नही लगता।'
खिलखिला कर हँस पडे।
उसी समय तात्या ने आकर कहा, सरकार ! लोग इकट्ठे हो गये
हैं। बातचीत होनी है।'
वे तीनो चले गये। बैठक में ब्रह्मावर्त निवासी महाराष्ट्र के प्रमुख
ब्राह्मण विवाह की शर्तों की चर्चा कर रहे थे।
मोरोपन्त के पास सोना चादी नही था, पर जो कुछ था वह उसे
विवाह में लगा देने को तैयार थे। बिठूर के इन प्रतिष्ठित ब्राह्मणो की
मध्यस्थता मे तै हुआ कि विवाह का व्यय झासी के राजा वहन करेंगे
और विवाह झासी में होकर होगा। यह भी तै हुआ कि मोरोपन्त झासी
में ही स्थायी तौर पर रहा करेगे और उनकी गणना झासी के सरदारो
में होगी।
४० झांसी की रानी
झासी के मिहमान मोरोपन्त को कन्या सहित अपने साथ लिवा ले
जाना चाहते थे । लेकिन यह ठीक न समझकर मोरोपन्त उन लोगो के
साथ नही गये । अपने सुभीते के लिये उन्होने कुछ समय उपरात झासी
आने का सकल्प प्रकट किया । विवाह का मुहूर्त निश्चित करके मिहमान
झासी चले गये । बाजीराव ने बाला गुरू के अखाडे वाले तात्या को
झासी में मोरोपन्त के लिये निवास-स्थान इत्यादि की उचित व्यवस्था के
लिये उन लोगो के साथ भेजा । यह ब्राह्मण था । आगे चलकर इतिहास
में यही युवा तात्या टोपे के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
लक्ष्मीबाई
४१
[ ८ ]
झाँसी में उस समय मन्त्रशास्त्री, तन्त्रशास्त्री, वैद्य, रणविद इत्यादि
अनेक प्रकार के विशेषज्ञ थे । शाक्त, शैव, वाम मार्गी, वैष्णव सभी
काफी तादाद में । अधिकांश वैष्णव और शैव । और ऐसे लोगो की तो
बहुतायत ही थी जो 'गृहे शाक्ता., वहिर शैवा , सभा मध्येच वैष्णवाः'
थे । इन सब के सघर्ष मे अनेक जातियाँ और उपजातियाँ जिनको शूद्र
समझा जाता था उन्नति की ओर अग्रसर हो रही थी । व्यक्तिगत चरित्र
का सुधार, घरेलू जीवन को अधिक शान्त और सुखी बनाना तथा
जातियो की श्रेणी मे ऊँचा स्थान पाना यह उस प्रगति की सहज आकाक्षा
थी । ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य जनेऊ पहिनते हैं—यह उनकी ऊँचाई की
निशानी है, जो न पहिनता हो वह नीचा । इसलिये उन जातियो के
कुछ लोगो ने, जिनके हाथ का छुआ पानी और पूडी मिष्ठान्न आम तौर
पर ऊँची जाति के हिन्दू ग्रहण कर सकते थे, जनेऊ पहिनने प्रारम्भ कर
दिये । उनके इस काम में कुछ बुन्देलखण्डी और महाराष्ट्र ब्राह्मणो का
समर्थन था । झाँसी नगर मे ब्राह्मण काफी सख्या में थे । अकेले महाराष्ट्र
ब्राह्मणो के ही तीन सौ घर थे । इन सब का बहुत बडा भाग इस
प्रगति के विरुद्ध था ।
आन्दोलन उठा । शूद्र जनेऊ के अधिकारी नही हैं, अधिकांश
पण्डित इस मत के थे । आन्दोलन के पक्ष में एक विद्वान तान्त्रिक
नारायण शास्त्री नाम का था । वह शृङ्गार शास्त्र का भी पारङ्गत
समझा जाता था । उसने शिवाजी के प्रसिद्ध अमात्य बालाजी आवजी
के पक्ष मे दी हुई महापण्डित विश्वेश्वर भट्ट* की व्यवस्था को जगह
जगह उद्धृत किया ।
यह वाद-विवाद कुछ दिनो अपनी साधारण गति से चलता रहा ।
*पूरा नाम—ब्रह्मदेव विश्वेश्वर भट्ट कलियुग के व्यास । महाराष्ट्र
में गङ्ग भट्ट के नाम से विख्यात ।
४२ झाँसी की रानी
गङ्गाधरराव के पास भी ख़बर पहुंची । वह तटस्थ से थे, और कट्टर-
पंथियो के नायको का उन्होने मजाक भी उडाया । पर इससे कट्टरपन्थ
की धार को जरा और तेजी मिली । घर-घर वाद-विवाद होने लगा ।
अमुक वर्ग शूद्र है, अमुक सवर्ण इस बात पर खूब ले-दे मची । घरो के
बाहर के चबूतरो पर, बैठको में, तम्बोलियो की दूकानो पर, मन्दिरो में, .
