रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं रंगनाथ रामायण भूमिका
रंगनाथ रामायण
[ राजा गोनबुद्ध-रचित मूल तेलुगु से अनूदित ]
अनुवादक
श्री ए० सी० कामाक्षि राव
सम्पादक
श्रीअवधनन्दन
हार-राष्ट्रभाषा-परिषद्
पटना
प्रकाशक
बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्
पटना
©
सर्वस्वत्वाधिकार प्रकाशकाधीन
१८८२ शकाब्द ; २०१७ विक्रमाब्द ; १९६१ खृष्टाब्द
सजिल्द मूल्य ६. ५०
मुद्रक
बेनी माधव प्रेस
राँची
वक्तव्य
प्रस्तुत ग्रंथ 'रंगनाथ रामायण' को पाठकों के सम्मुख उपस्थित करते हुए हमें
बड़ा हर्ष हो रहा है । परिषद् का मूल उद्देश्य जहाँ अधिकारी विद्वानों द्वारा मौलिक
ग्रंथों का प्रणयन कराकर प्रकाशित करना रहा है, वहाँ देश और विदेश की समृद्ध
भाषाओं के उत्कृष्ट ग्रंथों का हिन्दी-अनुवाद कराकर उनके प्रकाशनों से हिन्दी-साहित्य
की समृद्धि में योगदान भी रहा है । इस प्रकार, परिषद् से अबतक जर्मन भाषा से
रिचर्ड पिशल-लिखित 'प्राकृत भाषाओं का व्याकरण' तथा फ्रेंच भाषा से मारिस मेटर-
लिंक-रचित नाटक 'नीलपक्षी' के अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं । इन दोनों के अतिरिक्त
संस्कृत-साहित्य से 'काव्यमीमांसा' तथा 'कथासरित्सागर' ( प्रथम खंड ) के अनुवाद
मूल संस्कृत के साथ भी परिषद्-द्वारा प्रकाशित हुए हैं। 'कथासरित्सागर' का दूसरा खण्ड
इसी साल प्रकाशित होनेवाला है और उसके अन्तिम खण्ड का अनुवाद-कार्य सम्पन्न हो
रहा है । पाश्चात्य भाषाओं के साहित्य के अलावा परिषद् ने संविधान द्वारा स्वीकृत
चौदह भाषाओं और उनके साहित्य पर परिचयात्मक निबन्ध उन-उन भाषाओं के अधि-
कारी विद्वानों से लिखवाकर, उनके संग्रह के रूप में 'चतुर्दश भाषा-निबन्धावली' प्रकाशित
की है । तदुपरान्त भारत की प्रमुख लोकभाषाओं में से पन्द्रह लोकभाषाओं और उनके
साहित्य पर निबन्ध लिखवाकर 'पंचदश लोकभाषा-निबन्धावली' नाम का संग्रह प्रकाशित
किया है । उपर्युक्त पुस्तकों का हिन्दी-संसार में अच्छा स्वागत हुआ--यह हमारे लिए
प्रसन्नता की बात है ।
किन्तु, भारतीय भाषाओं के साहित्य से अनुवाद द्वारा हिन्दी-भाण्डार को भरने
की दिशा में परिषद् ने संकल्प किया था कि सर्वप्रथम दक्षिण भारत की चार—तमिल,
तेलुगु, कन्नड और मलयालम—भाषाओं के साहित्य से एक-एक ग्रंथ चुनकर अनूदित
कराया जाय । तदनुसार ही तमिल और तेलुगु के एक-एक ग्रंथ और उसके अनुवादक
का चुनाव किया गया और अनुवाद के काम सौंपे गये । इस योजना में हमें तेलुगु की 'रंग-
नाथ रामायण' के अनुवाद की पाण्डुलिपि सबसे पहले प्राप्त हुई और आज हम उसी
रामायण को आपके सामने उपस्थित करने में समर्थ हो सके हैं । हमें प्रसन्नता है कि
इसके बाद ही हम तमिल का 'कंब रामायण' का हिन्दी-अनुवाद भी यथाशीघ्र प्रकाशित
कर हिन्दी-संसार के सामने रख सकेंगे ।
मूल 'रंगनाथ रामायण' के सौष्ठव के सम्बन्ध में म ास-विश्वविद्यालय के विद्वान्
रीडर तथा तेलुगु-विभाग के अध्यक्ष श्रीनिडदवोलु वेंकट राव ने अपने परिचय में जो
उद्गार प्रकट किये हैं, वे इसी ग्रंथ में अन्यत्र देखने को मिलेंगे । फिर, इस ग्रंथ के
अनुवादक श्री ए० सी० कामाक्षि राव ने भी, अपनी भूमिका में, तेलुगु-साहित्य का विवेचन करते
हुए इस ग्रंथ की महत्ता पर जो कुछ प्रकाश डाला है, वह अलम् है । उसके बाद इस
( ४ )
सम्बन्ध में और कुछ लिखना पिष्टपेषण ही होगा। हम तो कवल इतना ही कहग कि
दक्षिण भारत के प्राचीन एव मूर्धन्य साहित्य की गरिमा एत्र आभा से हिन्दी-साहित्य
के भाण्डार के भरने की दिगा में हमारा यह विनम्र अनुष्ठान नगण्य न समझा जायगा।
इस अवसर पर हम सबमे पहले श्री म० सत्यनारायण को साधुवाद दिये बिना
नही रह सकते कि उन्होंने परिषद् को इस दिशा में अपने विचार और मुझाव देकर
अत्यधिक उत्साहित किया है । प्रारंभ में हमें उनका सहयोग न प्राप्त होता, तो शायद
हम इस ग्रंथ को तना शीघ्र प्रकाश में न ला सकते । साथ ही हम दक्षिण भारत के
गाँव-गाँव में हिन्दी की धूनी रमानेवाले श्रीअवधनन्दनजी के कृपापूर्ण सहयोग और
साहाय्य को शब्दो में वाँधना नही चाहते । इसम रचमात्र भी अत्युक्ति नही कि उनके
प्रयत्न का ही यह परिणाम है कि हम इस अनुवाद को हिन्दी-जगत् के सामने ला सके हैं।
उन्होंने अनुवादक से सारी पाण्डुलिपि प्राप्त कर पढ़ जाने की कृपा की, साथ ही सम्पादन
भी यथासाध्य किया । नि संकोच रूप से हम यह कह सकते हैं कि इस कार्य
में साहित्य के प्रति उनका अदम्य उत्साह और परम पवित्र निष्ठा गौरव एव ईर्ष्या की
वस्तु है । हम श्रीनिडदवोलु वेंकट राव के प्रति अतिशय कृतज्ञ हैं कि उनका ‘परिचय’
हमें इस ग्रंथ के लिए उपलब्ध हो सका । अनुवादक और सम्पादक के साथ-साथ हम
उनका भी आभार स्वीकार करते हैं, जिनका साहाय्य हमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राप्त
हो सका है ।
आशाहै, सुधी पाठको को रंगनाथ रामायण के अनुशीलन से प्रसन्नता होगी और
वे देख सकेंगे कि वाल्मीकि रामायण एत्र तुलसीदास के रामचरितमानस से यह किन-
किन वातो में एक और किन-किन बातों में भिन्न है, और यह अनुभव करेंगे कि भापा
और वेश-भूषा की भिन्नता होते हुए भी हमारे सम्पूर्ण देग की मूल सस्कृति किस प्रकार
सर्वथा एक, अभिन्न ए अखण्ड है ।
७-२-६१
भुवनेश्वरनाथ मिश्र ‘माधव’
संचालक
परिचय
तेलुगु-साहित्य में राम-कथा को अग्रस्थान प्राप्त हुआ है, और आज तेलुगु में
रामकथा से सबंधित रचनाओ की संख्या लगभग तीन-चार सौ तक है। पुराण, प्रबंध,
द्विपद, शतक, वचन, यक्षगान, दंडक, पद, गीत एवं संकीर्त्तन--मतलब यह कि आज
तलुगु में महाकाव्य जैसे शास्त्रीय रूप से अपढ़ ग्रामीण जनता के द्वारा गाये जानेवाले
लोकगीतो तक में रामकथा उपलब्ध है। साहित्य-रचना के रूप में रामकथा-साहित्य का
प्रारंभ तेरहवीं सदी में हुआ और उस समय से उस साहित्य की उत्तरोत्तर उन्नति
होती गई। इस साहित्य को प्रेरणा देनेवालो में भद्राचलम् में विराजमान श्रीरामचन्द्र
के अनन्यभक्त रामदास तथा अमरगायक भक्त त्यागय्या सर्वश्रेष्ठ हैं।
तेलुगु-साहित्य के सभी युगो में रामकथा विशेष आकर्षण की वस्तु रही है।
आज भी जब तेलुगु-साहित्य में भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियां जन्म ले चुकी हैं और जन्म ले
रही हैं, तेलुगु-भाषा के कई प्रसिद्ध आधुनिक कवियों ने रामकथा को शास्त्रीय पद्धति
पर लिखा है और आज भी कुछ कवि इस कथा को लिखने में लगे हैं। यह इस बात
को प्रमाणित करता है कि राम-भक्ति तेलुगु-जनता के हृदय को ही नहीं, बल्कि उनकी
प्रतिभा पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ चुकी है। प्राच्य तथा प्रतीच्य विद्वान् रामायण
का अध्ययन आधुनिक ढंग से करने लगे हैं। अतएव आधुनिक विचार एवं सास्कृतिक
