झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लछमीबाई १५३
'यही के राजा को न देखो ।- नाटक चेटक और नाचने गाने में सब
समाप्त कर दिया ।'
खुदाबख्श के कान खड़े हुये । क्षोभ आया ।
उसी आदमी से पूछा, 'यहा के राजा ने रैयत को तो कोई दुख
दिया नही ?'
'दुख न देना और बात है, सुख पहुचाना दूसरी बात ।'
'अङ्गरेजो का राज हो गया, तो याद आवेगी ।'
'अङ्गरेज कौन कच्चा खाये जाते हैं ।'
'जनाब वह ऐसी कौम है कि बिना खाये ही पचा जावेगी ।'
'ऐसा नही हो सकता । यहा का राज अङ्गरेजो के हाथ नही जावेगा ।'
'कुछ नही कहा जा सकता । यदि चला गया तो ?'
तम्बोली ने पान बनाते बनाते कहा, 'ठट्ठा है जो चला जावेगा ।
रानी हमारी बनी रहे, हम तो अपने सिर कटवा देंगे ।'
पीरअली ने हँसकर कहा, 'तुम तो पान काटते कतरते जाओ भाई ।
सिर काटना, कटवाना हम सिपाहियो का काम है ।'
तम्बोली ने ध्यान पूर्वक पीरअली को देखा ।
बोला, 'आप झाँसी के रहने वाले नही जान पडते । परदेशी हैं ?'
'क्यो ? क्या फर्क पड गया ?'
'धरती आकाश का ।'
'कैसे ?'
'अभी कुछ नही कह सकता । समय आने पर देखना ।'
'समय आने पर तेली तम्बोली भी तलवार बन्दूक चलावेगे, यह
देखना बाकी है ।'
'अभी न देखलो । ले आओ अपनी ढाल-तलवार मैं अपनी लाता
हूँ । फिर देखलो झांसी का पानी ।'
पीरअली हँसा । खुदाबख्श उसको वहा से ले गया ।
दूकान के पास झम्मीसिंह और भग्गी दाउजू सुनार खड़े थे ।
१५४ झांसी की रानी
झम्मीसिंह ने कहा, 'खूब कई साब तुमने, स्याबास । अँगरेजन की
जासूस सौ का हती ?'
तम्बोली बोला, 'हुइये । का करनै कक्का ।'
भग्गी दाऊजू ने कहा, 'झांसी लटी तकै तिहि खाये कालका माई ।'*
'वा दाऊजू वा,' तम्बोली बोला, 'कविराजई तो ठैरे ।'
झांसी मे उस समय अनेक लावनी बाज थे । उनकी कविताये पिंगल
के नियमो मे परे होती थी, लेकिन थी वे बहुत लोक प्रिय । भग्गी दाउजु
उन्ही में से एक था ।
पीरअली ने बाज़ार का सारा समाचार अलीबहादुर को दिया ।
अलीबहादुर ने दूसरे दिन एलिस को सुनाया ।
एलिस ने नवाब साहब को धन्यवाद दिया और मन में कहा, 'आल
बाजार गौसिप' ( सब बाजार की गपशप ) ।
*भग्गी दाऊजू का रायसा — परिशिष्ट में देखिये ।
लक्ष्मीबाई १५५
[ ३१ ]
जब महीने भर से ऊपर हो गया और कलकत्ते से कोई जवाब न
आया तो एलिस, मालकम इत्यादि को चिन्ता हुई । शायद गवर्नर
जनरल रानी के पक्ष में फैसला करदें और झाँसी सरकारी 'वन्दोबस्त' की
हुकूमत से वंचित रह जाय ।
एलिस के सामने सदाशिवराव नेवालकर नाम का एक व्यक्ति दावेदार
बन कर आया । खूब रहा—प्यादे से प्यादा कट जावेगा । सदाशिवराव को
एलिस ने प्रोत्साहित किया । सदाशिवराव ने एक लम्बे खर्रे की अर्जी
पेश की । गङ्गाधरराव के वंश का कुर्सी नामा अर्जी में दर्ज किया—ठीक
पांचवी पीढ़ी पर । और रानी बिचारी तो किसी भी पीढ़ी में न थी ! गत
राजा की धर्मपत्नी ! तो भी क्या हुआ ? स्त्री तो थी । स्त्री राज्य करने
लायक ! लेकिन इङ्गलैंड की रानी विक्टोरिया तो पुरुष नही । मगर
हिन्दुस्थान इङ्गलेंड नही है ।
सदाशिवराव की अर्जी को रानी की अर्जी से लड़वा ही तो दिया ।
डलहौजी रानी के लिये अब क्या खाक करेगा ? और न इस मूर्ख के लिये
ही कुछ ।
मालकम ने ३१ दिसम्बर सन् १८५३ को सदाशिवराव की सिफारिश
करते हुये लिखा, 'यदि मृत राजा के पुरखो के किसी मर्द वारिस का ही
हक कबूल किया जाना है, तो यह व्यक्ति वास्तव में गद्दी का सब से
अधिक निकट का हकदार है ।'
सदाशिवराव के पास कही से कुछ धन भी आ गया और वह मजे
में राजसी ठाठ से रहने लगा । राज्य मिलने में कितनी कसर रह गई थी ?
