झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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छोटी सहज वृत्ति से बोली, 'जनेऊ उतरवाने के बदले में कुछ देना
न पड़ेगा ? क्या बड़े बड़े लोग यों ही जनेऊ उतार कर दे देगे ?'
'कौन कौग लोग हैं ? जाति और नाम तो बतलाओ ।' शास्त्री ने
कहा ।
छोटी ने ब्योरेवार बतलाया । लम्बी सूची थी । बतलाने में समय
लगा । शास्त्री को फिर क्रोध आया । थोड़ी देर जलते-भुनते रहे ।
उसी समय ऐसा जान पड़ा जैसे किसीने बाहर से साँकल चढ़ा दी
हो । छोटी चौंकी । उसने शास्त्री को इशारा किया । शास्त्री धीरे से
किवाडो के पास गए । आहट ली । बाहर कुछ खुस-फुसाहट और पैरो का
शब्द सुनाई पड़ा । छोटी को सकेत किया, वह आगन में चली गई । शास्त्री
ने भीतर की साँकल खोलकर किवाड खोलना चाहा । न खुला बाहर
से साकल चढी हुई थी । उन्होने भीतर की साकल फिर चढाली । आँगन
में छोटी के पास गये ।
कहा, 'ये लोग किसी पाजीपन पर तुले हुए हैं ।'
छोटी जरा आतुरता के साथ बोली, 'मैने अभी-अभी पूछा था
कि ऐसा समय आने पर क्या करूँ । समय आ गया । अब बतलाइये ।'
शास्त्री ऊपर से दृढ और भीतर से घबराये हुये थे । चुप रहे ।
छोटी शान्ति के साथ बोली, 'आप चिन्ता छोडे । किसी तरह
अपने को बचावे । मुझको चाहे मार कर घर के कुयें में डालदे । कहदे
कि छोटी यहा कभी आई ही नही ।'
शास्त्री ने दृढतापूर्वक कहा, 'क्या कहती है छोटी ? मेरे भीतर अभी
कुछ बाकी है, जो मुझको मरने के समय भी धीरज दे सकता है । अब
सब उघर गया । राजा के सामने जाना पडेगा । मै चाहता हूँ कि तुम्हारा
बाल बाका न हो । कह देना कि शास्त्री ने जबरदस्ती की । मै वैसे भी
मारा जाऊँगा । तुम इस तरह बच जाओगी ।'
'कभी नही', छोटी गर्व के साथ बोली, 'अगर,हमारी जात मे कोई
गुण है तो एक-हम लोग बेईमानी कभी नही कर सकते ।'