परिपार्श्व की दृष्टि से इस महाकाव्य की व्याख्या करना आवश्यक है। चूंकि दक्षिण की
भाषाओ में भी संस्कृत-रामायण की कथा अनुवादों के रूप में अथवा मौलिक रचना के
रूप में आ गई है, हमें विचार करना होगा कि आर्य एवं आर्येतर संस्कृतियो का समन्वय
करने में रामायण का क्या स्थान है और रामायण भारत की सामासिक संस्कृति का
प्रतीक कैसे बनी हुई है आदि।
'रंगनाथ रामायण' एक द्विपद-काव्य है, जो तेलुगु की रामकथा-सबंधी कृतियो
में अत्यंत लोकप्रिय है। उसकी सरल, शुद्ध तथा प्रवाहमयी देशी शैली ने पंडित एवं
पामर दोनो को समान रूप से आकृष्ट किया है। इस कथा के कुछ भाग 'तोलुबोम्म
लाटा' (एक विशेष प्रकार की पुतलियो का नृत्य) जैसी लोक-कला के कार्य क्रमो में
भी गाये जाते हैं और यह इस बात को स्पष्ट करता है कि कवि राम की अमर-कथा
को तेलुगु-हृदय तक पहुँचाने में किस प्रकार सफल हुए हैं।
चूंकि इस कृति का नाम 'रंगनाथ रामायण' है, सहज ही यह भ्रम हो जाता है
कि इसका कवि 'रंगनाथ' नामक कोई व्यक्ति रहा होगा। किन्तु, इस विषय पर
( २ )
जो शोध-कार्य हुआ है, उससे यह प्रमाणित हो गया है कि तेरहवीं सदी में बूदपुर
(ऐतिहासिक बोयान नगर) के आसपास राज करनेवाले सूर्यवंशी राजा विट्ठलराजु के
आदेशानुसार उनके पुत्र गोनबुद्ध राजा ने इसकी रचना की है। इसका उल्लेख कवि
स्वयं काव्य के प्रारंभ में कर चुके हैं। प्रकाशित एवं अप्रकाशित शिलालेखों के आधार पर
यह प्रमाणित हो चुका है कि इस काव्य की रचना लगभग १३८० ई० में हुई थी।
'रंगनाथ रामायण' की विशेषता यह है कि उसकी रचना उस समय तक जनता
में प्रचलित राम-कथा के आधार पर हुई है, जो संस्कृत-रामायण से कईस्थानो में भिन्न है।
यद्यपि, रामायण आर्यावर्त्त या उत्तरापथ के राजा राम की कथा है, तथापि वह
परंपरागत लोक-कथाओं के रूप में सारे दक्षिण में अति प्राचीन काल से व्याप्त थी।
अब यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुका है कि दक्षिण की भाषाएं, तमिल,
तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम--जो संस्कृत भाषा-परिवार से सर्वथा भिन्न परिवार की हैं--
अपनी प्रारंभिक अवस्था में संस्कृत से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखती थीं।
ऐसी दशा में यह आशा नहीं की जा सकती कि इन भाषाओ के बोलनेवाले वाल्मीकि
रामायण की मूलकथा का ज्ञान प्राप्त करें। उन्होंने स्थूल रूप में कथा को ग्रहण किया
होगा और भिन्न-भिन्न व्यक्तित्वों ने भिन्न-भिन्न युगों में उस कथा का अपने ढंग से मोड़-
तोड़कर प्रचार किया होगा। यह कोई आश्चर्य नहीं, यदि घर-घर में इस कथा का प्रचार
हो गया हो और उत्सुक बालक-बालिकाओं के मनोरंजन के लिए तथा उनमें राम तथा
उनकी पत्नी सीता के आदर्श जीवन में प्रतिबिम्बित आर्य-धर्म को प्रतिष्ठित करने के
उद्देश्य से घर के बड़े-बूढ़े, रामायण के इतिवृत्त का छोटी-छोटी कहानियों के रूप में
प्रसार किया हो। हमारे यहाँ ऐसी प्रथा रही भी है। महाकवि कालिदास अपने मेघदूत
में कहते हैं कि कौशांबी नगर में ग्रामवृद्ध अपने पोते-पोतियों को उदयन की कथा
सुनाते थे। स्वयं कालिदास-कृत रघुवंश में वर्णित राम-कथा कुछ स्थानो में मूलकथा
से भिन्नता रखती है।
राम की कथा त्रेतायुग की होने के कारण उदयन की कथा से भी अधिक प्राचीन है
और कदाचित् उसने द्रविड़ों के हृदय एवं प्रतिभा पर अमिट प्रभाव डाला होगा।
इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि रामायण के दो प्रधान पात्रों में रावण
दक्षिण का था। लंका का राज्य, राम के विजय प्राप्त करने के पश्चात् भी बना रहा
और विभीषण उसका पालन करता रहा। आधुनिक युग की भाँति यदि राम भी लंका
को जीतने के पश्चात् अपने किसी भाई को अपनी तरफ से लंका का राज्य चलाने के
लिए नियुक्त करते, तो कदाचित् दक्षिणापथ का इतिहास कुछ बातो में भिन्न होता।
तेलुगु-भाषा तमिल के मुकाबले में प्राचीन न होने पर भी कुछ हद तक प्राचीन
ही कही जा सकती है; उस भाषा के बोलनेवालो में बहुत समय तक वाल्मीकि रामायण
की अपेक्षा लोक-कथाओं के द्वारा प्रचलित राम-कथा का ही आदर होता रहा। क्रमशः
तेलुगु-भाषाभाषी संस्कृत के प्रति आकृष्ट हुए और उस भाषा के प्रकांड पंडित बन गये।
'रंगनाथ रामायण' और 'भास्कर रामायण' के कवि संस्कृत के महान् पंडित थे और
( ३ )
उन्होंने अपनी कृतियों में स्पष्ट कहा भी है कि उनकी कृतियाँ वाल्मीकि रामायण को
आधार मानकर चलती हैं। फिर भी, वे जनता के बीच प्रचलित रामकथा की सर्वथा
उपेक्षा नहीं कर सके ।
कहा जाता है कि सन् १३१० ई० में 'कवित्रय' के प्रसिद्ध कवि एर्रना ने
मूल संस्कृत-रामायण का सही अनुवाद तेलुगु-पद्य में लिखा था । खेद है कि वह रचना
आज हमें अप्राप्त है--केवल उसके कुछ एक पद्य तेलुगु के एक लक्षण-ग्रन्थ में हमें
मिलते हैं। एर्रना के पश्चात् सन् १८६० ई० तक किसी और कवि ने वाल्मीकि रामायण
का सही-सही अनुवाद तेलुगु में प्रस्तुत नहीं किया । सन् १८६० ई० में गोपीनाथ वेंकट
कवि ने संस्कृत-रामायण का सही अनुवाद तेलुगु-पद्य में प्रस्तुत किया । उसके पश्चात्
कितने ही कवियों ने अपनी प्रतिभा के अनुसार संस्कृत-रामायण का अनुवाद किया ।
कहने का तात्पर्य यह है कि १८६० ई० तक राम की कथा पर जो काव्य लिखे गये,
उनपर लोक-कथाओ का ही अत्यधिक प्रभाव रहा ।
आज के शुभ समय में, जबकि भारत की विभिन्न संस्कृतियों में आदान-प्रदान का
कार्य प्रारंभ हो गया है, यह अत्यंत हर्ष की बात है कि दक्षिण के एक सुयोग्य तथा
हिन्दी-तेलुगु-भाषाओ के निपुण विद्वान् श्री ए० सी० कामाक्षि राव ने, तेलुगु की अत्यंत
लोकप्रिय द्विपद रामायण का अनुवाद राष्ट्रभाषा हिन्दी के गद्य में किया है, जिससे
वह भारत के सभी साहित्यों तक पहुँच सके ।
तेलुगु की 'रंगनाथ रामायण' अपने इतिवृत्त, भाव, कला एवं शैली के कारण
तीन करोड़ तेलुगु-भाषाभाषियों के हृदय में राम-भक्ति को जागरित करने में सफलता प्राप्त
कर चुकी है । यदि उसका हिन्दी-अनुवाद आसेतुहिमाचल व्याप्त चालीस करोड़
भारतवासियों के हृदयो में राम-भक्ति जागरित करनेवाली प्रबल शक्ति का स्रोत बन सके,
तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जयहिन्द ।१
ता० ८, शाके १८८२ } विद्यारत्न निडदवोलु वेंकट राव, एम्० ए०
चैत्र, सोमवार } रीडर तथा तेलुगु-विभाग के अध्यक्ष
२८-३-६० ई० } मद्रास-विश्वविद्यालय
१. 'आन्ध्र महाभारत' के तीन प्रसिद्ध कवि नन्नया, तिक्कना और एर्रना 'कवित्रय'
के नाम से विख्यात हैं ।
२ प्रस्तुत परिचय मूल अगरेजी लेख से अनूदित ।
इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है (यह पृष्ठ रिक्त है)।
ु, तेनुगु, आंध्रम्; किन्तु 'तेलुगु' शब्द का ही
Note: भाषा हैं। (has dot on हैं). नाम हैं-- (has dot on हैं).
