झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १५७
राज्य मिलेगा या न मिलेगा—इन दोनो के व्यवधान मे वे महीने
चले जा रहे थे । मोरोपन्त ताम्बे और अन्य कर्मचारी यथावत कार्य कर
रहे थे । एलिस वर्ग अपना पाया मजबूत बनाने की तैयारी करता चला
जा रहा था, बहुत सतर्कता, वडी सावधानी के साथ ।
जब कई महीने हो गये और डलहौली का उत्तर न आया तब
मोरोपन्त, नाना भोपटकर इत्यादि की सम्मति से एलिस और मालकम
के द्वारा एक खरीता और भेजा । उसमे पुरानी सधियो को दुहराया गया
और जिनके सामने गोद ली गई थी उनके नाम प्रकट किये गये ।
एलिस ने सिफारिश की । लिखा, 'ओर्छा राज्य के दत्तक की
स्वीकृति दी गई है । जैसा ओर्छा राज्य वैसा झासी राज्य । एक को
अनुमति देना और दूसरे को न देना अनुचित मालूम होना है ।'
यह बात नही कि एलिस रानी की अर्जी का स्वीकृत किया जाना
पसन्द करता हो । वह ओर्छा राज्य को दत्तक की स्वीकृति के मिलने पर
कुढ गया था — एक अच्छा खासा ग्रास कम्पनी सरकार के मुँह से छुटका
दिया गया ।
कई महीने उपरान्त डलहौजी अवध के दौरे से कलकत्ता लौटा ।
झाँसी की मिसिल पेश हुई । जगह जगह ऐमे उद्गार जो नाक तक
नफरत पैदा करे ।
बुन्देलखण्ड मे कम्पनी के राज्य की स्थापना हमारे पुरखो की
सहायता से हुई है ! हमारी राजभक्ति की कदर की जानी चाहिये ।
जरूर ! अब किस साधना के लिए राजभक्ति की अटक है ? सन्धिया
पवित्र होती हैं । बेशक ! तुम पेशवा के नौकर थे । पेशवा हमसे हारा
और उसने अपना स्वामित्व हमारे हवाले किया । अब तुम हमारे नौकर
हुये । मर्जी हमारी, माने हम तुम्हारी गोद-वोद को या न माने ।
डलहौजी सोचता-सोचता, जिस निष्कर्ष पर पहुचा, उसकी काउन्सिल
भी उससे सहमत हो गई ।