पोलिटिकल अफसरों ने सिफारिश कर ही दी थी । कोडा हाथ में आ
गया । बस । कसर रही थोडी—जीन लगाम घोडी ।
रानी गंभीरता पूर्वक सारी स्थिति का अवलोकन कर रही थी । वे
झाँसी राज्य को अपने किसी उद्देश्य की पूर्ति का साधन मात्र समझती
१५६ झांसी की रानी
थी । झाँसी का राज्य उनके लिए सुरपुर न था-किन्तु, जिस सुरपुर के
पाने की उनके मन मे लालसा थी, झाँसी उसकी एक सीढी मात्र थी ।
पति के देहान्त के बाद से रानी की दिनचर्या इस प्रकार हो गई —
वह नित्य प्रातःकाल चार बजे स्नान करके आठ बजे तक महादेव
का पूजन करती और उसी समय गवैये भजन-गायन सुनाते । फिर ग्यारह
बजे तक महल के समीपवर्ती खुले आँगन में घोडे की सवारी, तीरन्दाजी,
नेजा चलाना, दौडते हुए घोडे पर चढे चढे, दाँतो से लगाम पकड कर
दोनो हाथो से तलवार भाँजना, बन्दूक से निशाना लगाना, मलखब
कुश्ती इत्यादि करती थी और अपनी सहेलियो तथा नगर से आने वाली
कुछ स्त्रियो को ये सब कामे सिखलाती थी । इन मे भाऊबख्शी की पत्नी
प्रमुख थी और बहुधा आने वालो में, झलकारी कोरिन ।
ग्यारह बजे के उपरान्त रानी फिर स्नान करती और भूखो को
खिलाकर तथा कुछ दान-धर्म करके तब भोजन करती । भोजन के उपरात
थोडा सा विश्राम । फिर तीन बजे तक ग्यारह सो राम नाम लिख कर
आटे की गोलिया मछलियो को खिलाती । उस समय वे किसी से बात-चीत
नही करती थी और न कोई उस समय उनके पास बैठ सकता या आ सकता
था । वे किसी गूढ चिन्ता, किसी गूढ विचार में निमग्न रहती थी । तीन
बजे के उपरान्त सध्या तक फिर वे ही व्यायाम और कसरते—शरीर को
फौलाद बनाने की क्रियाये ।
सध्या के उपरान्त आठ बजे तक कथावार्ता, पुराण, भगवद्गीता का
अठारहवा अध्याय और भजन सुनती । इसके बाद एक घटा आगन्तुको
को भेट के लिये दिया जाता था । तीसरी बार स्नान करती । इसके बाद
थोडे समय तक इष्टदेव का एकान्त ध्यान । फिर ब्यालू भोजन । पश्चात्
सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई के साथ थोडा सा वार्तालाप और फिर ठीक
दस बजे शयन । वे समय की बहुत पाबन्द थी । शिथिलता तो छूकर
नही निकली थी ।
लक्ष्मीबाई १५७
राज्य मिलेगा या न मिलेगा—इन दोनो के व्यवधान मे वे महीने
चले जा रहे थे । मोरोपन्त ताम्बे और अन्य कर्मचारी यथावत कार्य कर
रहे थे । एलिस वर्ग अपना पाया मजबूत बनाने की तैयारी करता चला
जा रहा था, बहुत सतर्कता, वडी सावधानी के साथ ।
जब कई महीने हो गये और डलहौली का उत्तर न आया तब
मोरोपन्त, नाना भोपटकर इत्यादि की सम्मति से एलिस और मालकम
के द्वारा एक खरीता और भेजा । उसमे पुरानी सधियो को दुहराया गया
और जिनके सामने गोद ली गई थी उनके नाम प्रकट किये गये ।
एलिस ने सिफारिश की । लिखा, 'ओर्छा राज्य के दत्तक की
स्वीकृति दी गई है । जैसा ओर्छा राज्य वैसा झासी राज्य । एक को
अनुमति देना और दूसरे को न देना अनुचित मालूम होना है ।'
यह बात नही कि एलिस रानी की अर्जी का स्वीकृत किया जाना
पसन्द करता हो । वह ओर्छा राज्य को दत्तक की स्वीकृति के मिलने पर
कुढ गया था — एक अच्छा खासा ग्रास कम्पनी सरकार के मुँह से छुटका
दिया गया ।
कई महीने उपरान्त डलहौजी अवध के दौरे से कलकत्ता लौटा ।
झाँसी की मिसिल पेश हुई । जगह जगह ऐमे उद्गार जो नाक तक
नफरत पैदा करे ।
बुन्देलखण्ड मे कम्पनी के राज्य की स्थापना हमारे पुरखो की
सहायता से हुई है ! हमारी राजभक्ति की कदर की जानी चाहिये ।
जरूर ! अब किस साधना के लिए राजभक्ति की अटक है ? सन्धिया
पवित्र होती हैं । बेशक ! तुम पेशवा के नौकर थे । पेशवा हमसे हारा
और उसने अपना स्वामित्व हमारे हवाले किया । अब तुम हमारे नौकर
हुये । मर्जी हमारी, माने हम तुम्हारी गोद-वोद को या न माने ।