अधिकाधिक प्रयोग होता हैं । 'आंध्र' शब्द पहले जाति-परक था, किन्तु बाद को वह देश-
Note: होता हैं ।
परक हुआ और निदान आंध्र देश की भाषा 'आंध्रम्' कहलाई । तेलुगु अजंत भाषा है--
प्रायः इसके सभी शब्द स्वरांत और विशेष रूप से उकारांत होते हैं । (उदा०-संतोषमु,
Wait, in line 6: (उदा०-संतोषमु, or (उदा०-सतोषमु,?
Let's look at उदा०-सतोषमु: there's no dot on स. It's printed सतोषमु,. But either way, let's write सतोषमु,.
साहसमु, नीनु, नेनु आदि) । अतः, यह भाषा अधिक संगीतमय होने की क्षमता
रखती हैं। कदाचित् इसी कारण से विदेशी विद्वानो ने इसे 'पूर्व की इटालियन भाषा'
Note: रखती हैं। विद्वानो (no dot on no).
कहा होगा ।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी समय आंध्र-साम्राज्य
( ६ )
शुरू हुआ। यह आंदोलन आज तक चल रहा है। आज स्थिति ऐसी है कि तेलुगु के
पचहत्तर फी सदी लेखक अपनी साहित्य-साधना बोलचाल की भाषा के माध्यम से करते हैं।
साहित्यिक भाषा (ग्रांथिक भाषा) और बोलचाल की भाषा (व्यावहारिक भाषा) में
जो अन्तर हैं, वह विशेषतया क्रियाओं तथा कुछ शब्दो के रूपो तथा संधि के नियम-
पालन के ऊपर निर्भर करता है। एक उदाहरण से यह अन्तर स्पष्ट करेंगे।
साहित्यिक-भाषा--श्री राम चरित्रमु परम पावन मैनदि । अंदुवलनने तेलुगुलो
ननेकुलु रामायण-मुनिदिवरलो रचियिंचिरि । इप्पटिकिनि रचियुचु तम जन्ममुनु
चरितार्थमु गाविंचु कोनु चुन्नारु ।
व्यावहारिक भाषा--
श्रीराम चरित्र परम पावन मैंदि। अंदुवल्लने तेलुगुलो अनेकुलु रामायणान्नि यिदि
वरलो व्रासारु । इप्पटिकी व्रास्तू तम जन्मान्नि चरितार्थमु चेसुकुंटुन्नार ।
(श्रीराम की कहानी परम पावन है। इसलिए, कई लोगो ने अबतक रामायण की
रचना की। आज भी कुछ लोग इसकी रचना करते हुए अपने जीवन को चरितार्थ कर रहे हैं।)
जैसा हम पहले निवेदन कर चुके हैं, तेलुगु द्राविड़-भाषा-परिवार की एक मुख्य
भाषा है। किसी समय तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम मूल द्राविड़-भाषा की
बोलियां मात्र थीं। किन्तु, बाद को भिन्न-भिन्न वातावरण में पनपने के कारण आज ये
एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होती हैं। तेलुगु-प्रदेश पर कई राजवंशो ने राज्य किया।
सातवीं शताब्दी तक सातवाहन, इक्ष्वाकु, वृहत्फलायन, शालंकायन, पल्लव, विष्णुकुंडिन
तथा पूर्व चालुक्य राजाओ ने तेलुगु-प्रदेश पर राज्य किया था। इन राजाओ की राज-
भाषा या तो सस्कृत थी या प्राकृत। जो शिलालेख अबतक उपलब्ध हैं, उनमें बहुतों
की भाषा प्राकृत है। इन राजाओ में कुछ तो वैदिक धर्मावलंबी थे और कुछ बुद्ध के
अनुयायी थे। इस तरह तेलुगु-प्रदेश में राजभाषा तथा धर्म की भाषा की हैसियत से संस्कृत
तथा प्राकृत का अत्यधिक प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में देशभाषा पर पड़ता रहा।
परिणाम यह हुआ कि आज तेलुगु में पचहत्तर फी सदी शब्द सस्कृत या प्राकृत भाषाओ
के तत्सम या तद्भव रूप हैं। तेलुगु-प्रदेश के पंडितो का संस्कृत के प्रति इतना
अधिक आग्रह रहा कि तेलुगु का सब से प्रथम व्याकरण संस्कृत-भाषा में
लिखा गया।
तेलुगु की साहित्यिक भाषाके भी दो रूप मिलते हैं। एक रूप वह है, जो सस्कृत
शब्दों तथा समस्त पदो से भरा हुआ होता है और दूसरा वह, जिसमें ठेठ तेलुगु शब्दो
का ही बाहुल्य है। ठेठ तेलुगु को 'जानु तेनुगु' कहते हैं। इन दोनो रूपो में संस्कृत-
बहुल भाषा का ही अधिक आदर होता रहा और धीरे-धीरे ठेठ तेलुगु के प्राचीन काव्यो
के बहुत-से शब्दों का प्रचलन कम होता गया। इसलिए, ठेठ तेलुगु के प्राचीन काव्यो
को समझना बहुत-से तेलुगु-भाषाभाषियो के लिए भी आज कठिन-सा हो गया है।
ठेठ तेलुगु तथा संस्कृतबहुल तेलुगु के उदाहरणो को देखने से इन दोनों में अंतर स्पष्ट
हो जायगा--
( ७ )
ठेठ तेलुगु--
चेप्पु लोनिरायि चेविलोनि जोरीग,
कटिलोनि नलुसु, फालिमूल्ल,
इटिलोनि पोरु इंतित कादया ॥
(जूतो में पड़ा हुआ ककड, कान में पहुँचा हुआ कीडा, आंख की फिरफिरी, पैरो में
कांटा और घर में झगड़ा--इनकी पीड़ा असहनीय होती है।)
संस्कृतबहुल तेलुगु--
अधरमु गदली गदलक
मधुरमु लघु भाष लुडिगि
मौन व्रतुडौ अधिकार रोग पूरित
बधिरांधक शवमु जूड पापमु सुमती ॥
[अधरो को बिना हिलाये, मधुर भाषा से रहित हो, मौन व्रत धारण करनेवाला
अधिकार-रोग से भरा व्यक्ति बहरे तथा अंधे शव के बराबर है । उसे देखना भी पाप है।
(रेखांकित शब्द संस्कृत के हैं ।) ]
इन दोनो शैलियों का सामंजस्य भाषा के जिस रूप में पाया जाय, जिसमें तेलुगु
का मुहावरा भी और संस्कृत का मधुर एव गभीर शब्द-समूह भी हो, वही तेलुगु अधिक
लोकप्रिय है और वही सुंदर समझी जाती है । रंगनाथ रामायण की भाषा में ऐसी ही
सुंदरता पाई जाती है । इसकी चर्चा यथास्थान आगे की जायगी ।
तेलुगु-साहित्य--महाकवि नन्नया का आंध्र-महाभारत तेलुगु-साहित्य के उपलब्ध
काव्य-ग्रन्थो में सबसे प्राचीन है । इसकी रचना ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य में हुई थी।
इस काव्य की प्रौढ भाषा एव उत्कृष्ट कला-कौशल को देखकर विद्वान् यह अनुमान करते हैं
कि यही महाभारत तेलुगु-साहित्य का आदिकाव्य नहीं हो सकता । उनका विचार है
कि किसी भी भाषा के प्रथम साहित्य का रूप इतना विकसित एवं प्रौढ नहीं हो
सकता; शताब्दियों की साहित्य-साधना के परिणाम-स्वरूप ही ऐसी प्रौढ रचना का
प्रणयन संभव है । यह विचार कल्पना-मात्र कहा नहीं जा सकता। सातवीं तथा आठवीं
शताब्दी के जो शिलालेख एवं तांबे के दानपत्र अबतक उपलब्ध हुए, उनमें उत्कृष्ट
काव्य-स्वरूप के नमूने मिलते हैं । अत., यह कहना सत्य से दूर नहीं होगा कि तेलुगु में