पाठशालाओ में, दावतो-जेवनारो में, बाजार-बाजार में, चर्चा का यही
प्रधान विषय । उस समय झाँसी में दो अच्छे कवि थे । एक हीरालाल
व्यास, दूसरे 'पजनेश' । हीरालाल ने अपना उपनाम 'हृदयेश' रक्खा था ।
हृदयेश वैसे उदार विचारो के थे, उस समय के लिहाज से राष्ट्रवादी ।
पजनेश शृङ्गार-रस के कवि थे । अन्य जाति की एक सुन्दरी रक्खे
हुये थे और नारायण शास्त्री के मित्र थे । दोनो रसिक । इसलिये कट्टर
पन्थियो के प्रतिकूल थे । पजनेश ने इस विषय पर कुछ छन्द भी बनाये
परन्तु समय की हवा के खिलाफ होने के कारण पजनेश के तर्क-वितर्क
वाले थोडे से छन्द बिलकुल पिछड़ गये और हृदयेश का कट्टरपन्थी
पक्षपात छन्दो की बाढ में बहने लगा ।
दुर्गा लावनी वाली एक वेश्या थी । अच्छी गायिका और विलक्षण
नर्तकी । उसने बहुमत का साथ दिया । हृदयेश के छन्द गाती और कभी
अपनी बनाई हुई लावनियो में उस पक्षपात को चमकाती । नारायण
शास्त्री दाँत पीसते और सिरतोड परिश्रम अपने पक्ष की पुष्टि के लिये
करते । पजनेश ने उस पक्ष के समर्थन में कविता करना बन्द कर दिया ।
हृदयेश को गली-कूचे, हाट-बाजार और मन्दिरो में इतना महत्व मिलते
उन्हे अच्छा नही लगा । खासतौर पर दुर्गा सरीखी प्रसिद्ध नर्तकी और
सुन्दरी द्वारा हृदयेश के बनाये हुये छन्दो का गायन । वह नारायण शास्त्री
के घर अब और अधिक आने-जाने लगे और अधिक समय तक
बैठने-उठने लगे । नारायण शास्त्री का शास्त्रोक्त समर्थन सीख-सीख कर
वाद-विवाद में पूरी मुँहजोरी के साथ उद्धृत करने लगे । एक दिन
लक्ष्मीबाई ४३
उनके एक क्षुब्ध विरोधी ने सब दलीलो का एक जवाब देते हुये तडाक से
कहा, 'नारायण शास्त्री जिसकी तुम बार बार दुहाई देते हो, ब्राह्मण ही
नही है ।'
पजनेश ने अधिकतर क्षुब्ध स्वर मे पूछा, 'क्यो नही है ?'
उत्तर मिला, 'वह एक भगिन को रखे हुये है ।'
यह अपवाद खुसफुस के रूप मे फैला । परन्तु धीरे धीरे । कुछ कट्टर
पंथियो ने इसको अपना लिया और कुछ ने असम्भव कह कर अस्वीकृत
कर दिया । पजनेश ने सोचा, 'मैं स्वयं निर्धार करूँगा ।' नारायण शास्त्री
ने भी अपनी बदनामी सुन ली ।
४४ झाँसी की रानी
[ ६ ]
एक दिन ज़रा सवेरे ही पजनेश नारायण शास्त्री के घर पहुँचे। शास्त्री
अपनी पौर में बैठे थे जैसे किसी की बाट देख रहे हो। पजनेश को कई बार
आओ आओ कहकर बिठलाया, परन्तु पजनेश ने यदि शास्त्री की आंख
की कोर को बारीकी से परखा होता तो उनको मालूम हो जाता कि उनके
आने पर शास्त्री का मन प्रसन्न नही हुआ था। पजनेश पौर के चबूतरे पर
दरवाजे की ओर पीठ करके बैठ गये। शास्त्री दरवाजे की ओर मुंह किये
बैठे थे। शास्त्री ने पान खाने के लिए पानदान बढ़ाया। पजनेश के जी में
एक क्षणिक झिझक उठी। उसको दबा लिया और पान लगाकर खा
लिया।
शास्त्री ने पूछा, 'कोई नया समाचार ?'