डलहौजी सोचता-सोचता, जिस निष्कर्ष पर पहुचा, उसकी काउन्सिल
भी उससे सहमत हो गई ।
१५८ झाँसी की रानी
डलहौजी ने झाँसी की मिसिल पर २७ फरवरी सन् १८५४ को
हुकुम चढ़ाया:—
'झाँसी राज्य पेशवा का आश्रित राज्य था । १८०४ की सन्धि में
शिवराव भाऊ ने इस बात को कबूल किया था । हमको ऐसे आश्रित
राज्यो में गोद मानने न मानने का अधिकार है । रामचन्द्रराव ने १८३५
मे, जिसको हमने ही सन् १८३२ मे राजा की उपाधि दी थी, मरने से
एक दिन पहले किसी को गोद लिया था । वह गोद ब्रिटिश सरकार ने
नही मानी थी । हम दामोदरराव की गोद को मानने के लिये बाध्य नही
हैं । इसलिये झाँसी राज्य खालसा किया जाता है, और अङ्गरेजी राज्य
में मिलाया जाता है । पोलोटिकल एजेट की सिफारिस के अनुसार रानी
को मासिक वृत्ति दी जायगी ।'
इस हुक्म को कानूनी लिवास ७ मार्च सन् १८५४ को मिल गया ।
मालकम के पास डलहौजी की आज्ञा आ गई और उसने बिना
विलम्ब नीचे लिखा हुआ इश्तिहार एलिस के पास भेज दिया —
'दत्तक को गवर्नर जनरल ने नामन्जूर किया है । इसलिये भारत
सरकार की ७ मार्च सन् १८५४ की आज्ञा के अनुसार झाँसी का राज्य
ब्रिटिश इलाके में मिलाया जाता है । इस इश्तिहार के जरिये सब लोगो
को सूचना दी जाती है कि सम्प्रति झासी प्रदेश का शासन मेजर एलिस
के आधीन किया जाता है । इस प्रदेश की सब प्रजा अपने को ब्रिटिश
सरकार के अधीन समझे और मेजर एलिस को कर दिया करे और सुख
तथा सन्तोष के साथ जीवन निर्वाह करे । १३-३-१८५४ ह० मालकम ।'
प्रजा का सुख-सन्तोष ! उसका कल्याण !! राजनीति के पाखण्ड को
कैसे बढ़िया मुहाविरे मिले !!!
लक्ष्मीबाई १५६
[ ३२ ]
मालकम ने इस घोषणा को बहुत छिपा-लुका कर एलिस के पास भेजा
और उसको हिदायत की कि बहुत सावधानी के साथ काम किया
जावे, क्योकि उसे मालूम था कि रानी जन-प्रिय हैं, कही झासी की
जनता दगा-फसाद न कर बैठे । इसलिये एलिस ने सेना द्वारा झासी का
कठोर प्रबन्ध किया।
एलिस ने होशियारी के साथ उस घोषणा को एक जेब में रक्खा
और दूसरी में पिस्तौल । सशस्त्र अङ्गरक्षको साथ लेकर रानी के पास
किले वाले महल में पहुचा । रानी को सूचना दे दी गई थी कि छोटे
साहब के पास बडे लाट की आज्ञा आ गई है, उसी को सुनाने आ रहे हैं।
मोरोपन्त इत्यादि बहुत दिन से आशा लगाये बैठे थे । दीवान खास में
नियुक्त समय पर आ गये । रानी पर्दे के पीछे बैठी । दीवान खास में एक
ऊँची कुर्सी पर दामोदरराव ।
एलिस दृढ पद और अदृढ हृदय के साथ दीवान खास में प्रविष्ट
हुआ । मोरोपन्त इत्यादि ने बहुत विनीत भाव के साथ अभिवादन किया ।
दीवान खास मे इत्र-पान इत्यादि सजे सजाये रक्खे थे । बुर्जो पर तोपो
में सलामी दागने के लिये बारूद डाल दी गई थी । एलिस ओठ से ओठ
सटाये आया और अपने माथे की शिकनो को समेटकर अभिवादन का
उत्तर देता हुआ बैठ गया ।
मोरोपन्त ने विनीत भाव के साथ कहा, 'साहब, आपको यहा तक
आने में बहुत कष्ट हुआ होगा ।'
मुश्किल से एलिस का कण्ठ मुखरित हुआ, 'मेरा कर्तव्य है।
दुःखदायक कर्तव्य है।'
सब लोग सन्नाटे में आ गये ।
एलिस ने कहा, 'महारानी साहब आ गई हैं ?'
दीवान ने उत्तर दिया, 'जी साहब । पर्दे के पीछे विराजमान हैं।'
१६० झाँसी की रानी
एलिस ने जेब से मालकम वाली घोषणा निकाली। दरबारियो के
कलेजे धक धक करने लगे।
कलेजा थाम कर उन लोगो ने घोषणा को सुन लिया। गुलाम गौस
खा तोपची अनुकूल घोषणा की आशा से दीवान खास के एक दर के
पीछे की तरफ कान लगाये खडा था। प्रतिकूल घोषणा को सुनकर मुँह
लटकाये चुपचाप चला गया।
जब घोषणा पढ़ी जा चुकी—मोरोपन्त के मुँह से निकला, 'ओफ !'
दीवान के मुँह से, 'हाय !'