साहित्य-रचना का प्रारंभ ईसा की सातवीं शताब्दी में ही हुआ होगा, किन्तु सातवीं से
दसवीं शताब्दी तक का साहित्य हमें आज उपलब्ध नहीं हो सका ।
सन् १०५० ई० से आजतक के तेलुगु-साहित्य के इतिहास को पांच युगो में
विभाजित किया जा सकता है--
१. पुराण-युग (१०५०--१३५० ई०)
२. श्रीनाथ-युग (१३५०--१५०० ई०)
३ प्रबंध-युग (१५००--१६०० ई०)
४ दक्षिणांध्र-युग (१६००--१८७५ ई०)
५. आधुनिक-युग (१८७५ ई० से)
( द )
प्रत्येक युग का सक्षिप्त परिचय इस प्रकार है--
पुराण-युग --वैदिक धर्म तथा उसके समर्थक पुराणो के प्रचारार्थ इस युग में
साहित्य-साधना का प्रारंभ हुआ। महाकवि नन्नया ने 'महाभारत' की रचना प्रारंभ की
और अरण्य-पर्व का अर्द्ध भाग लिख भी न पाये कि उनका स्वर्गवास हो गया । उसके
दो सौ वर्ष के पश्चात् तिक्कना सोमयाजी ने विराट् पर्व से प्रारंभ कर शेष पंद्रह पर्वो की
रचना की। उसके पश्चात् एर्रना प्रग्गडा ने अरण्य-पर्व का अधूरा अंश पूरा किया । इस
तरह महाभारत की रचना तीन कवियो के द्वारा लगभग तीन सौ वर्षो में पूरी हुई ।
इन तीन महाकवियो को 'कवित्रय' कहते हैं । आन्ध्र-महाभारत तेलुगु-भाषाभाषियो के
लिए एक साथ, धर्मशास्त्र, नीति-ग्रन्थ, पुराण तथा महाकाव्य हैं। उसका प्रभाव तेलुगु-
जन-जीवन पर अक्षुण्ण हैं ।
इसी युग में रामायण की रचना भी हुई । गोनबुद्धराजु ने देशज छन्द 'द्विपदा'
में रामायण की रचना की, जो साधारण जनता के बीच अत्यंत प्रिय हुई, जिसका
हिन्दी-अनुवाद उपस्थित है। 'भास्कर रामायण' की रचना भी इसी युग में हुई,
किन्तु वह केवल पंडितों के बीच समादृत हुई । महाभारत तथा रामायण के
अलावा इस युग में शैव काव्यो की रचना अत्यधिक मात्रा में हुई । नन्नेचोड़ कवि कृत
'कुमारसम्भव', पालकुरिकि सोमनाथ-कृत 'वसवपुराणमु' तथा 'पंडिताराध्यचरित्र'
इस युग की श्रेष्ठतम शैवभक्तिपरक रचनाएं हैं, जो तेलुगु-साहित्य के उज्ज्वल आभूषणों की
भांति शोभायमान हैं। इस युग के एक और प्रसिद्ध कवि नाचन सोम हैं, जिनका 'उत्तर-
हरिवंश' एक बडी ही सुंदर कृति हैं।
श्रीनाथ-युग-- इस युग के प्रसिद्ध कवियो में श्रीनाथ तथा पोतना अग्रगण्य हैं।
श्रीनाथ राजदरबार के महाकवि तथा महापंडित थे । उन्होने कविता-शैली में क्रांतिकारी
परिवर्त्तन किया । उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं—'काशीखंडमु', 'शृंगारनैषधम्' तथा 'पलनाटि
चरित्रमु' । इनमें 'काशीखंडमु' और 'शृंगारनैषधम्' संस्कृत के काव्यो के अनुवाद हैं
और 'पलनाटिचरित्रमु' ऐतिहासिक वीर-काव्य हैं । श्रीनाथ के अनुवाद की शैली भी
निराली हैं । मूल ग्रन्थ को आधार मानते हुए, उसके समस्त काव्य-सौंदर्य को तेलुगु की
मुहावरेदार भाषा में मूर्त्तिमान् करने की उनकी क्षमता अद्भुत हैं। उनके समकालीन कवि
पोतना, तेलुगु-भाषाभाषियों के हृदय-पीठ पर सर्वदा विराजमान रहेंगे। उनकी उत्कृष्ट
रचना 'आन्ध्र-महाभागवत' हैं, जिसका प्रचार गरीब की झोपड़ी से अमीरो के
महलो तक में है । पोतना राम के भक्त थे, किन्तु उन्होने कृष्ण-प्रधान काव्य की रचना की ।
उनकी भक्ति विलक्षण थी । राम-कृष्ण, शिव-केशव में उन्होने कोई भेद नहीं किया।
उनकी भागवत के कुछ भाग, जैसे प्रह्लाद-चरित्र, गजेन्द्रमोक्ष तथा कृष्ण-लीलाएँ आदि
तेलुगु-प्रदेश में इतने प्रसिद्ध हैं कि लोग उन्हें जबानी याद करके समय-समय पर भक्ति-
भाव से गाते रहते हैं ।
प्रबन्ध-युग --यह युग तेलुगु-साहित्य का स्वर्ण-युग माना जाता है। विजयनगर-
साम्राज्य के विख्यात राजा श्रीकृष्णदेवराय का प्राश्रय पाकर तेलुगु-साहित्य ने अभूतपूर्व
उन्नति की। श्रीकृष्णदेवराय स्वयं भी कवि थे और उन्होंने 'आमुक्तमाल्यदा' नामक
एक प्रौढ काव्य की रचना की थी। उनके दरबार में आठ महाकवि थे, जो 'अष्टदिग्गज'
के नाम से प्रख्यात थे। इस युग में कई प्रबंध-काव्यो की रचना हुई । तेलुगु में प्रबंध-
काव्य की एक विलक्षण परिभाषा प्रचलित है । किसी पौराणिक, ऐतिहासिक अथवा
काल्पनिक प्रेमाख्यान को आश्रित कर आवश्यकता तथा औचित्य की दृष्टि से उसे घटा-बढ़ाकर
अपनी प्रतिभा एवं कला-कौशल के अनुसार तेलुगु की मुहावरेदार भाषा में, तेलुगु-जन-
जीवन को प्रतिबिंबित करते हुए जिस कला-कृति का निर्माण कवि करता है, उसे प्रबंध-
काव्य कहते हैं। ऐसे प्रबंध-काव्यो में अल्लसानि पेद्दना का 'मनुचरित्र', तिम्पना का
'पारिजातापहरण' तथा रामराजभूषण का 'वसुचरित्र' अत्यत प्रसिद्ध है । धूर्जटि कवि का
'कालहस्तीश्वरशतक' और तेनालि रामकृष्ण का 'पांडुरंगमाहात्म्यम्' इस युग के भक्ति-परक
महाकाव्य है। इस युग के उत्तरार्द्ध में पिंगलि सूरना ने 'फलापूर्णोदयमु' नामक एक मौलिक
प्रबंधन्काव्य की रचना की, जो वस्तु, भाव एवं कला की दृष्टि से बेजोड है। उन्होने
'राघवपांडवीयम्' नामक एक द्वयर्थी काव्य लिखा, जो अपने ढंग का प्रथम काव्य है।
इसको अपना आदर्श मानकर आगे कई कवियो ने तीन-तीन, चार-चार अर्थवाले
काव्योकी रचना की।
दक्षिणांध्र-युग-विजयनगर-साम्राज्य के पतन के पश्चात् आन्ध्र-साम्राज्य दक्षिण
म तंजाऊर और मदुरै में प्रस्फुटित हुआ । वहां के प्रायः राजा स्वय विद्वान् होते थे
और विद्वानो तथा कवियो का बहुत आदर करते थे। उनका आश्रय प्राप्त करके कई तेलुगु-
कवि तेलुगु-साहित्य-मंदिर को अपनी सरस कृतियो से सजाने लगे। इस युग की कविता
भी प्रबंध-शैली को ही अपनाकर चली, किन्तु समय के साथ-साथ उसकी भाव-प्रवणता
में शिथिलता आती गई । भाव-सौंदर्य की अपेक्षा पांडित्य-प्रदर्शन एवं आश्रयदाता
की अत्युक्तिपूर्ण प्रशंसा को ही कवि अधिक महत्त्व देने लगे । फिर भी, इस
युग में कई सुंदर काव्यो की रचना हुई, जिनमें ककटि पापराजू-कृत 'उत्तर-