'अब तो आपके चरित्र पर ही लांछन लगाया जाने लगा है।' पजनेश
उत्तर देकर पछताए। उस प्रसग का प्रवेश और किसी तरह करना
चाहते थे।
शास्त्री ने आंख चढ़ाकर कहा, 'मैने भी सुन लिया है।'
पजनेश ने दम ली। शास्त्री कहते गये, 'मूर्खों के पास जब युक्ति नहीं
रहती तब वे गालियों पर आ जाते हैं। मैं क्या गाली गलौज
के दबाव में शास्त्र-चर्चा को छोड़ दूँगा ? बदमाशों को मुंहतोड़ जवाब
दूँगा । उस पक्ष के जितने शास्त्री हैं, चाहे महाराष्ट्र हो चाहे
एतद्देशीय, सब इन बनियों महाजनों और सरदारों के किसी न किसी
प्रकार आश्रित हैं। और ये आश्रयदाता हैं—पुरानी लीकों के पुजारी।
मक्षिकास्थाने मक्षिका वाले। ये लोग शास्त्र का पारायण नहीं करते-अथवा
करते हैं तो सच बात न कहकर यजमानों को संतुष्ट करने के लिये केवल
उनकी मुंह-देखी कहते हैं। तन्त्रशास्त्र वालों का मूल, ज्ञान-विज्ञान और
सत्य में है; वे अवश्य पुराणियो और कथा-वाचकों के साथ असत्य की
सोभ नहीं करते।'
पजनेश—'परन्तु अपवाद का दमन जरूरी है।'
लक्ष्मीबाई ४५
शास्त्री—'व्यर्थ है ! बकने दो । मै परवाह नही करता । अपना
काम देखो ।'
पजनेश—'मेरी समझ मे श्रीमन्त सरकार से फरियाद करनी चाहिये
वे जब कठोर दण्ड देगे तब यह बदनामी खत्म होगी ।'
शास्त्री—'मै ऐसी सडियल वात को राजा के सामने नही ले जाना
चाहता । राजा तो यो भी उन कथा वाचको की दिल्लगी उड़ाया करते हैं ।'
पजनेश—'तव मैं कहूगा ।'
शास्त्री को प्रस्ताव पसन्द नही आया । बोले, 'यह और भी
बुरा होगा । राजा कहेगे कि कुछ रहस्य अवश्य है तब तो स्वय फरियाद
न करके मित्र से करवाई ।' फिर विषयातर के लिये कहा, 'आज घर से
इतनी जल्दी कैसे निकल पडे ?'
पजनेश ने उत्तर दिया, 'कान नही दिया गया तो इसी चर्चा के लिये
आपके ••'
पजनेश का वाक्य पूरा नही हो पाया था—कि उतरती अवस्था की
एक स्त्री डलिया झाडू लिये दरवाजे पर आई । बह बाहर ही रह गई ।
उसके पीछे उससे सटी हुई एक युवती थी । वह कुछ अच्छे वस्त्र पहिने
थी, थोडे से आभूषण भी । साफ सुथरी । युवती उतरती अवस्था वाली
स्त्री को एक ओर करके मुस्कराती हुई पौर में आगई । प्रवेश करते समय
उसने पजनेश को नही देखा था । परन्तु भीतर धसते ही पजनेश की
भाई पड गई । ठिठकी । लौटने के लिये मुडी और खडी रह गई ।
दूसरी स्त्री से बोली, 'कोसा पौर में तो कोई कूड़ा नही ।'
कोंसा ने कहा, 'मैं आती हू । ठहरना ।'
पजनेश ने देखा ऊँची जाति की सुँदर स्त्रियो जैसी सुन्दर है ।
नायिकाभेद की कुछ उपमाये स्मरण हो आई, कमलगात, मृगनयन,
कपोत ग्रीवा, कमलनालकटि । नायिका भेद का साहित्य और आगे
साथ न दे सका । कवि का मन आकर्षण और ग्लानि की खींचतान में
पड़ गया ।
| ४६ | झांसी की रानी |
|---|
शास्त्री ने अपनी घबराहट को किसी तरह नियन्त्रित करके उस
युवती से कहा, 'थोडी देर मे आना तब तुम्हारा काम कर दूंगा। समझी
छोटी ?'
युवती के खरे रग पर लाली दौड गई। वह 'हाँ' कहकर गजगति से
नही, बिल्ली की तरह वहा से भाग गई।
शास्त्री और कवि दोनो किसी एक बडे बोझ से मानो दब गये।
पजनेश के मुँह से वाक्य फूट पडा, 'यह कौन ?'
