झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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झाँसी की जनता के क्षोभ का समाचार, एलिस को मिल गया ।
उसने अपने मन मे एक सामञ्जस्य स्थिर किया और उसके अनुसार
मालकम को लिखा । मालकम ने गवर्नर जनरल को सिफारिश की:—
'रानी लक्ष्मीबाई को आजीवन पाच हज़ार रुपये दिये जावें और
नगर वाला राजमहल उनकी सम्पत्ति समझी जाकर उन्ही को दे दिया
जाय । रानी या उनके नौकरो पर ब्रिटिश अदालतो की सत्ता न रहे ।
अपने नौकरो के अपराधो का वे स्वय न्याय करे । राजा का निजका धन,
रियासत के लेन देन का हिसाव करके जो बाकी बचे वह, और राज्य के
सब जवाहिरात, रानी को दे दिये जावे । राजा और रानी के नातेदारो
की एक सूची बनाई जाय, और उन लोगो के निर्वाह की व्यवस्था कर
दी जाय ।'
डलहौजी ने ये सिफारिशे-स्वीकार की, केवल एक बात नही मानी ।
वह यह कि राजा की निज की सम्पत्ति और रियासत के जवाहिरात रानी
के हो । उसने तै किया कि दामोदरराव के होगे क्योकि यद्यपि वह राज्य
का अधिकारी नही है, मगर हिन्दू शास्त्र के अनुसार गगाधरराव की
निजी सम्पत्ति का अधिकारी अवश्य है ।
डलहौजी ने यह आज्ञा २५ मार्च सन् १८५४ को दी और तदनुसार
पोलिटिकल एजेन्ट ने झासी के खजाने से छ: लाख रुपये निकाल कर
दामोदरराव के नाम से अङ्गरेजी खजाने में जमा कर दिये और निश्चय
किया कि दामोदरराव को बालिग होने पर ब्याज समेत लौटा दिये
जावेगे । रियासत के सब जवाहिरात और सोने-चादी के आभूषण इत्यादि
'दामोदरराव हेतु' रानी के आधीन कर दिये ।
ईमान और राजनीति दोनो की परस्पर निभा दी ।
अब अङ्गरेजी बेलन अपरिहार्य और अनवरत गति से चला ।
सबसे पहले जो हुआ, वह रानी से किले का खाली कराना था ।
किले से एक बडी सुरङ्ग हाथीखाने को और वहा से शहर वाले महल को