झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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किसान अभी सिर न उठा पावे इसके लिये—साहब, साहब की कचहरी
और साहब का बङ्गला उद्भूत हुये ।
रह गई ग्राम पंचायतें सो उनके हाथ में केवल जात-पांत के झगडे
निवटाने का हथकण्डा रह गया । बाकी सारी शक्ति सौतिया-डाह रखने
वाली अङ्गरेजी अदालत के 'इजलास' में चली गई ।
इङ्गलैंड के कुछ आत्मनिष्ठ पुरुषो ने प्रतिवाद किये, परन्तु इन
प्रतिवादो का कोई प्रभाव नही हुआ ।
इङ्गलैंड सामन्त युग को लांघकर, माध्यम वर्ग के नेतृत्व में आ चुका
था । फ्रांस की क्रांति से घृणा करते हुये भी, इङ्गलैंड के मध्यम वर्ग ने
फ्रांस-क्रान्ति के तीन मोहक शब्द 'न्याय' 'समता' और 'भाईचारा' अपने
साहित्य में सोख लिये । इङ्गलैंड की तत्कालीन राजनीति भी प्रभावित
हुई । माध्यम वर्ग के एडमन्ड बर्क, शेरीडीन इत्यादि ने सिंहनाद किया ।
राजनीति के अमर सिद्धान्त प्रकट हुये । मध्यम वर्ग दृढतापूर्वक आगे
बढा और इंगलैंड का अधिकार क्षेत्र उसने अपने हाथ मे कर लिया ।
अधिकार हाथ में आते ही दायित्व ने उदारता को पीस डाला, क्योकि
निम्न वर्ग की असख्य जनता उस अधिकार ससर्ग से दूर थी । जो
मध्यम वर्ग उदार स्वरो में ऊची राजनीति के राग अलापा करता था
वह हर कदम पर हां-ना के सिर हिलाने लगा । मध्यम वर्ग के उदारवृत्ति
वाले जो लोग अधिकार क्षेत्र से बाहर थे, और प्रयत्न करने पर भी जो
उस क्षेत्र में नही घुस पाते थे, उसकी कौन सुनता था ?
रानी ने विलायत को अपील भेजी । उसका कभी जवाब ही नही
मिला ।
पार्लियामेंट में भी थोडी सी बहस हुई । एक मेम्बर ने कम्पनी के
डायरेक्टरो का पुराना मत उद्धृत किया ।
'अपने इलाके को और अधिक बढाना बुद्धिमानी का काम नही है ।
राज्य-विस्तार की नीति सकटपूर्ण है और ब्रिटिश जाति की भावना
प्रतिष्ठा और नीति के प्रतिकूल है ।'