और दरबारियो के मुँह से—'अनहोनी हुई।'
दामोदरराव समझने की कोशिश कर रहा था, उसको आभास
मिल गया कि कुछ बुरा हुआ है।
यकायक ऊँचे परन्तु मधुर स्वर में रानी ने पर्दे के पीछे से कहा,
॥'मै अपनी झासी नही दूगी।'*
इन शब्दो से दीवान खास गूँज गया। वायुमण्डल ने उनको अपने
भीतर निहित कर लिया।
भारत के इतिहास मे वे शब्द पिरो दिये गये। झासी की कलगी में
वे शब्द मणि-मुक्ता बन कर चिपक गये।
अब एलिस का धड़कता हुआ हृदय कुछ स्थिर हुआ।
बोला, 'मुझको गवर्नर जनरल साहब की जो आज्ञा मालकम साहब
के द्वारा मिली उसको मैने पेश कर दिया। जो कुछ मेरे सामर्थ्य में था
मैने किया। हम सब गवर्नर जनरल साहब की आज्ञा में बधे हुये हैं।
परन्तु मै समझता हूँ कि असन्तोष का कोई कारण नही है। पाच हजार
रुपया मासिक वृत्ति महारानी साहब और उनके कुटुम्ब के लिये काफी
है। यह मानना पड़ेगा कि गवर्नर जनरल साहब ने बहुत उदारता का
बर्ताव किया है।'
- परिशिष्ट देखिये।
लक्ष्मीबाई १६१
एलिस का वाक्य समाप्त नही हुआ था कि पर्दे के पीछे से रानी ने
उसी ऊंचे मधुर स्वर में कहा, 'मुझको यह वृत्ति नही चाहिये, मै न -
लूंगी।'
एलिस ने अधिक ठहरना उचित नही समझा। दीवान से कहता
गया, आप तुरन्त मेरे पास आइये।'
दीवान ने पान खाने का आग्रह किया। वह पान खाकर चला गया।
मुन्दर रानी के पास पर्दे में बैठी थी। जब घोषणा सुनाई गई वह
मूर्छित हो गई थी। एलिस के चले जाने पर वह होश में आई।
रानी ने कहा, 'क्यो री मूर्छित होना किससे सीखा ? क्या इस छोटे
से राज्य के लिये हम लोग जीवत हैं ?'
मुन्दर रोने लगी। रानी ने पुचकारा। मोरोपन्त इत्यादि ने
समझाया।
दीवान ने रानी से पूछा, 'मैं एलिस साहब के पास जाऊँ ? वह
बुला गये हैं।'
रानी अनुमति देकर रनवास में चली गई।
कुछ क्षणो मे ही समाचार सारे नगर में फैल गया। उस समय
झासी निवासियो के क्षोभ का ठिकाना न था। रानी की सेना तुरन्त युद्ध
छेड देना चाहती थी, परन्तु रानी ने निवारण किया। कहलवाया, 'अभी
समय नही आया है।'
झलकारी ने जब सुना अपने पति पूरन से कहा, 'छाती वर जाय इन
अङ्गरेजन की, गटक लई झासी।'
१६२ झांसी की रानी
[ ३३ ]
एलिस ने झांसी का 'अङ्गरेजी बन्दोबस्त' आरम्भ कर दिया ।
दीवान से दफ्तरो की चाभिया लीं। थाने पर अधिकार किया और
शहर में अङ्गरेजी राज्य और अपने अधिकार की डोडी पिटवा दी ।
तहसीलो मे तुरन्त समाचार भेजा और वहा भी कडे प्रबन्ध की व्यवस्था
कर दी ।
दीवान रानी को सब बातो की सूचना देकर अपने घर उदास चला
गया। रानी के नित्य नियम मे कोई अन्तर नही आया। अपने कार्य-
क्रम के अनुसार जब वे विश्राम के लिये बैठी तब मुन्दर, सुन्दर और
काशीबाई उनके पास आ गई । वे अपने आभूषण उतार आई थी ।
रानी ने कहा, 'आभूषण क्यो उतार आई हो ? क्या इसी समय
रणभूमि में चलना है ?'
मुन्दर सिसकने लगी । सुन्दर और काशी के नेत्र तरल हो गये ।
रानी बोली, 'ये चिन्ह ,तो असमर्थता और अशक्ति के हैं। अपने
सब आभूषण पहिनो और इस प्रकार रहो मानो कुछ हुआ ही नही है।'
मुन्दर ने रानी के पैर पकड लिये उसको हिलकी नही समाती थी ।
रानी का कठ भी थोडा रुद्ध हुआ। उन्होने भौहे सिकोडी। एक
ओर देखने लगी ।
काशीबाई रुदन करती हुई,बोली, 'वाईसाहब, बाईसाहब !'
सुन्दर ने करुण स्वर में कहा, 'सरकार अब क्या होगा ?
रानी ने अपने को सहज ही संयत कर लिया । मुन्दर के सिर पर
हाथ फेरा। उसकी आंखे आसुओ से भरी हुई थी । सुन्दर और काशी
की भी। चंचल आसुओ में होकर उन तीनो ने रानी के तेजस्वी रूप को
देखा-कई लक्ष्मीबाईया, कई सतेज नेत्र दिखलाई पडे । उन्होने अपनी
आंखे' पोछीं ।
रानी ने कहा, 'ये आसू बल का क्षय करेगे। अभी तो अपने कार्य
का प्रारम्भ भी नही हुआ है। सोचो, जब छत्रपति के उपरान्त शम्भू जी
लक्ष्मीबाई १६३
मारे गये, साहू समाप्त, राजाराम गत तब ताराबाई की गाठ में क्या रह
गया था ? इतने बड़े मुगल सम्राट को ताराबाई कैसे परास्त कर सकी ?
उसने स्वराज्य की बागडोर को कैसे बढ़ाया ? रो-रोकर ? कपड़े और
गहने फेक-फेककर ? भूखो मर मर कर ? और सोचो, जीजाबाई को पति
का सुख नही मिला । उन्होने छत्रपति को पाला । काहे के लिये ? किस
आशा से ? गद्दी पर विठलाने के लिये ? उन्होने इतना तप, इतना त्याग
अपने पुत्र को केवल हाथी की सवारी और नरम नरम गद्दी पर विराजमान
कराने के लिये किया था ?'