रामायण', चेमकूरि वेंकट कवि-कृत 'विजयविलासम्', कवयित्री मोल्ला द्वारा विरचित
'रामायण' तथा कवयित्री मुद्ददु पलनी कृत 'राधिका स्वातनमु' आदि अत्यत
प्रसिद्ध हैं ।
आधुनिक काल के साहित्य का परिचय देने के पहले तेलुगु-साहित्य की एक
और प्रवृत्ति का उल्लेख कर देना आवश्यक है । तेलुगु की प्रबंध-काव्य-धारा के साथ ही
'मुक्तक-काव्य-धारा का भी विकास समानांतर में होता रहा । मुक्तक-साहित्य के
अतर्गत शतक, गीत, सकीर्त्तन तथा यक्षगान आदि आते हैं । तेलुगु में लगभग एक
हजार शतक हैं, जिनमें बहुत-से प्रकाशित हो चुके हैं। तेलुगु-साहित्य में इन शतको का
महत्त्वपूर्ण स्थान है । इनमें बहुत-से शतक भक्तिपरक हैं, कुछ नीति-बोधक हैं और
कुछ शृङ्गार-रस से भरे हैं। इनकी कविता उच्चकोटि की है। इसके अलावा समय-समय
पर भक्तो के द्वारा रचे हुए पद तथा संकीर्त्तन साहित्य तथा संगीत की दृष्टि से अद्वितीय हैं ।
अन्नमय्या, त्यागय्या और क्षेत्रय्या, ये तेलुगु के तीन भक्त-कवि हैं, जिन्होने भक्ति के उन्मेष में
( १० )
कितने ही मधुर गीतो का गान किया है। त्यागय्या (त्यागराज) तमिलनाड के तिरुवाड़ी
नामक स्थान में हुए थे । उनके कीर्त्तन सारे दक्षिण में गाये जाते हैं।
आधुनिक युग--आधुनिक युग में तेलुगु-गद्य की अच्छी उन्नति हुई। गद्य की
विभिन्न प्रवृत्तियो को प्रारभ करके गद्य का विकास करने का श्रेय स्व० श्रीवीरेशलिंगम्
पंतुलु को है । उन्होंने स्वयं कितने ही निबंध, नाटक, प्रहसन तथा उपन्यास आदि लिखे और
दूसरे लेखको को लिखने की प्रेरणा दी। आधुनिक तेलुगु-साहित्य में उनका वही स्थान है, जो
हिन्दी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का है। इस युग के प्रारम्भ में कई ऐसी संस्थाओ की स्थापना हुई,
जो गद्य-साहित्य के निर्माताओ को प्रोत्साहन देती थीं। चिलकमर्त्ति लक्ष्मीनरसिंहम्, पानुगंटि
नरसिंहराव, गुरजाड़ अप्पाराव उन प्रारंभिक लेखको में से हैं, जिन्होंने गद्य-साहित्य के निर्माण
में अथक परिश्रम किया था । इसी समय व्यावहारिक भाषा को साहित्य-रचना के लिए प्रयोग
करने के प्रश्न पर जबरदस्त आंदोलन शुरू हुआ। कई युवा-लेखको तथा पत्र-पत्रिकाओ ने
इस आंदोलन का समर्थन किया । इस आंदोलन के फलस्वरूप बहुत बड़ी संख्या में गद्य-लेखक
निकल आये, जो आजतक गद्य-साहित्य की सर्वतोमुखी उन्नति के लिए प्रयास कर रहे हैं ।
कविता के क्षेत्र में भी तेलुगु-साहित्य भारत की अन्यान्य भाषाओ की साहित्यिक
प्रगति के साथ कदम-ब-कदम आगे बढ़ रहा है। अँगरेजी साहित्य का अध्ययन, स्वतंत्रता-
आंदोलन, वर्त्तमान जीवन का संघर्ष और व्यक्ति-स्वातंत्र्यवाद ने इस युग के कवियो को एक
नई दृष्टि प्रदान की तथा उसका प्रभाव उनकी कविताओ में लक्षित होने लगा । छाया-
वाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की जैसी कविताएँ हिन्दी-साहित्य में पाई
जाती है, वैसी रचनाएँ तेलुगु में भी है। भेद इतना ही है कि तेलुगु में उनके नाम भिन्न-
भिन्न हैं--जैसे भाव-कविता, अतिवास्तविक कविता, अभ्युदय-कविता आदि। वर्त्तमान समाज में
पाई जानेवाली आर्थिक असमानता, संघर्षमय जीवन, प्राचीन रूढियो तथा परंपराओं के प्रति
विद्रोह तथा समस्त मानव-जाति के कल्याण का आग्रह आज की कविताओ में दिखाई पड़ते हैं।
[ २ ]
रामायण, महाभारत एवं भागवतपुराण भारत की सांस्कृतिक एकता को सुरक्षित
रखनेवाले महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। राम और कृष्ण भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं । वस्तुतः,
आसेतुहिमाचल इन अलौकिक महापुरुषो की पूजा होती है और प्रत्येक भारतीय भाषा
के कवि इनके जीवन-वृत्तो का गान करने में ही अपने कवि-कर्म की सफलता मानते आये हैं।
रामायण की कथा नित्य नवीन है । हम अपनी बाल्यावस्था से ही न जाने
कितनी वार और कितने लोगो के द्वारा इस कथा को सुनते तथा स्वयं पढ़ते रहे हैं,
फिर भी जब-जब इसे सुनने या पढ़ने का अवसर मिलता है, तब-तब हम में नवोत्साह
जागरित हो उठता है । यही इस कथा की महत्ता है । वाल्मीकि-रामायण में चतुरानन के
मुंह से निकले हुए निम्नलिखित शब्द अक्षरशः सत्य प्रमाणित होते हैं -
यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले ।
तावत् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥
( ११ )
तेलुगु भाषा में रामकथा-संबंधी कितने ही काव्य हैं । ये काव्य प्राय दो रूपों
में मिलते हैं--प्रबंध-काव्य तथा मुक्तक-गीत । प्रबंध के रूप में प्राप्त होनेवाले काव्यों
में अधिकतर काव्य वाल्मीकि-रामायण के सरस अनुवाद-मात्र हैं । 'रंगनाथ रामायण'
तथा 'मोल्ल रामायण' ही दो ऐसे प्रबंध-काव्य हैं, जो स्वतंत्र रचना कहे जा सकते हैं
इन दोनों की कथा यद्यपि प्रधानतया वाल्मीकि-रामायण को आधार मानकर चली है,
तथापि काव्य-रचना के लक्ष्य में, कथा-वस्तु के विधान में वर्णनों में, तथा चरित्र-
चित्रण में नवीनता है । इन दोनों में 'मोल्ल रामायण' आकार में छोटी है । 'रंगनाथ
रामायण' ही आंध्र-देश में अधिक लोकप्रिय है । इसके रचना-काल तक जनता में
प्रचलित रामकथा-संबंधी कई ऐसे प्रसंग इस रामायण में मिलते हैं, जो वाल्मीकि-
रामायण में नहीं मिलते । अबतक रामकथा-संबंधी जितने प्रबंध-काव्य उपलब्ध हुए,
उनमें यही सब से प्राचीन काव्य है ।
'रंगनाथ रामायण' संबंधी चर्चा प्रारंभ करने के पहले हम एक विषय स्पष्ट कर
देना आवश्यक समझते हैं । जिस प्रकार तुलसी-रामायण उत्तर-भारत के लोक-जीवन के
पोर-पोर में व्याप्त होकर, उसके पारिवारिक सामाजिक, राजनीतिक एव सांस्कृतिक
जीवन को प्रभावित कर सकी, उसी प्रकार और उसी मात्रा में तेलुगु-भाषाभाषियों के
जीवन को तेलुगु-रामायण प्रभावित नहीं कर सकी । आंध्र-जनता के बीच वह कार्य