शास्त्री—'छोटी।'
पजनेज—'यह तो उसका नाम है। वह है कौन ?'
शास्त्री—'स्त्री।'
पजनेश—'यह तो मैं भी देखता हू। कौन स्त्री ?'
शास्त्री—'एक काम से आई थी।'
पजनेश—खैर मुझको कुछ मतलब नही, परन्तु यदि......
शास्त्री ने बात काट कर पूछा, 'परन्तु यदि क्या ? आप क्या इसके
सम्बन्ध में मेरे ऊपर सन्देह करते हैं ?'
पजनेश ने एक क्षण सोचकर उत्तर दिया, 'बस्ती के लोग क्या इसी
स्त्री की चर्चा करते हुये आप पर लाछन लगा रहे हैं ? यदि ऐसा है तो
आपको सावधान हो जाना चाहिये। उस स्त्री की जाति वाले उसका
सर्वनाश कर डालेगे और राजा आपका।'
शास्त्री ने कहा, 'झूठा आरोप है। मे किसी से नही डरता।'
'आप जानें,' पजनेश बोले, 'मेरा कर्तव्य था सो कह दिया।'
पजनेश उठे। शास्त्री ने एक पान और खाने का अनुरोध किया,
परन्तु पजनेश बिना पान खाये चले गये। बाहर निकल कर उनकी आंख
ने इधर उधर उस युवती को ढूँढा, परन्तु वह न दिखलाई पड़ी। उन्हे
आश्चर्य था, 'इस जाति में भी पद्मिनी होना सम्भव है।'
लक्ष्मीबाई ४७
[ १० ]
पजनेश जिस पक्ष का अभी तक जोरदार समर्थन करते चले आये
थे उसको उन्होंने छोड दिया । नारायण शास्त्री लगभग खामोश होगये ।
नए उपनीतो ने बडाई स्वयं अपने हाथो मे लेली और एकाध जगह
वह लडाई जीभ से खिसक कर हाथ और डंडे पर आ बैठी । झंझट
का रूप ज़रा भयानक हो गया । मामला गंगाधरराव के पास पहुचा ।
जाति और धर्म का झगडा था, इसलिये उन्होंने दखल देने की ठानी ।
नये जनेऊ वाले लोग बुलाये गये । प्रमुख ब्राह्मण भी ।
उस दिन कुछ वाद विवाद हुआं, पर राजा किसी निष्कर्ष पर नही
पहुचे । छोटी जाति के कहे जाने वाले जनेऊ धारियो ने नारायण
शास्त्री को पेश करने की मुहलत मागी । एक दिन का समय मिला ।
उन लोगो ने नारायण शास्त्री को सहज ही राजी कर लिया । उसी दिन
बिठूर से तात्या दीक्षित और युवक तात्या झासी आये । दीक्षित ने
बिठूर का सब समाचार राजा को सुनाया । राजा ने सब शर्तें मंजूर
करली । मगनी की रस्म बिहूर में हो आई थी, परन्तु सीमन्ती इत्यादि
विवाह की अन्य रीतिया झासी में किसी मकान में होकर होगी इसका
प्रबन्ध राजा ने अपने कर्मचारियो के सुपुर्द कर दिया । इसके लिये युवक
तात्या को झासी में दो एक दिन के लिये ठहरना पडा ।
दूसरे दिन जनेऊ सम्बन्धी झगडे की पेशी होने को थी । युवक
तात्या भी इस विलक्षण मुकद्दमें को सुनना चाहता था । दरबार में
गया । उसको फौजी अफसर की पोशाक पसन्द थी । खास तौर पर
लोहे की फ्रांसीसी टोपी ।
गंगाधरराव ने उसको आदर के साथ बिठलाया । बाजीराव पेशवा
का कर्मचारी और भविष्य की ससुराल से आया हुआ मिहमान । राजा
अपने पदाभिमान के आतंक में आगये और शास्त्रियो के थोड़े से ही
विवाद के सुनने के बाद वे न्याय-निष्ठुरता पर जम गये ।
४८ झाँसी की रानी
राजा ने अपराधियो से पूछा, 'क्या ब्राह्मण बनना चाहते हो ?'
अपराधियो में एक अधिक साहस वाला था । उसने उत्तर दिया,
'नही तो सरकार ।'
'फिर यह अनुचित काम क्यो किया ?
'अनुचित तो नही है सरकार ।'
'क्योरे अनुचित नही है ?'