वे सहेलिया सचेत हुई ।
रानी कहती गईं, 'हमको जो कुछ करना है उसकी दिशा निश्चित
है । मार्ग में विघ्न बाधाये तो आती ही हैं । खरीते का स्वीकृत न होना
केवल एक बाधा ही है । स्वीकृत हो जाता तो क्या हम लोग केवल
सो जाने के लिये ही जीवित रहती ? भगवान कृष्ण की आज्ञा को याद
रक्खो कि हमको केवल कर्म करने का अधिकार है । कर्म के फल का
नही । देखो, छत्रपति के उपरान्त जिन लोगो ने स्वराज्य के आदर्श को
आगे बढ़ाया और उसकी जडे प्रबल बनाई, वे बाधाओ को डटकर
प्रतिरोध करते रहते थे । जिन लोगो की लालसा अपने लिये फलो की
ओर गई, वे गिर गये और स्वराज्य की धारा धीमी पड़ गई । परन्तु वह
सूखी कभी नही । दादा बाजीराव पेशवा हतप्रभ होकर बिठूर चले आये ।
परन्तु हम लोगो को वे स्वराज्य की शिक्षा देने से कभी नही चूके । यदि
हिन्दुस्थान में कोई भी उस पवित्र काम को अपने हाथ मे न ले, तो भी,
मैने अपने कृष्ण के सामने, अपनी आत्मा के भीतर उसका बीड़ा उठाया
है । करूँगी और फिर करूँगी । चाहे मेरे पास खडे होने के लिये हाथ
भर भूमि ही क्यो न रह जाय । मानलो कि मैं सफल न हो पाई, तो भी
जिस स्वराज्य धारा को आगे बढ़ा जाऊँगी, वह अक्षय रहेगी । उसी
महावाक्य को सदा याद रक्खो—हमको केवल कर्म करने का अधिकार
है, फल का कभी नही । हमको एक बड़ा सन्तोष है । जनता । हमारे साथ
१६४ झाँसी की रानी
। है । जनता सब कुछ है । जनता अमर है । इसको स्वराज्य के सूत्र में
बाधना चाहिये । राजाओ को अङ्गरेज भले ही मिटादे, परन्तु जनता को
नही मिटा सकते । एक दिन आवेगा जब इसी जनता के आगे होकर मैं
स्वराज्य की पताका फहराऊँगी ।'
सहेलियो की आखो में भी चमत्कार उत्पन्न हो गया ।
रानी बोली । 'मुझ से आज एक भूल हो गई है । मुझको एलिस के
सामने कुछ नही कहना चाहिये था । मेरे उस वाक्य से वह अपने सङ्गी
अङ्गरेज़ो सहित चौकन्ना हो जागया । वृत्ति भी अस्वीकृत नही करना
चाहिये थी ।'
काशी ने स्थिर स्वर मे प्रश्न किया, 'अब क्या करना है ?'
रानी ने कहा, 'अङ्गरेज़ जाति बहुत धूर्त है । उसका सामना चाणक्य
नीति ही से हो सकता है। मै वृत्ति को स्वीकृत करूँगी और आगे
सावधानी के साथ काम करूंगी । मैं दामोदरराव की ओर से विनय
प्रार्थना की लिखा पढी जारी रक्खूँगी । विलायत में अपील भिजवाऊँगी ।
जिसमे एलिस इत्यादि मेरी झाँसी न देने वाली बात की यथार्थता को
अपनी समझ से दूर कर दे और, जनता अपनी स्मृति में इस बात को
पकडे रहे, कि मै और झासी अभी बनी हैं ।'
इतने मे वहा दामोदरराव आया ।
रानी ने अपनी गोद में बिठला लिया ।
दामोदरराव ने पूछा, 'माता, क्या यह राज्य चला जावेगा ?'
रानी—'यह राज्य चला जावेगा तो चला जाने दो । स्वराज्य आवेगा ।'
दामोदरराव --'स्वराज्य क्या ?'