आंध्र-महाभारत तथा आंध्र-महाभागवत ने किया । इन दोनों ग्रन्थों ने तेलुगु-प्रदेश में
लोक-जीवन को प्रभावित ही नहीं, बल्कि अनुप्राणित भी किया है । तुलसी-रामायण
हिन्दी-भाषाभाषियों के लिए एक साथ धर्म-ग्रन्थ, पुराण, नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र तथा
लोक-जीवन का पथ-प्रदर्शक है । तेलुगु-प्रदेश में वह स्थान तेलुगु-रामायण को नहीं,
बल्कि तेलुगु-भागवत को प्राप्त है । तेलुगु-भाषाभाषियों के लिए 'आंध्र-महाभारत'
एक साथ धर्मशास्त्र, वेदान्त-ग्रन्थ, नीति-ग्रन्थ, महाकाव्य और इतिहास हैं ।
परन्तु, फिर भी राम की कथा, जो परंपरा से जनता के बीच लोक-कथाओं
तथा लोक-गीतों के रूप में प्रचलित थी, अपना अक्षुण्ण प्रभाव लोगों के जीवन पर
डालती रही । आंध्र-देश में समय-समय पर कई ऐसे भक्त हुए, जिन्होंने अपने भक्ति-रस
पूर्ण गीतों एव भजनों के द्वारा राम-भक्ति का ऐसा प्रचार लोगों में किया कि श्रीराम
आंध्रों के इष्टदेव-से हो गये । आंध्र-प्रदेश में विरला ही ऐसा कोई गांव होगा, जहाँ
श्रीराम का मंदिर न मिलता हो । तेलुगु-भाषाभाषियों में रामय्या, रामन्ना, रामराव,
रामचन्द्र राव, सीतय्या, लक्ष्मण्ना आदि नामों की तो गिनती ही नहीं है ।
किन्तु, प्रश्न यह है कि तुलसी-रामायण के समान सर्वव्यापक तथा प्रभावशाली
राम-काव्य तेलुगु में क्यो नहीं लिखा जा सका ? ऐसी बात नहीं कि तेलुगु-प्रदेश में
इसके लिए आवश्यक प्रतिभा का अभाव था । यदि ऐसी बात होती, तो महाभारत एव
भागवत जैसे प्रौढ एव सरस महाकाव्यों की रचना ही तेलुगु में नही होती । अतः इसका
कारण जानने के लिए हमें इतिहास का आश्रय लेना पड़ेगा ।
यह सर्वविदित है कि भगवान् बुद्ध की धार्मिक क्रान्ति से वैदिक धर्म को बड़ा
भारी धक्का लगा । बौद्धधर्म कई शताब्दियों तक उत्तर-भारत के राजाओं के द्वार
( १२ )
सन्नाहूत रहा । उत्तर-भारत क कुछ राजाओ न जैनधर्म को भी अपनाया था । धीरे-
धीरे इन दोनो धर्मों न अपनी विजय-यात्रा सदूर दक्षिण तक बढ़ाई । दक्षिणापथ के
कई राजाओ ने इस धर्म क आगे अपने घुटने टेक दिये। आंध्र-राजाओ में सबसे प्रथम
शातवाहन थे, जिन्होने वैदिक धर्म के अनुयायी होते हुए भी बौद्ध तथा जैन धर्मों का
आदर किया । इन्हीं शातवाहनो के सामंत इक्ष्वाकु-वंश के राजा ( ई० पू० २०० )
बौद्धधर्म के अनुयायी बने । इन्होने बौद्ध तथा जैन धर्मों को बहुत आदर दिया और
वैदिक' धर्म के प्रभाव को नष्ट करने का भी यथाशक्ति प्रयत्न किया । इस प्रकार, दक्षिण
भारत में वैदिक, बौद्ध एवं जैन धर्मों के बीच कई शताब्दियो तक संघर्ष चलता रहा ।
बीच-बीच में ऐम आंध्र-राजा भी हुए, जिन्होने वैदिक धर्म को प्रोत्साहन दिया और बौद्ध
तथा जैन धर्मों को समूल नष्ट करने का प्रयत्न किया ।
सन् ८२५ ई० में शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ । उन्होने बौद्धधर्म के प्रचार
को रोकने तथा वैदिक धर्म को पुन. प्रतिष्ठापित करने का जो प्रयत्न किया, उससे
आंध्र-प्रदेश के वैदिक धर्मावलंवियो को आंध्र-देश से बौद्धधर्म को समूल उखाड़ फेंकने
की प्रेरणा मिली। उन्होने कई मोर्चों पर बौद्धधर्म का विरोध किया । बौद्धधर्मावलंवियो
को तरह-तरह की यातनाएँ दी गई और कई ऐसे ग्रन्थो के निर्माण का प्रयत्न हुआ,
जिनके द्वारा वैदिक धर्म तथा उनके समर्थक पुराणो की प्रतिष्ठा बढ़ी। वातावरण भी
इसके लिए अनुकूल था । उसी समय तमिल-देश में अनेक वैष्णव तथा शैव संतो का
आविर्भाव हुआ, जिन्होंने अपनी सरस एवं सबल रचनाओ से बौद्ध तथा जैन धर्मों का
विरोध आरंभ किया । उसी युग में आंध्र में राजराज नरेन्द्र नामक एक विख्यात राजा हुए
जो वैदिक धर्म के अनन्य अनुयायी थे। इन महापुरुषो का प्रोत्साहन पाकर तेलुगु-साहित्य
में पुराण-युग प्रारंभ हुआ, जिसमें प्रधानतया पुराणो और इतिहासो का अनुवाद-कार्य हुआ ।
इन ग्रन्थों की रचना करने में कवियो का उद्देश्य यही था कि उनके द्वारा भगवान्
के उस लोकरंजनकारी रूप की अभिव्यक्ति की जाय, जिसको आलंबन मानकर मानव-
हृदय वैदिक धर्म के कल्याण-मार्ग की ओर अपने आप आकृष्ट हो सके । लगभग
सन् १०२५ ई० में कवि नन्नया ने महाभारत का अनुवाद प्रारंभ किया, किन्तु वे महा-
भारत के केवल ढाई पर्व-मात्र की रचना कर पाये थे कि उनका स्वर्गवास हो गया।
इसके पश्चात् तेलगू-रामायण (रंगनाथ रामायण) की रचना हुई ।
तेलुगु में रामायण की रचना को प्रेरणा देनेवाली परिस्थितियां तुलसी-रामायण
की रचना के लिए प्रेरणा देनेवाली परिस्थितियो से भिन्न थीं। रंगनाथ रामायण का उद्देश्य
वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा को बढ़ाना तथा रामचन्द्र जैसे अलौकिक शक्तिशाली एवं सौदर्य-
संपन्न व्यक्ति तथा अवतार-पुरुष के भव्य चरित्र को प्रस्तुत करना था, जिसकी अनुभूति-
मात्र से मानव-हृदय गद्गद हो उठे। या यों कह सकते हैं कि रंगनाथ रामायण उस
व्यापक पृष्ठभूमि को तैयार करने में सफल हुई, जो पीछे चलकर राम के प्रति भक्ति-
भावना को जन्म देने के लिए आवश्यक थी। भक्ति का प्रादुर्भाव अचानक नहीं होता । अनंत
सौंदर्य, शक्ति और शील से संपन्न चरित्र के प्रत्यक्षीकरण से व्यक्ति का हृदय पहले
( १३ )
आश्चर्य से भर जाता है और धीरे-धीरे वह उस शक्ति-सपन्न व्यक्ति के महत्त्व की
अनुभूति करने लगता है । उसके उपरात उसकी प्रशसा करने की इच्छा सहज ही उसके
मन में जागरित होती है । महान् व्यक्ति की प्रशसा करने की यह इच्छा ही भक्ति की
पहली सीढ़ी है । रंगनाथ रामायण के प्रतिभावान् रचयिता ने अपनी रचना के द्वारा
यही कार्य संपन्न किया ।
रंगनाथ रामायण वाल्मीकिरामायण का मात्र अनुवाद नहीं है । स्थूल रूप से