'सरकार ! ब्राह्मणो के अलावा और अनेक जातियाँ भी तो जनेऊ
पहिनती हैं ।'
'अवे बदमाश, उन जातियो की बराबरी करता है ?
वह चुप रहा ।
गंगाधरराव का क्रोध चढ लेने पर उतरता मुश्किल से था ।
बोले, 'जनेऊ तोडकर फेक दे और फिर कभी आगे न पहिनना ।'
उसने हाथ जोडे सिर नीचा कर लिया ।
राजा ने कडक कर कहा, 'क्या कहता है ? अपने हाथ से तोडता है
या तुडवाऊँ ?'
उसने उत्तर दिया, 'अपने हाथो तो हम लोग अपने जनेऊ नही
तोडेंगे चाहे प्राण भले ही निकल जावे । आप राजा हैं, चाहे जो करे ।'
गंगाधरराव की आंखो के लाल डोरे रक्त हो गए । चोबदार को हुक्म
दिया, 'एक पतला तार लाओ । ताबा, लोहा किसी का भी । जल्दी
लाओ ।'
वह दौडकर ले आया । आगी मगवाई गई । तार को जनेऊ
का आकार बनाकर गरम किया गया । आज्ञा दी, 'यह गरम जनेऊ
इसको पहिनाओ ।'
अपराधी ने गर्व से सिर ऊँचा किया । आकाश की ओर एक क्षण
के लिये हाथ बाधकर देखा और फिर नतमस्तक हो गया । वह गरम
जनेऊ उसके कधे को छुलाया ही गया था कि युवक तात्या ने विनय
की, महाराज धर्म की रक्षा करिये । यह ठीक नही है ।'
लक्ष्मीबाई ४६
गङ्गाधरराव ने वह गरम जनेऊ तुरन्त अलग करा दिया । युवक से
बोले, 'श्रीमन्त पेशवा भी तो यही दण्ड देते ।'
'नही सरकार', युवक ने निर्भयता के साथ सम्मति दी, 'धर्म अपने
अपने विश्वास की बात है । इसमें राज्य को तटस्थ रहना चाहिये ।'
'लोकाचार भी ?' गङ्गाधरराव ने जरा-सा मुस्कराकर प्रश्न किया ।
'हा महाराज', युवक ने विनीत और मधुर स्वर में उत्तर दिया,
'लोकाचार समय-समय पर बदलते रहते हैं।'
गङ्गाधरराव के क्रोध ने कुछ ठण्डक पाई । उनकी दृष्टि उस युवक
के टोप पर जा टिकी । कुछ क्षण ठहरी । कुतूहलवश पूछा, 'यह टोप
क्यो लगाते हो ?'
युवक ने उत्तर दिया, 'मैं सिपाही हूँ।'
राजा को इस उत्तर पर हँसी आई । बोले 'हमारे यहा तात्या दीक्षित
- एक शास्त्रज्ञ ब्राह्मण हैं, सो जानते ही हो । तुम सिपाही ब्राह्मण हो,
परन्तु नाम से बुलाने मे कभी-कभी गडबड हो सकती है । इसलिये तुमको
तात्या टोपी वाले या सीधा टोपे कहे तो कैसा ?'
हँसकर युवक ने जवाब दिया, 'श्रीमन्त सरकार, मुझको इसी छोटे
से नाम से लोग पुकारते हैं ।
'मुझे भी पसन्द है।' राजा ने कहा । फिर जनेऊ वाले अपराधियो
को बनावटी रूखे स्वर में डाटते हुये बोले, 'इस युवक ने तुमको बचा
लिया—भाग जाओ ।'
वे लोग चले गये । राजा ने तात्या टोपे को नाटकशाला के लिये
आमन्त्रित करते हुये कहा, 'टोपे आज रात को हमारी नाटकशाला में
रत्नावली नाटक खेला जायगा । आना । बहुत अच्छा अभिनय, गायन-
वादन और नृत्य है । पहले कभी देखा ?'