रानी मुस्कराई ।
बोली, 'अभी भोजन करने चलो । फिर कभी बतलाऊँगी ।'
रानी ने पैन्शन लेने की स्वीकृति लिखवा भेजी ।
लक्ष्मीबाई १६५
[ ३४ ]
झाँसी की जनता के क्षोभ का समाचार, एलिस को मिल गया ।
उसने अपने मन मे एक सामञ्जस्य स्थिर किया और उसके अनुसार
मालकम को लिखा । मालकम ने गवर्नर जनरल को सिफारिश की:—
'रानी लक्ष्मीबाई को आजीवन पाच हज़ार रुपये दिये जावें और
नगर वाला राजमहल उनकी सम्पत्ति समझी जाकर उन्ही को दे दिया
जाय । रानी या उनके नौकरो पर ब्रिटिश अदालतो की सत्ता न रहे ।
अपने नौकरो के अपराधो का वे स्वय न्याय करे । राजा का निजका धन,
रियासत के लेन देन का हिसाव करके जो बाकी बचे वह, और राज्य के
सब जवाहिरात, रानी को दे दिये जावे । राजा और रानी के नातेदारो
की एक सूची बनाई जाय, और उन लोगो के निर्वाह की व्यवस्था कर
दी जाय ।'
डलहौजी ने ये सिफारिशे-स्वीकार की, केवल एक बात नही मानी ।
वह यह कि राजा की निज की सम्पत्ति और रियासत के जवाहिरात रानी
के हो । उसने तै किया कि दामोदरराव के होगे क्योकि यद्यपि वह राज्य
का अधिकारी नही है, मगर हिन्दू शास्त्र के अनुसार गगाधरराव की
निजी सम्पत्ति का अधिकारी अवश्य है ।
डलहौजी ने यह आज्ञा २५ मार्च सन् १८५४ को दी और तदनुसार
पोलिटिकल एजेन्ट ने झासी के खजाने से छ: लाख रुपये निकाल कर
दामोदरराव के नाम से अङ्गरेजी खजाने में जमा कर दिये और निश्चय
किया कि दामोदरराव को बालिग होने पर ब्याज समेत लौटा दिये
जावेगे । रियासत के सब जवाहिरात और सोने-चादी के आभूषण इत्यादि
'दामोदरराव हेतु' रानी के आधीन कर दिये ।
ईमान और राजनीति दोनो की परस्पर निभा दी ।
अब अङ्गरेजी बेलन अपरिहार्य और अनवरत गति से चला ।
सबसे पहले जो हुआ, वह रानी से किले का खाली कराना था ।
किले से एक बडी सुरङ्ग हाथीखाने को और वहा से शहर वाले महल को
१६६ झाँसी की रानी
गई थी। रानी ने इसके द्वार को मुँदवा दिया और वह किले से शहर
वाले महल में सहेलियो सहित चली आईं।
अग्रेजी पल्टन ने किले पर कब्ज़ा कर लिया। उसके अग्रेज़ अफ़सरो
ने रात को कबाब-शराब से जश्न मनाया। पल्टन के बहुत से हिन्दुस्थानी
सिपाही आँसू बहाते हुये सोये।
दूसरे दिन बहुत सा रियासती फ़ौजी सामान नष्ट किया गया और
बडी बडी तोपो को निरुपयोगी कर डाला गया। झाँसी राज्य की सम्पूर्ण
सेना एक कलम बरखास्त कर दी गई—उनको छ छ महीने का वेतन
देने की उदारता जरूर की गई। सिपाही वेतन लेकर महल के सामने से
निकले। वे रानी का एक अन्तिम दर्शन लेना चाहते थे। रानी झरोखे पर
पर्दे के पीछे आ गई। सिपाही आसू बहाते जाते थे और रानी माता,
रानी माता कहते हुए उनको प्रणाम करते चले जाते थे। रानी पर्दे के
बाहर केवल अपने जुडे हुए हाथो नमस्कार करती जाती थी। रानी ने
सिपाहियो के आसू देखकर भी अपने आँसू किसी आश्चर्यपूर्णा क्रिया से रोके।
छ छ मास वाले वेतन की उदारता केवल सिपाहियो तक सीमित
रही बाकी सब रियासती नौकर खाली जेब घर चले गये। जिसको पटवार-
गिरी और कानूनगोई से पेट भरना था उनकी अर्जिया जल्दी जल्दी मंजूर
करली गईं। एक बख्शिशअली झासी नगर के सब फाटको का फाटकदार
था और रियासती कर्मचारियो मे उसका बहुत ऊँचा स्थान था। उसको
झासी के जेल की दरोगाई मिल गई।
लगभग सब जागीरदार खत्म कर दिये गये। केवल गुरसराय, कटेरा
और गुसाइयो की जागीरे बच गई। वे इसलिये कि बेलन के नीचे कुछ
कडे कंकड बच ही जाते हैं। छोटे जागीरदारो में आनन्दराय भी था।
उसके पास ताम्र-पत्र थे। छीन लिये गये और बदले में कागज पर नकले
दे दी गईं।
औरो की तरह आनन्दराय से भी पूछा गया, 'नौकरी करोगे ?'
लक्ष्मीबाई १६७
'कौनसी ?'
'पटवारगिरी ।'
'नही कर सकूँगा । खेती से पेट पालूंगा ।'
'नायव थानेदारी करोगे ?'
'कर लूँगा ।'
जहाँ सैकडो और सहस्रों की तादाद में जनता के पढ़े-लिखे लोग
रियासत में थोडा वेतन भी पाकर अपनी गुजर करते थे, वहाँ रियासत
के केवल थोडे से ऊँचे कर्मचारी और छोटे-छोटे जागीरदार अङ्गरेजी
राज्य में छोटे-छोटे से पदो पर कुछ अधिक वेतन देकर नियुक्त कर दिये
गये । बाकी बडे-बडे पदो पर मोटा वेतन पाने वाले थोडे से अङ्गरेज़
मुकर्रर हो गये । ठीक तो है—राजा की जगह अङ्गरेज़ कमिश्नर, एक
दर्जन दीवानो की जगह एक डिप्टी-कमिश्नर और दो-तीन अङ्गरेज
परगना-हाकिम । सहस्रो सिपाहियो की जगह दो सौ तीन सौ अँग्रेज
सैनिक । दरबार समाप्त—कवि, चित्रकार, धुरपदिये, सितारिये, नर्तकियां
नर्तक, साटमार, कारीगरी सब की विदा !