वाल्मीकिरामायण की कथा इसमें आ तो गई है, किन्तु उसके कवि ने बीच-बीच में
ऐसे प्रसंग भी जोड़े हैं, जो कदाचित् उस समय तक जनता के बीच लोक-कथाओ के रूप
में प्रचलित हो चुके थे । हम नीचे ऐसे कुछ प्रसगो का उल्लेख करेंगे, जो वाल्मीकि-
रामायण में नहीं मिलते, यद्यपि उनमें से कुछ प्रसंग जैनग्रन्थो में मिलते हैं । कदाचित्
कवि ने वहीं से इन प्रसगो को लेकर अपनी रामायण में सम्मिलित कर दिया हो
१. जंबुमाली का वृत्तात, २. रावण से तिरस्कृत हो विभीषण का अपनी माता के
पास जाना, ३ कैकेसी (रावण की माता) का रावण को हितोपदेश, ४. रावण का राम की
धनुर्विद्या-कुशलता की प्रशसा करना, ५. गिलहरी की भक्ति, ६. नागपाश में बद्ध होकर
राम-लक्ष्मण के पास नारदजी का आना, ७. रावण के आगे मदोदरी का राम की महिमा
एवं शौर्य की प्रशसा करना, ८. दूसरी बार सजीवनी लाते समय हनुमान् तथा माल्यवान्
का युद्ध, ६. कालनेमि का वृत्तात, १०. सुलोचना का वृत्तात, ११. शुक्राचार्य के आगे रावण
का दुखड़ा रोना, १२. रावण का पाताल-होम, १३. अंगद का रावण के समक्ष
मदोदरी को बुला लाना, १४. रावण की नाभि में स्थित अमृत-कलश को
सोखने के निमित्त आग्नेयास्त्र का प्रयोग करने की विभीषण की सलाह,
१५ लक्ष्मण की हँसी ।
उक्त प्रसंगों में जंबुमाली का वृत्तांत, कालनेमि का वृत्तात, रावण के समक्ष अंगद
का मंदोदरी को घसीटकर लाना, आग्नेयास्त्र का प्रयोग करने की विभीषण की सलाह
आदि ऐसे हैं, जो मूलकथा की घटनाओ को अधिक तर्क-सगत सिद्ध करने के निमित्त
जोड़े हुए प्रतीत होते हैं। रावण से तिरस्कृत होकर विभीषण का अपनी माता के पास
जाना, कैकेसी का हितोपदेश और सुलोचना का वृत्तात आदि रावण के परिवार के लोगो
के चरित्र पर प्रकाश डालने के साथ ही साथ इस ओर भी इगित करते हैं कि रावण
भूत-प्रेतो का वशज एव भूत-प्रेतो का राजा नहीं था, किन्तु एक विलक्षण परिवार में
उत्पन्न हुआ विशिष्ट व्यक्ति था । रावण का, राम की धनुर्विद्या की कुशलता की प्रशसा
करना, मंदोदरी का रावण के समक्ष श्रीराम की महिमा एव पराक्रम की प्रशंसा करना,
गिलहरी का वृत्तात आदि प्रसंग राम के उस लोकोत्तर व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हैं,
जो शत्रुओ की भी प्रशंसा प्राप्त करने की क्षमता रखता था । साथ ही साथ, वे रावण
तथा मंदोदरी के चरित्र पर भी प्रकाश डालते हैं । उक्त प्रसगो के अलावा इस रामायण
में यत्र-तत्र ऐसे वर्णन भी मिलते हैं, जो वाल्मीकिरामायण में नहीं मिलते, किन्तु जिन्हें
कवि ने वैदिक धर्म में लोगो की निष्ठा बढाने के निमित्त जोडा है ।
पात्रों का चित्रण-पात्र-चित्रण की दृष्टि से रंगनाथ रामायण विशेष महत्त्व रखती है ।
जैसा हमने पहले ही निवेदन किया है, रंगनाथ रामायण में श्रीराम के महिमा-समन्वित शक्ति,
शील तथा सौंदर्य से परिपूर्ण चरित्र को प्रस्तुत करने का अधिक प्रयत्न हुआ है । इस रामायण
के नायक राम जहां एक धीरोदात्त वीर तथा सर्वगुणसंपन्न व्यक्ति थे, वहां इस काव्य
का खलनायक रावण भी उदार, वीर, साहसी, असमान पराक्रमी, राजनीतिकुशल, स्वाभि-
मानी एवं शिवजी का अनन्य भक्त भी था । किन्तु, उसके दोष भी उसके गुणोसे
कम नहीं थे । वह कामुक, अभिमानी तथा उद्धत था । इसलिए, इस रामायण के कवि ने
रावण के चरित्र का चित्रण करने में अपनी अद्वितीय प्रतिभा एव सहृदयता का
परिचय दिया है । उन्होंने एक कलाकार तथा इतिहास-लेखक—इन दोनो के उत्तर-
दायित्व को सफलतापूर्वक निभाया है । जहाँ उन्होंने रावण के कृष्ण पक्ष की निंदा की है
वहाँ उसके उज्ज्वल पक्ष को प्रकट करने की उदारता भी दिखाई है । उनकी दृष्टि
में रावण एक विलक्षण वीर था, जिसमें जड़-चेतन तथा गुण-दोषो का अद्भुत
सम्मिश्रण था। उसका पतन इसलिए हुआ था कि जड़ ने चैतन्य पर पूरा-पूरा अधिकार
प्राप्त कर लिया था । कदाचित् यह रामायण के प्रति द्राविड़ दृष्टि का प्रमाण भी हो ।
द्राविड़ लोग रावण को उसी दृष्टि से नहीं देखते, जिस दृष्टि से आर्यों ने उसे देखा और
राक्षस, निशाचर आदि नामो से संबोधित किया । द्रविड़ दृष्टि में रावण भी एक वीर,
विद्वान्, पराक्रमी मनुष्य ही था, किन्तु उसके गुणो पर दुर्गुणो ने विजय प्राप्त कर ली थी
और यही उसके सर्वनाश का कारण हुआ । इसके अतिरिक्त, कला की दृष्टि से
देखा जाय, तो हमें यह मानना पड़ेगा कि रामचन्द्रजी का प्रतिद्वन्द्वी केवल एक लपट
तथा नीच व्यक्ति नहीं हो सकता था । रावण को अपने बल-पौरुष का जहाँ अभिमान है,
वहां उसके हृदय में अपने शत्रु के गुणो के प्रति आदर भी है । वह राम के बल-
विक्रम पर आश्चर्य ही प्रकट नहीं करता, वल्कि उनकी प्रशंसा भी करने लगता है। श्रीराम
की धनुर्विद्या की निपुणता देखकर रावण कहता है—
नल्लवो रघुराम नयनाभिराम, विल्लविद्या गुरुव, वीरावतार ।
वापुरे, राम भूपाल, लोकमुल नीपाटि विलुकाडु नेर्चुने कलग ?
(हे नीलमेघश्याम, नयनाभिराम, धनुर्विद्या-निपुण, वीरावतार, रघुराम,
हे राजा राम, इस संसार में तुम्हारे समान धनुर्धर और कोई हो सकता है ?)
रावण की इस प्रशंसापूर्ण शब्दो को सुनकर रावण के मत्री रावण से कहते हैं
कि आपका इस प्रकार शत्रु की प्रशंसा करना आपको शोभा नहीं देता । तब रावण
कहता है--
विल्लुविद्या पेंपुनु, विक्रम क्रममु, गलितनवुनु, बाहुगर्व राजसमु,
लादियो गुणमुल नधिकुडैनहि, कोदंडदीक्षा गुरुनितो राज
वरुनितो, रामभूवरुनितो नोरुलु पकिचि चूड नेपट्टुन नैन,
साटिये इम्भूडु जगमुलयदु ? मेटि शूरुल पंषु पेच्चंग वलदे ?
( १५ )
(धनुर्विद्या-नैपुण्य, पराक्रम, शौर्य, बाहुबल आदि गुणो में श्रेष्ठ राजा राम की समता
करनेवाला तीनो लोको में कौन है ? क्या महान् पराक्रमी व्यक्तित्वयो की महानता की प्रशसा नहीं
करनी चाहिए ?