'नही सरकार', टोपे ने उत्तर दिया ।
'पढा है?' दूसरा प्रश्न किया गया ।
'नही सरकार', टोपे ने फिर उत्तर दिया ।
५० झाँसी की रानी
'समय से जरा पहले आ जाना', राजा ने प्रस्ताव किया, 'मै तुमको
कथानक वही बतलाऊँगा ।'
सन्ध्या के कुछ घडी पीछे तात्या टोपे नाटकशाला पहुच गया । राजा
ने रत्नावली का कथानक उत्साह पूर्वक सुनाया और रङ्गमञ्च पर आने
वाले अभिनेताओ के नाम और गुण बतलाये । कहा, 'रानी वासवदत्ता
का अभिनय मोतीबाई करेगी । बडी कलावती है, और सागरिका अर्थात्
रत्नावली का अभिनय जूही करेगी । नृत्य बहुत अच्छा करती है । गाती
भी है । नाटकशाला में हाल ही में आई है ।'
नाटक समय पर ही शुरू हो गया ।
राजा के निकट बैठे हुये नवागन्तुक तात्या टोपे को सभी पात्र बहुधा
देखते थे । सुन्दर, बलिष्ट और किसी उमङ्ग में तना हुआ । और सिर
पर विलक्षण टोपी !
रानी वासवदत्ता का अभिनय मोतीबाई ने बहुत अच्छा किया ।
सागरिका (रत्नावली) का अभिनय जूही ने खूब निभाया । नाची भी
बहुत अच्छा । टोपे को वह सब बहुत भला लगा । परन्तु उसके मुँह से
'वाह' या 'आह' कुछ भी नही निकला ।
नाटक की समाप्ति पर गङ्गाधरराव रगशाला के श्रंगार-कक्ष में नही
गये । टोपे से पूछा, 'कैसा रहा ?'
टोपे ने जवाब दिया, 'सरकार ने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही सब
हुआ है ।'
'नृत्य कैसा था जूही का ?' राजा ने सवाल किया ।
टोपे ने सावधानी के साथ जवाब दिया, 'मैने इससे पहिले नृत्य देखे
ही नही हैं । मुझे तो बडा विलक्षण जान पडा ।'
राजा प्रसन्न हुये । उन्होने प्रस्ताव किया, 'थोडे दिन ठहर न जाओ
झाँसी में ? कुछ और अच्छे-अच्छे अभिनय देखने को मिलेगे ।'
टोपे ने कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार किया ।
लक्ष्मीबाई ५१
[ ११ ]
जनेऊ विरोधी पक्ष वाले किले से परम प्रसन्न लौटे। अपने पक्ष की
विजय का समाचार बहुत गम्भीरता के साथ सुनाना शुरू करते थे और
फिर पर पक्ष की मिट्टी पलीत होने की बात खिलखिलाकर हँसते हुये
समाप्त करते थे। शहर भर मे घूम मच गई, 'तामे और लोहे के जनेऊ
आगी मे लाल कर-करके राजा ने पहिनाये। नही तो इन्होने आज जनेऊ
पहिने थे, कल वेदो की ऋचाये आल्हा की तरह गली-गली बकते फिरते।'
कोई कहते थे, 'अजी बडी कुशल समझो, बिठूर वाले मिहमान दरवार
में न होते तो राजा सिर काटकर फेक देने का हुकुम दे चुके थे।'
नारायण शास्त्री यह सब वाङ्मय चुपचाप सुनते हुये घर आये।
उदास थे। किवाड लटका कर पौर के चबूतरे की चटाई पर लेट गये।
देर तक लेटे रहे। सन्ध्या हो गई। अन्धेरा छा गया। वह उठे। दियाबत्ती
की। कुछ खा-पीकर फिर पौर में आ बैठे। किसी ने धीरे से साकल
खटकाई। नारायण शास्त्री ने किवाड खोले। छोटी थी।
भीतर आ गई। शास्त्री ने किवाड बन्द करके साँकल चढा ली।
छोटी चबूतरे पर बैठ गई। शास्त्री की उदासी जा चुकी थी। छोटी के
नेत्रो में कटाक्ष सरल था, परन्तु सरल चितवन मे ही मद बहुत।
छोटी ने अपने एक घुटने पर ठोढी टेक कर नजर उठाई। बरौनियां
भोहो के ऊपर जाने को हुईं। बोली, मैं तो बडी हैरान हूँ। लोग बहुत
तग करते हैं। छेडते हैं। आपका नाम ले-लेकर आवाजे कसते हैं।'
शास्त्री ने भोह सिकोड कर कहा, 'उंह बकने दो छोटी। ज़रा भी
परवाह मत करो।'
'मुझको आप ही की फिकर रहती है,' छोटी बोली, 'अपने लिये
कोई खटका नही। मेरी जात वाले लोग मुझको जात बाहर करना चाहते
हैं। सुग-सुग चल रही है।'
'फिर क्या करोगी?'
'क्या करूंगी—आप ही बतलाइये।'
५२ झांसी की रानी
'देखा जायगा ।'
'कब ?'
