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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 526 में से

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पृष्ठ 61

५० झाँसी की रानी
'समय से जरा पहले आ जाना', राजा ने प्रस्ताव किया, 'मै तुमको
कथानक वही बतलाऊँगा ।'
सन्ध्या के कुछ घडी पीछे तात्या टोपे नाटकशाला पहुच गया । राजा
ने रत्नावली का कथानक उत्साह पूर्वक सुनाया और रङ्गमञ्च पर आने
वाले अभिनेताओ के नाम और गुण बतलाये । कहा, 'रानी वासवदत्ता
का अभिनय मोतीबाई करेगी । बडी कलावती है, और सागरिका अर्थात्
रत्नावली का अभिनय जूही करेगी । नृत्य बहुत अच्छा करती है । गाती
भी है । नाटकशाला में हाल ही में आई है ।'
नाटक समय पर ही शुरू हो गया ।
राजा के निकट बैठे हुये नवागन्तुक तात्या टोपे को सभी पात्र बहुधा
देखते थे । सुन्दर, बलिष्ट और किसी उमङ्ग में तना हुआ । और सिर
पर विलक्षण टोपी !
रानी वासवदत्ता का अभिनय मोतीबाई ने बहुत अच्छा किया ।
सागरिका (रत्नावली) का अभिनय जूही ने खूब निभाया । नाची भी
बहुत अच्छा । टोपे को वह सब बहुत भला लगा । परन्तु उसके मुँह से
'वाह' या 'आह' कुछ भी नही निकला ।
नाटक की समाप्ति पर गङ्गाधरराव रगशाला के श्रंगार-कक्ष में नही
गये । टोपे से पूछा, 'कैसा रहा ?'
टोपे ने जवाब दिया, 'सरकार ने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही सब
हुआ है ।'
'नृत्य कैसा था जूही का ?' राजा ने सवाल किया ।
टोपे ने सावधानी के साथ जवाब दिया, 'मैने इससे पहिले नृत्य देखे
ही नही हैं । मुझे तो बडा विलक्षण जान पडा ।'
राजा प्रसन्न हुये । उन्होने प्रस्ताव किया, 'थोडे दिन ठहर न जाओ
झाँसी में ? कुछ और अच्छे-अच्छे अभिनय देखने को मिलेगे ।'
टोपे ने कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार किया ।