रावण के इन शब्दो से कवि दो उद्देश्यो की पूर्ति करना चाहते हैं। रावण के ये
वचन जहाँ एक ओर उसकी उदारता प्रकट करते हैं वहाँ वे शत्रु के द्वारा भी
प्रशसा प्राप्त करनेवाले श्रीराम के असाधारण एवं अलौकिक व्यक्तित्व पर भी प्रकाश
डालते हैं ।
यही नहीं, रावण अच्छी तरह जानता था कि श्रीराम विष्णु के अपर रूप हैं
और उनके हाथो मरने से मोक्ष की प्राप्ति होती है । इसलिए, वह सोचता है कि युद्ध
के लिए ललकारनेवाले शत्रु के सामने घुटने टेककर में अपनी दीनता क्यो प्रकट
करूँ और अपनी वीरता को क्यो कलंकित करूँ । जब मंदोदरी राम की महिमा
का वर्णन करके रावण को युद्ध करने से रोकने का प्रयत्न करती हैं, तो रावण
कहता है-
ये नेल्लभगुल ఁनिक राघवुल बोनीक चपुदु; भूमिज नीय
वारुठ बलुडनै, यटु गाक येनु श्रीरामु शरमुलचे जत्तुनेनि
नाकवासुलु मेच्च ना कोरुचुन्न वेंकुंठ मेदुरागवच्चु निच्चटिकि
ललन नीवेटिकि ? लक येमिटिकि ? दलकोन्नु मुक्ति सत्पथमु गेकोडु ।
(अब मैं किसी भी प्रकार राघवो का वध करूँगा ही; मैं सीता को नहीं दूंगा। यदि
इसके विपरीत मैं श्रीराम के शरो से ही मारा जाऊँगा, तो मेरा चिर अभिलषित
स्वर्ग मेरे पास स्वयं आ जायगा और स्वर्ग के निवासी मेरी प्रशसा करेंगे । जब मैं
मुक्तिपथ को प्राप्त करने जा रहा हूँ, तब हे सुन्दरी ! मुझे न तुम्हारी आवश्यकता है न
लका की ।)
वाल्मीकिरामायण में सुलोचना का वृत्तात नहीं मिलता है । तुलसी-रामायण
की कुछ प्रतियो में इस कथा का बडा सरस वर्णन मिलता है। किन्तु पडितो का विचार है
कि तुलसी-रामायण का यह अंश प्रक्षिप्त है । रंगनाथ रामायण में इस महान् साध्वी
के चरित्र का अत्युत्तम चित्रण मिलता है । बँगला-कवि माइकेल मधुसूदन ने अपनी रचना
'मेघनाद-वध' में सुलोचना के चरित्र को विशेष प्रधानता दी है और उस वीर एव
सती-साध्वी स्त्री का एक भव्य चरित्र उपस्थित किया है । इन्द्रजीत की मृत्यु के उपरात
उसकी वीर पत्नी सुलोचना अपने पति के मृत शरीर के साथ सती होना चाहती है ।
अतः, वह अपने ससुर रावण से इन्द्रजीत के मृत शरीर को मँगा देने की प्रार्थना करती है ।
किन्तु, रावण अपनी असमर्थता प्रकट करता है; क्योकि इन्द्रजीत का शव शत्रुओ के अधीन
में था । तब सुलोचना अपने पति का मृत शरीर प्राप्त करने के हेतु स्वयं साहस के साथ
शत्रु-शिविर में चली जाती है। वहाँ पहुँचकर वह पहले रामचन्द्रजी से पति-भिक्षा देने
की प्रार्थना करती है । उसके साहस पति-भक्ति एवं निर्मल चरित्र से प्रभावित होकर
रामचन्द्र उसकी प्रार्थना स्वीकार करने को प्रस्तुत-से होते दीखते हैं । तब हनुमान् उन्हें
( १६ )
समझाते हैं कि ब्रह्मा का लेख झूठा नहीं होने देना चाहिए। इस पर रामचन्द्र सुलोचना
को आश्वासन देते हैं कि अगले जन्म में तुम अपने पति के साथ चिरकाल तक सुखमय
जीवन व्यतीत करने के उपरांत वैकुंठ-धाम प्राप्त करोगी। इसके पश्चात् सुलोचना राम से
अपने पति का शरीर माँगती हैं । तब सुग्रीव उसे ताना देते हुए कहता है—'यदि तुम
पतिव्रता हो, तो अपने मृत पति से वार्तालाप करो।' सुलोचना इस चुनौती को स्वीकार
करती हैं और युद्ध-भूमि में पड़े हुए अपने पति के शव के पास जाकर बड़े ओजपूर्ण
शब्दों में कहती हैं—'यदि मैं मन, वचन, कर्म से अपने पति की सच्ची भक्ति करती हूँ,
तो मेरे पति सजीव होकर मुझसे वार्तालाप करें।' तब मेघनाद का शव आँखें खोलकर
कहता है—'हे प्रिये ! मेरे पिता ने ही मुझे मारा है। नहीं तो और किसकी ऐसी शक्ति थी
कि मुझे मार सके, काल की गति प्रबल है। इसलिए चिन्ता मत करो।' इतना
कहकर इन्द्रजीत की आँखें सदा के लिए बंद हो जाती हैं। इसके पश्चात् सती सुलोचना
अपने पति के शव को साथ लेकर जाती हैं और उसके साथ सती होकर देवलोक में
पहुँच जाती हैं।
कला-पक्ष--कला की दृष्टि से भी रंगनाथ रामायण उच्च कोटि का महाकाव्य है।
कला के उत्कृष्ट चमत्कार इसके प्रत्येक पृष्ठ में दृष्टिगोचर होते हैं। कवि संस्कृत के
काव्य-शास्त्र के निष्णात विद्वान् होने के कारण उक्ति-वैचित्र्य एव अर्थगौरव, इन दोनो
का उचित अनुपात बनाये रखने में सर्वथा सफल हुए हैं। उनकी कला-साधना में पग-पग
पर उनका हाथ बँटानेवाले अनुप्रास एवं यमक अलंकारों की छटा कवि के अगाध
पांडित्य एवं भाषा पर उनके विलक्षण अधिकार का प्रमाण प्रस्तुत करती है। भावों की
मार्मिक अभिव्यंजना के लिए प्रयुक्त अर्थालंकार इतने स्वाभाविक हैं कि हम कवि की
औचित्य-प्रियता पर मुग्ध हो जाते हैं। रंगनाथ रामायण की भाषा विलक्षण माधुर्य एवं
गंभीरता से परिपूर्ण है । तेलुगु की साहित्यिक भाषा के जिन दो रूपों की चर्चा पहले की
गई है, उन दोनो रूपों का सुन्दर सम्मेलन इस काव्य में हो गया है। कवि
का तेलुगु एवं संस्कृत दोनो भाषाओ पर पूरा-पूरा अधिकार था और दोनो भाषाओ के
शब्द-भांडार उनको आदेश का पालन के लिए सर्वथा प्रस्तुत रहते दिखाई देते हैं।
कवि ने तेलुगु की सजीव एवं मधुर मुहावरेदार भाषा के साथ संस्कृत-शब्दो का
ऐसा सुन्दर मेल कराया है कि भाषा में मणि-कांचन-योग की-सी शोभा आ गई है।
इसकी भाषा का एक नमूना नीचे दिया जाता है—
राज-तिलक चेतोविनिर्मलशिष्ट विशिष्ट, गौतम जावालिकश्यप वामदेवाहुलो
वरमुनीश्वरुल नामादि बहुवेद चतुर वोवकुल भरतुडु रप्पिचि भय भुक्तु लोप्प, परम सम्मद
वचोभंगुलु, मेरय 'श्री रामुनकु पट्टाभिषेकंबु सेयुडारूढ नियतितो' ननि पलुक वारु पूनि
मंगल तूर्य मुलु मोयुचुंड, जानकी रामुल चडुरोप्प तेच्चि रमणीयतरमैन रत्नपीठमुन, कोडरोप्प
निरुवुर कूर्चुंड बनि चि मानित वेदोक्त मंत्र पूर्वकमुग अभिषेकंवु करमथिचेय ना रामुनीदल
ना पूर्णवारि धार डग्गएनप्पुडु तग चूडनोप्पे गीर्वाण मुत्युलु कीर्तनल सेय पार्वती सहितुडै
प्रणुनिपनोप्पु अंगजहर मौलि नमल नैतोरुगु गंगा नदियु वोले कमनीय मगुचु ना तीर्थचरुलु