'जब बात सामने आवेगी तब ।'
'और ये लोग जो मुझसे छेड़-छाड़ करते हैं, उनका क्या करूँ ?'
'उनसे आँख बरकाओ । कान मूँदकर अपना रास्ता लिया करो ।'
'ऐसी छेड़-छाड़ को तो मे अनसुनी कर सकती हूँ, करती ही रहती
हूँ, परन्तु वे प्रेम की बाते करते हैं ।'
'अच्छा !'
'हाँ ! कोई अप्सरा कहता है । कोई कविता न्योछावर करने की बात
कहता है । कोई सौगन्ध खाता है कि तेरे लिये सब कुछ छोडने को
तैयार हूँ ।'
'तुम क्या जवाब देती हो ?'
'किसी को कुछ, किसी को कुछ । कुछ से मैने पूछा, जनेऊ भी उतार
देने को तैयार हो ?'
'उन लोगो ने इस सवाल के पल्टे में क्या कहा ?'
'उन्होने कहा उतार देगे ।'
छोटी मुसकराई । शास्त्री को गुस्सा आया । थोड़ी देर सोचते रहे ।
कभी सिर खुजलाते और कभी छोटी को देखते थे । बोले, 'छोटी, यदि
बात ऊपर ही आ जावे तो मे मारे जाने तक के लिये तैयार हू । तुम
पक्की हो ?'
उसने दृढ़ता के साथ उत्तर दिया, 'क्या आपने कभी कोई कचाहट
पाई ?'
शास्त्री ने नीची गर्दन करके कहा, 'वैसे ही पूछा था । एक काम
करना होगा ।'
'क्या ?' निश्चिन्तता के साथ छोटी ने प्रश्न किया ।
शास्त्री ने प्रश्न के रूप में उत्तर दिया, 'क्या इन लोगो के जनेऊ
उतरवा सकोगी ?'
लक्ष्मीबाई ५३
छोटी सहज वृत्ति से बोली, 'जनेऊ उतरवाने के बदले में कुछ देना
न पड़ेगा ? क्या बड़े बड़े लोग यों ही जनेऊ उतार कर दे देगे ?'
'कौन कौग लोग हैं ? जाति और नाम तो बतलाओ ।' शास्त्री ने
कहा ।
छोटी ने ब्योरेवार बतलाया । लम्बी सूची थी । बतलाने में समय
लगा । शास्त्री को फिर क्रोध आया । थोड़ी देर जलते-भुनते रहे ।
उसी समय ऐसा जान पड़ा जैसे किसीने बाहर से साँकल चढ़ा दी
हो । छोटी चौंकी । उसने शास्त्री को इशारा किया । शास्त्री धीरे से
किवाडो के पास गए । आहट ली । बाहर कुछ खुस-फुसाहट और पैरो का
शब्द सुनाई पड़ा । छोटी को सकेत किया, वह आगन में चली गई । शास्त्री
ने भीतर की साँकल खोलकर किवाड खोलना चाहा । न खुला बाहर
से साकल चढी हुई थी । उन्होने भीतर की साकल फिर चढाली । आँगन
में छोटी के पास गये ।
कहा, 'ये लोग किसी पाजीपन पर तुले हुए हैं ।'
छोटी जरा आतुरता के साथ बोली, 'मैने अभी-अभी पूछा था
कि ऐसा समय आने पर क्या करूँ । समय आ गया । अब बतलाइये ।'
शास्त्री ऊपर से दृढ और भीतर से घबराये हुये थे । चुप रहे ।
छोटी शान्ति के साथ बोली, 'आप चिन्ता छोडे । किसी तरह
अपने को बचावे । मुझको चाहे मार कर घर के कुयें में डालदे । कहदे
कि छोटी यहा कभी आई ही नही ।'
शास्त्री ने दृढतापूर्वक कहा, 'क्या कहती है छोटी ? मेरे भीतर अभी
कुछ बाकी है, जो मुझको मरने के समय भी धीरज दे सकता है । अब
सब उघर गया । राजा के सामने जाना पडेगा । मै चाहता हूँ कि तुम्हारा
बाल बाका न हो । कह देना कि शास्त्री ने जबरदस्ती की । मै वैसे भी
मारा जाऊँगा । तुम इस तरह बच जाओगी ।'
'कभी नही', छोटी गर्व के साथ बोली, 'अगर,हमारी जात मे कोई
गुण है तो एक-हम लोग बेईमानी कभी नही कर सकते ।'
५७ झांसी की रानी
शास्त्री सोच विचार में पड गए ।
कुछ देर बाद उन्होने एक अनुरोध किया, 'कुछ न कुछ झूठ बनाना
पडेगा ।'
छोटी बोली, 'सिवाय उस झूठ के और जो कहिये कह दूंगी ।'
शास्त्री ने कहा, 'तुम कुछ ब्राह्मणो, बनियो इत्यादि के नाम लेकर
कह सकती हो कि इन-लोगो ने अपने जनेऊ उतार कर तुम्हारे हवाले
किये हैं ।'
छोटी ने उत्तर दिया 'जिन जिन लोगो ने मेरा धर्म मांगा, उन्ही-
उन्ही लोगो का नाम लूंगी । औरो के नही । पर जनेऊ कहा हैं ?'