उनकी जगह क्लब, डाकबङ्गला और ऊँचे-नीचे, छोटे-बडे सब
हिन्दुस्थानियो का अनिवार्य माथा-टेकू सलाम । वह भी, अर्दली को हक-
दस्तूर दो, जूते उतार कर साहब की विलायती प्रतिमा के सामने
नतमस्तक जाओ, तब नसीब । कोरी, करघे, कपडे सब गायब—केवल
एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्रिया जारी—गङ्गाजी के किनारो से चांदी-सोने
का शोषण करना और टेम्स जी के किनारो पर निचोड देना ।
हिन्दुस्थान उस ओर चलाया जाने लगा जिसको आजकल की भाषा
में कह सकते हैं—
'महफिल उनकी साकी उनका
आँखें अपनी बाकी उनका ।'*
- अकबर इलाहाबादी ।
१६८ झाँसी की रानी
झासी प्रदेश के अनेक लोग रानी के पास प्रणाम करने जाते थे और
पूछते थे—
'सरकार की आज्ञा हो तो अङ्गरेजो की नौकरी करले ?'
रानी उत्तर दिलवाया करती थी, 'करलो, परन्तु इस बात को मत
भूलना कि कभी झाँसी राज्य में तुम्हारा कोई स्थान था ।'
सेठ-साहूकारो के उलहनो के मारे रानी हैरान थी । कोई कुछ कह
जाता, कोई कुछ ।
'आप कुछ उपाय क्यो नही करती ?'
'विलायत खरीता भेजिये । झाँसी को यो ही तो अङ्गरेजो के हाथ में
नही चला जाने देना चाहिये ।'
'हम लोगो से जितना रुपया चाहिये हो लीजिये और मुकद्दमा
लड़िये ।'
'हम लोग साहबो के बङ्गलो पर सलाम करने नही जाना चाहते
इसलिये कम से कम शहर तो अपने अधिकार में लीजिये ।'
'हमारा सारा व्यापार ठप हो गया है । राजदरबार, सरदार कोई
नही रहे—अब हमको कोई नही पूछता ।'
किसानो के ऊपर जो लगान रियासत में कायम था, वह पूरा कभी
वसूल नही हो पाता था--कभी आधा कभी पर्धा । और वह भी प्राय अन्न
के रूप में । अब कागजो में लगान कम हुआ; परन्तु जितना लिखा गया
उसमे से वसूली कौडी कम की नही की गई—और सब सिक्को में । भूमि
का स्वामी राजा पुस्तको में अवश्य था, परन्तु नित्य के जीवन में किसान
को अपनी भूमि किसी को भी देने का अधिकार था । अङ्गरेजी राज्य
में वसूली करने के लिये पहले-पहल हर गाव मे ठेकेदार नियुक्त किये गये ।
फिर इन्ही को जमीदारियाँ 'अता' कर दी गईं । इस श्रेणी के खडे कर
देने से किसान नीचे धसक गये । भूमि के ऊपर उनका जो अधिकार था,
वह थोडे से जमीदारो के हाथ में पहुँच गया । इन दोनो श्रेणियो के बीच
के व्यवधान को सतुलित रखने के लिये—अथवा जमीदार-किसान सघर्ष में
लक्ष्मीबाई १६६
किसान अभी सिर न उठा पावे इसके लिये—साहब, साहब की कचहरी
और साहब का बङ्गला उद्भूत हुये ।
रह गई ग्राम पंचायतें सो उनके हाथ में केवल जात-पांत के झगडे
निवटाने का हथकण्डा रह गया । बाकी सारी शक्ति सौतिया-डाह रखने
वाली अङ्गरेजी अदालत के 'इजलास' में चली गई ।
इङ्गलैंड के कुछ आत्मनिष्ठ पुरुषो ने प्रतिवाद किये, परन्तु इन
प्रतिवादो का कोई प्रभाव नही हुआ ।
इङ्गलैंड सामन्त युग को लांघकर, माध्यम वर्ग के नेतृत्व में आ चुका
था । फ्रांस की क्रांति से घृणा करते हुये भी, इङ्गलैंड के मध्यम वर्ग ने
फ्रांस-क्रान्ति के तीन मोहक शब्द 'न्याय' 'समता' और 'भाईचारा' अपने
साहित्य में सोख लिये । इङ्गलैंड की तत्कालीन राजनीति भी प्रभावित
हुई । माध्यम वर्ग के एडमन्ड बर्क, शेरीडीन इत्यादि ने सिंहनाद किया ।
राजनीति के अमर सिद्धान्त प्रकट हुये । मध्यम वर्ग दृढतापूर्वक आगे
बढा और इंगलैंड का अधिकार क्षेत्र उसने अपने हाथ मे कर लिया ।
अधिकार हाथ में आते ही दायित्व ने उदारता को पीस डाला, क्योकि
निम्न वर्ग की असख्य जनता उस अधिकार ससर्ग से दूर थी । जो
मध्यम वर्ग उदार स्वरो में ऊची राजनीति के राग अलापा करता था
वह हर कदम पर हां-ना के सिर हिलाने लगा । मध्यम वर्ग के उदारवृत्ति
वाले जो लोग अधिकार क्षेत्र से बाहर थे, और प्रयत्न करने पर भी जो
उस क्षेत्र में नही घुस पाते थे, उसकी कौन सुनता था ?
रानी ने विलायत को अपील भेजी । उसका कभी जवाब ही नही
मिला ।
पार्लियामेंट में भी थोडी सी बहस हुई । एक मेम्बर ने कम्पनी के
डायरेक्टरो का पुराना मत उद्धृत किया ।
'अपने इलाके को और अधिक बढाना बुद्धिमानी का काम नही है ।
राज्य-विस्तार की नीति सकटपूर्ण है और ब्रिटिश जाति की भावना
प्रतिष्ठा और नीति के प्रतिकूल है ।'
१७० झांसी की रानी
उस मेम्बर ने अन्तरराष्ट्रीय कानून के न्याय की भी दुहाई दी। उस
मेम्बर के वाक्चातुर्य की तारीफ हुई और बुद्धि की निन्दा।
दूसरी अगस्त सन् १८५४ को अपनी सब पूर्व प्रतिज्ञाओ का विस्मरण
करके ब्रिटिश सरकार ने झासी राज्य को 'अग्रेजी इलाके' में मिला लेने
की मुहर लगा दी। गवर्नर जनरल की, की हुई काररवाई मन्जूर कर
ली गई।
चुक्खी चौधरी मगन गन्धी, लाला श्याम, झम्मी और भग्गी
दाउजू पूरन कोरी और छन्दी चमार इत्यादि सब अपनी विगत स्वतंत्रता
की ओर हसरत भरी निगाहो से देखते रह गये। झलकारी कोरिन के
वस्त्राभूषणो, की चटक चली गई।
लक्ष्मीबाई १७१
[ ३५ ]
अङ्गरेजी क्लब घर के सामने वाले मैदान की दूबा साफ कराई जा
रही थी। धूप में मजदूर हाँफ हाँफ कर काम कर रहे थे । मजदूरो का
मुखिया खडे खडे काम का ढग बतला रहा था ।
एलिस चाहता था काम ज्यादा जल्दी हो । सन्ध्या के पहले ही
कमिश्नर स्कीन, डिप्टी-कमिश्नर गार्डन और फौजी अफसर कप्तान डनलप
इत्यादि की बैठक होनी थी । कुछ फल-फलारी की भी योजना थी ।
झाँसी को कमिश्नरी शासन का गौरव प्राप्त हुआ । इसमें कई जिले
शामिल कर दिये गये । झाँसी का एक अलग जिला बना । इस झाँसी
जिले का पहला डिप्टी-कमिश्नर कप्तान गार्डन हुआ, जो गंगाधरराव को
चिरौरी किया करता था ।
मैदान की सफाई करने वाले मजदूर जरा ढीले पड पड जा रहे थे ।
एलिस को क्षोभ हुआ । उसने मजदूरो के मुखिया को डांटा ।
मुखिया ने कहा 'ये मुफ्तखोर हैं हुजूर । डर के मारे मैंने अभी तक
इनकी मारपीट नही की । अब हड्डी-पसली तोडता हू ।'
एलिस बोला, 'मैं इस समय हड्डी-पसली तोडना पसन्द नही करता,
मगर इनसे काम लो । काफी पैसा दिया जाता है । जब रियासत थी तब
तो इनको मुफ्त में काम करना पडता था ।'
एलिस बगले में चला गया । मुखिया ने सोचा, 'रियासत में काम
मुफ्त में करते थे तो रियायते भी बहुत पाये हुये थे । लडकी-लडके के
व्याह के समय, देखें अब कौन इन लोगो की मदद करता है ।'
चिल्लाकर मजदूरो को काम करने के लिये सम्बोधन करने लगा ।
पास जाकर उसने कहा 'अब, रियासत नही है अङ्गरेजी सरकार उठी
है । ठिकाने से काम करो नही तो खाल टूटती फिरेगी ।'
मजदूरो ने कुडकुडाते हुये कहा—
'न हमें रियासत जागीर लगाये थी और न अङ्गरेज लगा देंगे ।'
'जितना खोदेंगे उतना पी पायेंगे ।'
१७२ झांसी की रानी
'पर यह जरूर है कि अपना अपना ही है।'
'अपने को मार खाते थे तो उनसे लड भी जाते थे। इनलोगो से
तो कुछ कह भी नहीं सकते।'
मुखिया ने मना किया, 'झंझट की बात मत करो। साहब अपनी
भाषा खूब समझता है। सुन लेगा तो तुम्हारी और हमारी जान लेलेगा।'
मजदूर सन्ध्या के पहले ही काम समाप्त करके अपनी मजदूरी लेकर
चले गये। ठीक समय पर अङ्गरेज अफसरों की बैठक हुई।
खानपान के साथ ही काम काज की बात जारी रही।
एलिस—'मुझको अन्देशा था कि कही झाँसी की जनता हटाये हुये
रियासती सिपाहियो को भडका कर, दंगा न करवादे।'
डनलप—'हमारी पलटने तैयार थी।'
स्कीन—'बन्दोबस्त अच्छा था।'
गार्डन—'मैने सुना है कि वे सब रानी के पास गये थे।'
एलिस—'स्वाभाविक है।'
गार्डन—'परन्तु रानी ने उनको कोई प्रोत्साहन नही दिया।
समझदार स्त्री है।'
स्कीन—'मुझको उस स्त्री पर अचरज होता है। सुनता हूँ ऐसी घुड
सवार है, कि पुरुष दातो तले उँगली दबाते हैं।'
गार्डन—'हिन्दुस्थानी कसरते खूबी के साथ करती है।'
एलिस—मुझे शका थी कि कही सती होने की कोशिश न करे।
मै गंगाधरराव के दाह के समय कप्तान मार्टिन को ससैन्य ले गया था।'
गार्डन—'मै उन दिनो यहा न था।'
स्कीन—'इस प्रदेश के लोग शान्ति-प्रिय और कानून-भक्त हैं।
यहा पहले दो वार सरकारी अमल रह चुका है, इसलिये हमारा शासन
पसन्द करते हैं। न मालूम इस रियासत के सडे और गन्दे वातावरण में
यहां की जनता कैसे सास लेती रही?'