शास्त्री ने समाधान किया, 'जनेऊ मैं देता हूँ । नये हैं, उनको मैला
कर लेना । कुछ उतारे हुये भी है, उनको नयो में मिला लेना ।'
छोटी बोली, 'जल्दी करिये । अभी तो मैं निकल जाऊँगी ।'
शास्त्री ने पूछा, 'कैसे ?'
छोटी ने कहा, 'आप अपना काम देखिये । मैं निकल जाऊँगी ।'
शास्त्री ने बहुतसे नये-पुराने जनेऊ छोटी को दे दिये ।
छोटीने प्रस्ताव किया, आप पौर का दिया भीतर रख दीजिये ।
किवाड़ खुलवाने का उपाय कीजिये । तब तक मैं खपरैल पर से कूद कर
घर जाती हू । देर लगी तो ये लोग मेरी जातवालो को दरवाजे पर
इकट्ठा कर देंगे, और फिर मैं बहुत मारी-पीटी जाऊँगी । अभी तो
मुझको कोई न छुयेगा ।'
शास्त्री ने मान लिया । उन्होने किवाड खोलने की कोशिश की,
परन्तु न खुले । हल्ला करना ठीक न समझा । छोटी खपरैल से कूदकर
निकल गई । परन्तु उसके मार्ग में रुकावट डाली गई । फिर भी यह
अपने घर पहुच गई, यद्यपि घिरी हुई थी ।
लक्ष्मीबाई ५५
[ १२ ]
जनेऊ का प्रश्न समाप्त नही हुआ था कि यह बिकट रौरा खडा हो
गया । जिन थोडे से लोगो का जीवन विविध समस्याओ के काटो पर
होकर सफलतापूर्वक गुजर रहा था, वे तो नारायण शास्त्री के कृत्य की
निन्दा करते ही थे, परन्तु जिनका भीतरी जीवन-बाहरी छल से भिन्न
था—जो जीवन के काटो पर गुलाब की सेजो को अंगूरी की—या महुये
की—मोहक सिंचाई से मीठा बना बनाकर हर घडी को मौजो में बाट
बाटकर, चल रहे थे—उन्होने नारायण शास्त्री की सबसे ज्यादा बुराई
की । पाखण्डी है, पाजी है, धर्म-द्रोही, राक्षस है, इत्यादि—और उसको
कम से कम प्राणदण्ड मिलना चाहिये । और छोटी को ? उसके टुकडे
टुकडे करके स्यारो को खिला देना चाहिये, क्योकि उसी ने तो एक विद्वान
ब्राह्मण को पतित किया । इतनी बडी बात बिना विलम्ब राजा के पास
न पहुँचे, यह असम्भव था । राजा ने जब सुना, कभी हँसी आती थी
और कभी उनको क्षोभ-संताप होता था ।
छोटी और नारायण शास्त्री बुलाये गये । मालूम होता था जैसे
शास्त्री कुछ घण्टो में ही बूढे हो गये हो । छोटी चिंतित थी, परन्तु उसके
पैर जम-जमकर किले की ओर गये थे । जब वह गंगाधरराव के सामने
पहुँची, तब उसको पसीना जरूर आ गया था ।
इस मामले का निर्धार सुनने के लिये भी तात्या टोपे गया ।
नारायण शास्त्री को उस बीभत्स में डूबा देखकर राजा को बडे ज़ोर
की हँसी आने को हुई । उन्होने कठोरता के साथ अपना दुस्सह सयम
किया । पूछ-ताछ शुरू की ।
राजा—‘यह क्या हुआ शास्त्री ?’
शास्त्री—‘जो होना था हो गया सरकार ।’
राजा—‘कैसे हुआ ?’
शास्त्री—‘क्या कहूँ श्रीमन्त ,’
राजा—‘बतलाना तो पड़ेगा । न बतलाने से ज्यादा नुकसान होगा ।’